Saturday, March 7

मिर्गी (Epilepsy)

मिर्गी एक तंत्रिकातंत्रीय विकार (न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर) है इस रोग में मस्तिष्क में किसी गड़बड़ी के कारण बार-बार दौरे पड़ने की समस्या हो जाती है। मिर्गी के दौरे के समय व्यक्ति का दिमागी संतुलन पूरी तरह से गड़बड़ा जाता है और उसका शरीर लड़खड़ाने लगता है। इसका प्रभाव शरीर के किसी एक हिस्से पर देखने को मिल सकता है, जैसे चेहरे, हाथ या पैर पर।

कारण :
• हमारे मस्तिष्क में खरबों तंत्रिका कोशिका होती है। इन कोशिकाओं की क्रियाशीलता हमारे क्रिया-कलापों को नियंत्रित करती है। इन कोशिकाओं में एक विद्युतीय प्रवाह होता है जो नाड़ियों द्वारा प्रवाहित होता है। ये सारे कोष विद्युतीय नाड़ियों के माध्यम से आपस में संपर्क बनाये रखते हैं, लेकिन कभी मस्तिष्क में असामान्य रूप से विद्युत का संचार होने से व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के झटके लगते हैं और वह मूर्छित हो जाता है। ये मूर्छा कुछ सेकिंड से लेकर ४-५ मिनट तक चल सकती है।
• सामान्तः मिर्गी रोग प्रकार की हो सकती है आंशिक तथा पूर्ण। आंशिक मिर्गी में मस्तिष्क का एक भाग अधिक प्रभावित होता है। पूर्ण मिर्गी में मस्तिष्क के दोनों भाग प्रभावित होते हैं। इसी प्रकार अनेक रोगियों में इसके लक्षण भी भिन्न-भिन्न होते हैं। प्रायः रोगी व्यक्ति कुछ समय के लिए चेतना खो देता है।
• कुछ विशेषज्ञों के अनुसार सूअर की आंतों में मिलने वाले फीताकृमि के संक्रमण से भी मिर्गी की संभावना रहती है। इस कृमि का सिस्ट यदि किसी प्रकार मस्तिष्क में पहुँच जाए तो उसके क्रियाकलापों को प्रभावित कर सकता है, जिससे मिर्गी की आशंका बढ़ जाती है।
• मिर्गी का एक कारण सिर की चोट भी है।
• बच्चे के जन्म के समय चोट लगना भी मिरगी रोग का एक कारण होता है।

लक्षण :
• मिर्गी के दौरों में तरह-तरह के लक्षण होते हैं, जैसे कि बेहोशी आना, गिर पड़ना, हाथ-पांव में झटके आना।
• मिर्गी किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। अनेक बीमारियों में मिर्गी जैसे दौरे आ सकते हैं।
• मिर्गी के सभी मरीज एक जैसे भी नहीं होते। किसी की बीमारी मध्यम होती है, किसी की तेज। यह एक आम बीमारी है जो लगभग सौ लोगों में से एक को होती है।
• दौरों की अवधि कुछ सेकेंड से लेकर दो-तीन मिनट तक होती है। और यदि यह दौरे लंबी अवधि तक के हों तो चिकित्सक से तत्काल परामर्श लेना चाहिये।
• मिर्गी रोगियों में आवाज बदल जाने, चक्कर आने, जबान लड़खड़ाने की समस्या पाई जाती है।

प्राथमिक उपचार :
• जब रोगी को दौरे आ रहे हों, या बेहोश पडा हो, झटके आ रहे हों तो उसे साफ, नरम जगह पर करवट से लिटाकर सिर के नीचे तकिया लगाकर कपडे ढीले करके उसके मुंह में जमा लार या थूक को साफ रुमाल से पोंछ देना चाहिये।
• दौरे का काल और अंतराल समय ध्यान रखना चाहिये। ये दौरे दिखने में भले ही भयानक होते हों, पर असल में खतरनाक नहीं होते।
• दौरे के समय इसके अलावा कुछ और नहीं करना होता है, व दौरा अपने आप कुछ मिनटों में समाप्त हो जाता है।

क्या नही करें :
• रोगी को जूते या प्याज नहीं सुंघाना चाहिये।
• दौरे के समय हाथ पांव नहीं दबाने चाहिये न ही हथेली व पंजे की मालिश करें क्योंकि दबाने से दौरा नहीं रुकता बल्कि चोट व रगड़ लगने का डर रहता है।
• रोगी के मुंह में कुछ नहीं फंसाना चाहिये। यदि दांतों के बीच जीभ फंसी हो तो उसे अंगुली से अंदर कर दें अन्यथा दांतों के बीच कटने का डर रहता है।

मिर्गी रोगियों के लिए सावधानी :
• मिरगी के रोगी सामान्य खाना खा सकते हैं अतएव उन्हें भोजन का परहेज नहीं रखना चाहिये।
• रोगी व्रत, उपवास, रोजे आदि रखने से कुछ रोगियों में दौरे बढ़ सकते हैं अतः इनसे बचना चाहिये।
• यदि अन्न न लेना हो तो दूध या फलाहार द्वारा पेट आवश्यक रूप से भरा रखना चाहिये।
• मिर्गी रोगी का विवाह हो सकता है एवं वे प्रजनन भी कर सकते हैं। उनके बच्चे स्वस्थ होंगे या उन्हें मिर्गी होने की अधिक संभावना नहीं होती।

प्राकृतिक चिकित्सा :
प्रतिदिन ठंडा कटिस्नान देने के बाद पेट पर मिटटी पट्टी + एनिमा देना चाहिए | इसके अतिरिक्त दिन में एक बार गर्म-ठंडा कटिस्नान एवं दो बार रीढ़ का गर्म-ठंडा सेंक करना चाहिए |
योग चिकित्सा :

मृगी मुद्रा ;
यह मुद्रा बनाते वक्त हाथ की आकृति मृग के सिर के समान हो जाती है इसीलिए इसे मृगी मुद्रा (Mrigi mudra yoga) कहा जाता है।

विधि -
हाथ की अनामिका और मध्यमा अंगुली को अंगूठे के आगे के भाग को छुआ कर बाकी बची तर्जनी और
कनिष्ठा अंगुली को सीधा तान देने से मृगी मुद्रा बन जाती है।

लाभ -
1. मृगी मुद्रा मिर्गी के रोगियों के लिए बहुत ही लाभकारी है।
2. सिरदर्द और दिमागी परेशानी में लाभ मिलता है।
3. दांत और सहनस रोग में भी लाभ मिलता है।
4. इस मुद्रा को करने से सोचने और समझने की शक्ति का विकास भी होता है।

अवधि -
इस मुद्रा को सुविधानुसार कुछ देर तक कर सकते हैं और इसे तीन से चार बार
किया जा सकता है।

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