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Thursday, February 16

घबराहट होने पर इसे आजमायें !


इस साधारण योग क्रिया के द्वारा घबराहट को दूर किया जा सकता है। ध्यान रखें कि इस विधि का अभ्यास हमेशा न करें। इसका अभ्यास तभी करें जब तत्काल घबराहट से आराम पाने की आवश्यकता हो। इसके अभ्यास से तेज घबराहट में भी जल्द आराम मिल जाता है-

विधि :




  1. कुर्सी पर या जमीन पर दरी बिछाकर बैठ जाएं। रीढ़ को सीधा रखें।

  2. यदि अभ्यास खड़े होकर किया जा रहा है तो भी अपने शरीर को बिल्कुल सीधा रखें।

  3. अब अपने मन को एकाग्र करें और धीरे-धीरे  को श्वास बाहर छोड़ते हुए अन्दर की वायु को बाहर निकाल दें।

  4. श्वास को कुछ देर बाहर ही रोककर रखें तत्पश्चात  धीरे-धीरे श्वास अन्दर खींचें।

  5. इस क्रिया में सांस लेने व छोड़ने की क्रिया धीरे-धीरे करें।

  6. इस श्वसन क्रिया का 10 बार अभ्यास करें।

  7. अभ्यास के बाद 10 मिनट तक विश्राम करें।


लाभ :



• इस क्रिया का स्नायुओं पर शांतिकारक प्रभाव पड़ता है।
• इससे घबराहट में जल्द आराम मिलता है।
• इससे दिल की गति संतुलित होती है और मन शांत होता है।
• यदि इस क्रिया के अभ्यास से भले ही घबराहट पूर्ण रूप से दूर न हो तो भी बहुत आराम मिलता है।
• इस क्रिया का अभ्यास कहीं भी किसी भी जगह पर किया जा सकता है।
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Friday, February 3

बाह्य कुम्भक



By-  Dr.Kailash Dwivedi

विधि :


  1. किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर पूरी शक्ति से श्वास को एक बार में ही बाहर निकल दें |

  2. श्वास को बाहर निकालकर मूलबंध (गुदा द्वार को संकुचित करें) और उड्डीयान बंध (पेट को यथाशक्ति अंदर सिकोड़ें) लगाकर आराम से जितनी देर रोक सकें,श्वास को बाहर ही रोककर रखें |

  3. जब श्वास अधिक समय तक बाहर न रुक सके तब बंधों को खोलकर धीरे-धीरे श्वास को अंदर भरें | यह एक चक्र पूरा हुआ |

  4. श्वास भीतर लेने के बाद बिना रोके पुनः बाहर निकालकर पहले की तरह बाहर ही रोककर रखें | इस प्रकार 3 से 21 चक्र किये जा सकते हैं |

लाभ :


  • इस प्राणायाम से मन की चंचलता दूर होकर वृत्ति निरोध होता है |

  • इससे बुद्धि सूक्ष्म एवं तीव्र होता है |

  • वीर्य स्थिर होकर स्वप्नदोष और शीघ्रपतन छुटकारा मिलता है |

सावधानियाँ :

  1. यह प्राणायाम प्रातः खाली पेट करें |

  2. श्वास बाहर इतना नही रोकना चाहिए कि लेते समय झटके से श्वास अंदर जाए और उखड़े हुए श्वास को 5-6 सामान्य श्वास लेकर ठीक करना पड़े |

  3. प्राणायाम के 30 मिनट बाद ही कुछ खाएं - पियें |


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Saturday, February 6

शीतली प्राणायाम

By - Yogaguru Suneel Singh



(Yoga guru suneel singh is one of the top 5 yoga gurus in India.)





जिस प्राणायाम के अभ्यास से अत्यधिक शीतलता की अनुभूति हो उसे शीतली प्राणायाम कहते हैं।

विधि:




  1. पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं। दोनों हाथ की अंगुलियों को ज्ञान मुद्रा में दोनों घुटनो पर रखें, आँखें बन्द करें।

  2. अपनी जीह्वा (जीभ) को नली के समान बना लें अर्थात् गोल बना लें और मुँह से लम्बी गहरी श्वास आवाज के साथ भरें।

  3. जितनी देर श्वास को आसानी से रोक सकते हैं, उतनी देर श्वास रोकें फिर धीरे-धीरे नाक से श्वास को बाहर निकाल दें। यह इस प्राणायाम का एक चक्र पूरा हुआ, कम से कम 10 चक्रों का अभ्यास करें।



लाभ व प्रभाव:




  • इस प्राणायाम के अभ्यास से बल एवं सौन्दर्य बढ़ता है। रक्त शुद्ध होता है।

  • भूख, प्यास, ज्वर (बुखार) और तपेदिक पर विजय प्राप्त होती है।

  • शीतली प्राणायाम ज़हर के विनाश को दूर करता है।

  • अभ्यासी में अपनी त्वचा को बदलने की सामर्थ्य होती है।

  • अन्न, जल के बिना रहने की क्षमता बढ़ जाती है।

  • यह प्राणायाम अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग और अल्सर में रामबाण का काम करता है।

  • चिड़-चिड़ापन, बात-बात में क्रोध आना, तनाव तथा गर्म स्वभाव के व्यक्तियों के लिए विशेष लाभप्रद है।



सावधानियाँ:




  • निम्न रक्तचाप वाले, दमा की अन्तिम अवस्था वाले और ज़्यादा कफ़ वाले रोगी इस प्राणायाम का अभ्यास न

  • करें। शीतकाल में इसके अभ्यास की मनाही है।

  • प्रदूषित जगह में इस प्राणायाम का अभ्यास न करें।



Wednesday, February 3

कपालभाति प्राणायाम

By- योगगुरु सुनील सिंह 



 Yoga guru suneel singh is one


of the to 5 yoga gurus in India.






प्राणवायु के बिना जीवन संभव नहीं है। मनुष्य के शरीर में स्थित प्राण ही उसे आरोग्य व स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। “प्राणायाम” प्राणवायु को नियंत्रित करने की प्रक्रिया है। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक का उद्देश्य पाठक को योगासन एवम् प्राणायाम के विभिन्न पक्षों पर विस्तृत जानकारी प्रदान करने का है, आसनों की विस्तृत जानकारी के उपरान्त अब हम प्राणायाम का विस्तारपूर्वक वर्णन करेंगे। हाँलाकि योग-शास्त्रों में कई प्रकार के प्राणायाम के संदर्भ में बताया गया है, लेकिन हम केवल उन्हीं प्राणायाम के बारे में जानकारी दे रहे हैं जो कि चलन में है। यह प्राणायाम निम्नवत् हैं; क्योंकि....
1. कपालभाति प्राणायाम
2. नाड़ी शोधन प्राणायाम
3. शीतली प्राणायाम
4. भ्रामरी प्राणायाम
5. सूर्यभेदी प्राणायाम
6. उज्जाई प्राणायाम
7. भस्तिका प्राणायाम
8. चन्द्रभेदी प्राणायाम

कपालभाति प्राणायाम :



कपाल माने माथा और भाति का अर्थ है रोशनी, ज्ञान व प्रकाश। योगियों ने कहा है कि इस प्राणायाम से हमारे मस्तिष्क या फिर सिर के अग्र भाग में रोशनी प्रज्जवलित होती है और हमारे अग्र भाग की शुद्धि होती है। कपालभाति प्राणायाम षटकर्म की क्रिया के अर्न्तगत भी आता है। इसे कपाल शोधन प्राणायाम भी कहा जाता है।

विधि :




  • ज़मीन पर पद्मासन या फिर सुखासन की अवस्था में बैठे फिर पूरे बल से नासिका से साँस को बाहर फेंके, श्वास को लेने का प्रयास न करें, श्वास स्वतः आ जाएगा।

  • जब हमारा श्वास बाहर निकलेगा उसी समय हम अपने पेट का संकुचन करेंगे।

  • पहले धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें, उसके बाद धीरे-धीरे श्वास छोड़ने और पेट के संकुचन की गति बढ़ा दें।

  • शुरू-शुरू में नये अभ्यासी कम से कम 20 चक्रों का अभ्यास करें।

  • एक सप्ताह उपरांत 50 चक्रों तक अभ्यास को बढ़ा दें।

  • ध्यान रहे कमर और गर्दन सीधी हो, आँखें बन्द (या खोलकर भी अभ्यास कर सकते है) हो। दोनों हाथ ज्ञान मुद्रा में हो।



लाभ व प्रभाव :




  1. इस प्राणायाम के अभ्यास से नाक, गले एवम् फेफड़े की सफाई होती है, चेहरे पर कांति, लालिमा और ओजस्व आता है।

  2. इसे करने से चेहरे की झुर्रियाँ, दाग, फुन्सी आदि दूर होते हैं।

  3. कपालभाति प्राणायाम से ईडा नाड़ी और पिंगला नाड़ी की शुद्धि होती है।

  4. दमा, तपेदिक, टाईसिल / टाउंसिल आदि के विकार दूर हो जाते हैं।

  5. महिलाओं में गर्भाशय के विकार, मासिक धर्म सम्बंधी कठिनाई और गर्भाशय जनित दोष दूर होते है।

  6. यह प्राणायाम पाचन संस्थान को मजबूत बनाता है तथा नर्वस सिस्टम में संतुलन लाता है।

  7. इससे कपाल की नस-नाड़ियों की शुद्धि होती है, इसलिए इसके अभ्यास से ध्यान की एकाग्रता बढ़ती है, जिससे व्यक्ति तनावमुक्त होता है।



सावधानियाँ :



हृदय रोगी, उच्च रक्तचाप के रोगी, मिर्गी स्ट्रोक, हार्निया और अल्सर के रोगी तथा गर्भवती महिलाएं इसका अभ्यास ना करें।

विशेष :



चक्कर आने या फिर सरदर्द की स्थिति में कुछ देर आराम करें और पुनः इसका अभ्यास करें। इसे करते हुए हर दिन कम से कम 15 गिलास पानी अवश्य पियें।

Friday, May 8

सूर्यभेदी प्राणायाम



 विधिः 

  1. किसी भी ध्यानात्मक आसन जैसे- पद्मासन,सिद्धासन अथवा  सुखासन में बैठकर बायें नासाछिद्र  को बंद कर लें एवं  दायें नासाछिद्र से धीरे-धीरे श्वास भरें। 
  2. जालन्धर बन्ध लगाकर तब तक अन्तः कुम्भक करें जब तक सिर-से लेकर पाँव तक पसीना न आ जाए |अर्थात अधिकाधिक जितने समय तक रोक सकते हैं उतने समय तक वायु को अन्दर ही रोक कर रखें तत्पश्चात श्वास को  बाएं नासाछिद्र से बाहर निकाल दें |
  3. फिर दायें नासाछिद्र से श्वास भरकर अन्तः कुम्भक करें एवं बाएं नासाछिद्र से श्वास को छोड़ दें | इस प्रकार 3 से 5 चक्र  इस क्रिया को दोहराएँ |
लाभ : 
सूर्यभेदी प्राणायाम नियमित रूप से करने से कफ-सम्बन्धी समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं।
सर्दी, खाँसी जुकाम दूर हो जाते हैं व पुराना जमा हुआ कफ पिघल जाता है।
इस प्राणायाम से शरीर की अग्नि प्रदीप्त होती है जिससे पाचन शक्ति भी प्रबल हो जाती है |
सावधानियां :                                                                                                                                                                 
जिन व्यक्तियों का ब्लड प्रेशर हाई रहता हो उन्हें सुर्यभेदी  प्राणायाम नहीं करना चाहिए |
शरीर की बढ़ी हुयी गर्मी की अवस्था में भी यह  निषेध है |

Thursday, May 7

प्राणायाम - अनुलोम-विलोम

विधि:

  1. किसी भी पदमासन,सिद्धासन या सुखासन में बैठ जाएँ |
  2.  कमर से  गर्दन तक रीढ़ की हड्डी सीधी रखें एवं आंखें बंद कर लें। 
  3. दाहिने हाँथ के अंगूठे से दाहिने नासाछिद्र  को बंद कर लें। 
  4. अब बाएं नासाछिद्र  से धीरे-धीरे श्वास को बाहर की ओर निकालें। संपूर्ण श्वास निकालने के पश्चात पुन: बाएं नासाछिद्र से ही श्वास भरना प्रारंभ करें। 
  5. अधिक से अधिक सांस भरने के बाद बाएं नासाछिद्र को अनामिका और कनिष्ठा अंगुलियों से बंद कर लें व अंगूठे को दाएं नासाछिद्र से हटाकर दाईं नासिका से ही श्वास को  धीरे-धीरे बाहर निकालें। 
  6. पूरा श्वास बाहर निकल जाने के बाद दाएं नासाछिद्र  से ही श्वास भरना प्रारंभ करें और पूरा श्वास  भर जाने के पश्चात दाएं नासाछिद्र  को अंगूठे से बंद कर श्वास को बाएं नासाछिद्र  से अंगुलियां हटाकर धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। 
  7. यह एक चक्र अनुलोम-विलोम प्राणायाम कहलाता है।प्रारंभ में इस प्राणायाम का अभ्यास कम से कम 11 चक्र करें।

लाभ:

  • अनुलोम-विलोम प्राणायाम के अभ्यास से शरीर की समस्त नाड़ियां शुद्ध हो जाती हैं, जिससे शरीर दोषरहित, पवित्र, निर्मल एवं  हल्का हो जाता है। शरीर की ऊर्जा व्यवस्थित होकर ऊर्ध्वगामी होने लगती है। 
  • इस प्राणायाम से स्नायु तंत्र संबंधी रोग दूर होते हैं एवं मन शान्त एवं  एकाग्र हो जाता है। विचारों में सकारात्मकता, सृजनात्मकता व रचनात्मकता बढ़ती है। 
  • अनुलोम-विलोम के अभ्यास से तनाव, क्रोध, चिन्ता, चिड़चिड़ापन, भय, घबराहट, अशांति, बेचैनी, हाई ब्लडप्रेशर, माइग्रेन, नींद न आना, कम्पवात आदि विकार दूर हो जाते हैं। 
  • अनुलोम-विलोम प्राणायाम  के नियमित अभ्यास से गठिया, आमवात, वैरीकोज वेन्स, शीतपित्त, ऐसिडिटी, साइनस तथा इंद्रियों की दुर्बलता दूर होती है। 




प्लाविनी प्राणायाम

विधि :

  1. जमीन पर आसन बिछाकर पदमासन, सुखासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ |
  2. दोनों नासिका (नाक के छिद्र) से वायु को को खींचकर फेफड़ों एवं पेट तक भरें |
  3. श्वास  को तब तक अन्दर रोककर रखें जब तक आराम से श्वास  को रोकना सम्भव हो। 
  4. दोनों नासा छिद्रों से धीरे-धीरे श्वास  छोड़ें अर्थात वायु को बाहर निकालें। 
  5. आराम से जितनी देर तक कर सकते इस तरह इस क्रिया को करें |

सावधानियां :

  • इसका अभ्यास को करने में जबरदस्ती बिलकुल न करें।
  • प्राणायाम भोजन के पहले खाली पेट करें |

लाभ :

  1. प्लाविनी प्राणायाम का अभ्यास सिद्ध  होने के बाद व्यक्ति कई दिनों तक बिना भोजन के रह सकता है |
  2. प्लाविनी प्राणायाम के नियमित अभ्यास से  जठराग्नि  प्रबल होकर पाचनशक्ति बढती है एवं  कब्ज से छुटकारा मिलता है। 
  3. इसके अभ्यास से  प्राण शुद्धि एवं आयु में वृद्धि होती है। 
  4. मन स्थिर व शांत होता है एवं  स्मरण शक्ति बढ़ती है। 
  5. प्लाविनी प्राणायाम का  पूर्ण रूप से अभ्यास कर लेने पर व्यक्ति बिना हाथ-पैर हिलाएं पानी में तैर सकता है।

Wednesday, April 1

माइग्रेन : कारण,लक्षण औऱ उपचार

माइग्रेन एक प्रकार का सिरदर्द है जो दिमाग में नर्व की सूजन से पैदा होती है। कभी-कभी यह लगभग चार घंटे से लेकर 72 घंटे तक बना रहता है। इसमें सिर के पिछले हिस्से में गर्दन के पास से लेकर पूरे सिर में बहुत भंयकर दर्द होता है।
कारण :

  • माइग्रेन ट्राईगेमिनल नर्व में न्यूरोकेमिकल के बदलाव और मस्तिष्क के रसायनों में असंतुलन, खासकर सेरोटोनिन के कारण आरंभ होता है।
  • तनाव और बेचैनी,संवेदनात्मक उत्तेजना, जैसे-तेज प्रकाश, धूप से आँख चुंधियाना, तेज आवाज, परफ्यूम, बदबू (जैसे-पेंट थिनर और धुआं)।
  • प्राकृतिक या हार्मोनल बदलाव, जो खासकर महिलाओं के मामले में होता है, जहां एस्ट्रोजेन हार्मोन का स्तर कम होने पर सिरदर्द होता है।
  • सोने-जगने के पैटर्न में अवरोध जैसे-सो नहीं पाना, अत्यधिक सोना आदि।
  • मौसम में बदलाव(अत्यधिक गर्मी या ठंडक)


लक्षण :

  • माइग्रेन का दर्द 4 से 72 घंटों तक रह सकता है। माइग्रेन का सिरदर्द अलग-अलग लोगों को अलग-अलग सीमा तक हो सकता है |
  • साधारण या तीव्र दर्द, जो सिर के एक या दोनों ओर हो सकता है |
  • जी मिचलाना. जिससे उल्टी भी हो सकती है |
  • फड़कने जैसा दर्द हो सकता है |
  • शारीरिक श्रम करने से दर्द बढ जाना |
  • आवाज और प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता बढ जाना |


उपचार :
अनुलोम-विलोम प्राणायाम

  1.  किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएं। कमर व गर्दन को सीधा कर आंखें बंद कर लें।
  2. अंगूठे से दाएं नासारन्ध्र को बंद कर लें।
  3. अब बाएं नासारन्ध्र से धीरे-धीरे सांस को बाहर की ओर निकालें। संपूर्ण सांस निकालने के पश्चात सांस को पुन: बाएं नासारन्ध्र से ही भरना प्रारंभ करें।
  4. अधिक से अधिक सांस भरने के बाद बाएं नासारन्ध्र को अनामिका और कनिष्ठा अंगुलियों से बंद कर लें व अंगूठे को दाएं नासारन्ध्र से हटाकर दाईं नासिका से सांस धीरे-धीरे बाहर निकालें।
  5. पूरा सांस बाहर निकल जाने के बाद दाएं नासारन्ध्र से ही सांस भरना प्रारंभ करें और पूरा सांस भर जाने के पश्चात दाएं नासारन्ध्र को अंगूठे से बंद कर श्वास को बाएं नासारन्ध्र से अंगुलियां हटाकर धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। 

यह एक चक्र अनुलोम- विलोम प्राणायाम कहलाता है। इस प्राणायाम का अभ्यास कम से कम 11 चक्र कर लें।

घरेलू उपाय :

  • सर दर्द शुरू होते ही जीभ की नोक पर एक चुटकी नमक रख लें आधा मिनट बाद पानी पी लें सर दर्द गायब हो जायगा।
  • हरी पत्तेदार सब्जियों और वैजिटेबल जूस जैसे गाजर, पालक, खीरा लें । मौसमी फल व सब्जियाँ खायें।
  • माइग्रेन सिर दर्द होने पर आराम करने की सख्त जरूरत है। रोशनी और आवाज से दूर रहें। आंख बंद करके सोने की कोशिश करें।
  • माइग्रेन सिर दर्द में अदरक बहुत फायदेमंद है। अदरक के सेवन से मिचली और उल्टी आना बंद हो जायेगी।
  • दालचीनी को पीसकर इसका लेप माथे पर लगायें इससे दर्द से तुरंत आराम मिलेगा।
  • बर्फ या ठंडे पानी की पट्टी सिर पर रखें। इससे जो रक्त धमनियां फैल गयी हैं, वे फिर से अपनी पूर्व स्थिति पर
  • वापस आ जायेगी।
  • दालचीनी को पाउडर बनाकर दिन में चार बार ठंडे पानी के साथ खाने से भी आराम मिलेगा।
  • कम से कम 6-8 घंटे की गहरी नींद जरूर ले।


परहेज़ :

  1. तेज़ इत्र या पर्फ्यूम ना लगाए।
  2. दबाव या स्ट्रेदस से दूर रहे।
  3. उपवास न  करें, और ना ही ऐसा भोजन करें जिसमें वसा हो।
  4. तेज रोशनी एवं तेज शोर से दूर रहे।
  5. धूप में या फिर ठंडक में घर से बाहर न निकलें।
  6. आंखों पर ज्यादा जोर न डालें।
  7. अचार व डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ न खाएं।


Monday, March 30

स्वप्नदोष और शीघ्रपतन दूर करने की विधि -बाह्य कुम्भक

विधि : 

  1. किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर पूरी शक्ति से श्वास को एक बार में ही बाहर निकल दें |
  2. श्वास को बाहर निकालकर मूलबंध (गुदा द्वार को संकुचित करें) और उड्डीयान बंध (पेट को यथाशक्ति अंदर सिकोड़ें) लगाकर आराम से जितनी देर रोक सकें,श्वास को बाहर ही रोककर रखें |
  3. जब श्वास अधिक समय तक बाहर न रुक सके तब बंधों को खोलकर धीरे-धीरे श्वास को अंदर भरें | यह एक चक्र पूरा हुआ |
  4. श्वास भीतर लेने के बाद बिना रोके पुनः बाहर निकालकर पहले की तरह बाहर ही रोककर रखें | इस प्रकार 3 से 21 चक्र किये जा सकते हैं |

लाभ :

  • इस प्राणायाम से मन की चंचलता दूर होकर वृत्ति निरोध होता है |
  • इससे बुद्धि सूक्ष्म एवं तीव्र होता है |
  • वीर्य स्थिर होकर स्वप्नदोष और शीघ्रपतन छुटकारा मिलता है |


सावधानियाँ :

  1. यह प्राणायाम प्रातः खाली पेट करें |
  2. श्वास बाहर इतना नही रोकना चाहिए कि लेते समय झटके से श्वास अंदर जाए और उखड़े हुए श्वास को 5-6 सामान्य श्वास लेकर ठीक करना पड़े |
  3. प्राणायाम के 30 मिनट बाद ही कुछ खाएं - पियें |


Saturday, March 7

स्वप्नदोष,शीघ्रपतन,नपुंसकता की चिकित्सा

निवेदन :ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को सम्पूर्णता प्रदान करने में अपनी तरफ से कोई कमी नही छोड़ी परन्तु मनुष्य ने स्वयं की गलतियों से शरीर को रोगी और अपूर्ण बना दिया | योग अपने आप में पूर्ण वैज्ञानिक विद्या है | हमारे ऋषियों ने योग का प्रयोग भोग के वजाय आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए जोर दिया है जो नैतिक दृष्टि से सही भी है | परन्तु ईश्वर की सृष्टि को बनाये रखने के लिए संसारिकता भी आवश्यक है, वीर्यवान व्यक्ति ही अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है,संतानोत्पत्ति के लिए वीर्यवान होना आवश्यक है पौरूषवान (वीर्यवान) व्यक्ति ही सम्पूर्ण पुरुष कहलाने का अधिकारी होता है | वीर्य का अभाव नपुंसकता है इसलिए मौज-मस्ती के लिए वीर्य का क्षरण निश्चित रूप से दुखदायी होता है | ऐसे व्यक्ति स्वप्नदोष,शीघ्रपतन और नपुंसकता जैसे कष्ट सहने को विवश होते हैं |
इन रोगों की चिकित्सा के लिए जब हमने योग की इन रहस्यमयी विधियों का प्रयोग प्रारंभ किया तो कई बार तथाकथित ज्ञानियों का विरोध भी सहना पड़ा …कि आप इस पवित्र ज्ञान का प्रयोग किस रूप में कर रहे हो …..आदि आदि | इसलिए आप सब से निवेदन है कि आप इन योग विधियों का प्रयोग करके वीर्यवान बनें,और अपनी अध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाएं, इनका दुरूपयोग मौज-मस्ती के रूप में न करें |

1. वज्रोली क्रिया :जब भी मूत्र त्याग करे तब एकदम से मूत्र को रोक ले .कुछ सेकेण्ड रोकें ..फिर नाड़ियों को ढीला छोड़ें और मूत्र निकलने दे ..पुनः रोके इस तरह मूत्र त्याग के दौरान कई बार इस क्रिया को करें | इस क्रिया के द्वारा नाड़ियों में शक्ति आएगी .फिर वीर्य के स्खलन को भी आप कंट्रोल कर सकेंगे | हमारा मस्तिष्क मूत्र त्याग व वीर्य स्खलन में भेद नही कर सकता ….यही कारण है कि इस क्रिया द्वारा स्खलन के समय में उसी अनुपात में बढ़ोत्तरी होती है जिस अनुपात में आप मूत्र त्याग के समय कंट्रोल कर लेते है |

2. बाह्य कुम्भक :लाभ :1- इस प्राणायाम से मन की चंचलता दूर होकर वृत्ति निरोध होता है |
2- इससे बुद्धि सूक्ष्म एवं तीव्र होता है |
3- वीर्य स्थिर होकर स्वप्नदोष और शीघ्रपतन छुटकारा मिलता है |

विधि :किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठकर पूरी शक्ति से श्वास को एक बार में ही
बाहर निकल दें |
श्वास को बाहर निकालकर मूलबंध (गुदा द्वार को संकुचित करें) और उड्डीयान
बंध (पेट को यथाशक्ति अंदर सिकोड़ें) लगाकर आराम से जितनी देर रोक
सकें,श्वास को बाहर ही रोककर रखें |
जब श्वास अधिक समय तक बाहर न रुक सके तब बंधों को खोलकर धीरे-धीरे श्वास
को अंदर भरें | यह एक चक्र पूरा हुआ |
श्वास भीतर लेने के बाद बिना रोके पुनः बाहर निकालकर पहले की तरह बाहर ही
रोककर रखें | इस प्रकार 3 से २१ चक्र किये जा सकते हैं |

सावधानी :यह प्राणायाम प्रातः खाली पेट करें |
श्वास बाहर इतना नही रोकना चाहिए कि लेते समय झटके से श्वास अंदर जाए और
उखड़े हुए श्वास को 5-6 सामान्य श्वास लेकर ठीक करना पड़े |
प्राणायाम के 30 मिनट बाद ही कुछ खाएं – पियें |

3. अश्विनी मुद्रा :लाभ :1- इस मुद्रा के निंरतर अभ्यास से गुदा के सभी रोग ठीक हो जाते हैं।
2- शरीर में ताकत बढ़ती है तथा इस मुद्रा को करने से उम्र लंबी होती है।
3- माना जाता है कि इस मुद्रा से कुण्डलिनी का जागरण भी होता है।
4- यह मुद्रा शीघ्रपतन रोकने का अचूक इलाज है |
5- अश्वनी मुद्रा से नपुंसकता दूर होती है |

विधि :कगासन में बैठकर (टॉयलैट में बैठने जैसी अवस्था) गुदाद्वार को अंदर
‍खिंचकर मूलबंध की स्थिति में कुछ देर तक रहें और फिर ढीला कर दें। पुन:
अंदर खिंचकर पुन: छोड़ दें। यह प्रक्रिया यथा संभव अनुसार करते रहें और
फिर कुछ देर आरामपूर्वक बैठ जाएं।

विशेषयह क्रिया दिन में कई बार करें, एक बार में कम-से-कम 50 बार अश्वनी मुद्रा करें |