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Friday, December 30

जानिए एनिमा की विधि एवं लाभ


  • एनिमा क्रिया आंतों को साफ करने की एक क्रिया है, जिसमें यंत्र के द्वारा पानी को मलद्वार से मलाशय में पहुंचाकर आंतों को साफ किया जाता है। एनिमा क्रिया वैसे ही है जैसे योग में आंतरिक अंगों को साफ करने के लिए षटक्रिया होती है। षटक्रिया में पानी, दूध, रस्सी तथा धौति आदि के द्वारा शरीर के आंतरिक अंगों को साफ किया जाता है। षटक्रिया में एक अन्य क्रिया भी है जिसे बस्तिक्रिया कहते हैं। बस्ति क्रिया का छोटा रूप ही एनिमा क्रिया है। एनिमा क्रिया में पानी को मलद्वार से अंदर पहुंचाकर मलाशय को साफ किया जाता है। एनिमा क्रिया द्वारा केवल आंतों को साफ करके शरीर के विभिन्न रोगों को उत्पन्न होने से रोककर शरीर को स्वस्थ्य बनाए रखा जा सकता है। एनिमा क्रिया से रोग दूर होता है और शरीर कोमल, सुंदर बनता है। एनिमा से आंतों की सफाई के साथ-साथ शरीर का खून भी साफ होता है, जिससे त्वचा कोमल और चेहरे पर चमक आती है।

  • एनिमा क्रिया देखने में साधारण क्रिया लगती है, जिससे आंते साफ होती हैं। परंतु यह क्रिया शरीर में उत्पन्न करने वाले अनेक प्रकार के रोगों का मुख्य स्रोत पेट की कब्ज को दूर करता है। इस क्रिया से कब्ज जड़ से ही समाप्त होता है और शरीर में विभिन्न प्रकार के रोगों को उत्पन्न होने से रोकता है।
  • एनिमा से आंतों की गर्मी और खुश्की दूर होती है। दस्त या रेचक को ठीक करने के लिए प्रयोग की जाने वाले दवाईयां शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक होती हैं। इन दवाईयों के प्रयोग से कब्ज दूर होने के स्थान पर आंतों को कमजोर हो जाती है। इन दवाईयों के प्रयोग से कब्ज दूर नहीं होती बल्कि वह दब जाता है, जो धीरे-धीरे गैस या अन्य विकार उत्पन्न करता है। इससे खून दूषित होकर शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी कब्ज पुराना हो जाने पर आंतों में सड़ने लगता है, जिससे आंतों में कीड़े आदि बन जाते हैं। परंतु एनिमा क्रिया से आंत में जमा हुआ मल, पुराना कब्ज तथा कीड़े आदि नष्ट होते हैं और मलद्वार से बाहर निकल जाते हैं।
  •  बुखार उत्पन्न होना शरीर में बनने वाले अन्य रोगों को संकेत देता है। अत: बुखार में एक एनिमा रोगी को देने से बुखार ठीक हो जाता है और उत्पन्न होने वाले रोग अपने आप समाप्त हो जाता है।
  • गर्भावस्था के अनेक विकार जैसे- उल्टी (वमन), भोजन का न पचना आदि रोग दूर होते हैं। गर्भवती स्त्री को प्रसव के समय उत्पन्न होने वाले दर्द के समय एनिमा देने से प्रसव का कष्ट दूर होता है और बच्चे का जन्म सुखपूर्ण होता है।
  • गर्म पानी के एनिमा के बाद ठंडे पानी का एनिमा देने से पीलिया रोग दूर होता है। एनिमा से विभिन्न रोग जैसे- गठिया, बवासीर, पुराना कब्ज, मन्दाग्नि (पाचन क्रिया का कमजोर होना), खून की खराबी, सांस का रोग, सिरदर्द, बेहोशी, चक्कर आना, अफारा, खांसी, मुंह से बदबू आना आदि रोग ठीक होते हैं। एनिमा यकृत विकार, शारीरिक कमजोरी, निस्तेज हो जाना, फोड़े-फुंसी, दाद, खाज आदि चर्म रोगों को दूर करता है। यह जीभ के छाले, मुंह के छाले तथा स्नायु विकार को दूर करता है। एनिमा क्रिया करने के बाद शारीरिक और मानसिक शांति व स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इस तरह एनिमा सभी प्रकार के रोगों को दूर करने वाली एक आसाधारण क्रिया है |
  • एनिमा पानी के अतिरिक्त रोगानुसार अन्य कई चीजों से दिया जाता है जैसे मट्ठा, नीम के पानी से,दशमूल क्वाथ से आदि | यहाँ हम सामान्य रूप से प्रचलित सादे पानी का एनिमा के विषय में बता रहे हैं




एनिमा की विधि :
साधन:
एनिमा पाट,(चित्र देखें) एक टेबल जिस पर आराम से लेटा जा सके, सरसों का तेल (लगभग 50 मिली)। रबड़ का कैथेटर – 10 नं. का |


विधि : पैरों की तरफ से टेबल के पायों के नीचे ईंट आदि लगाकर थोड़ा ऊँचा कर लें। एनिमा पाट को पैरों की तरफ स्टैण्ड पर या दीवार के सहारे टांग दें। पाट में आवश्यकतानुसार गुनगुना पानी भर लें। अब टेबल पर सीधे लेटकर पैरों को घुटनों से मोड़ लें तत्पश्चात् एनिमा पाट से लगी पाइप के नोजल पर थोड़ा सा तेल लगाकर गुदा द्वार से 2-3 इन्च अन्दर प्रवेश करा दें तथा पानी खोल दें। पानी स्वतः आंत में पहुँचने लगेगा। नोजल एनिमा पॉट के साथ ही आता है, परन्तु यदि नोजल की जगह 10 नं. का रबड़ का कैथेटर प्रयोग में लिया जाये तो अधिक लाभ होगा | वयस्क व्यक्ति के गूदा द्वार से लगभग 8-10 इंच कैथेटर प्रवेश कराके पानी खोल देना चाहिए | पूरा पानी आंत में पहुँचने के बाद 2-3 मिनट दाहिनी करवट लेटें फिर 2-3 मिनट बाईँ करवट लेटें यदि प्रेशर न बना हो तो 10-15 मिनट टहलें, तत्पश्चात् शौच के लिए जाएं।




 



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विभिन्न आयु वर्ग के लिए एनिमा में पानी की मात्रा :
• 06 माह से 01 वर्ष के बच्चे को – 100 – 200 मिली.
• 01 वर्ष से 06 वर्ष के बच्चे को – 200 – 500 मिली.
• 06 वर्ष से 12 वर्ष के बच्चे को – 500 – 1000 मिली.
• 12 वर्ष से ऊपर – 1000 – 1200 मिली.
सवधानियाँ :
• एनिमा के पानी का तापमान शरीर के तापमान के बराबर रहना चाहिए।
• एनिमा के बाद शौच के समय जोर नहीं लगाना चाहिए। अपने आप पानी के साथ जो मल निकले उसे निकलने देना चाहिए।

विभिन्न अंगों पर एनिमा का प्रभाव :
गर्म पानी से एनिमा क्रिया करने से स्राव होने वाले सभी अंगों पर प्रभाव पड़ता है। इस क्रिया से यकृत, क्लोम ग्रंथि, आमाशय, छोटी आंत और बड़ी आंत प्रभावित होती है। एनिमा क्रिया से आंतों की सफाई होती है, जिससे कब्ज दूर हो जाती है और रोगी को अनेक प्रकार के रोग होने की संभावना समाप्त हो जाती है। इससे पाचन शक्ति बढती है। एनिमा से गैस व कब्ज के कारण उत्पन्न होने वाला मानसिक तनाव दूर होता है और यह मन को शांत करता है। ठंडे पानी का एनिमा लेने से आंते शक्तिशाली बनती हैं और भूख बढ़ती है।


Wednesday, December 28

द्रव्य एनिमा





भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा के विख्यात चिकित्सक महात्मा जगदीश्वरानन्द जी ने पिछले 60 वर्षों से लाखों रोगियों पर द्रव्य एनिमा का प्रयोग किया है एव रोगनिवारण में चमत्कारिक सफलता प्राप्त की है | आईये जानते हैं कि द्रव्य एनिमा क्या है |

तालिका में दिए गए रोगानुसार द्रव्यों को 1 से 1.5 ली. गुनगुने पानी में लिया जाता है |



क्रम नाम द्रव्य रोगों में लाभ
1एक नींबू का रस (छानकर)आँतों के शुद्धिकरण हेतु
2250 मिली. पानी में 50 ग्राम त्रिफला पकाकर एवं छानकरआँतों की विशेष शुद्धि के लिए
3200 से 300 ग्राम दही अथवा दही का तोड़, छानकरचिपके हुए आंव को उखाड़ने के लिए
4200-300 ग्राम नीम की पत्तियां पानी में पकाकर, छानकररक्त शोधक
54-5 कण पोटैशियम परमैगनेट (लाल दवा)कीड़े (कृमि) नाशक
6500 ग्राम पालक/ चौलाई/ बथुआ अथवा पुनर्नवा का रसइसके प्रयोग से आंतें लौह तत्व एवं प्राकृतिक लवणों का प्रचूषण कर सबल बनती हैं
7100 ग्राम शीरा अथवा गुड़ + 10 ग्राम राई, आपस में पीस छानकरकृमि नाशक
850 ग्राम अरंड का तेल (कैस्टर आयल) – इसे एनिमा पात्र की नली में डालकर आंत में चढ़ाएं ऊपर से 1 से 1.5 ली. गुनगुने पानी चढ़ाएंआँतों में चिकनाहट या मल को सरकाने की प्रवृत्ति पैदा करना
91 ली. गुनगुने दूध में 100 ग्राम शहद मिलाकर एनिमा लेने के बाद कुछ समय तक रोकेंआँतों की शक्ति बढ़ाने के लिए
10200 ग्राम इसबगोल पानी में पकाकरआंव उखाडकर बाहर लाना, मरोड़ में भी लाभकारी
11200 ग्राम मुल्तानी मिटटी पानी में घोल एवं छानकरपेट की गर्मी को समाप्त करने के लिए
12100 ग्राम प्याज + 25 ग्राम लहसुन का रसकृमि नाश के लिए



एनिमा लेने की विधि :

पैरों की तरफ से टेबल के पायों के नीचे ईंट आदि लगाकर थोड़ा ऊँचा कर लें। एनिमा पाट को पैरों की तरफ स्टैण्ड पर या दीवार के सहारे टांग दें। पाट में आवश्यकतानुसार गुनगुना पानी भर लें। अब टेबल पर सीधे लेटकर पैरों को घुटनों से मोड़ लें तत्पश्चात् एनिमा पाट से लगी पाइप के नोजल पर थोड़ा सा तेल लगाकर गुदा द्वार से 2-3 इन्च अन्दर प्रवेश करा दें तथा पानी खोल दें। पानी स्वतः आंत में पहुँचने लगेगा। नोजल एनिमा पॉट के साथ ही आता है, परन्तु यदि नोजल की जगह 10 नं. का रबड़ का कैथेटर प्रयोग में लिया जाये तो अधिक लाभ होगा | वयस्क व्यक्ति के गूदा द्वार से लगभग 8-10 इंच कैथेटर प्रवेश कराके पानी खोल देना चाहिए | पूरा पानी आंत में पहुँचने के बाद 2-3 मिनट दाहिनी करवट लेटें फिर 2-3 मिनट बाईँ करवट लेटें यदि प्रेशर न बना हो तो 10-15 मिनट टहलें, तत्पश्चात् शौच के लिए जाएं।

सवधानियाँ :

  • एनिमा के पानी का तापमान शरीर के तापमान के बराबर रहना चाहिए।

  • एनिमा के बाद शौच के समय जोर नहीं लगाना चाहिए। अपने आप पानी के साथ जो मल निकले उसे निकलने देना चाहिए
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Monday, April 4

सर्व रोगहारी- एनिमा



विभिन्न रोगों में आंत में पानी को रोककर रखने वाले एनिमा की तरह ही विभिन्न वनस्पतियों की पत्तियों के काढ़े या रसों को रोककर रखने वाला एनिमा लिया जाता है | इन वनस्पतियों के काढ़े या रस की लगभग 100-150 मिली. की मात्रा रात्रि में आंत में चढ़ाकर रात भर रोककर रखने से बहुत लाभ मिलता है | किस रोग में कौन सा रस या काढ़ा लिया जाये यह निम्न तालिका में दिया जा रहा है |

क्रम



नाम वनस्पति



नाम रोग जिसमे लाभकारी है


1पेडू पर मिटटी की पट्टी के बाद नीम की पत्तियों के उबाले हुए पानी को हरी बोतल में सूर्य तप्त करके एनिमा लेना और रोककर रखना |गर्भ धारण न होता हो |

2
मेंहदी की पत्तियों का 250 मिली. काढ़ा हरी बोतल में सूर्य तप्त करके, एक सप्ताह तक प्रतिदिन रोकने वाला एनिमा ले |

बबासीर आदि खून जाने की बीमारी |
3गुलर की पत्तियों और जड़ की छाल का 250 मिली. काढ़ा हरी
बोतल में सूर्य तप्त करके एनिमा लेना और रोककर रखना |
गर्मी, सुजाक, घाव, फोड़े आदि में |
4हरी बोतल में सूर्य तप्त किया हुआ अरंड के पत्तों का काढ़ा, 200 मिली. अरण्ड के बीजों के तेल में मिलाकर एनिमा लेना और
रोककर रखना |
पुराना कब्ज, मन्दाग्नि, संग्रहणी, हर्निया, अपेण्डिसाइटिस, कॉलिक पेन |
5अशोक की छाल और पत्तियों को सामान भाग लेकर पानी में उबालकर हरी व पीली बोतलों में सूर्यतप्त कर दोनों जल सामान मात्रा में लेकर एनिमा लेना और रोककर रखना |

स्त्रियों के रोग जैसे – रक्तप्रदर तथा गर्भाशय से खून बहना आदि |
6निर्गुन्डी की पत्तियों का काढ़ा पीली बोतल में सूर्यतप्त करके 250 मिली. काढ़ा पीली बोतल में सूर्य तप्त करके एनिमा लेना और रोककर रखना |शरीर में हर प्रकार की सूजन |
7
पालक के पंचांग का 250 मिली. काढ़ा हरी बोतल में सूर्य तप्त
करके एनिमा लेना और रोककर रखना |
गुर्दे और मसाने की पथरी, कब्ज, कमर का दर्द, पेशाब की जलन |

नोट :



  1. जल को सूर्य तप्त करने के लिए सम्बंधित रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर किसी लकड़ी के पट्टे पर 7-8 घंटा धूप में रखें |

  2.  सम्बंधित किसी भी जानकारी हेतु कृपया नीचे दिए गए कमेन्ट बाक्स में लिखें |
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