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Friday, March 6

रखें पेट की सेहत का ध्यान


हमारा स्वास्थ्य सर्वाधिक पेट के स्वास्थ्य पर निर्भर है | पेट खराब होने से विभिन्न रोगों की आशंका काफी बढ़ जाती है। आजकल की व्यस्त जीवनशैली में हमे यह ध्यान ही नहीं रहता कि हम अपने खानपान में जो ले रहे हैं वह स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है भी या नहीं। हम कई बार स्वाद के चक्कर में तो कई बार मजबूरी में ऐसे खाद्यों को खा लेते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक नही होते हैंइन कारणों से पाचन तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है | इसलिए ध्यान रखें, यदि पेट स्वस्थ रहेगा, तभी शरीर स्वस्थ रहेगा। पेट खराब होने से निम्न परेशानियाँ उत्पन्न हो जाती हैं |
·       यदि पाचन तंत्र सही तरह से काम न करे और खाना ठीक से न पचे तो कई बार गैस की समस्या पैदा हो जाती है, जो कई तरह की परेशानियों को जन्म देती है। सही तरह से खाना न पचने से आपका पाचन तंत्र बिगड़ जाता है, जिससे शरीर को जरूरी पोषण भी नहीं मिल पाता है।
·       कब्ज एक बड़ी समस्या है, जिसका हमारी पाचन क्रिया पर सीधा असर पड़ता है।
·       पेट खराब होने का असर सबसे ज्यादा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता अनेक बीमारियों का कारण बनती चली जाती है।
·       पेट खराब होने पर छोटी आंत में मौजूद बैक्टीरिया शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देते हैं। इससे दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।
·       आंतों में खराब बैक्टीरिया जमा होने के कारण शरीर में पोषक तत्व ठीक से अवशोषित नहीं हो पाते। ऐसे में वजन घटने लगता है।
·       यदि पेट में समस्या बनी रहती है तो इसका असर हमारी त्वचा पर दिखने लगता है। खुजली और मुहांसे जैसी समस्या ऐसे में आम हो जाती हैं।

पेट को स्वस्थ्य रखने के लिए इन्हे अपनाएं –

तरल पदार्थों की मात्रा बढ़ाएँ
शरीर में पानी की कमी से अक्सर पेट खराब हो जाता है । ऐसे में भरपूर पानी पीएं अथवा आप फलों का जूस और सब्जियों का रस भी ले सकते हैं। आप चाहें तो नीबू पानी, नमक-चीनी का घोल या फिर नारियल पानी ले सकते हैं। 
साबुत अनाज खाएं 
साबुत अनाज में फाइबर, विटामिन, मिनरल्स और पानी की अधिकता होती है। इसलिए इनके सेवन से पेट का स्वास्थ्य ठीक रहता है। अंकुरित अन्न के माध्यम से यह हमे आसानी से प्राप्त हो सकते हैं |
पेट रोगों मे दही का सेवन है लाभकारी
पेट दर्द में दही का इस्तेमाल काफी फायदेमंद रहता है। दही में मौजूद बैक्टीरिया संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे पेट जल्दी ठीक होता है। ये पेट को ठंडा भी रखता है।
जीरा
जीरा दस्त में काफी फायदेमंद है । यदि लगातार दस्त हो रहे हों तो एक चम्मच जीरा चबा लें। जीरा चबाकर पानी पी लेने से दस्त बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं।
पुदीना
पुदीना पेट से जुड़ी समस्याओं मे एक बेहद असरदार हर्ब है। इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सिडेंट्स पाचन क्रिया को सुधारने में भी सहायक होते हैं।
बेल का शरबत
बेल फाइबर से युक्त होता है। इससे बना शरबत भी काफी गाढ़ा और फाइबर युक्त होता है। फाइबर पेट को बांधने का काम करता है, जिससे दस्त जल्दी ठीक हो जाते हैं।
सेब का सिरका
सेब के सिरके में पेक्टिन की पर्याप्त मात्रा होती है, जिससे पेट दर्द और मरोड़ में राहत मिलती है। एक चम्मच सिरके को एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से जल्दी आराम होता है।
अदरक
अदरक में एंटीफंगल और एंटी-बैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं, जो पेट दर्द में राहत देते हैं। एक चम्मच अदरक का रस काफी फायदेमंद साबित होता है।

Monday, December 4

8 माह सिर्फ गाजर का जूस पी कर महिला ने कैंसर को दी मात



हम सभी जानते हैं कि कैंसर जिसको हो जाता है, वह ज्‍यादा दिनों तक जिंदा नहीं बचता। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि एक महिला ने कैंसर को 8 महीने तक गाजर का जूस पी कर मात दे दी? ही हां, चौंकिये नहीं यह बात सच है।
एन कैमरून नामक महिला, को 2012 से पेट का कैंसर (colon cancer) था, जो कि तीसरे चरण में प्रवेश कर चुका था। उनके लिये यह बड़ी ही दिल दहला देने वाली बात थी क्‍योंकि 2005 में उनके पति का फेफड़े के कैंसर से देहांत हो चुका था। यह देख कर उन्‍होने निर्णय लिया कि उन्‍हें महंगा और दर्द भरा कीमोथैरेपी इलाज नहीं करवाना है क्‍योंकि इससे उनके पति को काफी पीड़ा हुई थी।
उन्‍होने बताया कि, "मुझे जून 2012 में पेट के कैंसर के लिए आपरेशन करवाने को कहा गया, लेकिन मैंने कीमोथेरेपी चिकित्सा लेने से इनकार कर दिया। मैं ठीक महसूस कर रही थी, मगर 6 महीने बीतते ही कैंसर मेरे फेफड़ों तक फैल चुका था और यह अपने चौथे चरण पर था।" कुछ ही समय बाद कैमरून को एक आदमी के बारे में पता चला जिसे स्‍किन कैंसर था और उसने अपना कैंसर रोज़ ढाई किलो गाजर का जूस पी कर खतम कर लिया। कैमरून से सोंचा क्‍यूं ना इस चीज को आजमाया जाए और रिजल्‍ट देखा जाए।
8 हफ्तो के बाद कैमरून का ट्यूमर फैलने से रूक गया। उसका ट्यूमर और लसीका ग्रंथी सिकुड़ने लगी। 4 महीने बाद उनके टिशू नॉर्मल हो गए। 8 महीने बाद टोमोग्राफी पीरीक्षण से पता चला कि उनका कैंसर पूरी तरह से खतम हो गया है।

ब्रिटेन की न्यू कैसल यूनिवर्सिटी में किए गए एक शोध के अनुसार, गाजर में पॉलीएसिटिलीन पाया जाता है, जो कैंसर कोशिकाओं को समाप्त कर ट्यूमर का विकास रोकने में सहायता करता है। इसके अलावा गाजर में कई तरह के विटामिन और मिनरल्स के अलावा बीटा कैरोटीन, अल्फा कैरोटीन, कैल्शियम एवं अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो आंतरिक अंगों को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं।
कैमरून एक लेखिका हैं और उन्‍होने इस अपने इस जादुई एक्‍सपीरिसंय के बारे में Curing Cancer with Carrots नामक किताब में भी लिखा है। दोस्‍तों, अगर आप या आपके रिश्‍ते में भी किसी को कैंसर की बीमारी का पता चले तो हमेशा अपना दिमाग खोल कर काम लें। हो सकता है कि जो चीज़ दूसरे को फायदा पहुंचा सकती है, वह आपको न पहुंचाए। मगर एक बार तो प्राकृतिक इलाज कर के देखना ही चाहिये।

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Thursday, November 30

गुणों से भरपूर है -हरा प्याज


By- Dr.Kailash Dwivedi

सर्दियों में हरा प्याज आसानी से उपलब्ध हो जाता है | यह खाने में न सिर्फ स्वादिष्ट होता है बल्कि स्वास्थ्य गुणों से भी भरपूर होता है | हरा प्याज इन्सुलिन के स्तर को संतुलित कर मधुमेह को नियंत्रित करने में सहायक है साथ ही अन्य स्वास्थ्य लाभ भी देता है | आईये जानते हैं हरे प्याज के लाभ -

हड्ड‍ियों की क्रियाशीलता बढ़ाये :
हरा प्याज में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में जाया जाता है जोकि हड्ड‍ियों की क्रियाशीलता को बनाए रखने के लिए अत्यंत सहायक हैं। 

धमनियों को स्वस्थ रखने में सहायक :
हरे प्याज में पर्याप्त मात्रा में सल्फर पाया जाता है जो धमनियों से जुड़ी समस्याओं से बचाव में सहायक सिद्ध होता है। सल्फर ब्लड प्रेशर को कम करने में सहायक होता है। 

सर्दी-जुकाम दूर भगाए :
हरा प्याज सर्दी-जुकाम को दूर करने में बहुत सहायक सिद्ध होता है। ये श्वसन प्रक्रिया को बेहतर बनाता है। 


कैंसर से बचाए :
हरे प्याज का सेवन विभिन्न प्रकार के कैंसर के खतरे को कम करता है। यह एक अच्छा एंटीओक्सिडेंट है | 

संक्रमण रोधी :
हरे प्याज में पाया जाने वाला सल्फर फंगस और दूसरे संक्रमण को होने से रोकता है। 

विटामिन K का अच्छा स्रोत :
हरे प्याज में रक्त का थक्का जमाने के लिए भी आवश्यक विटामिन के भरपूर मात्रा में मिलता है।

Tuesday, April 25

इस प्रयोग से पेट का अल्सर हो जायेगा गायब !



जब भोजन को पचाने वाला अम्लीय पदार्थ अमाशय की दीवारों को क्षति पहुंचाने लगता हैं तो व्यक्ति को अल्सर का रोग हो जाता हैं. अल्सर व्यक्ति के अमाशय या छोटी आंत के ऊपरी हिस्से में फोड़े निकलते हैं. अल्सर को अमाशय का अल्सर, पेप्टिक अल्सर तथा गैस्ट्रिक अल्सर के नाम से भी जाना जाता हैं.




प्रयोग :


1 सेब में लौंग को इस प्रकार से चारों तरफ चुभों दें कि कोई भाग खाली न रह जायें। 40 दिन बाद लौंगों को निकाल कर शीशी में रख दें। खाना खाने के बाद एक लौंग को चूसने से पेट का घाव भरने लगता है।
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Thursday, April 13

पेट के लिए रामबाण है बेल



By- Dr. Kailash Dwivedi

गर्मियों की शुरुआत के साथ ही शरीर के लिए ऐसे खाद्य और पेय पदार्थों की आवश्यकता बढ़ जाती है, जो शरीर को गर्मी से राहत देते हुए ठंडक प्रदान करें। उनमें से बेल भी एक है, जो पेट के लिए सबसे अच्छा माना गया है।ऊपर से भूरे सुनहरे रंग वाले पके बेल फल का गूदा पीला और खुशबूदार होता है। ठंडी तासीर होने की वजह से इसे शीतल फल भी कहा जाता है।

न्यूट्रिशनल वैल्यू :

बेल में प्रोटीन, फास्फोरस, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम, फैट,फाइबर, विटामिन-सी, बी पाया जाता है। आयुर्वेद में इसके रस को खाली पेट पीने की सलाह दी गई है। यह ज्यादा फायदेमंद होता है। दिन भर बेल का शरबत पीने से कोई फायदा नहीं।

पेट के लिए रामबाण है बेल :

दिमाग और हृदय को शक्ति प्रदान करने के साथ पेट के रोगों में भी बेल को रामबाण माना गया है। यह एसिडिटी दूर करता है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमताभी बढ़ाता है। अल्सर और कब्ज के साथ पेचिश की समस्या में यह फायदेमंद है।पेट संबंधी समस्या के लिए इसके मुरब्बे का सेवन करें।

लू से बचाता है :

गर्मियों में लू लगने पर बेल के ताजे पत्तों को पीसकर पैर के तलवे पर लगाने से आराम मिलता है। लू लगने पर इसके रस को मिश्री के साथ पीना भी सहीरहता है। दस्त हो रहा हो, तो इसके कच्चे फल के गूदे का चूर्ण बनाकर काले तिल के चूर्ण के साथ खाएं।

कैसे करें स्टोर  :

बेल के गूदे में पर्याप्त मात्रा मेंबीज पाए जाते हैं, जिन्हें निकालकर गूदे को सुखाने के बाद चूर्ण बनाया जा सकता है। इस चूर्ण का सेवन पेट के रोगों में फायदेमंद होता है। गांवों में लोग बेल के गूदे की टिकिया बनाकर रखते हैं। इस मौसम में आप पके बेल और कच्चे बेल दोनों के गूदे का चूर्ण बनाकर स्टोर कर लें। कच्चे बेल के टुकड़े काटकर उनका हवन करने से घर कीटाणु रहित हो जाता है।

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Wednesday, February 15

मोटापा कम करने के कुछ घरेलू उपाय



वजन कम करना और चर्बी को गला देना दोनों ही अलग अलग बातें हैं। आज कल हम तरह तरह के जंक फूड खाते रहते हैं, जिनमें खाद्य पदार्थ और पोषण के नाम पर कुछ भी नहीं होता, लेकिन हां, इससे फैट खूब मिल जाता है। यही फैट आपके शरीर में जम जाता है जो कई दिनों तक रहने से विष का रूप ले लेता है।

कुछ घरेलू उपायों से आप इस चर्बी तथा टॉक्‍सिन को अपने शरीर से निकाल सकते हैं। जब आप शरीर से इस फैट को निकालेगें तो आपके शरीर की सफाई भी होगी, जिससे पेट साफ रहेगा और त्‍वचा दमकने लगेगी। यह घरेलू उपचार हैं, जिनका कोई साइड इफेक्‍ट नहीं होगा और मोटापा भी अलग से दूर होगा।

आप इन पेय को अपने घर पर ही बना सकते हैं। यह घरेलू पेय अभी से नहीं बल्कि कई दशको से अलग-अलग देशों में प्रयोग किये जाते आ रहे हैं। तो आइये देखते हैं कौन से हैं वे पेय जो शरीर से फैट को गला देते हैं।

नींबू, शहद और गरम पानी :

रोज सुबह खाली पेट इसे पीने से आपको पेट सही रहेगा, स्‍किन साफ रहेगी और मोटापा भी दूर रहेगा।

ग्रीन टी :

ग्रीन टी में एंटीऑक्‍सीडेंट होता है जो कि झुर्रियों को दूर रखती है। अगर आपको अपना मोटापा घटाना है तो ग्रीन टी को बिना चीनी मिलाए पियें।

लौकी जूस :

यह एक पौष्टिक सब्‍जी है। इसे पीने से पेट भर जाता है, इसमें फाइबर होता है और यह पेट को ठंडक पहुंचाती है। लौकी का जूस पीने से घंटो तक पेट भरा रहता है और मोटापा भी कंट्रोल होता है।

धनिया जूस :

इस जूस को पीने से किडनी सही रहती है और मोटापा भी कंट्रोल रहता है। इसे पीने से पेट देर तक भरा रहता है और यह शरीर की शुद्धि करता है।
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Tuesday, February 7

हमारा मन एक श्रेष्ठ चिकित्सक है !


                                    - डॉ.कैलाश द्विवेदी

हमारा शरीर ब्रह्माण्ड में व्याप्त पाँच तत्वों आकाश,वायु,अग्नि,जल एवं पृथ्वी से बना है | कहा गया है - “यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे” अर्थात जो ब्रह्माण्ड में है वह सब इस पिंड (शरीर) में व्याप्त है |
पंच महाभूत प्राकृतिक चिकित्सा के साधन हैं इन पंच्च्तत्वों का मूल आधार महत्तत्व होता है ।  पञ्चतत्वों को रोगनिवारक शक्ति महत्तत्व से ही प्राप्त होती है | प्रत्येक प्राणी के अन्दर आरोग्य प्रदान करने वाली एक शक्ति होती है जो उसे स्वस्थ्य रखती है । प्रकृति के विरुद्ध आचरण के फलस्वरूप जब व्यक्ति के शरीर में विजातीय द्रव्यों की मात्रा बढ़ जाती है तब आंतरिक शक्ति शरीर को स्वच्छ और निरोग बनाने के लिए तीव्र रोगों की उत्पत्ति करती है, तथा उन रोगों को नष्ट भी करती है । इस शक्ति को सभी लोग अलग-अलग नामों जैसे - शक्ति, परमात्मा, अंतरात्मा तथा कोई राम,अल्लाह आदि कहकर पुकारते है । सम्पूर्ण निरोगता के लिए यह आवश्यक है कि रोगी व्यक्ति के मन, आत्मा तथा शरीर तीनो का शुद्धिकरण किया जाये | जिस व्यक्ति का मन, आत्मा तथा शरीर तीनों निरोग होगा वही व्यक्ति निरोगी हो सकेगा। प्राकृतिक चिकित्सा के उपचार में सबसे समर्थ उपचार अपने इष्ट की स्तुति, सदाचार एवं सद्विचार है, यह सभी रोगों को रोकने का सबसे प्रभावी,सरल व सुलभ उपाय है । क्योंकि विचार शक्ति का शरीर पर विचारों के अनुसार अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है, रोगी होने पर व्यक्ति संशयग्रस्त हो जाता है जिससे भले ही वास्तविकता कुछ और ही हो परन्तु मन में रोग की भयानकता प्रगट होने लगती है | मन जब किसी विचार को स्वीकार कर लेता है तब शरीर उसी के अनुसार बनने लगता है इसीलिए निरोग होने के लिए सर्वप्रथम ईश् प्रार्थना पर जोर दिया जाता है, क्योंकि लिस क्षण मनुष्य अपने ईश के प्रति सच्चे मन से प्रार्थना करता है उस क्षण शरीर पर से नकारात्मक विचारों का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है ।

                शब्द, सदाचार, सद्विचार जैसे गुणों को शक्ति तो महत्तत्व से मिलती है परन्तु यह कारक हैं आकाश तत्व के आकाश तत्व पंचतत्वों में सबसे अधिक उपयोगी एवं प्रथम तत्व है जिस प्रकार महत्तत्व निराकार किन्तु सत्य है उसी प्रकार आकाश तत्व निराकार भी है और सत्य भी है महत्तत्व अविनाशी है उसी प्रकार आकाश तत्व का भी कभी नाश नही होता | आकाश विशुद्ध तथा निर्विकार होता है इसीलिए हमें इस तत्व से विशुद्धता एवं निर्मलता की प्राप्ति होती है | जो शक्ति हमें महत्तत्व अथवा आकाशतत्व से मिलती है वह अमोघ होती है एवं आत्मिक मानसिक तथा शारीरिक तीनों प्रकार के स्वास्थ्य को उन्नत बनाने वाली होती है |

पंचतत्वो में अन्य चार तत्व – वायु,अग्नि,जल तथा पृथ्वी को आकाश तत्व से शक्ति मिलती है अन्य चारों तत्व आकाश तत्व के साथ मिलकर शरीर में अपना कार्य करते हैं | शरीर में आकाश तत्व के विशेष स्थान सिर, कण्ठ, हृदय, उदर एवं कटिप्रदेश है | मस्तिष्क में स्थित आकाश वायु का भाग जो प्राण का मुख्य स्थान है | हृदयदेशगत तेज का भाग है जो पित्त का मुख्य स्थान है, इससे अन्य का पाचन होता है | उदर देशगत आकाश जल का भाग है इससे सब प्रकार की मल विसर्जन क्रिया सम्भव होती है | कटि देशगत आकाश पृथ्वी का भाग है यह अधिक स्थूल होता है और गन्ध का आश्रय है | इन सब में जो सर्वोच्च आश्रय है वह है मस्तिष्क में स्थित आकाश तत्व का भाग | इसी के कारण व्यक्ति में सोचने की क्षमता उत्पन्न होती है।

 सम्पूर्ण स्वास्थ्य का अर्थ 

आप- आर्क्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘हेल्थ’ के शाब्दिक अर्थ से समझ सकते हैं इसके अनुसार “शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा से पुष्ट होना- ‘हेल्थ’ है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य को ठीक बनाये रहने में अनेकों कारण गिनाये जा सकते हैं पर सबसे प्रमुख कारण है- व्यक्ति की मानसिक स्थिति । प्रसन्नचित्त, उत्साही एवं आशावादी लोग अनेक बाधाओं के होते हुए भी निरोग बने रहते हैं। मनोबल के कारण ऐसे व्यक्तियों के नाड़ी संस्थान में एक प्रचण्ड विद्युत प्रवाह का संचार होता रहता है जो शरीर के प्रत्येक अंग को रोगों से लड़ने की सामर्थ्य प्रदान करता रहता है |
        कोई भी शारीरिक रोग प्रकट होने पर व्यक्ति के मन में भी विचारों द्वारा निर्मित अनेक काल्पनिक  रोग उत्पन्न होते रहते है | इनका उतना ही भयंकर प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है जितना कि क्षय,कैंसर जैसे घातक रोगों का ।

       मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सा शास्त्रियों का कहना है वास्तव में रोगियों में ऐसे व्यक्तियों संख्या बहुत कम होती हैं, जो वास्तव में किसी रोग से पीड़ित हों । अधिकांश ऐसे व्यक्ति होते हैं जो किसी न किसी काल्पनिक रोग के शिकार होते हैं । सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति में विचारों का अत्यधिक महत्व है । जो व्यक्ति स्वयं के प्रति रोगी, शक्तिहीन और असमर्थ होने का भाव रखते हैं और सोचते रहते हैं कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, उनको कोई रोग नहीं भी होता है तो भी इन नकारात्मक विचारों के फलस्वरूप कोई न कोई रोग उत्पन्न हो जाता है और वे वास्तव में रोगी बन जाते । इसके विपरीत जो स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक विचार रखते हैं, वे रोगी होने पर भी शीघ्र स्वस्थ्य हो जाते हैं।  औषधियों तथा तरह- तरह की जड़ी- बूटियों का उपयोग कोई स्थाई लाभ नहीं करता, उनसे रोग के बाह्य लक्षण दब भर जाते हैं, रोग का मूल कारण नष्ट नहीं होता । सच बात तो यह है कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य की  प्राप्ति का प्रभावशाली उपाय आन्तरिक स्थिति का अनुकूल प्रयोग ही है । व्यक्ति की  जीवनी शक्ति उसकी मनोदशाओं के अनुसार बढ़ती- घटती रहती है । यह शक्ति आरोग्य का आधार है, यदि रोगी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाय कि उसे अपने रोग के विषय में नकारात्मक सोचने का मौका ही न मिले, वह अधिक से अधिक प्रसन्न तथा उल्लसित रहने लगे, तो उसकी जीवनी- शक्ति बढ़ जाती फलस्वरूप रोग निवारण प्रारंभ हो जाता है ।

       शरीर पर मस्तिष्क का पूर्ण नियंत्रण होता है एनेस्थीसिया देकर जब मस्तिष्क को संज्ञा शून्य कर दिया जाता है तब शरीर में आंतरिक अवयवों के सक्रिय रहते हुए भी शरीर मुर्दे की तरह हो जाता है | इसी तरह से पागल,नशेड़ी,मानसिक विकारों से ग्रस्त व्यक्तियों को भी देखा जा सकता है, इन सब का शरीर ठीक- ठाक होते हुए भी सिर्फ मस्तिष्क के असंतुलित होने के कारण ही तो उपहास या दया के पात्र बनना पड़ता हैं | इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही शरीर में श्वसन,रक्तसंचरण,पाचन,आत्मसातीकरण,उत्सर्जन  आदि क्रियायों का महत्व है परन्तु सर्वाधिक महत्व मस्तिष्क की चेतना प्रवाह क्रिया का ही है।

आरोग्यता के लिए मनःशक्ति का प्रयोग :

मन जो विचार करता है ,बुद्धि उसे प्राप्त करने के उपाय तलाशने लग जाती है | विचारों के एक स्थान पर केन्द्रित होते रहने पर उनकी सूक्ष्म चेतनशक्ति घनीभूत होती जाती है जिससे एक प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता है । परिणामस्वरूप विचार के अनुसार ही परिस्थितियां बनने लगती हैं | यह स्थिति मात्र शरीर तक ही सीमित नही है –अन्य क्षेत्रों में भी चाहे वह हमारा आर्थिक क्षेत्र हो सामाजिक या अन्य कोई क्षेत्र , सबमें यही सिद्धांत लागू होता है | मन जैसा विचारता है वैसी ही प्रतिक्रिया वातावरण में होती है। यह स्थिति एक प्रकार से कुएं की प्रतिध्वनि की तरह है कि कुएं में जैसी ध्वनि की, ठीक वैसी ही प्रतिध्वनि वापस आ गयी | बल्कि ध्वनि से भी तेज प्रतिध्वनि बन गयी | मनुष्य जैसा सोचता है उसके आसपास वैसी ही परिस्थितियां बनने लगती हैं । विचार शक्ति अपने समानधर्मी विचारों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। एक ही प्रकार के विचारों के घनीभूत होने पर विचार के अनुसार ही क्रिया प्रारंभ हो जाती है,फलस्वरूप  वैसे ही स्थूल परिणाम प्राप्त  हो जाते हैं । भय, चिन्ता और निराशा में डूबे रहने वाले मनुष्य के सामने ठीक वैसी ही परिस्थितियाँ आ जाती हैं जैसी कि वे सोचते रहते हैं । व्यक्ति जिस प्रकार के विचारों को प्रश्रय देता है उसके अनुसार ही उसका रहन-सहन,मुद्रा आदि बन जाते हैं | यदि स्वास्थ्य की कामना करने वाला व्यक्ति इस प्रकार विचार करे कि - मेरा रोग साधारण है, मेरा उपचार उपयुक्त व पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन-प्रतिदिन  मेरा रोग घटता जा रहा है एवं मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव कर रहा हूँ । मेरे आरोग्यता प्राप्ति में अब अधिक समय नही लगेगा। जब इस प्रकार के विचार बार-बार किये जायेंगे तो विचारों के अणु घनीभूत होकर सम्पूर्ण स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त करने लग जायेंगे |

विचारों का शरीर पर प्रभाव :

व्यक्ति जिस प्रकार के विचारों में रहता है उसके चेहरे पर उनका प्रतिबिम्ब स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है | विचारों का यह प्रभाव चेहरे या बाह्य अंगो तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि आंतरिक अवयवों जैसे -पाचन, रक्त संचार एवं वायु प्रवाह उत्पन्न करने वाले अंगों पर भी पड़ता है । आमाशय, आँत, फुफ्फुस, हृदय, यकृत, वृक्क, मूत्राशय, मस्तिष्क, नेत्र, कान, शिश्न, जिह्वा जैसे भीतरी अंगों पर भी उनका असर होता है और उनकी कार्य प्रणाली एवं गतिविधि में मन्दता, तीव्रता, अव्यवस्था तथा व्यतिक्रम आदि पर प्रभाव विचारों के अनुसार ही परिलक्षित  होने लगता है |

 नकारात्मक एवं कुविचारों का प्रभाव शरीर पर अत्यंत घातक रूप में पड़ता है । इनके प्रभाव से शरीर में ऐसी शिथिलता एवं विकृति उत्पन्न हो जाती है कि पाचन रक्त संचार आदि प्रक्रिया में गतिरोध उत्पन्न होने से रोग लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं | यदि यही प्रक्रिया लगातार चलती रहे तो स्वस्थ्य व्यक्ति भी  रोगी हो जाता है । मनःस्थिति अथवा विचारों का शरीर पर कैसा होता है यह इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है - एक माता को एक दिन किसी बात पर बहुत क्रोध हो आ रहा था,स्थिति यह थी कि क्रोध में उसके मुंह से झाग निकल रहा था | आवेश में उसका पूरा शरीर कांप रहा था। उसी आवेश की अवस्था में अपने बच्चे को स्तनपान कराया और एक घण्टे के भीतर ही बच्चे की हालत खराब हो गई एवं अंततः उसकी मृत्यु हो गई। शव परीक्षा के परिणाम से विदित हुआ कि मानसिक क्षोभ के कारण माता का रक्त तीक्ष्ण परमाणुओं से विषैला हो गया और उसके प्रभाव से उसका दूध भी विषाक्त हो गया था, जिसे पी लेने से बच्चे की मृत्यु हो गई।


          मन:स्थिति के सदर्भ में रायल मेडिकल सोसायटी के चिकित्साविज्ञानी डा. ग्लॉस्टन का कहना है कि “शारीरिक रोग उत्पन्न होने से लेकर निरोग होने अथवा कष्टसाध्य बनने में मानसिक स्थिति की बहुत बड़ी भूमिका होती है। मन को सशक्त एवं सकारात्मक बनाकर कठिन से कठिन रोगों पर विजय पाई जा सकती है । विकृत मन:स्थिति मनुष्य को राक्षस या जिंदा लाश बनाकर छोड़ देती है। यह सब हमारी इच्छा-आकांक्षा एवं विचारणा पर निर्भर करता है कि हम स्वास्थ्य-समुन्नत बनें अथवा रूग्ण एवं हेय । रोगोत्पत्ति या रोगों के उतार-चढ़ाव में जितना गहरा संबंध शारीरिक कारणों अथवा परिस्थितियों का माना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा प्रभाव मनोदशा का पड़ता है। यदि व्यक्ति मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ हो तो फिर रोगों की संभावना बहुत ही कम रह जाती है। आक्रमण करने पर भी रोग बहुत समय तक ठहर नहीं सकेंगे। मन की प्रगति या अवगति ही रूग्णता या निरोगता का मूल है। इस तथ्य को समझना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।“

सकारात्मक भोजन से आरोग्य प्राप्ति :

सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु अपने रोग के प्रति सकारात्मकता तो आवश्यक है ही इसके अतिरिक्त हमारा भोजन जिसे प्राकृतिक चिकित्सा में औषधि की संज्ञा दी गयी है का निर्माण से लेकर एवं ग्रहण करने तक जो मनोभाव रहने चाहिए वे समझना आवश्यक है |
जो भोजन ग्रहण करते हैं,  उसके द्वारा  शरीर का पोषण और नव निर्माण ही नहीं होता, अपितु  भोजन करते समय व्यक्ति की जो मन:स्थिति होती है एवं जिन संस्कारों या वातावरण में भोजन ग्रहण किया जाता हैं,  वे मनोभाव, विचार एवं भावनाएं भी अलक्षित रूप में भोजन और जल के साथ शरीर  ग्रहण कर लेता हैं | भोजन कितना भी प्राकृतिक क्यों न हो यदि उसको बनाते समय रसोइया की मनःस्थिति एवं भोजन करते समय ग्राही की मनःस्थिति सात्विक व सकारात्मक नही है तो वह प्राकृतिक भोजन भी शरीर में विष का कार्य करता है | इसलिए सम्पूर्ण स्वास्थ्य पाने के लिए भोजन के सन्दर्भ में इन बिन्दुओं को धयान रखना आवश्यक है –

भोजन बनाने वाले का व्यक्तित्व


  • भोजन को बनाते समय रसोईये की प्रवृत्ति,मनःस्थिति एवं शारीरिक स्थिति का अच्छा या बुरा प्रभाव भोजन पर पड़ता है | अतृप्त, भूखा, लालची, क्रोधी, हिंसावृत्ति युक्त, गंदा रसोइया अपने सम्पर्क से ही भोजन को दूषित कर देता है। एक तो वह शरीर या वस्त्रों से स्वच्छ नहीं होता दूसरे उसकी उपर्युक्त मन:स्थिति भोजन को दूषित कर देती है । यह  भोजन  विष के समान हो जाता है । बाजार में भी बिकने वाले  भोजन, मिठाइयां, नमकीन, दूध इत्यादि असंख्य अतृप्त भूखे व्यक्तियों की लुब्ध दृष्टियां पड़कर उन्हें दूषित बना देती हैं। अत: वे ऐसे विचार अणुओं से इतना अधिक दूषित हो जाते हैं कि शरीर के लिए अस्वास्थ्यकर हो जाते हैं | अतः सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को ऐसे खाद्यों से बचना ही हितकर है |इस तथ्य का हमेशा ध्यान रखें कि भोजन बनाने वाले की वृत्ति सात्विक हो , वह रोगी न हो, भूखा न हो | वह प्रेमपूर्ण भाव से भोजन तैयार करने वाला हो |

  • भोजन ग्रहण करते समय मन:स्थिति की आन्तरिक स्वच्छता आवश्यक है,अर्थात भोजन के समय जैसे बाह्य स्वच्छ्ता आवश्यक है उसी प्रकार हमारे विचारों की सात्विकता भी आवश्यक है। जैसे अच्छे –बुरे विचार होंगे वैसा ही प्रभाव भोजन पर पड़ेगा फलस्वरूप भोजन से मिलने वाले पोषण में भी विचारों के अनुरूप अधिकता या न्यूनता आ जाएगी |  यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उत्तम से उत्तम भोजन दूषित मन:स्थिति से विकारयुक्त अथवा विषमय हो जाता है। 
  • चिन्ता, आवेश, क्रोध, जल्दबाज़ी, चिड़चिड़ापन, आदि उद्वेगों की स्थिति में किया गया भोजन विषैला हो जाता है। यह शरीर को पोषित करने के स्थान पर हानि पहुंचाता और पाचन-क्रिया को विकारमय कर देता है। 
  • क्रोध की स्थिति में किये गए भोजन का ढंग से पाचन नही हो पाता |
  • चिंतित मन:स्थिति में किया गया भोजन आमाशय में अल्सर जैसा घातक रोग उत्पन्न कर सकता है । 

इसके विपरीत आनंद एवं सकारात्मक विचारों के साथ किया गया भोजन स्वास्थ्य पर जादू-जैसा गुणकारी प्रभाव डालता है। अन्त:करण की शान्त-सुखद वृत्ति में किये हुए भोजन के साथ-साथ हम प्रसन्नता, सुख-शान्ति और उत्साह की स्वस्थ भावनाएं भी ग्रहण करते हैं फलस्वरूप इसका स्वास्थ्यप्रद प्रभाव शरीर पर पड़ता है। अतः
    भोजन स्वच्छ स्थान पर शान्तिपूर्वक प्रसन्न मुद्रा से ग्रहण करें । जो कुछ रूखा-सूखा प्राप्त हुआ है, उसे भगवान् का प्रसाद मानकर ग्रहण करें । भोजन जब सामने आये, तब नेत्र बंदकर ईश्वर का चिन्तन करते हुए करें | पुनः स्मरण रखें - मन में जैसी विचारधाराएं उठती हैं शरीर उनका उसी के अनुरूप प्रभाव पड़ता है।

विचार के विषय में महापुरुषों का चिंतन :

स्वामी रामतीर्थ जी के अनुसार - 
‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही उसका जीवन बनता है |"

 स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार -
 ‘‘स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, इनका निवास हमारे विचारों में ही है।"

 भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था- 
‘‘भिक्षुओ! वर्तमान में हम जो कुछ हैं अपने विचारों के ही कारण और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह भी अपने विचारों के कारण।"

 शेक्सपीयर ने लिखा है- 
‘‘कोई वस्तु अच्छी या बुरी नहीं है। अच्छाई- बुराई का आधार हमारे विचार ही हैं।"

 ईसामसीह ने कहा था- 
‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वह बन जाता है।"

 प्रसिद्ध रोमन दार्शनिक मार्क्स आरीलियस ने कहा है- 
‘‘हमारा जीवन जो कुछ भी है, हमारे अपने ही विचारों के फलस्वरूप है।"

 प्रसिद्ध अमरीकी लेखक डेल कार्नेगी ने अपने अनुभवों पर आधारित तथ्य प्रकट करते हुए लिखा है- ‘‘जीवन में मैंने सबसे महत्त्वपूर्ण कोई बात सीखी है तो वह है विचारों की अपूर्व शक्ति और महत्ता, विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है।"


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Friday, January 20

आलू सब्जी ही नहीं, एक औषधि भी है - जानिये आलू के औषधीय प्रयोग




By- Dr. Kailash Dwivedi

लेटिन नाम : सोलेनम ट्यूबरोसस
प्रकृति : शुष्क और गर्म। यह रोटी से जल्दी पचता है। यह सम्पूर्ण आहार है।
आलू में पाए जाने वाले तत्व

  • प्रोटीन - 1.6%
  • कार्बोहाइड्रेट - 22.9%
  • पानी - 74.7%
  • विटामिन A - 40 I.U./100 ग्राम
  • कैल्शियम - 0.01%
  • फास्फोरस - 0.03%
  • लौह - लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग/100 ग्राम
आलू का रस निकालने की विधि : 



आलू को ताजे पानी से अच्छी तरह धोकर छिलके सहित कद्दूकस करके इस लुगदी को कपड़े में दबाकर रस निकाल लें। इस रस को 1 घंटे तक ढंककर रख दें। जब सारा कचरा, गूदा नीचे जम जाए तो ऊपर का निथरा रस अलग करके काम में लें।

 आलू के औषधीय प्रयोग 


बेरी-बेरी :

 बेरी-बेरी का सरलतम् सीधा-सादा अर्थ है-”चल नहीं सकता” इस रोग से जंघागत नाड़ियों में कमजोरी का लक्षण विशेष रूप से होता है। आलू पीसकर या दबाकर रस निकालें, एक चम्मच की मात्रा के हिसाब से प्रतिदिन चार बार पिलाएं। कच्चे आलू को चबाकर रस निगलने से भी यह लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

गोरापन : 

आलू को पीसकर त्वचा पर मलने से रंग गोरा हो जाता है।

चेहरे की झांई के लिए : 

अगर चेहरे पर चेचक या मुंहासों के दाग या झांइयां हो तो कच्चे आलू को पीसकर 3-3 बूंद ग्लिसरीन, सिरका और गुलाब का रस मिलाकर फेस पैक बना लें। इसे रोजाना तीन मिनट तक चेहरे पर अच्छी तरह रगड़-रगड़ कर लगाने से चेहरे के दाग और झांइयां बहुत ही जल्दी दूर हो जाती हैं।

हाथों की झुर्रियां : 

कच्चे आलू के रस से मालिश करने से हाथों पर झुर्रियां (सिलवटें) नहीं पड़ती हैं।

दाद के रोग में : 

कच्चे आलू का रस पीने से दाद ठीक हो जाता है।

बिवाई के फटने पर : 

सूखे और फटे हुए हाथों को ठीक करने के लिए आलू को उबाल लें, फिर उसका छिलका हटाकर पीसकर उसमें जैतून का तेल मिलाकर हाथों पर लगायें तथा लगाने के 10 मिनट बाद हाथों को धोने से लाभ होता है।

गठिया या जोड़ों का दर्द : 

गर्म राख में चार आलू सेंक ले और फिर उनका छिलका उतारकर नमक मिर्च डालकर नित्य खाएं। इस प्रयोग से गठिया ठीक हो जाती है।

सूजन : 

कच्चे आलू को सब्जी की तरह काट लें। जितना वजन आलू का हो, उसके लगभग 2 गुना पानी में उसे उबालें। जब मात्र एक भाग पानी शेष रह जाए तो उस पानी से चोट से उत्पन्न सूजन वाले अंग को धोकर सेंकने से लाभ होगा।

मोटापा : 

आलू मोटापा नहीं बढ़ाता है। आलू को तलकर तीखे मसाले घी आदि लगाकर खाने से जो चिकनाई पेट में जाती है, वह चिकनाई मोटापा बढ़ाती है। आलू को उबालकर या गर्म रेत अथवा गर्म राख में भूनकर खाना लाभकारी है।

चोट लगने पर : 

चोट लगने पर उस स्थान पर नीले रंग का निशान पड़ जाता है। उस नीली पड़ी जगह पर कच्चा आलू पीसकर लगाने से निशान मिट जाता है।

एसिडिटी : 

आलू की प्रकृति क्षारीय है जो अम्लता को कम करती है। जिन रोगियों के पाचन अंगों में अम्लता की अधिकता है, खट्टी डकारें आती है और वायु (गैस) अधिक बनती है, उनके लिए गरम-गरम राख या रेत में भुना हुआ आलू बहुत ही लाभदायक है। भुना हुआ आलू गेहूं की रोटी से आधे समय में पच जाता है। यह पुरानी कब्ज और अन्तड़ियों की दुंर्गध को दूर करता है। आलू में पोटैशियम साल्ट होता है जो अम्लपित्त को रोकता है।

कमर दर्द : 

कच्चे आलू के गूदे को पीसकर पट्टी में लगाकर कमर पर बांधने से कमर दर्द दूर हो जाता है।

पीलिया का रोग : 

आलू या उसके पत्तों का क्वाथ (काढ़ा) बनाकर पिलाने से पीलिया में लाभ होता है।

पेट की गैस बनना : 

कच्चे आलू को पीसकर उसका रस पीने से आराम मिलता है।

जलने पर : 

आलू को बारीक पीसकर शरीर में जले हुए भाग पर मोटा-मोटा सा लेप कर दें जिससे कि जले हुए भाग पर हवा न लगे। ऐसा करने से जलन मिट जाती है और आराम आ जाता है।

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Monday, January 16

हकलाने (STAMMERING) की घरेलू चिकित्सा







By- Dr. Kailash Dwivedi

प्राकृतिक उपचार :
सूर्य की तरफ पीठ करके एक आइना पकड़कर और मुँह खोलकर ऐसी स्थिति में बैठें ताकि सूर्य की रोशनी आईने से प्रतिम्बिबित होकर आपके खुले मुँह में प्रवेश करे। गहरी साँस लें और धीरे धीरे अपना मुँह खोलें, और आईने को अपनी जीभ पर प्रतिम्बिबित करें। जीभ आपके मुँह के निचले भाग की तरफ होनी चाहिए अगर आपने सही तरह से निर्देशों का पालन किया है। अपनी जीभ को ढीला छोड़ दें, उसे कभी भी कड़ा न करें, क्योंकि ऐसा करने से हकलाहट बनी रहेगी। स्पष्ट रूप से ‘क्या हो’ शब्द का बार बार उच्चारण करें। आपकी जीभ को सुचारू रूप से कार्यशील करने के लिए यह एक उत्तम उपाय माना जाता है।

घरेलू उपचार :

  • नियमित रूप से एक आँवले का सेवन करने से हकलाहट कम होती है । सुबह सवेरे एक चम्मच सूखे आँवले का पाउडर और एक चम्मच देसी घी का सेवन करने से भी हकलाहट में लाभ मिलता है।
  • सोने से पहले छुआरों का सेवन करें पर कम से कम 2 घंटों तक पानी न पीयें। इससे आवाज़ भी साफ़ हो जायेगी और हकलाहट भी दूर हो जायेगी।
  • 12 बादाम पूरी रात पानी में सोख कर रखें, और सुबह उनके छिलके उतार कर पीस लें, और उन्हें 30 ग्राम मक्खन के साथ सेवन करने से भी हकलाहट में लाभ मिलता है।
  • हकलाहट दूर करने के लिए 10 बादाम और 10 काली मिर्च मिश्री के साथ पीस कर दस दिन तक सेवन करें।
  • गुनगुने ब्राह्मी तेल से सिर पर 30 से 40 मिनट तक मालिश करें। उसके बाद गुनगुने पानी से नहा लें। इससे स्मरण शक्ति में सुधार होता है और अटककर और हकला कर बोलने का दोष मिट जाता है ।
  • योग में खेचरी मुद्रा करने से भी हकलाहट में लाभ होता है (इस मुद्रा को करने के लिए अपनी जिव्हा को मोडकर तालू में लगायें, कुछ समय तक इसी स्थिति में रहें | दिन में कई बार इसे करें |
  • दिन में तीन-चार बार 10 बार गहरी श्वास भरें और छोड़ें |
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Sunday, January 15

अमाशय का घाव (ULCER) - कारण लक्षण और उपचार




By- Dr.Kailash Dwivedi

आमाशय  के घाव का प्रमुख कारण है- बहुत अधिक अप्राकृतिक आहार जैसे चाय,काफी,कोल्ड ड्रिंक,तले हुए खाद्य, तम्बाकू, शराब, डिब्बाबंद खाद्य, परिशोधित/ परिरक्षित  खाद्य इत्यादि का सेवन है | आमाशय को निरंतर अप्राकृतिक खाद्यों से भरते रहना उसकी कार्य क्षमता को घटाता है फलस्वरूप वहां पर विजातीय द्रव्यों (विष) का प्रभाव बढ़ जाता है और अल्सर सहित अन्य अनेक पाचन संस्थान के रोग उत्पन्न हो जाते हैं | इसके अतिरिक्त निम्न कारण भी उत्तरदायी हैं -


  • बहुत अधिक ठंडा अथवा गर्म भोजन ग्रहण करना |
  • अम्लरोग (Acidite) से पीड़ित लोग जब लगातार इसकी उपेक्षा करते हैं एवं विभिन्न दवाओं से एसिडिटी को दबाते रहते हैं, यह अवस्था आगे चलकर ‘अल्सर’ में परिवर्तित हो जाती है |
  • अयाधिक मद्यपान एवं चाय, काफी शरीर में अम्लता के स्तर को बढ़ा देती है, जिससे आमाशय में घाव की सम्भावना बढ़ जाती है |

लक्षण  

  • आमशायिक घाव में अधिकांश नाभि के थोडा ऊपर या पेट के ठीक बीचों-बीच छाती की हड्डियों के ठीक नीचे दर्द होता है |
  • सामान्यतः भोजन के पहले (खाली पेट) दर्द अधिक रहता है जो कि भोजन करने के पश्चात् बंद या कम हो जाता है |
  • दर्दयुक्त स्थान पर दबाने से असहनीय पीड़ा होती है | रोगी पैंट या पैजामा कसकर पहनने में भी तकलीफ महसूस करता है |
  • कभी-कभी खून की उलटी होती है जो कि कुछ काले रंग कि होती है एवं खून के साथ खाए हुए पदार्थ भी निकलते हैं |

चिकित्सा  :

चूँकि शरीर में विजातीय द्रव्यों(विष) का बढ़ना भी इस रोग का कारण है अतः मात्र आमाशय के घाव को निरोग करना इसका स्थायी निवारण नहीं क्योंकि शरीर की दूषित अवस्था में एक स्थान का घाव अच्छा होने पर उसकी दूसरे स्थान पर पुनः उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है अतः आहार चिकित्सा के साथ-साथ शरीर का शोधन करना अति आवश्यक है |रोगी को कम-से-कम तीन सप्ताह तक प्राकृतिक उपचार एवं प्राकृतिक नियमों का पालन करना चाहिए | अल्सर की चिकित्सा में प्रतिदिन पेट की लपेट का प्रयोग करना चाहिए |

पेट की लपेट  की विधि  :

पेट की लपेट के लिए महीन सूती कपडा लगभग एक फिट चौड़ा एवं लम्बा इतना कि पेट पर तीन-चार लपेटे लग जाएँ | इस कपडे कि पट्टी को ठन्डे पानी में भिगोकर निचोड़ लें, तत्पश्चात इसे पेडू से नाभि के ऊपर तक रखकर लपेट लें | इस गीली पट्टी के ऊपर कोई गर्म कपडा जैसे शाल या चादर इस तरह लपेटें कि नीचे  वाली गीली पट्टी पूरी तरह से ढक जाय | इसके अतिरिक्त निम्नलिखित क्रम से चिकित्सा करनी चाहिए |

प्रथम सप्ताह का उपचार एवं भोजन क्रम :

  • एक सप्ताह तक प्रतिदिन प्रातः खाली पेट 5 मिनट पेट की गर्म सेंक करके पेट पर ४५ मिनट तक  मिटटी की पट्टी लगायें तत्पश्चात गुनगुने पानी का एनिमा लेकर ४५ मिनट के लिए पेट की लपेट करें |
  • रात्रि में पेट पर  मिटटी की पट्टी लगाकर सोयें |पट्टी लगी रहे इसलिए उसे किसी कपडे की पट्टी से बांध लें |
  • रोग की तीव्र अवस्था में रोगी को एक बार में भरपेट न खाकर थोडा-थोडा करके पहले एक घंटे के अन्तराल पर सुबह ७ बजे से सायं ७ बजे तक खाना चाहिए |
  • प्रातः एक गिलास ताजे पानी में दो चम्मच शहद, एक घंटे बाद एक खीरे का रस पुनः एक घंटे बाद दूध (१०० से २५० मिली.) लेना चाहिए | इन्ही तीन पथ्यों को क्रम से दिनभर लेना चाहिए |
  • इस रोग में दूध को सर्वश्रेष्ठ पथ्य माना गया है क्योंकि यह आमाशय को उत्तेजित किये बिना शरीर को पुष्ट करता है | इस बात का ध्यान रखें कि दूध न अधिक गर्म हो और न ही अधिक ठंडा |
  • शहद को पानी के अतिरिक्त दूध के साथ भी ले सकते हैं | चीनी का प्रयोग न करें |

दूसरे सप्ताह का उपचार एवं भोजनक्रम  :

  • दूसरे सप्ताह प्रातः काल प्रथम सप्ताह की तरह ही उपचार करें तत्पश्चात ठन्डे पानी में एक तौलिया भिगोकर,निचोड़कर  सिर पर रखकर ३० -४० मिनट धूप में बैठें |
  • रात्रि में प्रथम सप्ताह की तरह पेट पर मिटटी की पट्टी लगायें |
  • भोजन में प्रति दो घंटे पर शहद+पानी, खीरे का रस, दूध लें |
  • दोपहर में खूब पके हुए २-३ केला खाएं |

तीसरे सप्ताह का उपचार एवं भोजनक्रम  :


प्रातः पेट की सेंक १० मिनट+मिटटी की पट्टी ४५ मिनट+एनिमा के बाद पेट की गर्म-ठंडी सेंक करनी चाहिए | 

गर्म-ठंडी सेंक के लिए एक रबड़ की थैली में गर्म पानी भरें | एक बर्तन में खूब ठंडा पानी रख लें | गर्म सेंक रबड़ की थैली से एवं ठंडी  सेंक  पानी में एक छोटा तौलिया भिगोकर निम्नलिखित क्रम से करें -

  • गर्म सेंक : 3 मिनट                     
  • ठंडी सेंक : 1मिनट
  • गर्म सेंक : 3 मिनट                     
  • ठंडी सेंक : 1मिनट
  • गर्म सेंक : 3 मिनट                     
  • ठंडी सेंक : 1मिनट
  • गर्म सेंक : 3 मिनट                     
  • ठंडी सेंक : 3 मिनट

यदि गर्म सेंक के लिए रबड़ की थैली उपलब्ध न हो तो ठंडी सेंक की तरह गर्म पानी में छोटा तौलिया भिगोकर, हल्का निचोड़कर सेंक की जा सकती है | सेंक के दौरान तौलिया प्रति मिनट पुनः पानी में भिगोकर बदलते रहें |

  • रात्रि सोते समय सारी रात के लिए पेट की लपेट करें |
  • भोजन में प्रति दो घंटे पर क्रम से शहद+पानी व मौसमी का रस लें |
  • दोपहर में खूब गला हुआ भात (पुराने चावल का) लें |
  • सायं ४ बजे किसी हरी सब्जी का सूप लें |
  • रात्रि भोजन में – लौकी, परवल जैसी कोई हरी सब्जी+उबला हुआ आलू लें |

आमाशय से रक्तस्राव होने पर क्या करें ?

रोग की तीव्र अवस्था में यदि आमाशय से रक्तस्राव एवं उल्टियाँ प्रारंभ हो जाएँ तो तुरंत पीठ के बल चित लेट जाएँ, तत्पश्चात ठन्डे पानी में तौलिया भिगोकर, दो-तीन तह करके  पेट पर रखें उसके ऊपर बर्फ की थैली रख दें |अथवा पेट पर मिटटी की पट्टी रखें तत्पश्चात सिर पर ठन्डे पानी में बिगोकर तौलिया रखें एवं पैरों की लपेट (पेट की लपेट की तरह ) करें || यह सब प्रयोग एक साथ ही करें | उपचार के मध्य यदि रोगी को पसीना आने लगे तो तो पैरों की लपेट खोल दें | उपचार के मध्य चाय के चम्मच से बर्फ का पानी पीते रहें अथवा बर्फ का टुकड़ा मुंह में रखकर चूसते रहें |इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आमाशय से रक्तस्राव होने पर पूर्ण विश्राम अति आवश्यक है अतः कम-से-कम १५ दिन का बेडरेस्ट करें एवं प्रथम सप्ताह का उपचार क्रम चलाते रहें | 

विशेष ध्यान देने योग्य बातें  :

  • यदि अल्सर का दर्द हो रहा हो तो पेट पर दिन में तीन बार गर्म -ठंडी सेंक के बाद एक-एक घंटे के लिए पेट की लपेट करनी चाहिए | इसके अतिरिक्त दो बार एक घंटे के लिए पैरों की लपेट करनी चाहिए |
  • यदि भोजन के बाद उल्टी हो जाती हो तो भोजन के पूर्व पेट की गर्म-ठंडी सेंक के बाद  ४५ मिनट तक पेट की लपेट करें तत्पश्चात भोजन करें |
  • घाव सुखाने के लिए यह आवश्यक है कि चिकित्सा क्रम के अनुसार पेट पर मिटटी कि पट्टी का प्रयोग सारी रात के लिए किया जाय |
  • प्रतिदिन शवासन और शरीर की शिथिलता का अभ्यास करना चाहिए |
  • पेट थोडा अच्छा होते ही (तीन सप्ताह बाद) फलों के रस,उबली हुयी सब्जी,सब्जियों का सूप और कच्ची सब्जियों का रस लेना चाहिए | रोग की  तीव्र अवस्था में सलाद नहीं लेना चाहिए |
  • किशमिश जैसे मेवे ले सकते हैं परन्तु इसे १२ घंटे पहले पानी में भिगोकर मसल कर लें तत्पश्चात उस पानी को छानकर पी लें |
  • हल्दी के अतिरिक्त सभी तरह के मसाले,फलों के छिलके और बीज,सलाद,मूली ,रेशेदार सब्जियां,सभी तरह के तले- भुने खाद्य,अधिक नमक,मिर्च,अचार,अंजीर,खुबानी,कच्चा सेब,मुनक्का,परिरक्षित खाद्य,सिरका,मांस-मछली,चाय,काफी व चीनी निरोग होने के बाद कम से कम एक वर्ष तक नहीं लेना चाहिए |
  • यदि रोग को पुनः नहीं आने देना चाहते हों तो धूम्रपान,मद्यपान,पान मसाला, गुटखा आदि नशीले पदार्थों का सेवन वर्जित कर दें |

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Thursday, January 12

3 ऐसे सुपर ड्रिंक्स जो पेट व कमर की अतिरिक्त चर्बी को कर देंगे गायब !




By- Dr. Kailash Dwivedi

कमर एवं पेट के आस-पास बढ़ी हुयी चर्बी को लेकर प्रत्येक व्यक्ति खासकर महिलायें बहुत ही चिंतित रहती हैं | इस प्रकार की चर्बी न सिर्फ सुन्दरता को कम करती है बल्कि अनेक रोगों का कारण भी बनती हैं | इस लेख में हम आपको बता रहे हैं  कमर और पेट की चर्बी को कम करने के कुछ आसान व अत्यंत प्रभावकारी ड्रिंक्स |


1. दालचीनी और एप्पल साइडर विनेगर :

यदि यह कहा जाये कि एप्पल साइडर सिरका वजन घटाने, मधुमेह, सूजन, सुंदर त्वचा और बालों के लिए एक सुपर पदार्थ है और रसोई में पाया जाने वाला दालचीनी वसा को ढीला करने में चमत्कार कर सकता हैं। तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी

आवश्यक सामग्री

  • एक गिलास पानी
  • एक टेबल स्पून एप्पल साइडर विनेगर
  • एक चुटकी दालचीनी पाउडर
  • शहद

बनाने की विधि :

एक गिलास पानी में 1 टेबल स्पून एप्पल साइडर विनेगर  मिलाएं | इसमें एक चुटकी दालचीनी पाउडर मिलाएं एवं एप्पल साइडर विनेगर का कसैलापन दूर करने के लिए 1 चम्मच शहद मिला लें | अच्छे परिणाम के लिए इस जूस को नाश्ते से 30 मिनट पहले तथा प्रत्येक भोजन के पहले पियें | यह प्रयोग न सिर्फ शरीर से चर्बी घटाएगा बल्कि शरीर से बहुत सारे विषैले तत्वों को भी बाहर निकालने में भी सहायक होगा |

2. अदरख की चाय :

अदरख एक सुपर हाई एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में भी जाना जाता है |  अदरख शरीर के मेटाबोलिज्म को बढ़ाती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करती है एवं कमर की अतिरिक्त चर्बी को भी घटाती है  | भोजन के पूर्व अदरख के कुछ टुकड़े चबाने से पाचन तंत्र मजबूत होता है | प्रतिदिन दो बार अदरख  की चाय पीने से अच्छे परिणाम आते हैं |

आवश्यक सामग्री :

  • 1 नींबू
  • एक कप ताज़ा पानी
  • शहद (यदि लेना चाहें तो)
  • अदरख की 1-इंच लम्बा टुकड़ा
  • 1 चम्मच ग्रीन टी


बनाने की विधि :

पैन में दो कप पानी लेकर इसमें एक इंच लम्बा अदरख का टुकड़ा कद्दूकस करके मिला  दें | इसे धीमी आंच पर तब तक उबालें  जब तक कि पानी एक कप रह जाए |  इस पानी में आधा नींबू का रस निचोड़कर पियें | इस पेय को दिन में दो बार खाली पेट पियें | स्वाद के लिए इसमें एक चम्मच शहद मिला सकते हैं |

3. नींबू का रस, शहद और गर्म पानी :

नींबू एवं शहद एक उच्च एंटी ऑक्सीडेंट है | इसमें मौजूद विशेष तत्व पेट के आस-पास की चर्बी को कम करने में बहुत सहायक हैं | जब इन सुपर सामग्री को आपस में मिलाते हैं तब कुछ बहुत ही अद्भुत होता है | जी हाँ, नींबू और शहद गर्म पानी के साथ- मानव शरीर के लिए चमत्कारिक सिद्ध  हो सकते हैं। यह शरीर में वसा, विषैले तत्वों को नष्ट कर पेट कम कर देता है | साथ ही इसका प्रयोग आपकी त्वचा को युवा और सुन्दर बनाता है।

आवश्यक सामग्री :

  • 1 टेबल स्पून नींबू का रस
  • 1 टेबल स्पून शहद
  • एक गिलास पानी

बनाने की विधि :

एक टेबल स्पून नींबू का रस एवं एक टेबल स्पून शहद दोनों को लेकर एक गिलास गर्म पानी में मिला लें | इस पेय को प्रतिदिन प्रातः खाली पेट पियें | यह ड्रिंक शरीर के अतिरिक्त फैट को जलाएगा साथ ही शरीर से विषैले तत्वों को भी बाहर करेगा एवं शरीर को ऊर्जावान बनाएगा |
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