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Wednesday, January 11

जानिए, 24 घंटे में मूत्र त्याग की सामान्य स्थिति क्या होनी चाहिए



                     By-Dr. Kailash Dwivedi

हमारे शरीर में अन्य तत्वों की तुलना में जल की मात्रा सबसे अधिक है | हमारे द्वारा पिया गया जल शरीर में विभिन्न कार्यप्रणालियों को सक्रिय करने में सहायक होता है | सामान्यतः गुर्दों को क्रियाशील रखने के लिए प्रतिदिन 2 से 4 लीटर जल का सेवन आवश्यक होता है | इससे कम या अधिक जल का सेवन गुर्दों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है |

 पिए गए पानी से शरीर को जितनी आवश्यकता होती है उतना वह अपने उपयोग में ले लेता है, शेष जल मूत्राशय के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है | इस जल में विभिन्न विषैले तत्व भी होते हैं, जिनकी शरीर को आवश्यकता नहीं है | अतः स्वस्थ शरीर के लिए नियमित रूप से मूत्र त्याग करना आवश्यक है | आईये जाने कि एक स्वस्थ व्यक्ति के मूत्र का रंग क्या होना चाहिए एवं 24 घंटे में मूत्र की सामान्य आवृत्ति कितनी होनी चाहिए -


  • मूत्र त्याग करते समय किसी प्रकार का दर्द या जलन न होना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है |
  • मूत्र का रंग हल्का सुनहरा (Beer Colour) होना चाहिए |
  • स्त्रियों में मूत्र त्याग की सामान्य आवृत्ति 24 घंटों में 5 से 6 बार तक होनी चाहिए |
  • पुरुषों में मूत्र त्याग की सामान्य आवृत्ति 24 घंटों में 4 से 5 बार तक होनी चाहिए |
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Thursday, December 29

मानव शरीर के आश्चर्यजनक तथ्य




  • वस्यक व्यक्तियों में अस्थियों की संख्या : → 206
  • खोपड़ी में अस्थियां : → 28
  • कशेरुकाओ की संख्या : →33
  • पसलियों की संख्या : →24
  • गर्दन में कशेरुकाएं : →7
  • श्वसन गति : →16 बार प्रति मिनिट
  • हृदय गति : →72 बार प्रति मिनिट
  • दंत सूत्र : → 2:1:2:3
  • रक्तदाव : →120/80
  • शरीर का तापमान : → 37 डीग्री 98.4 फ़ारेनहाइट
  • लाल रक्त कणिकाओं की आयु : → 120 दिन
  • श्वेत रक्त कणिकाओ की आयु : →1 से 3 दिन
  • चेहरे की अस्थियां : → 14
  • जत्रुक की संख्या : →2
  • हथेली की अस्थियां : → 14
  • पंजे की अस्थियां : → 5
  • ह्दय की दो धड़कनों के बीच का समय : → 0.8 से.
  • एक श्वास में खीची गई वायु : →500 मि.मी.
  • सुनने की क्षमता : →20 से १२० डेसीबल
  • कुल दांत : →32
  • दूध के दांतों की संख्या : → 20
  • अक्ल दाढ निकलने की आयु : → 17 से 25 वर्ष
  • शरीर में अमीनों अम्ल की संख्या : → 22
  • शरीर में तत्वों की संख्या : → 24
  • शरीर में रक्त की मात्रा : → 5 से 6 लीटर (शरीर के भार का 7 प्रतिशत)
  • शरीर में पानी की मात्रा : → 70 प्रतिशत
  • रक्त का PH मान : → 7.4
  • ह्दय का भार : → 300 ग्राम
  • महिलाओं के ह्दय का भार → 250 ग्राम
  • रक्त संचारण में लगने वाला समय → 22 से.
  • छोटी आंत की लंबाई → 22 फीट
  • शरीर में पानी की मात्रा → 22 लीटर
  • मष्तिष्क का भार → 1380 ग्राम
  • महिलाओं के मष्तिष्क का भार → 1250 ग्राम
  • गुणसूत्रों की संख्या → 23 जोड़े
  • जीन्स की संख्या →97 अरब


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Wednesday, December 28

ह्रदय की संरचना एवं कार्य



ह्रदय रक्त परिसंचरण तन्त्र का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है | किसी के भी ह्रदय का पूर्णरूप से कार्य करना बंद होने का अर्थ होता है उसकी मृत्यु हो जाना | आज हम चर्चा करेंगे ह्रदय की संरचना एवं कार्यप्रणाली के विषय में |
  • ह्रदय एक पेशीय,खोखला,संकुचनशील,शंक्वाकार अंग है जो वक्ष में स्टर्नम के पीछे दोनों फेफड़ों के मध्य उतकों के एक भाग जिसे मीडिएस्टिनम कहते हैं कुछ बायीं ओर को हटा हुआ तिरछेपन के साथ स्थित है | बायीं तरफ हटा होने के कारण ह्रदय का एक तिहाई भाग शरीर की मध्यरेखा से दाहिनी ओर एवं दो तिहाई भाग बायीं ओर स्थित रहता है |
  • ह्रदय का उपर का हिस्सा कुछ चौड़ा होता है जो आधार (Base) कहलाता है | यह हिस्सा कुछ दहिनी तरफ झुका होता है |
  • ह्रदय का निचला हिस्सा नुकीला होता है यह शिखर (Apex) कहलाता है | यह थोडा बायीं ओर झुका डायाफ्राम पर स्थित होता है | यह हिस्सा पांचवी एवं छठी बायीं पसलियों के मध्य (इन्टरकॉस्टल) तक पहुँचता है | इसी स्थान पर हाथ रखने से ह्रदय स्पंदन (धड़कन) का आभास मिलता है |
  • ह्रदय का आकार स्वयं की मुट्ठी के आकार का होता है | ह्रदय की औसतन लम्बाई लगभग 12 सेमी. एवं चौड़ाई 9 सेमी. (5x3.5 इंच) होती है |
  • वयस्क व्यक्ति के ह्रदय का वजन लगभग 250 से 390 ग्राम एवं स्त्रियों में 200 से 275 ग्राम के बीच होता है |

ह्रदय की संरचना ( Structure of the Heart)

ह्रदय भित्ति का निर्माण तीन परतों से होता है –
  1. पेरीकार्डियम (Pericardium)
  2. मायोकार्डियम (Myocardium)
  3. एण्डोकार्डियम (Endocardium)

पेरीकार्डियम (Pericardium) :

पेरीकार्डियम या हृद्यावरण दो कोशों का बना होता है | बाह्य कोश तंतमय उतकों (Fibrous Tissue) का बना होता है | यह अन्दर से सीरमी कला (Serous membrane) की दोहरी परत की निरंतरता में होता है | बाह्य तंतुमय कोश ऊपर ह्रदय की बड़ी रक्तवाहिकाओं के टुनिका एडवेंटिशिया (Tunica edventitia) के साथ निरंतरता में रहता है तथा नीचे डायाफ्राम से सटा रहता है | तंतुमय एवं अप्रत्यास्थ (Inelastic) प्रकृति होने के कारण यह ह्रदय के अत्यधिक फैलाव (Overdistension) को रोकता है | सीरमी कला की बाह्य परत, पार्श्विक पेरीकार्डियम (Parietal Pericardium) तंतुमय कोश को आस्तारित करती है | आंतरिक परत, अंतरांगी पेरीकार्डियम (Visceral Pericardium) अथवा एपिकार्डियम (Epicardium) जो पार्श्विक पेरीकार्डियम के निरंतरता में होती है, ह्रदय पेशी से चिपटी होती है |
सीरमी कला में चपटी उपकला कोशिकाओं का समावेश रहता है | यह अंतरांगी एवं पार्श्विक परतों के बीच के स्थान में एक सीरमी द्रव (Serous fluid) स्रवित करती हैं जो ह्रदय स्पन्द के दौरान दोनों परतों के बीच घर्षण को रोकता है जिससे ह्रदय स्वच्छन्दतापूर्वक गतिशील बना रहता हैं |

मायोकार्डियम (Myocardium) :

यह एक विशेष प्रकार की ह्रदयपेशी (Cardiac muscle) की बनी होती है,जो केवल ह्रदय में ही पायी जाती है | इसमें विशेष प्रकार के तंतु (Fibers) रहते हैं जो अनैच्छिक वर्ग के होते हैं | मायोकार्डियम की मोटाई भिन्न-भिन्न होती है | यह शिखर (Apex) पर सबसे मोटी होती है एवं आधार (Base) की ओर पतली होती चली जाती है | यह बाएं निलय (Left Ventricle) में अधिक मोटी रहती है क्योंकि यहाँ पर इसे अधिक कार्य करना पड़ता है जबकि दाहिने निलय (Right Ventricle) में पतली रहती है, क्योकि यहाँ इसे सिर्फ फेफड़ों में रक्त प्रवाहित करना होता है | यह अलिन्दों (Atriums) में बहुत पतली रहती है |

एण्डोकार्डियम (Endocardium) :

एण्डोकार्डियम ह्रदय में सबसे भीतर की एक पतली, चिकनी झिलमिलाती कोमल कला (membrane) है | यह चपटी उपकला कोशिकाओं से निर्मित है जो एण्डोथीलियम के साथ निरंतर रहकर रक्त वाहिकाओं के आन्तरिक स्तर में विलीन हो जाती है | एण्डोकार्डियम ह्रदय के चारों कक्षों एवं कपाटों (Valves) को आच्छादित किये रहती है |
                                       
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Monday, March 7

ह्रदय की संरचना एवं कार्य -2 (ह्रदय के कक्ष)

आधार से शिखर ह्रदय एक पेशीयपट (Septum) द्वारा दायें एवं बाएं दो भागों में विभाजित रहता है जिसका आपस में कोई सम्बन्ध नही होता है | ह्रदय का सम्पूर्ण दायाँ भाग अशुद्ध रक्त के लेन-देन से सम्बंधित है एवं बायाँ भाग शुद्ध रक्त के लेन-देन से सम्बंधित है | दायाँ एवं बायाँ दोनों भाग पुनः एक अनुप्रस्थ पट (Transverse septum) द्वारा विभाजित होकर एक ऊपर एवं एक नीचे का कक्ष बनाते हैं | इस प्रकार ह्रदय का सम्पूर्ण भीतरी भाग 4 कक्षों (Chambers) में बंटा रहता है | दाहिनी एवं बायीं ओर के ऊपरी कक्ष क्रमशः   
दायाँ आलिन्द या एट्रियम (Right Atrium) एवं बायाँ आलिन्द (Left Atrium) कहलाते हैं, तथा दाहिनी एवं बायीं ओर के निचले कक्ष क्रमशः दायाँ निलय (Right Ventricle) एवं बायाँ निलय (Left Ventricle) कहलाता है |
बायीं ओर के दोनों कक्ष अर्थात आलिन्द व निलय एक छिद्र के द्वारा आपस में सम्बंधित रहते हैं | ठीक इसी प्रकार दाहिने ओर के दोनों कक्ष आलिन्द व निलय भी एक छिद्र के द्वारा आपस में सम्बंधित रहते हैं | इन छिद्रों पर कपाट (वाल्व) लगे रहते हैं | यह वाल्व इस प्रकार से लगे होते हैं कि रक्त आलिन्द (Atrium) से निलय (Ventricle) में जा तो सकता है परन्तु वापस लौट नहीं सकता |
ह्रदय के सभी कक्षों में सम्बंधित रक्त को ले जाने वाली नलिकाओं के छिद्र (Opening) भी उनसे सम्बंधित कक्ष में ही खुलते हैं |

दायाँ आलिन्द (Right Atrium)

दाहिने आलिन्द में समस्त शरीर में संचरित हुआ आक्सीजन रहित रक्त लौटकर संग्रहित होता है |
शरीर के विभिन्न भागों से आने वाली शिराएँ मिलकर दो बृहत् शिराएँ बनाती हैं जो – उर्ध्व महाशिरा (Superior vena cava) एवं निम्न महाशिरा (Inferior vena cava ) कहलाती हैं | यह शिराएँ दाहिने आलिन्द में दो अलग-अलग छिद्रों द्वारा खुलती हैं | उर्ध्व महाशिरा शरीर के ऊपरी भाग से एवं निम्न महाशिरा शरीर के निचले भाग से अशुद्ध रक्त को लाकर दाहिने आलिन्द में पहुंचाती हैं |
दाहिने आलिन्द का कार्य केवल रक्त को ग्रहण करना है | इस कक्ष में रक्त को पम्प करने का कार्य बहुत कम होता है इसलिए इसमें संकुचन की क्रिया अन्य कक्षों की अपेक्षा कम होती है अतः इस कक्ष की भित्तियां अपेक्षाकृत पतली और कमजोर होती हैं |
रक्त गृहण करने के बाद इसे रक्त को इतना ही धक्का देना पड़ता है कि वह बीच के छिद्र को खोलकर दाहिने निलय में चला जाये | (रक्त का दाब अधिक होने के कारण यह निलय की तरफ ही बढ़ता है, महाशिराओं में वापस नही जाता) |

दायाँ निलय (Right Ventricle)

दायें आलिन्द (Right Atrium) से अशुद्ध रक्त दायें एट्रियोवेंट्रिकुलर छिद्र से होकर दायें निलय में आकर गिरता है | दायें आलिन्द के संकुचन से रक्त को धक्का मिलता है जिससे त्रिकपर्दी कपाट (Tricuspid Valve) के पट स्वयं खुल जाते हैं और अशुद्ध रक्त दायें निलय में पहुँच जाता है | दूसरे ही क्षण दायें निलय में संकुचन होता है, फलस्वरूप रक्त को बाहर निकल जाने के लिए धक्का मिलता है |
दायें निलय में एक छिद्र होता है जिसे फुफ्फुसीय छिद्र (Pulmonary orifice) कहते हैं इस छिद्र से होकर फुफ्फुसीय धमनी (Pulmonary artery) निकलती है जो आगे चलकर ह्रदय से बाहर निकलकर दो भागों में होकर फुफ्फुसों में चली जाती है | दायें निलय से अशुद्ध रक्त शुद्ध होने के लिए इस धमनी में से होकर फुफ्फुसों में चला जाता है |
दायें निलय से जैसे ही अशुद्ध रक्त फुफ्फुसीय धमनी में जाता है वैसे ही इनके बीच स्थित पल्मोनरी वाल्व (Pulmonary valve) बंद हो जाता है जिससे अशुद्ध रक्त वापस दायें निलय में न लौट सके | (नोट : फुफ्फुसीय धमनी के अतिरिक्त सभी धमनियों में शुद्ध रक्त बहता है)
दायें आलिन्द (Right Atrium) की अपेक्षा दायें निलय (Right Ventricle) की भित्तियां अधिक मोटी एवं मजबूत होती हैं क्योंकि इसे रक्त को शुद्द करने हेतु फुफ्फुसों में पहुँचाने के लिए दायें आलिन्द की अपेक्षा अधिक संकुचित होकर रक्त को पम्प करना पड़ता है |

बायाँ आलिन्द (Left Atrium)

ह्रदय के बाएं भाग का ऊपरी कक्ष, बायाँ आलिन्द कहलाता है | यह दायें आलिन्द से कुछ छोटा होता है | इसकी भित्तियां दायें आलिन्द की अपेक्षा कुछ मोटी होती हैं | इस आलिन्द में चार छिद्रों के द्वारा चार फुफ्फुसीय शिराएँ आकर खुलती हैं | इन शिराओं का कार्य आक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त को फुफ्फुसों से बाएं आलिन्द में लाना होता है |

बायाँ निलय (Left Ventricle)

ह्रदय के बाएं भाग का नीचे का कक्ष बायाँ निलय कहलाता है | यह अन्य तीनों कक्षों में सबसे बड़ा कक्ष होता है | इसकी भित्तियां भी अन्य सभी कक्ष भित्तियों की अपेक्षा मोटी होती है |
बाएं निलय में एक छिद्र होता है जिसे महाधमनी छिद्र (Aorta orifice) कहते हैं | इस छिद्र से होकर महाधमनी (Aorta) निकलती है जो शरीर के विभिन्न भागों तक शुद्ध रक्त पहुँचाने का कार्य करती है |
बाएं आलिन्द के संकुचन से शुद्ध रक्त बाएं निलय में भर जाता है | दूसरे ही क्षण बाएं निलय की बारी आती है, इससे पहले ही बाएं आलिन्द एवं निलय के बीच का द्विक्पर्दी कपाट या माइट्रल वाल्व (Mitral Valve) बंद हो चूका होता है | बाएं निलय के संकुचन से शुद्ध रक्त के धक्के से महाधमनी का द्वार खुल जाता है, जिससे होकर रक्त शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचता है | महाधमनी के मुख पर भी कपाट होता है जो रक्त को वापस निलय में आने से रोकता है |
इस प्रकार बायाँ निलय शरीर के ऊतकों को पोषक तत्व एवं आक्सीजन प्रदान करने हेतु वहां तक शुद्ध रक्त वितरित करने का महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित करता है |
-----अगले लेख में पढ़ें – ह्रदय के कपाट (Valves of the Heart)
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