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Tuesday, January 3

अच्छे स्वास्थ्य के लिए विश्राम को न भूलें :








विश्राम शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है विश्राम के बिना कोई व्यक्ति लम्बे समय तक कार्य नहीं कर सकता। थकान दूर करने व मन की शांति के लिए विश्राम आवश्यक है। पूर्ण विश्राम न ले पाने के कारण मानसिक व शारीरिक कार्य करने की क्षमता कम होने लगती है। इसके अतिरिक्त थकावट, मानसिक परेशानी, बेचैनी और घबराहट उत्पन्न होने लगती है।

विश्राम न करने के दुष्परिणाम :


  • विश्राम न करने से शरीर में विभिन्न रोग उत्पन्न होने लगते है जैसे- पेट के रोग, हृदय रोग तथा अन्य आंतरिक गड़बड़ियां।
  • विश्राम के अभाव में सिर दर्द, सिर में भारीपन, एकाग्रता की कमी जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
  • विश्राम न करने के फलस्वरूप चेहरे की सुन्दरता नष्ट होने लगती है, त्वचा पर काले धब्बे पड़ने लगते हैं, इससे शरीर जल्दी थक जाता है,एवं क्रोध,चिड़चिड़ापन आलस्य जैसे लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं।

विश्राम को दिनचर्या में इस प्रकार शामिल करें :


  1. देर रात तक कार्य न करें, हर हालत में रात्रि 11 बजे तक सो जाएँ |
  2. अच्छी नींद के लिए सोने से 2 घंटे पहले भोजन कर लें |
  3. हमेशा शाकाहारी एवं संतुलित भोजन करें |
  4. नशीले पदार्थ जैसे – शराब,तम्बाखू,गुटखा,सिगरेट,चाय,काफी,का सेवन न करें |
  5. सोने से पहले हिंसक या उत्तेजक फिल्में आदि न देखें ।
  6. विश्राम में शारीरिक अवस्था का विशेष महत्व है, शरीर को स्वच्छ रखें। दिन में कम से कम एक बार ताज़े पानी से अवश्य नहाए। सोने से पहले हाथ-पैरों को स्वच्छ पानी से धोकर ही बिस्तर पर जाएं तथा सोने से पूर्व ईश्वर का ध्यान अवश्य करें।
  7. सोने से पूर्व अपने दिन भर की सभी मानसिक परेशानियों को भूल जाएं।
  8. सोने से 10 से 15 मिनट पहले बिस्तर पर बैठकर अपने कल करने वाले कार्यों को एक कागज पर लिख लें और फिर उसे बार-बार पढ़ें। साथ ही कल किये जाने वाले कार्यों की योजना अपने मन में बनाएं।
  9. विश्राम के लिए अपने प्रत्येक कार्य का समय निश्चित करें, जैसे – निश्चित समय पर सोना और उठना, निश्चित समय पर भोजन करना इत्यादि |
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Thursday, May 7

प्लाविनी प्राणायाम

विधि :

  1. जमीन पर आसन बिछाकर पदमासन, सुखासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ |
  2. दोनों नासिका (नाक के छिद्र) से वायु को को खींचकर फेफड़ों एवं पेट तक भरें |
  3. श्वास  को तब तक अन्दर रोककर रखें जब तक आराम से श्वास  को रोकना सम्भव हो। 
  4. दोनों नासा छिद्रों से धीरे-धीरे श्वास  छोड़ें अर्थात वायु को बाहर निकालें। 
  5. आराम से जितनी देर तक कर सकते इस तरह इस क्रिया को करें |

सावधानियां :

  • इसका अभ्यास को करने में जबरदस्ती बिलकुल न करें।
  • प्राणायाम भोजन के पहले खाली पेट करें |

लाभ :

  1. प्लाविनी प्राणायाम का अभ्यास सिद्ध  होने के बाद व्यक्ति कई दिनों तक बिना भोजन के रह सकता है |
  2. प्लाविनी प्राणायाम के नियमित अभ्यास से  जठराग्नि  प्रबल होकर पाचनशक्ति बढती है एवं  कब्ज से छुटकारा मिलता है। 
  3. इसके अभ्यास से  प्राण शुद्धि एवं आयु में वृद्धि होती है। 
  4. मन स्थिर व शांत होता है एवं  स्मरण शक्ति बढ़ती है। 
  5. प्लाविनी प्राणायाम का  पूर्ण रूप से अभ्यास कर लेने पर व्यक्ति बिना हाथ-पैर हिलाएं पानी में तैर सकता है।

Thursday, April 30

पूर्णोपवास का शरीर पर प्रभाव

पाचनसंस्थान
          जैसे अधिक भोजन का परिणाम आमाशय को भुगतना पड़ता हैं उसी तरह उपवास रखने का अच्छा असर भी सबसे पहले आमाशय पर ही नज़र आता है। उपवास काल में दूसरे या तीसरे दिन तेज भूख महसूस होती है। जब यह आन्तरिक भूख परेशान करना बंद कर देती है तब शरीर के अन्दर से जहरीले पदार्थों का निकलना शुरू होता है और यह अवस्था जहर की मात्रा के अनुसार 3-4 दिनों तक बनी रहती है। कभी-कभी यह अवस्था 15 दिनों तक भी देखी जाती है। शरीर के अन्दर से विजातीय द्रव्य (विष) के बाहर निकलने के कारण व्यक्ति की जीभ मैली, सांस में बदबू और भूख न लगना जैसी परेशानियां आ जाती हैं। जैसे-जैसे शरीर में विष की मात्रा कम होती जाती है वैसे ही रोग का असर भी कम हो जाता है और असली भूख भी लगने लगती है, जीभ साफ हो जाती है और शरीर हल्का सा महसूस होने लगता है।
          उपवास का आंतों पर बहुत ज्यादा असर पड़ता है। यदि किसी व्यक्ति की आंतों में मल सड़ जाता है तो उसे दस्त, गठिया, और पेचिश जैसे रोग घेर लेते हैं। उपवास के फलस्वरूप आंतों में नया अन्न रस न पहुंचने के कारण उसके सेलों को कम काम करना पड़ता है जिससे उसकी खोई हुई शक्ति पुनः आ जाती है। आंते शरीर के अन्दर से मल को निकालने लगती हैं तथा आंतों में पैदा हुई हवा शोषित हो जाती है |
बड़ी आंत 
 बड़ी आंत में ज्यादा दिनों तक मल के रुके रहने से मल सख्त हो जाता है और उसको बाहर निकलने में बहुत परेशानी होती है। कई बार मल को बाहर निकलने के समय तेज दर्द और कभी-कभी खून भी आ जाता है। इसलिए उपवास काल में एनिमा लेना आवश्यक होता है। यदि उपवास प्रारम्भ करने से पहले साधारण भोजन किया जाए तो पहले और दूसरे दिन अन्य दिनों की तरह ही बराबर मल आएगा। लेकिन 2-3 दिन बाद मल का आना बंद हो जाता है, तब उसे अगर एनिमा क्रिया द्वारा बाहर न निकाला जाए तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
शरीर का ताप 
 भोजन पचने के बाद शरीर में गर्मी पैदा करता है। जिस तरह किसी इंजन में कोयला, पेट्रोल या डीजल की जरूरत होती है, उसी तरह शरीर को चलाने के लिए भोजन की जरूरत होती है। भोजन हमारे शरीर में ईंधन का काम करते हुए शरीर के तापमान को स्थिर रखता है। इसलिए जब हम भोजन नहीं करते हैं तो हमारे शरीर की गर्मी भी कम हो जाती है।
नाड़ी
 उपवास रखने के दौरान नाड़ी में अलग-अलग प्रकार के बदलाव होते देखे जाते हैं। उपवास की कुछ अवस्थाओं में नाड़ी साधारण रहती है, लेकिन कुछ अवस्थाओं में इसके चलने की रफ्तार कम हो जाती है। लगभग 64 प्रतिशत लोगों में नाड़ी की गति सामान्य ही पाई गई है तथा 36 प्रतिशत व्यक्तियों में कम और किसी-किसी मामले में यह गति बढ़ी हुई भी पाई गई है।
रक्त 
उपवास रखने के दौरान उपवास रखने वाले व्यक्ति के खून में अलग-अलग बदलाव देखे जाते हैं। उपवास काल में रक्त में निम्न परिवर्तन हो सकते हैं –

  • कुछ समय तक उपवासकर्ता के रक्त में RBC की संख्या कम होने के बाद बढ़नी शुरू हो जाती है।
  • उपवास के बढ़ने के साथ WBC की संख्या कम हो जाती है।
  • व्यक्ति के खून में इओसिनौफिल्स तथा पोलीन्यूक्लियर की संख्या कम होती जाती है।

इसके अतिरिक्त आंतों में से जो आन्त्र-रस रक्त में चला जाता है वह धीरे-धीरे मल को पकाकर बाहर निकालने लगता है। इसलिए आन्त्र-रस से पैदा हुए आमवात (गठिया) आदि रोग ठीक हो जाते हैं। इसके अलावा आंतों में मल के जमा होने से खून का दबाव बढ़ जाता है, लेकिन यह उपवास के समय आंतों के साफ होने से कम होने लगता है, जिसके कारण दिल की अतिवृद्धि कम होती जाती है, परिणाम स्वरुप  दिल का दौरा होने का डर कम हो जाता है।
त्वचा
          हमारे शरीर में त्वचा के 3 काम होते हैं- शरीर की रक्षा करना, संवेदनाओं को दिमाग तक पहुंचाना, शरीर के अन्दर से पसीने के रूप में विष को बाहर निकालना। हमारे फेफड़े जितना जहर को बाहर निकालते हैं, उतना ही जहर त्वचा भी बाहर निकाल देती है। अप्राकृतिक खान-पान से त्वचा के नीचे ज्यादा चर्बी जमा हो जाती है, तब त्वचा के वे छिद्र जिनमें से पसीना बाहर निकलता है, वे बंद हो जाते हैं, जिसकी वजह से त्वचा द्वारा पसीने के रूप में विभिन्न विजातीय द्रव्य शरीर में ही एकत्र हो जाते हैं । उपवास रखने से त्वचा के नीचे स्थित श्रमबिन्दु और ग्रंथियां अपने असली काम को करना शुरू कर देती हैं, फलस्वरूप शरीर में एकत्र विष बाहर निकलना शुरू हो जाता है। इसी कारण से उपवास काल में बदबूदार पसीना आता है |
स्नायु संस्थान
         स्नायु संस्थान शरीर का सबसे मुख्य संस्थान है। उपवास के फलस्वरूप स्नायु संस्थान के रोग भी ठीक हो जाते हैं।
वजन
          यदि स्वस्थ व्यक्ति उपवास करता है तो शुरुआत के 1-2 दिनों तक उसके वजन में कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अगर कोई मोटा और रोगी व्यक्ति उपवास करें तो 2-3  दिन के बाद उसका वजन लगभग दो किलोग्राम तक कम हो जाता है। उसके बाद रोजाना व्यक्ति का लगभग 500 ग्राम  वजन कम हो जाता है। यदि किसी साधारण से रोग में उपवास किया जाए तो प्रतिदिन 500 ग्राम के लगभग वजन कम होता है।
श्वसन तंत्र 
          उपवास काल में श्वसन तंत्र में विभिन्न परिवर्तन होते हैं जोकि समस्त उपवास कर्ताओं में सामान हो सकते हैं | उपवास के दौरान शुरुआती 2-3 दिनों तक सांस में से बहुत तेज बदबू आती है जो शरीर से जहर और गंदगी निकलने का संकेत देती है, लेकिन लगभग 5-6 दिन बाद पहले की ही तरह सामान्य श्वास चलने लगती है जिससे पता चलता है कि शरीर की सफाई हो गई है।



Wednesday, April 29

उपवास काल के दौरान रोग और चिकित्सा-

          उपवास काल में रोगों के उभार के चलते कभी-कभी बहुत ज्यादा परेशानी होती है जिससे डरकर अधिकांश लोग उपवास को बीच में ही तोड़ देते हैं। उपवास काल में यदि इनमे से कोई स्थिति बने तो निम्न उपाय करने चाहिए -
मूर्च्छा (बेहोशी)-
 यदि उपवास के दौरान बेहोशी आ जाती है इस बेहोशी को दूर करने के लिए रोगी को बिल्कुल सीधा लिटाकर उसके पैरों को थोड़ा ऊंचा कर देना चाहिए, जिससे मस्तिष्क में रक्त संचरण ठीक से हो सके। बेहोशी की हालत में कभी भी रोगी को खड़ा नहीं करना चाहिए, अन्यथा उसकी मृत्यु तक भी हो सकती है।
चक्कर -
चक्कर आने पर रोगी के सिर को ऊंचा रखना चाहिए, इसके साथ ही व्यक्ति को खुली हवा में रहकर आराम करना चाहिए।
सीने में दर्द-
 उपवास के दौरान आमाशय में मल जमा हो जाने से अक्सर दिल में दर्द होने लगता है। ये लक्षण धीरे-धीरे खुद ही मिट जाते हैं।
सिरदर्द-
 उपवास के प्रारम्भ में सिरदर्द होने लगता है, लेकिन यह कुछ देर के बाद अपने आप ठीक हो जाता है।
पेशाब आने में रुकावट होना - 
 उपवास काल में मूत्रावरोध होने पर ठंडा मेहनस्नान या पेड़ू पर गर्म और ठंडा सेंक देना चाहिए।
नाड़ी की गति धीरे चलना -
 अक्सर उपवास रखने वाले व्यक्ति की नाड़ी के चलने की गति कम हो जाती है, लेकिन इससे डरने की कोई बात नहीं है, क्योंकि यह खतरनाक नहीं होता। थोड़ा बहुत व्यायाम करने से या गर्म पानी से नहाने से इसकी रफ्तार सही हो जाती है। इसमें मालिश करने से भी बहुत लाभ होता है।
नाड़ी का तेज चलना-
जब कोई व्यक्ति लंबा उपवास करता है तो अक्सर उसकी नाड़ी तेज-तेज चलने लगती है, जो बहुत खतरनाक होती है। इसका उसी समय इलाज करना जरूरी है। ऐसी स्थिति में ठंडे पानी से स्नान करने से दिल उत्तेजित होता है, इसलिए रोगी को ठंडे पानी से स्नान नहीं करना चाहिए। इस स्थिति में रोगी को गर्म पानी से स्नान कराना लाभदायक होता है। यह पानी भी ज्यादा गर्म नहीं होना चाहिए, बस शरीर के तापमान के बराबर ही होना चाहिए। पेडू़ पर ठंडे पानी की पट्टी रखने से, सिर को ठंडा और पैरों को गर्म रखने से भी लाभ होता है।
उल्टी -
वमन होना उपवास रखने के दौरान सबसे खतरनाक रोग है । इस स्थिति में बहुत सारा गर्म पानी पिलाना चाहिए ताकि उसके आमाशय में जमा उत्तेजक पदार्थ जल्दी से बाहर निकल सकें। अगर ऐसा करने से कोई लाभ न हो तो, रोगी को ठंडा गर्म कटिस्नान करना चाहिए। अगर इस प्रयोग से लाभ न हो तो रोगी को पानी में ग्लिसरीन मिलाकर पिलाने से उल्टी आने का रोग दूर हो जाता है।
नोट :- पूर्ण उपवास किसी योग्य प्राकृतिक चिकित्सक के निर्देशन में ही करना चाहिए |

पूर्ण उपवास

पूर्णोपवास कितने दिनों का होना चाहिए। इसलिए इसका कोई खास नियम नहीं है। कोई भी व्यक्ति 5 से 7 दिनों तक पूर्णोपवास रख सकता है। जो लोग हमेशा के लिए अपने स्वास्थ्य को अच्छा रखना चाहते हैं, उन लोगों को सप्ताह में 1 दिन, हर महीने की दोनो एकादशियों को तथा साल में 8, 10 या 15 दिनों का पूर्णोपवास करना चाहिए। ऐसा करने से बहुत लाभ होता है। जिन लोगों की सेहत अच्छी होती है, वे लोग उपवास को 7 दिन तक बिना किसी डर के कर सकते हैं और लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
पूर्णोपवास के लिए तैयारी-
 उपवास करने के लिए किसी खास तरह की तैयारी करने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि जिस तरह किसी व्यक्ति को भूख लगने पर उसे किसी तरह की तैयारी नहीं करनी पड़ती, उसी तरह कोई सा भी रोग चाहे शारीरिक हो या मानसिक उसको दूर करने के लिए किसी भी प्रकार के विचार-विमर्श की जरूरत नहीं होती। बस इतना जरूर होता है कि उपवास रखने की शुरुआत में मानसिक प्रवृति को थोड़ा शांत और भटकने से रोकने की जरूरत होती है।
 लंबे उपवास को शुरू करने से पहले यदि  कुछ समय तक सिर्फ प्राकृतिक भोजन पर ही रहकर कटि स्नान तथा थोड़े बहुत व्यायाम आदि कर लिए जाने के बाद उपवास शुरू किया जाए तो अधिक लाभकारी है |
          उपवास रखने से पहले यह आवश्यक है कि उपवास रखने वाला व्यक्ति उपवास के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त कर ले। इससे उस व्यक्ति को उपवास के दौरान ताकत और मन को काबू में रखने की शक्ति प्राप्त होगी। जिससे उपवास करने वाले व्यक्ति का मन डगमगाएगा नहीं। लंबे उपवासों को शुरू करने से पहले व्यक्ति को अपने ह्रदय और नाड़ी की जांच जरूर करा लेनी चाहिए। जो पुराने रोगी होते हैं उन्हें लंबे उपवास शुरू करने से पहले अपने रोजाना करने वाले भोजन में थोड़ा बहुत बदलाव कर देना चाहिए।  इसके बाद धीरे-धीरे लंबे उपवास रखें जैसे पहले उपवास में सिर्फ सुबह का ही भोजन छोड़ दें और सिर्फ शाम को ही भोजन खाएं। फिर 2-3 दिन के बाद अन्न खाना बिल्कुल बंद करके सिर्फ फल पर ही रहें। फिर 2-3 दिन तक सिर्फ फलों को खाने के बाद पूरे दिन का उपवास शुरू कर दें। ऐसा करने से उपवास के दौरान व्यक्ति को किसी तरह की परेशानी सामने नहीं आएगी।
उपवास करने का समय :
प्राकृतिक चिकित्सका के अनुसार लंबे उपवास के लिए सबसे अच्छे मौसम गर्मी और बसन्त ऋतु के हैं।
पूर्ण उपवास में सावधानियां :
पानी - उपवास के दौरान पानी न पीने से शरीर को नुकसान होने की आशंका रहती है। इसलिए उपवास काल में  पूरे दिन प्रति घंटे एक गिलास पानी में आधा कागजी नींबू का रस मिलाकर पियें। ऐसा करने से शरीर की सफाई अच्छी तरह से हो जाती है। पानी की कमी होने के कारण रक्तप्रवाह में भी रुकावट पैदा हो सकती है। इसके अलावा उपवास के दौरान पानी कम पीने या न पीने से शरीर में गर्मी भी बढ़ सकती है। जिससे उपवास करने वाले व्यक्ति को परेशानी हो सकती है।
एनिमा-
उपवास काल में प्रतिदिन सांयकाल एनिमा लेना चाहिए क्योकि उपवास के दौरान आंतें अपना काम बंद कर देती हैं, इसलिए उन्हें दूसरे तरीके से रोजाना साफ करते रहना आवश्यक है। एनिमा लेने का पानी हल्का गर्म होना चाहिए। एनिमा के पानी में एक कागजी नींबू का रस मिलाने से पेट की अच्छी सफाई हो जाती है।
स्नान-
उपवास रखने के दिनों में प्रतिदिन ताज़े पानी से स्नान करना चाहिए ।कटीस्नान या मेहरस्नान कर लिया जाए तो बहुत अच्छा होता है। यदि किसी कारण स्नान संभव न हो तो गर्म पानी में किसी तौलिए को भिगोकर और निचोड़कर अपने पूरे शरीर को अच्छी तरह से रगड़कर पोंछना चाहिए।
शरीर को सक्रिय रखें -
उपवास काल में शरीर की शक्ति के अनुसार कोई न कोई काम करते रहना जरूरी होता है। जीर्ण रोगों के निवारण हेतु उपवास रखने पर अपना छोटा-मोटा काम करते रहना चाहिए योग,प्राणायाम आदि भी करते रहना चाहिए। यदि यह सब न कर सकें तो टहलना अवश्य चाहिए । परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि इतना अधिक श्रम न करें कि थकान हो जाये |
विश्राम -
 उपवास काल में श्रम साथ ही शरीर को विश्राम की आवश्यकता भी होती है। इसके लिए उपवास काल में पूरी नींद लेना आवश्यक है।
प्रसन्नता 
उपवास काल में हमेशा खुश, तनाव रहित रहना चाहिए।
औषधि निषेध 
          उपवास काल में किसी भी तरह की औषधियां नहीं लेनी चाहिए क्योंकि ये शरीर को नुकसान पहुंचा सकती हैं | इस दौरान किसी रोग के होने पर प्राकृतिक उपचारों का ही सहारा लेना चाहिए। उपवास करने वाले व्यक्ति को खुली हवा में रहना और सोना चाहिए। प्रातःकाल नंगे वादन कुछ देर तक धूप में बैठना चाहिए।
पूर्णोपवास की समाप्ति
  उपवास को तोड़ने में भी बहुत सावधानी और आत्मसंयम की जरूरत होती है। उपवास काल के दौरान पाचनशक्ति बहुत ज्यादा कमजोर हो जाती है। इसलिए उपवास को तोड़ते समय सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। उसके बाद पाचनशक्ति जैसे-जैसे बढ़ने लगे, वैसे ही भोजन की मात्रा भी थोड़ी-थोड़ी करके बढ़ाते रहनी चाहिए। इस दौरान तरल पदार्थ लेना शरीर के लिए बहुत लाभकारी होता है। इसका कारण यह है कि उपवास के दौरान हमारी आंते तरल पदार्थ लेने की आदी हो जाती हैं। इसलिए तरल भोजन लेने पर उन पर ज्यादा भार नहीं पड़ता और उसे पचाने में भी आसानी रहती है।
जब शरीर में निम्न लक्षण महसूस होने लग जाए, तभी व्यक्ति को समझना चाहिए कि उसका उपवास पूरा हो गया और उसे समाप्त करने का समय आ गया है।

  1. जब स्वतः  ही बहुत तेज भूख लगने लगे तब समझना चाहिए कि उपवास को तोड़ने का समय आ गया है।
  2. उपवास के दौरान उपवास करने वाले व्यक्ति की जीभ पर जो सफेद मैल जम जाता है जब वह साफ हो जाए तो समझिए कि उपवास को समाप्त करने का समय आ गया है।
  3. जब लेने वाली सांस मीठी-मीठी सी महसूस होने लगे।
  4. नाड़ी की रफ्तार जब बिल्कुल ठीक तरह से चलने लगे।
  5. शरीर में खून का प्रवाह सही तरह से चलने के कारण जब त्वचा मुलायम और लचीली हो जाए।
  6. शरीर का तापमान बिल्कुल सामान्य हो जाए।
  7. जब शरीर बिल्कुल ही हल्का-फुल्का सा लगने  लगे  उसके अंदर नई तरह की चुस्ती-फर्ती लगने लगे।

पूर्णोपवास के बाद-
          कोई भी व्यक्ति जब उपवास करता है तो उसे उपवास की समाप्ति के बाद बड़ी ही तेज भूख लगती है, लेकिन उस वक्त व्यक्ति को बड़े ही सब्र से काम लेना चाहिए और ज्यादा नहीं खाना चाहिए। भोजन के हर ग्रास को अच्छी तरह धीरे-धीरे चबाकर खान चाहिए |

नोट :- पूर्ण उपवास किसी योग्य प्राकृतिक चिकित्सक के निर्देशन में ही करना चाहिए |

उपवास के प्रकार एवं महत्व


उपवास का महत्व 
 उपवास का शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों के लिए ही महत्व है। स्वस्थ्य रहने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को सप्ताह में कम से कम एक बार उपवास करना चाहिए।
उपवास शरीर में कोई नई ताकत पैदा करने वाली क्रिया नहीं है लेकिन उसको करने से शरीर में मौजूद जहरीले पदार्थ जिनके कारण व्यक्ति रोगी होता है वे जरूर बाहर निकल जाते हैं और शरीर निरोगी हो जाता है। उपवास रखने का उद्देश्य अपने पाचन संस्थान को पूरी तरह से आराम देना है। अर्थात पाचन संस्थान को अवकाश (उपवास) प्रदान करना | पाचन संस्थान को सिर्फ उपवास रखने के दौरान ही आराम मिलता है क्योंकि प्रतिदिन हम लोग कुछ न कुछ खाकर पेट भर लेते हैं, जिसके कारण हमारे पाचन संस्थान को बिल्कुल भी फुर्सत नही मिल पाती तथा वह हर समय इस भोजन को पचाने में लगा रहता है। धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक उपवास को शरीर और मन को शुद्ध करने का माध्यम माना गया है।
          जब किसी व्यक्ति को कोई रोग घेर लेता है तो उसकी भूख अपने आप ही लगना बंद हो जाती है, लेकिन मनुष्य जैसा बुद्धिमान प्राणी भी प्रकृति के इस आदेश को अनदेखा करके रोगी होने पर भी कुछ न कुछ खाता ही रहता है, फलस्वरूप रोगी व्यक्ति और भी ज्यादा रोगी हो जाता है। रोग होने पर रोग के कारण शरीर में जमा जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने का एक बहुत ही मजबूत साधन उपवास है। उपवास के दौरान शरीर की सारी जीवनीशक्ति सिर्फ रोग को ही दूर करने में लग जाती है और जब तक रोग को समाप्त न कर दें तब तक चैन नहीं लेती |                
उपवास के प्रकार-
सुबह के समय का उपवास-
यह सबसे ज्यादा आसान उपवास होता है। इस उपवास में सिर्फ सुबह का नाश्ता नहीं करना होता है और पूरे दिन और रात में सिर्फ 2 बार ही भोजन करना होता है। इस उपवास को अंग्रेजी में `नो ब्रेकफास्ट सिस्टम´ कहते हैं।
शाम के समय का उपवास-
इस उपवास को अद्धोपवास भी कहा जाता है और इस उपवास में सिर्फ पूरे दिन में 1 ही बार भोजन करना होता है। इस उपवास के दौरान रात का भोजन नहीं खाया जाता। जिन लोगों को कोई पुराना रोग होता है, वे अगर इस उपवास को करते हैं तो यह उनके लिए बहुत ही लाभकारी होता है। एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि इस उपवास में जो भोजन किया जाता है वह प्राकृतिक और जल्दी पचने वाला होना चाहिए।
एकाहारोपवास-
एकाहारोपवास में एक बार के भोजन में सिर्फ एक ही चीज खाई जाती है जैसे- सुबह के समय अगर रोटी खाई जाए तो शाम को सिर्फ सब्जी खाई जाती है। दूसरे दिन सुबह को एक तरह का कोई फल और शाम को सिर्फ दूध आदि। शरीर में हल्की सी परेशानी मालूम होने पर इस उपवास को लाभ के साथ किया जा सकता है।
रसोपवास-
इस उपवास में अन्न तथा फल जैसे ज्यादा भारी पदार्थ नहीं खाए जाते। सिर्फ रसदार फलों के रस अथवा साग-सब्जियों के जूस पर ही रहा जाता है। दूध पीना भी मना होता है, क्योंकि दूध की गणना भी ठोस पदार्थों में की जा सकती है। इस उपवास में एनिमा लेते रहने से शरीर की अच्छी तरह से सफाई हो जाती है।
फलोपवास-
कुछ दिनों तक सिर्फ रसदार फलों या भाजी आदि पर रहना फलोपवास कहलाता है। इस उपवास के दौरान कभी-कभी पेट को साफ करने के लिए एनिमा लेते रहना चाहिए। इस उपवास में किसी-किसी को एक व एक फलाहार अनूकूल नहीं पड़ता और उसके पेट में गड़बड़ी पैदा हो जाती है। ऐसे व्यक्तियों को पहले 2-3 दिनों का पूरा उपवास करने के बाद इस फलोपवास की शुरुआत करनी चाहिए। फलोपवास के समय जो आसानी से पच जाए, उन्हीं फलों का खाने में इस्तेमाल करना अच्छा होता है। अगर फल बिल्कुल ही अनुकूल न पड़ते हों तो सिर्फ पकी हुई साग-सब्जियां खानी चाहिए। कहने का मतलब यह है कि फलोपवास में जो साग-सब्जियां या फल अनुकूल पड़े उन्हीं का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि किसी भी तरह का उपवास हो उसमें यह ध्यान रखना चाहिए कि उपवास करने वाले को बदहजमी नहीं होनी चाहिए।
दुग्धोपवास 
दुग्धोपवास को `दुग्धकल्प´ के नाम से भी जाना जाता है। इस उपवास में सिर्फ कुछ दिनों तक दिन में 4-5 बार सिर्फ दूध ही पीना होता है। इस उपवास के दौरान जो दूध पिया जाए वह गाय का ताजा निकाला हुआ दूध ही होना चाहिए।
तक्रोपवास-
 तक्रोपवास को `मट्ठाकल्प´ भी कहा जाता है। अगर व्यक्ति की भोजन पचाने की क्रिया कमजोर पड़ जाए तो दुग्धोपवास की जगह इस उपवास को करना लाभकारी होता है। इस उपवास में जो मट्ठा लिया जाए, उसमें घी कम होना चाहिए और वह खट्टा भी कम ही होना चाहिए। तक्रोपवास शुरू करने से पहले अगर 1-2 दिन पूरे दिन का उपवास कर लिया जाए तो ज्यादा लाभ होने के आसार होते हैं। इस उपवास को कम से कम 2 महीने तक आराम से किया जा सकता है। इस उपवास को करने से शरीर के छोटे-मोटे रोग बिल्कुल ठीक हो जाते हैं। अगर इस उपवास को करने के दौरान पेट भारी-भारी सा लगे तो एनिमा जरूर लेनी चाहिए।
पूर्णोपवास-
बिल्कुल साफ-सुथरे ताजे पानी के अलावा किसी और चीज को बिल्कुल न खाना पूर्णोपवास कहलाता है। इस उपवास में उपवास से सम्बंधित बहुत सारे नियमों का पालन करना होता है।
साप्ताहिक उपवास-
पूरे सप्ताह में सिर्फ एक पूर्णोपवास नियम से करना साप्ताहिक उपवास कहलाता है। इस उपवास को करने से व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहता है। जो लोग पूरे दिन आफिस आदि में बैठने का काम करते हैं उनको तो यह उपवास जरूर ही करना चाहिए। अगर उपवास के दिन 1-2 बार एनिमा ले लिया जाए तो यह बहुत अच्छा रहता है। इस उपवास को करने से अरुचि दूर हो जाती है। सिरदर्द, सुस्ती तथा दूसरे कई शारीरिक और मानसिक रोग समाप्त हो जाते हैं।
लघु उपवास-
3 दिन से लेकर 7 दिनों तक के पूर्णोपवास को लघु उपवास कहते हैं।
कठोर उपवास-
जिन लोगों को बहुत भयानक रोग होते हैं यह उपवास उनके लिए बहुत लाभकारी होता है। इस उपवास में पूर्णपवास के सारे नियमों को सख्ती से निभाना पड़ता है।
टूटे उपवास-
इस उपवास में 2 से 7 दिनों तक पूर्णोपवास करने के बाद कुछ दिनों तक हल्के प्राकृतिक भोजन पर रहकर दुबारा उतने ही दिनों का उपवास करना होता है। उपवास रखने का और हल्का भोजन करने का यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि इस उपवास को करने का मकसद पूरा न हो जाए। इस उपवास का इस्तेमाल बहुत से भयंकर रोगों में अक्सर किया जाता है।
दीर्घ उपवास-
दीर्घ उपवास में पूर्णोपवास बहुत दिनों तक करना होता है, जिसके लिए कोई निश्चित समय पहले से ही निर्धारित नहीं होता। इसमें 21 से लेकर 50-60 दिन भी लग सकते हैं। अक्सर यह उपवास तभी तोड़ा जाता है, जब स्वाभाविक भूख लगने लगती है अथवा शरीर के सारे जहरीले पदार्थ पचने के बाद जब शरीर के जरूरी अवयवों के पचने की नौबत आ जाने की संभावना हो जाती है। यह उपवास जब शारीरिक दृष्टि से किया जाता है, तो इसका लक्ष्य शरीर के अलग-अलग भागों में इकट्ठे हुए जहरीले पदार्थों के बाहर निकालने की ओर ही होते हैं और जब यह मकसद पूरा हो जाता है तो उपवास को तोड़ दिया जाता है। इस तरह का लंबा उपवास बिना तैयारी किए तथा बिना उपवास के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त किए हुए नहीं करना चाहिए। अगर इस तरह के लंबे उपवासों को किसी योग्य उपवास चिकित्सक की देख-रेख में करें तो अच्छा होता है।

आकाश तत्व आरोग्य सम्राट है !

आकाश तत्व पंचतत्वों में प्रथम तत्व है, शेष चारों तत्वों का आधार भी आकाश तत्व होता है | इस तत्व को `शून्य´ भी कहा जाता है। जिस तरह से ईश्वर निराकार होते हुए भी सत्य है,उसी प्रकार आकाश तत्व भी निराकार लेकिन सच है। आकाश तत्व अविनाशी. विशुद्ध तथा निर्विकार होता है। इसलिए उससे हमें विशुद्धता और निर्मलता की प्राप्ति होती है। आकाश में देवताओं का वास माना जाता है जो अमर होते हैं। हम भी आकाश तत्व का भरपूर और सही मात्रा में सेवन करके अमर तो नहीं लेकिन निरोगी और लंबी उम्र तक तो जी सकते हैं।
      प्राकृतिक चिकित्सा में आकाश तत्व को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन उपवास है। महात्मा गांधी ने आकाश तत्व को ‘आरोग्य सम्राट’ की संज्ञा दी है। उनके मुताबिक आकाश का रहस्य जानना भगवान का रहस्य जानने के समान है। ऐसे महान तत्व का जितना ही अभ्यास और इस्तेमाल किया जाएगा, उतना ही ज्यादा आरोग्य मिलेगा। जिस तरह से आकाश हमारे आसपास, ऊपर और नीचे है इसी तरह से वह हमारे अन्दर भी है। त्वचा के छिद्रों में तथा दो छिद्रों के बीच में जो रिक्त स्थान है वह आकाश तत्व होता है। इस आकाश तत्व की खाली जगह को हमें भरने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यदि हम शरीर को जितने भोजन की आवश्यकता है उतना ही लें और ज्यादा न खाएं तो शरीर में खाली जगह रहेगी। यदि सप्ताह में एक बार उपवास कर लिया जाए तो शरीर में आकाश तत्व की पूर्ति होती रहती है। यदि पूरे दिन उपवास करना सम्भव न हो तो दिन में एक बार का भोजन न करने से भी लाभ होता है।
उपवास :
 उपवास से रोगी एवं स्वस्थ व्यक्ति दोनों को लाभ मिलता है। उपवास हमारी जीवन पद्धति का महत्वपूर्ण अंग है। रोगों को दूर करने की शक्ति हमारे शरीर में निहित है, उपवास की स्थिति में पाचन संस्थान को पूर्ण विश्राम मिलता है। इस स्थिति में शरीर की शक्ति रोगों एवं शरीर स्थित मल को निष्काषित करने में संलग्न हो जाती है |
उपवास रखने के दौरान शरीर की सफाई होने लगती है। हमारे शरीर में जो जहरीले जीवाणु पैदा हो जाते हैं वे जीवाणु हमारे करने वाले भोजन से ही अपना भोजन लेना शुरू कर देते हैं और इन जीवाणुओं में से ज्यादातर जीवाणु ऐसे होते हैं जिनको अगर भोजन न मिले तो वे ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रह सकते। इसलिए अगर उपवास रखा जाए तो ये जीवाणु भोजन के अभाव में समाप्त होने लगते हैं। इसी तरह पेट के रोगों से भी छुटकारा मिल जाता है।
उपवास के दौरान पालन योग्य नियम 
उपवास रखने के दौरान किसी भी प्रकार का भोजन नही करना चाहिए।
उपवास में प्रतिदिन लगभग 2 लीटर पानी में 2-3 नींबू का रस डालकर पूरे दिन में कई बार पीना चाहिए, या फल या सब्जी का जूस भी पी सकते हैं।
जिस व्यक्ति को शुरुआत में पूरे दिन का उपवास रखने में परेशानी आए, वह पूरे दिन में एक समय फल खा सकता है।
उपवास चाहे तो एक दिन का भी कर सकते हैं या काफी दिनों तक भी कर सकते हैं। हर व्यक्ति को पूरे हफ्ते में कम से कम 1 दिन तो उपवास जरूर करना चाहिए।
उपवास को तोड़ते समय कभी भी ठोस आहार का सहारा नहीं लेना चाहिए। उपवास तोड़ने के लिए सबसे अच्छा आहार पके हुए संतरे, मौसमी, अंगूर का रस या फल-सब्जी का रस होता है।
अगर उपवास एक दिन का रखा है तो उसे फलों को खाकर तोड़ा जा सकता है। बहुत से लोग उपवास को भारी पकवानों से तोड़ते हैं जिससे उनके शरीर को लाभ की बजाय नुकसान ही होता है।
पूरे दिन के उपवास के बाद शाम को गुनगुने पानी में एक नींबू का रस मिलाकर एनिमा अवश्य लेना चाहिए |
उपवास कब नही करना चाहिए 

  1. गर्भकाल में - गर्भवती स्त्री के बच्चे को पोषण की बहुत ज्यादा जरूरत होती है इसलिए इस समय स्त्री को उपवास नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे हल्का और प्रोटीन वाला भोजन खाना चाहिए।
  2. मधुमेह में - डायबटीज के रोगी को समय पर भोजन नहीं मिलता तो उसके शरीर में चीनी की मात्रा कम हो जाती है जिससे परेशानी हो सकती है अतः मधुमेह (डायबटीज) रोगी को उपवास नहीं करना चाहिए। 
  3. रिकेट्स और रतौंधी में -जिन लोगों को आंखों के रोग होते हैं जैसे कम दिखाई देना या रात को न दिखाई देना उन्हें उपवास नहीं रखना चाहिए। जिन रोगियों को रिकेट्स का रोग होता है उन्हे भी उपवास नही रखना चाहिए। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऐसे रोगियों के शरीर में लोहे (आयरन) की कमी होती है।

       

Tuesday, March 31

उपवास का महत्व

   उपवास का उद्देश्य होता है पाचन प्रणाली को पूर्ण रूपेण अवकाश प्रदान करना | जो भी भोजन हम ग्रहण करते हैं उसे पचाने के लिए शरीर को बहुत सारी उर्जा खर्च करनी पड़ती है |शरीर की पाचन प्रणाली सुचारू ढंग से कार्य करती रहे इसलिए उसे सप्ताह में कम से कम एक दिन के लिए पूर्णतया अवकाश प्रदान करना चाहिए | हमारे धर्म शास्त्रों में विभिन्न व्रत,उपवास को स्वस्थ्य की द्रष्टि से ही जोड़ा गया है | आस्था ,पवित्रता के साथ किया गया उपवास हमारे मस्तिष्क व् शरीर दोनों को शुद्ध करता है | उपवास के दौरान भोजन को पचाने वाली जो उर्जा बचती है वह शरीर के दोष दूर करने एवं रोगमुक्त करने में लग जाती है | तीव्र रोगों में उपवास के समान कोई औषधि नही है | इस मामले में मनुष्य से अधिक जानवर अधिक संवेदनशील होते हैं क्योंकि वे बीमार पड़ने पर सबसे पहले भोजन का त्याग कर देते हैं और बिना किसी औषधि के स्वस्थ्य भी हो जाते हैं | इससे यह सिद्ध होता है कि रोगमुक्त करने की शक्ति शरीर मे ही मौजूद है , आवश्यकता इस बात की है कि उस उर्जा का सही वक्त पर सही उपयोग किया जाये |