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Saturday, January 25

कब्ज व बबासीर को दूर करने की अदभुत योग क्रिया- मूलशोधन


संस्कृत शब्द मूल का अर्थ आधार या जड़ है । यहाँ पर मूल का अर्थ मलद्वार एवं मलाशय है । शोधन का अर्थ शुद्ध करना या धोना है । इस प्रकार मूलशोधन की परिभाषा है - वह क्रिया जिससे मलद्वार और मलाशय की सफाई की जाती है । इस मूलशोधन क्रिया के अन्य कई नाम हैं , जैसे - मूलधौति व गणेश क्रिया । गणेशजी का मूलाधार चक्र से संबंध होता है । इसलिये भी इसका नाम गणेश क्रिया पड़ा है । इस क्रिया को चकरी कर्म भी कहा जाता है , क्योंकि उँगली को अंदर में चकरी की तरह गोल - गोल घुमाया जाता है ।


मूलशोधन एक सरल , किन्तु प्रभावशाली क्रिया है ।  इस विधि में उँगली से मलद्वार एवं मलाशय की सफाई करनी होती है । सभवतः आपको यह सबसे कष्टकारक और घिनौना योगाभ्यास  प्रतीत हो , परन्त यही आपके समग्र जीवन को बदल सकता है , विशेषतः आप यदि कब्ज या बवासीर ( हेमोराइड ) से पीड़ित हैं ।
यह अति सरल अभ्यास है परन्तु इसके अनेक अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं । आप अपनी झिझक को दूर करके स्वयं इस क्रिया को करने का प्रयास करें । परम्परानुसार मूल शोधन के लिए हल्दी की जड का प्रयोग किया जाता है , क्योंकि इसका औषधि के रूप में भी उपयोग होता है । यह रोगानु - रोधक तथा रक्त शुद्धि - कारक है एवं शरीर की गंदगी को बाहर निकालती है ।
हल्दी की जड़ सब जगह उपलब्ध नहीं है , अतः मलशोधन हेतु हल्दी की जड़ के स्थान पर उँगली का प्रयोग किया जा सकता है । पर ध्यान रखें कि, आपके नाखून छोटे हों तथा अभ्यास के बाद हाथों को अच्छी तरह धो लें ।
लाभ
इस क्रिया से प्राप्त होने वाले लाभों को जानने से पहले शरीर के इस भाग की संरचना को संक्षिप्त में समझ लेना उपयक्त होगा । वास्तव में यह दो भागों में विभक्त है - पहला गुदा या मलद्वार और दूसरा मलाशय । गुदा दो अवरोधिनियों में विभक्त है . जिन्हें इच्छानुसार प्रसारित व संकुचित किया जा सकता है । आप इसे करके स्वयं समझ सकते हैं । ये अवरोधिनी - पेशियाँ मलत्याग का समय आने तक गुदा को बंद रखती हैं । वास्तव में मलद्वार लगभग दो सेंटीमीटर लम्बा है तथा उसके बाद वह मलाशय में विलीन हो जाता है । मलाशय थोड़ी दूर तक ऊपर जाकर अवरोही बडी आंत के निचले भाग में मिल जाता है । जब आप मलशोधन हेतु अपनी उँगली भीतर डालते हैं तो कुछ उभरा हुआ भाग मालूम होता है । इन उभरे हए भागों की संख्या सात या आठ है तथा इनकी ऊँचाई लगभग एक सेंटीमीटर होती है । इस भाग में कुछ वाल्व भी होते हैं तथा स्नायु एवं रक्त वाहिकाएँ बहुतायत से होती हैं । ये रक्त वाहिकाएँ ही बवासीर के रूप में प्रसारित हो जाती हैं
लाभ
1 . इस क्रिया से स्नाय और रक्त वाहिकाएँ उत्प्रेरित होती हैं , जिससे उत्सर्जन प्रणाली को यथोचित रूप से कार्य करने हेत प्रोत्साहन । मिलता है ।
2 . इससे नियमित एवं तनाव - रहित मल - त्याग की आदत को । प्रोत्साहन मिलता है ।
3 . यह क्रिया कठोर , जमे हए तथा दुर्गंधयुक्त व्यर्थ पदार्थों को निकाल कर सम्पूर्ण भाग की सफाई करती है ।
4 . यह क्रिया कब्ज और बवासीर आदि रोगों का निराकरण करती है तथा उन्हें पनपने से रोकती है ।

कब्ज आधुनिक जीवन का रोग है । इस रोग के मुख्य कारण हैं - अनियमित शौच जाना व मलत्याग के समय अनावश्यक दबाव डालना , गरिष्ठ भोजन करना , जैसे मैदा से निर्मित ब्रेड आदि का सेवन इत्यादि ।
कब्ज होने पर बड़ी आँत का भाग रोगग्रस्त हो जाता है । । कब्ज का निराकरण करना अत्यन्त आवश्यक है , क्योंकि इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ता है । यदि मलोत्सर्ग ठीक से होने लगे तो पाचन क्षेत्र के शेष भाग भी ठीक से काम करने लगेंगे । जो लोग कब्ज से पीड़ित हैं वे नियमित रूप से मूलशोधन का अभ्यास करें । यह अभ्यास है तो कछ ही मिनटों का , मगर इससे मिलने वाले लाभ बहुत हैं ।

कब्ज के साथ बवासीर भी एक सर्व सामान्य रोग है । यह सीधे कब्ज से अथवा रक्त - प्रवाह में रुकावट एवं जमने से भी हो सकता है । मलाशय के अंतिम भाग के समीप गुच्छों या जालिकाओं के आकार की असंख्य रक्त - वाहिका होती हैं । कब्ज के दौरान मलाशय में कड़ा मल संगृहीत होने लगता है तथा वह इन पतली दीवालों वाली रक्त वाहिकाओं पर दबाव डालता है । । इससे रक्त का प्रवाह धीमा तथा अवरुद्ध हो जाता है तथा वह जमने लगता है । यह जमा हुआ रक्त ( थ्रोम्बी ) रक्त वाहिकाओं को प्रसारित होने को बाध्य करता है ताकि कुछ और रक्त प्रवाहित हो सके । यह फैलाव अंदर ही ऊपर की ओर बढ़ता है | फैली हई रक्त - वाहिकाएँ कड़े व कठोर मल के कारण और प्रसारित होती हैं । इस प्रकार मलोत्सर्ग के समय वाहिकाओं में प्रदाह , उत्तेजना तथा दर्द उत्पन्न होता है । चूँकि इस क्षेत्र में रक्त अधिक मात्रा  में रहता है और वाहिकाएं खिचने के कारण सामान्य से पतली हो गई होती हैं , अत वे थोड़ा भी दबाव सहन नहीं कर पातीं और अति शीघ्र रक्त स्रवित होने लगता है तथा पपड़ी जमने लगती है । यही बवासीर की पीड़ादायक । अवस्था है । इसके निराकरन हेतु आप नियमित रूप से मूलशोधन का अभ्यास करें , परन्तु सावधानी अवश्य रखें । यदि आवश्यक हो तो इस हेतु उँगली पर किसी चिकने पदार्थ का लेप किया जा सकता है । इससे असुविधा नहीं होगी तथा वह स्थल शुष्क प्रतीत नहीं होगा ।

अभ्यास का समय
यह आपकी परिस्थिति पर निर्भर करता है । मलशोधन से जो उत्तेजना उत्पन्न होती है , वह क्रमाकंचन की प्रक्रिया शुरू कर देती है । अतः जो कब्ज से पीड़ित हैं , उन्हें मलत्याग से पूर्व मूलशोधन की क्रिया करनी चाहिये । यदि आपको नियमित शौच होता है तो मूलशोधन का अभ्यास शौच के बाद करें ।
अभ्यास
  • इस अभ्यास हेतु उकड़ू बैठना सर्वोत्तम है । भारतीय लोग शौच हेतु उकड़ू ही बैठते हैं । उकड़ू बैठने से पेट पर दबाव पड़ता है , जिससे मल को नीचे मलद्वार की ओर सरकने में सहायता मिलती है । यदि आप शौच के लिये उकड़ू न बैठते हों तो कोई बात नहीं । कम से कम मूलशोधन की क्रिया करते समय आपको उकड़ू बैठना । चाहिये । आप शौचालय में कमोड पर भी उकड़ू बैठ सकते हैं, परन्तु सावधानी रखें ।
  • उकडूं बैठ जायें ।
  • तर्जनी या माध्यमा उँगली को मलद्वार में डालें । आवश्यकता हो तो घी ,थोड़ा तेल या पानी उँगली में लगाया जा सकता है ।
  • पहले उँगली को करीब दो सेंटीमीटर अंदर डालें । उसके बाद उँगली को अंदर दोनों दिशाओं में धीरे - धीरे गोल घुमायें ।
  •  इस प्रकार करने पर धीरे - धीरे आप अपनी उँगली को मलाशय में और आगे प्रवेश कराने में सक्षम होंगे । बल प्रयोग न करें । इससे अवरोधिनी की मांसपेशियाँ शिथिल हो जायेंगी । उँगली को घुमाना और यथा संभव अंदर डालना लगातार करते जायें । इससे मलाशय के स्नाय उत्तेजित होंगे और उनकी कार्यप्रणाली सुधरेगी ।
  • अब उँगली बाहर निकालकर अच्छी तरह धो लें ।
  • पुनः ऊपर बतलाये अनुसार उँगली को अंदर डालकर कछ देर घुमायें । पुनः उँगली को निकालकर धो डालें । इसी प्रकार कई बार करें ।
  • आपको उँगली के द्वारा मलद्वार और मलाशय की दीवालों पर सौम्य , परन्तु स्थिर दबाव डालना है ।
  • यदि आप इस अभ्यास को अधिक प्रभावशाली बनाना चाहें तो अंदर ऊँगली डालते समय मलद्वार की अवरोधिनी को बारी - बारी से संकुचित एवं मुक्त करें । इससे वहाँ के स्नायओं में उत्तेजना उत्पन्न होगी और मलाशय में रक्त का प्रवाह सुचारू रूप से होने लगेगा । परिणामस्वरूप स्वास्थ्य उन्नत होगा और शरीर के इस महत्वपूर्ण अंग की कार्यप्रणाली में सुधार आयेगा ।


सावधानियाँ
·       उँगली के नाखून अच्छी तरह काट लें , क्योंकि मलद्वार तथा मलाशय अत्यधिक संवेदक अंग हैं और नाखूनों से क्षति पहँच सकती है ।
·       यदि आप नाखून काटना नहीं चाहते तो आपको हल्दी की जड़ का प्रयोग करना चाहिये ।
·       अभ्यास के बाद हाथों को अच्छी तरह साफ करें ।
·       यदि आप बवासीर से पीड़ित हों तो उँगली अंदर डालते समय सावधान रहें । इस क्रिया से आपको रोग मुक्त होने में मदद मिलेगी परन्त इसके लिये उँगली डालते समय और मालिश करते समय आपको सावधानी रखनी होगी । दर्द में जैसे - जैसे कमी होती जाये , वैसे - वैसे आप मालिश थोड़े दबाव के साथ कर सकते हैं । इस समय आपको अपने सामान्य विवेक का उपयोग करना चाहिये ।
·        अभ्यास के दौरान अपने हाथों को धोने के लिए ठंडे पानी का प्रयोग करें । यदि संभव हो तो मलद्वार को भी ठंडे पानी से धोयें । यह बहत महत्वपूर्ण है , क्योंकि ठंडा पानी उस क्षेत्र में रक्त के प्रवाह को उत्तेजित करता है । साथ ही ठंडा पानी रक्त वाहिकाओं का संकुचन करता है , जो बढ़ी शिराओं को यथा स्थान ले जाता है । इस हेतु गर्म पानी का उपयोग करने से उक्त क्रिया विपरीत दिशा में होने लगती है , अतः हमेशा ठंडे पानी का ही प्रयोग करना चाहिये ।



Friday, February 10

चेहरे की बारीक रेखाओं और झुर्रियों से परेशान हैं तो इसे जरुर करें !



By- Dr. Kailash Dwivedi

चेहरे में लगभग 52 मांसपेशियां होती हैं। नियमित रूप से इन मांसपेशियों का व्यायाम न सिर्फ चेहरे, गर्दन और आंखों के तनाव को कम करता है बल्कि चेहरे की बारीक रेखाओं और झुर्रियों को भी दूर करता है | यह अभ्यास मांसपेशियों को टोन करता है, जिससे चेहरे की अतिरिक्त चर्बी से भी छुटकारा मिलता है। इस लेख में हम आपको बता रहे हैं ऐसे व्यायाम जिन्हें आप किसी भी समय कर सकते हैं |


करें यह व्यायाम :

  • गालों को फुलाएं, मुंह के अन्दर की वायु को एक गाल से दूसरे गाल में दायें-बाएं 5 -5 बार घुमाएं | और फिर होंठों को गोल 'O'  आकर बनाकर वायु को बाहर निकाल दें।
  • होठों से छोटा ‘o’ बनाएं और फिर होठों को फैलाते हुए क्रमशः बड़ा  ‘O’ बनाएं | इस अभ्यास को 10 बार करें।
  • होठों को बंद रखते हुए मुस्कुराएं। फिर अपने गालों को अंदर की ओर खींचें और मछली के मुंह के जैसे मुंह बनाएं।
  • जीभ को यथाशक्ति मुंह से बाहर निकालें | लगभग 1 मिनट इसी स्थिति में बने रहें |
  • श्वास भरते हुए अपने सिर को एक तरफ कंधे तक ले जाएं, थोड़ी देर रुकें एवं श्वास छोड़ते हुए वापस आयें | इसी तरह दूसरी तरफ श्वास भरते हुए कंधे तक ले जाएं, थोड़ी देर रुकें एवं पुनः श्वास छोड़ते हुए वापस आयें ।  दोनों तरफ 3-3 बार इस अभ्यास को करने के बाद 3 बार गर्दन को दोनों दिशाओं में गोल-गोल घुमाएं।
  • ऊपर की ओर देखते मुंह को चूमने की स्थिति में सिकोड़ें 5 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें | इसे भी कम से कम 5 बार दोहराएँ |
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Wednesday, February 1

जानिए, सिर दर्द दूर करने की एक चमत्कारिक विधि !



प्रथम स्थिति :

अपने दाहिने हाथ को कन्धे के बराबर सीध में उठाते हुए हाथ को कोहनी से मोड़कर हथेली को दाहिनी कनपटी (कान के आगे मस्तक के दाहिने साइड में) पर जमायें | श्वास को अन्दर भरते हुए दाहिनी कनपटी पर हथेली का दबाब बायीं ओर बनायें एवं सिर से दाहिनी ओर दबाब बनायें | अर्थात हथेली के दबाब के विपरीत दिशा में सिर से जोर लगायें | जब तक आराम से श्वास को अन्दर रोक सकते हों इसी प्रकार दबाब बनाकर रखें, तत्पश्चात श्वास को बाहर छोड़कर दबाब हटा लें | इस प्रक्रिया को पांच बार दोहराएँ | ध्यान रहे कि हथेली एवं सिर का एक-दूसरे के विपरीत इतना दबाब बनाना है कि सिर में एक एक प्रकार का कम्पन उत्पन्न हो जाये |



दूसरी स्थिति :

अब अपने बाएं हाथ को कन्धे के बराबर सीध में उठाते हुए हाथ को कोहनी से मोड़कर हथेली को बायीं कनपटी (कान के आगे मस्तक के बाएं साइड में) पर जमायें | श्वास को अन्दर भरते हुए बायीं कनपटी पर हथेली का दबाब दाहिनी ओर बनायें एवं सिर से दाहिनी ओर से बायीं ओर दबाब बनायें | अर्थात प्रथम स्थिति की तरह हथेली के दबाब के विपरीत दिशा में सिर से जोर लगायें | जब तक आराम से श्वास को अन्दर रोक सकते हों इसी प्रकार दबाब बनाकर रखें, तत्पश्चात श्वास को बाहर छोड़कर दबाब हटा लें | इस प्रक्रिया को पांच बार दोहराएँ | ध्यान रहे कि हथेली एवं सिर का एक-दूसरे के विपरीत इतना दबाब बनाना है कि सिर में एक एक प्रकार का कम्पन उत्पन्न हो जाये |





तीसरी स्थिति :

अपने दोनों हाथों की ऊँगलियो को आपस में फंसाकर हाथों को कन्धों के बराबर सीध में उठाते हुए हथेलियों को मस्तक पर जमायें | श्वास को अन्दर भरते हुए मस्तक पर हथेलियों का दबाब पीछे की ओर बनायें एवं सिर से आगे की तरफ दबाब बनायें | जब तक आराम से श्वास को अन्दर रोक सकते हों इसी प्रकार दबाब बनाकर रखें, तत्पश्चात श्वास को बाहर छोड़कर दबाब हटा लें | इस प्रक्रिया को पांच बार दोहराएँ | इसमें भी ध्यान रहे कि हथेली एवं सिर का एक-दूसरे के विपरीत इतना दबाब बनाना है कि सिर में एक एक प्रकार का कम्पन उत्पन्न हो जाये |



चौथी स्थिति :

तीसरी स्थिति की तरह से अपने दोनों हाथों की ऊँगलियो को आपस में फंसाकर हाथों को सिर के उपर उठाते हुए हथेलियों को सिर के पीछे जमायें | श्वास को अन्दर भरते हुए हथेलियों का दबाब पीछे से आगे की तरफ बनायें एवं सिर से पीछे की तरफ दबाब बनायें | जब तक आराम से श्वास को अन्दर रोक सकते हों इसी प्रकार दबाब बनाकर रखें, तत्पश्चात श्वास को बाहर छोड़कर दबाब हटा लें | इस प्रक्रिया को पांच बार दोहराएँ | इसमें भी ध्यान रहे कि हथेली एवं सिर का एक-दूसरे के विपरीत इतना दबाब बनाना है कि सिर में एक एक प्रकार का कम्पन उत्पन्न हो जाये |

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Sunday, January 22

इन 6 आसनों से बनाएं अपनी बॉडी स्लिम !





By- Dr. Kailash Dwivedi

उर्ध्व हस्तोत्तानासन :

खड़े होकर पैरों को थोड़ा खोलें। हाथों की उंगलियों को फंसाकर सिर के ऊपर उठा लें। श्वास निकालें और कमर को लेफ्ट साइड में झुका लें। दाहिनी ओर से भी इसी प्रकार करें। दोनों साइड से 10-10 बार करें |

उत्तानपादासन :

कमर के बल लेटकर हाथों को जंघाओं के नीचे जमीन पर रखें। श्वास भरते हुए दोनों पैरों को 90 डिग्री तक ऊपर उठाएं एवं श्वास छोड़ते हुए वापस नीचे लायें। इस प्रकार जमीन पर बिना टिकाए बार-बार पैरों को ऊपर-नीचे करते रहें। कमर दर्द वाले इसे न करें।

हृदय स्तंभासन :

कमर के बल लेटकर हाथों को जंघाओं के ऊपर रखें। सांस भरकर पैरों को उठाएं। सिर और कमर को उठाएं। इस दौरान शरीर का भार हिप्स पर रहेगा।

द्विपाद साइकलिंग :

कमर के बल लेटे-लेटे ही दोनों पैरों को मिलाकर एक साथ साइकलिंग की तरह घुमाएं। थकान होने तक लगातार घुमाते रहें। हाथों को कमर के नीचे रखें।

कपालभाति :

सांस को तेजी से नाक से बाहर फेंकें, जिससे पेट अंदर जाएगा। 5-10 मिनट करें। हाई बीपी वाले धीरे-धीरे करें और कमर दर्द वाले कुर्सी पर बैठकर करें।

अग्निसार :

खड़े होकर पैरों को थोड़ा खोलकर हाथों को जंघाओं पर रखें। सांस को बाहर रोक दें। फिर पेट की पंपिंग करें यानी पेट अंदर खींचें, फिर छोड़ें। स्लिप डिस्क, हाई बीपी या पेट का ऑपरेशन करा चुके लोग इसे न करें।

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Friday, November 28

श्वास-प्रश्वास से रोग-मुक्ति

हमारा शरीर पंचतत्व – पृथ्वी,जल,वायु और आकाश से निर्मित है| प्राकृतिक चिकित्सा भी इन्ही पंचतत्वों पर आधारित है| प्रदूषित आहार,प्रदूषित विचार व प्रदूषित रहन-सहन ने व्यक्ति के स्वास्थ्य को अस्त-व्यस्त कर दिया है |
अक्सर लोग कहते हैं कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में व्यक्ति को साँस लेने की फुर्सत नहीं है | वास्तव में बहुत कुछ हद तक यह सत्य है | कितने लोग ऐसे होंगे जिनका ध्यान दिन में कभी अपने श्वास-प्रश्वास पर पहुंचता होगा ? हम स्वयं का ही अवलोकन कर लें – क्या हम सजकतापुर्वक श्वास लेते हैं?
स्वस्थ्य रहने का मंत्र -श्वासों को अपने नियंत्रण में रखने में है परन्तु हम स्वयं श्वासों के नियंत्रण में हैं | चिंता,क्रोध,विषय-वासना आदि के समय यदि अपनी श्वास का अवलोकन करें तो वे असामान्य मिलेंगी | इस समय यदि श्वासों को नियंत्रित कर लें तो यह उद्वेग अपने आप नियंत्रित हो जायेंगे |
ईर्ष्या,क्रोध,दुःख,शोक, चिंता आदि द्वारा असामान्य हुआ श्वसन शरीर के अन्तःस्रावी-तंत्र को असंतुलित कर देता है परिणामस्वरूप अतःस्रावी – तंत्र हारमोंस की कम या अधिक मात्रा अथवा हानिकारक हार्मोन स्रवित करना प्रारंभ कर देता है जिससे शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होने लगते हैं |
आक्सीजन , जिसे हम श्वास के माध्यम से प्रतिदिन भोजन एवं जल से लगभग सात गुना अधिक ग्रहण करते हैं |श्वास द्वारा खींची गई वायु फेफड़ों में १५ वर्ग फुट से अधिक का चक्कर लगाकर गंदे रक्त को शुद्ध एवं स्वच्छ कर देती है| रक्त शुद्धिकरण के दौरान उत्पन्न कचरा कार्बन डाईआक्साइड एवं अन्य विषैले तत्वों के साथ प्रश्वास के रूप में बाहर निकलता है | परन्तु उथली श्वास से यह प्रक्रिया सुचारू ढंग से नहीं हो पाती और रोगों का कारण बनती है |

श्वास:



एक वयस्क व्यक्ति एक मिनट में सामान्यतः १८-२० बार श्वास लेता है | श्वास के दौरान ली गयी वायु में ऑक्सीजन मात्र २० प्रतिशत रहती है जिसमें भी हम मात्र ४ प्रतिशत ऑक्सीजन का ही उपभोग कर पाते हैं बाकी १६ प्रतिशत ऑक्सीजन,नाइट्रोजन आदि गैसों के साथ वापस आ जाती है |

ऑक्सीजन के सही उपभोग से रोग-मुक्ति कैसे ?



ऑक्सीजन बड़ा उग्रदाह्क है | शुद्ध ऑक्सीजन अन्य गैसों के संयोग से लोहे जैसी कठोर धातु को भी क्षण -मात्र में पिघला देती है | किसी भी धातु में जंग लगना,वस्तुओं का सड़ना,आग का जलना सभी में ऑक्सीजन की संयोजन की क्रिया है| ऑक्सीजन के संयोग के फलस्वरूप गन्दा नीला रक्त क्षणमात्र में शुद्ध होकर लाल हो जाता है | यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि ऑक्सीजन कि दहनशीलता जल या जलवाष्प के संपर्क मेंआने से समाप्त हो जाती है | श्वास के साथ नाईट्रोजन एवं जल वाष्प भी अन्दर जाती है | इसी कारण ऑक्सीजन हमें जलाती नहींअपितु जीवन प्रदान करती है |
ऑक्सीजन प्रकाश और ताप दोनों को उत्पन्न करती है | ऑक्सीजन के अभाव में शरीर का ठंडा [मृत] होना निश्चित है | श्वास के द्वारा प्राप्त ऑक्सीजन को रक्त शरीर कि प्रत्येक कोशिका में पहुँचाकरउन्हें जीवन प्रदान करता है | अर्थात प्रत्येक कोशिका श्वसन करती है| इसी प्रक्रिया को आक्सीकरण कहते हैं |
उथली श्वास लेने या जल्दी-जल्दी श्वास-प्रश्वास से सभी कोशिकाओं तक ऑक्सीजन नहीं पहुँच पाती फलस्वरूप वहां कि कोशिकाएं निष्क्रिय होने लगती है जहाँ पर पूरी मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुँच पाती |
प्रयोगों से यह सिद्ध हो चूका है कि ऑक्सीजन को श्वास कि सही विधि से लेने पर किसी भी तरह का रोग,दर्द तो क्या ट्यूमर तक को समाप्त किया जा सकता है |

रोग-मुक्ति हेतु श्वास-प्रश्वास के कुछ प्रयोग :



प्रथम चरण – 5 मिनट

किसी शांत-शुद्ध स्थान पर जहाँ पर शुद्ध वायु मिल रही हो,शांत-स्थिर होकर बैठ जाएँ | रीढ़ कि हड्डी सीधी रहे | धीरे-धीरे खूब गहरी श्वास लें| श्वास इतने धीरे लें कि स्वयं को भी सुनाई न पड़े |
आराम से श्वास को जितनी देर अन्दर रोक सकते हैं रोके रखें, तत्पश्चात धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकालें |
अब जितनी देर बिना श्वास लिए आराम से रुक सकते हैं श्वास को बाहर ही रोके रखें, तत्पश्चात पुनः धीरे-धीरे गहरी लम्बी श्वास भरें एवं पहले कि प्रक्रिया दोहराएँ |

द्वितीय चरण – 5 मिनट



श्वास को अन्दर-बाहर रोकना बंद कर दें परन्तु गहरी लम्बी श्वास लेते व् छोड़ते रहें |

तृतीय चरण -5  मिनट



मन को श्वास-प्रश्वास पर लगा दें | अर्थात अपने मन को श्वास के साथ ही अन्दर ले जाएँ एवं श्वास के साथ बाहर लायें | दूसरे शब्दों में -श्वास को अन्दर-बाहर आते-जाते हुए देखें |

चतुर्थ चरण – 10 मिनट




  • अब शरीर के रोग-ग्रस्त स्थान का अन्दर ही अन्दर अवलोकन करें |

  • गहरी लम्बी श्वास खींचकर अपना ध्यान एवं श्वास दोनों को रोग-ग्रस्त स्थान पर केन्द्रित करें व अनुभव करें कि श्वास में उपस्थित ऑक्सीजन से रोग-ग्रस्त

  • अंग में आक्सीडेशन हो रहा है | ऐसा महसूस करें कि श्वास रोग-ग्रस्त स्थान से जितने भी विष हैं, अपने में मिला रही है |

  • श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालें एवं ऐसा अनुभव करें कि रोग-ग्रस्त स्थान से रोग के जो कारण हैं वे भी बाहर निकल रहे हैं |

  • प्रत्येक श्वास-प्रश्वास के साथ उपर्युक्त अनुभव करें | आप देखेंगे कि इस आधा घंटे के प्रयोग से कुछ ही दिनों में रोग समाप्त होना प्रारंभ हो जायेगा |



 

Thursday, August 29

गैस्ट्रिक से परेशान हैं तो रोज करें पश्चिमोत्तानासन

गलत खानपान, शारीरिक श्रम की कमी, तनाव आदि हमारी जीवनशैली में इस तरह घर कर गए हैं कि ये हमारे लिए तमाम तरह की बीमारियों की जड़ हैं। गैस्ट्रिक भी ऐसी समस्या है जो किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए परेशानी का सबब बन गई है।

अगर आप सेहतमंद डाइट और योगासनों को जीवनशैली का हिस्सा बनाएंगे तो गैस्ट्रिक की समस्या आपसे कोसों दूर रहेगी। इस कड़ी में रोज सुबह पश्चिमोत्तानासन का अभ्यास आपको इस समस्या से छुटकारा दिलाने में काफी मददगार हो सकता है। बेहतर होगा कि आप किसी अनुभवी प्रशिक्षक की देखरेख में करें |

 

पश्चिमोत्तानासन की विधि :


  1. दोनों पैरों को सीधा फैलाकर बैठ जाएं।

  2. कमर सीधी रखें और सांस खींचते हुए दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाएं।

  3. अब दोनों हाथों को नीचे की ओर लाते हुए झुकें और हाथों से पैरों के पंजे छूने ‌की कोशिश करें।

  4. माथा घुटनों से छूना चाहिए लेकिन घुटने सीधे रखें।

  5. कुछ सेकंड इसी अवस्था में रहने के बाद सामान्य अवस्था में आ जाएं।

  6. रोज कम से कम 10 से 15 बार यह आसन जरूर करें।