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Wednesday, January 4

7. सहस्त्रार चक्र






सहस्त्रार चक्र ब्रह्मन्ध्र से ऊपर मस्तिष्क में स्थित सभी शक्तियों का केन्द्र है। इस चक्र का रंग अनेक प्रकार के इन्द्रधनुष के समान होता हैं तथा इसमें अनेक पंखुड़ियों वाले कमल का अनुभव होता है। इस चक्र में ´अ´ से ´क्ष´ तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती रहती है। यह कमल अधोखुला होता हैं तथा यह अधोमुख आनन्द का केन्द्र होता है। साधक अपनी साधना की शुरूआत मूलाधार चक्र से करके सहस्त्रार चक्र में उसका अंत करता है। इस स्थान पर प्राण तथा मन के स्थिर हो जाने पर सभी शक्तियां एकत्र होकर असम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता प्राप्त होती है। 

सहस्त्रार चक्र में ध्यान करने से उस चक्र में प्राण और मन स्थिर होते हैं। इस चक्र पर ध्यान करने से संसार में किये गए बुरे कर्मो का नाश होता है। ऐसे व्यक्ति यदि कोई अच्छे कर्म न भी करता हो तो भी योग के कारण पुन: उस प्राण का जन्म इस संसार में नहीं होता। ऐसे साधक अच्छे कर्म करने और बुरे कर्मो का नाश करने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। 
जो व्यक्ति इस चक्र का जागरण करने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं, वे जीवन मृत्यु पर नियंत्रण प्राप्त कर लेते हैं। सभी लोगों में अंतिम 2 चक्र सोई हुई अवस्था में रहते हैं। अत: इस चक्र का जागरण सभी लोगों के वश में नहीं होता। इस चक्र का जागरण करने में कठिन साधना व लम्बे समय तक अभ्यास की आवश्यकता होती है। योग गुरुओं के अनुसार इस चक्र का जागरण आम जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति को जबदस्ती नहीं करना चाहिए। इस चक्र का केवल ध्यान करना चाहिए और स्वास्थ्य तथा सुखमय जीवन व्यतीत करना चाहिए ।

इसे जाग्रत करने के लिए ध्यान को एक-एक कर सभी चक्रों पर केन्द्रित करते हुए ऊपर के स्थित सहस्त्रार चक्र पर स्थिर किया जाता है। पहले सभी चक्रों का ध्यान करते हुए कमल के बन्द फूल की कल्पना की जाती है और उसे अपनी आंतरिक दृष्टि से स्पष्ट करने की कोशिश की जाती है। परन्तु इस चक्र में अपने ध्यान को केन्द्रित करते हुए अधोमुख अर्थात आधे खुले हुआ कमल के फूल की कल्पना की जाती है। इसमें अपने ध्यान को सहस्त्रार चक्र में लगाते हुए कल्पना करें कि अधोखुले कमल के फूल है। सातवें चक्र पर ध्यान केन्द्रित करना ध्यान का सबसे अंतिम ध्यानाभ्यास है। इसका ध्यान करने से मन में सुख, शांति और सत्य का ज्ञान का अनुभव होता है। 



सहस्त्रार चक्र पर ध्यान की विधि :

अंतिम चक्र पर ध्यान का अभ्यास करते समय अपने मन को मस्तिष्क के बीच वाले भाग में स्थित सहस्त्रदल कमल के फूल पर स्थिर करें। मन को उस पर केन्द्रित कर कल्पना करें कि उस फूल में सभी रंग मौजूद है और वह नीचे की ओर खिला हुआ है। ध्यान करें कि यह चक्र प्रतिबिम्बों का सागर, सभी चेतनाओं का केन्द्र, यह वर्तमान, भूत और भविष्य है तथा मानव जीवन का यही आदि और अंत है। कुछ देर मन को एकाग्र करने के बाद मूलाधार चक्र के ठीक विपरीत ध्यान का त्याग सहस्त्रार चक्र में करें।इस तरह सहस्त्रार चक्र पर कुछ समय तक ध्यान को केन्द्रित रखें। फिर सहास्त्रार चक्र से अपने ध्यान को हटा लें और अपने ध्यान को भौंहों के बीच स्थित आज्ञा चक्र पर लाएं। भौंहों के बीच स्थित कमान पर अपने ध्यान को एकाग्र कर खुले हुए कमल की पंखुड़ियों को बन्द करें। इसके बाद कंठमूल में स्थित विशुद्धि चक्र पर ध्यान करें और खिली हुए पंखुड़ियों को बन्द कर दें। फिर हृदय के पास स्थित अनाहत चक्र पर ध्यान को लाकर फूल की खिली हुई पंखुड़ियों को बन्द करें। इसके बाद नाभि में स्थित मणिपूर चक्र पर ध्यान को लाएं और खिले हुए फूल को बन्द करें। फिर अपने ध्यान को स्वाधिष्ठान चक्र पर लाएं और फूल की पंखुड़ियों को बन्द करें। इसके बाद अपने ध्यान को नीचे स्थित मूलाधार चक्र पर लाएं और खिले हुए फूल की पंखुड़ियों को बन्द कर अपने मन को आंतरिक चेतना से बाहर निकालें अर्थात ध्यानावस्था से बाहर निकाले और अपने शरीर का ज्ञान करें। जिस आसन में बैठे है या लेटे हैं उस आसन का ज्ञान करें। फिर आसन को त्यागकर सामान्य स्थिति में आ जाएं। पैरों के पंजों को ऊपर नीचे चलाएं तथा सिर को दाएं-बाएं घुमाएं। मुट्ठी को 4 से 5 बार बन्द करें और खोलें। दोनों हाथों को आपस में रगड़ें और अपनी आंखों व मुंह पर सहलाएं। हाथों से कुछ देर तक आंखों को बन्द करके रखें और 4 से 5 बार आंखों को खोले व बन्द करें। कुछ समय तक मौन व शांत स्थिति में बैठे रहें तत्पश्चात अभ्यास की स्थित का त्याग करें। 
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6. आज्ञा चक्र






आज्ञा चक्र दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है। इस चक्र में 2 पंखुड़ियों वाले कमल का अनुभव होता है, इसका रंग सुनहरा होता है। इस चक्र में 2 नाड़ियां मिलकर 2 पंखुड़ियों वाले कमल की आकृति बनाती है। यहां 2 ध्वनियां निकलती रहती है। 
शरीर रचना के अनुसार इस स्थान पर पिनियल और पिट्यूटरी 2 ग्रंथियां मिलती है। योगशास्त्र में इस स्थान का विशेष महत्व है। इस चक्र पर ध्यान करने से सम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता आती है। मूलाधार से ´इड़ा´, ´पिंगला´ और सुषुम्ना अलग-अलग प्रवाहित होती हुई इसी स्थान पर मिलती हैं। इसलिए योग में इस चक्र को त्रिवेणी भी कहा गया है। 
योग ग्रंथ में इसके बारे में कहा गया है-इड़ा भागीरथी गंगा पिंगला यमुना नदी।तर्योमध्यगत नाड़ी सुषुम्णाख्या सरस्वती।।अर्थात ´इड़ा´ नाड़ी को गंगा और ´पिंगला´ नाड़ी को यमुना और इन दोनों नाड़ियों के बीच बहने वाली सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती कहते हैं। इन तीनों नाड़ियों का जहां मिलन होता है, उसे त्रिवेणी कहते हैं। 
जो मनुष्य अपने मन के इन चक्रो पर ध्यान करता है, उसके सभी पाप नष्ट होते हैं।आज्ञा चक्र मन और बुद्धि का मिलन स्थान है। यह ऊर्ध्व शीर्ष बिन्दु ही मन का स्थान है। सुषुम्ना मार्ग से आती हुई कुण्डलिनी शक्ति का अनुभव योगी को यहीं आज्ञा चक्र में होता है। योगाभ्यास व गुरू की सहायता से साधक कुण्डलिनी शक्ति को आज्ञा चक्र में प्रवेश कराता है और फिर में कुण्डलिनी शक्ति को सहस्त्रार चक्र में विलीन कराकर दिव्य ज्ञान व परमात्मा तत्व को प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त करता है। इस पर ध्यान करने से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। इस चक्र का सम्बंध जीवन को नियंत्रित करने से है। 

आज्ञा चक्र जाग्रत करने की विधि :


  • अपने ध्यान को दोनों भौंहों के बीच भ्रूमध्य में स्थित आज्ञा चक्र पर लाएं। 
  • इस चक्र में 2 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की कल्पना करें जिसका रंग सुनहरा है। इसकी भी दोनों पंखुड़ियां आपस में मिली हुई है। 
  • आंतरिक दृष्टि से उस कमल के फूल को स्पष्ट करने की कोशिश करें और अपने मन को केन्द्रित करते हुए कमल की पंखुड़ियों को खिलाते हुए चित्र की कल्पना करें। खिले हुए कमल के फूल को देखें और कुछ समय तक अपने मन को उस चक्र पर केन्द्रित करें। 

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5. विशुद्धि चक्र






विशुद्ध चक्र कंठ में स्थित होता है जिसका रंग भूरा होता है । यहां 16 पंखुड़ियों वाले कमल का अनुभव होता है क्योंकि यहां 16 नाड़ियां आपस में मिलती है तथा इनके मिलने से ही कमल के फूल की आकृति बनती है। इस चक्र में ´अ´ से ´अ:´ तक 16 ध्वनियां निकलती रहती है। 

इस चक्र का ध्यान करने से दिव्य दृष्टि, दिव्य ज्ञान तथा समाज के लिए कल्याणकारी भावना पैदा होती है। इस चक्र का ध्यान करने पर मनुष्य के रोग, दोष, भय, चिंता, शोक आदि दूर वह लम्बी आयु को प्राप्त करता है। यह चक्र शरीर निर्माण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह चक्र आकाश तत्व प्रधान है और शरीर जिन 5 तत्वों से मिलकर बनता है, उसमें एक तत्व आकाश भी होता है। आकाश तत्व शून्य है तथा इसमें अणु का कोई समावेश नहीं है। मानव जीवन में प्राणशक्ति को बढ़ाने के लिए आकाश तत्व का अधिक महत्व है। यह तत्व मस्तिष्क के लिए आवश्यक है और इसका नाम विशुद्ध रखने का कारण यह है कि इस तत्व पर मन को एकाग्र करने से मन आकाश तत्व के समान शून्य और शुद्ध हो जाता है।

इस चक्र का सम्बंध मस्तिष्क से होता है। जिस व्यक्ति में इस चक्र का जागरण होता है, वे किसी भी संसारिक क्रिया को आलोचनात्मक द्रष्टि से देखता है। ऐसे व्यक्ति हर बातों में बहस करने तथा दूसरों को परेशान करने में अपनी महानता समझते हैं |

विशुद्धि चक्र को जाग्रत करने की विधि :

  • अपने ध्यान को कंठमूल में स्थित विशुद्धि चक्र पर केन्द्रित करें। 
  • इस चक्र पर ध्यान करते हुए भूरे रंग के 15 दलों वाले कमल के फूल की कल्पना करें। 
  • इसके बाद अपनी आंतरिक दृष्टि को केन्द्रित करते हुए अपने मन में कमल की एक-एक पंखुड़ियों को खिलाते हुए स्थिति की कल्पना करें। फिर खिले हुए फूल की सुन्दरता के आनन्द को प्राप्त करते हुए कुछ समय तक अपने मन को वहीं स्थिर रखें।


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4.अनाहत चक्र






अनाहत चक्र हृदय के पास स्थित होता है। इस चक्र में श्वेत रंग का कमल होता है जिसमें 12 पंखुड़ियां होती है। इस स्थान पर 12 नाड़ियां आपस में मिलकर 12 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की आकृति बनाती है। अनाहत चक्र में 12 ध्वनियां निकलती है जो कं, खं, गं, धं, डं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं होती है। 

यह चक्र प्राणवायु का स्थान है तथा यहीं से वायु नासिका द्वारा अन्दर व बाहर होती रहती है। प्राणवायु शरीर की मुख्य क्रिया का सम्पदन करता है जैसे- वायु को सभी अंगों में पहुंचाना, अन्न-जल को पचाना, उसका रस बनाकर सभी अंगों में प्रवाहित करना, वीर्य बनाना, पसीने व मूत्र के द्वारा पानी को बाहर निकालना आदि। यह चक्र हृदय समेत नाक के ऊपरी भाग में मौजूद है तथा ऊपर की इन्द्रियों का काम उसी के द्वारा सम्पन्न होता है। इस चक्र में वायु तत्व की प्रधानता है। प्राणवायु जीवन देने वाले सांस है। प्राण सम्पूर्ण शरीर में प्रसारित होकर शरीर को ओषजन (ऑक्सीजन) वायु एवं जीवनी शक्ति देता है। 

अनाहत चक्र पर ध्यान करने से मनुष्य, समाज और स्वयं के वातावरण में सुसंगति एवं संतुलन की स्थापना करता है। अनाहत चक्र पर ध्यान करने से मनुष्यों को सभी शास्त्रों का ज्ञान होता है तथा वाक् पटु, संसार के जन्म-मरण के विषय में ज्ञान होता है, ऐसे मनुष्य ज्ञानियों में श्रेष्ठ, काव्यामृत रस के आस्वादन में निपुण योगी तथा अनेक गुणों से युक्त होते हैं।जिस व्यक्ति में अनाहत चक्र का जागरण होता है, उसका स्वभाव भावनात्मक रूप से बेकाबू होता है। जिनमें यह चक्र कमजोर होता है, वे स्वभाव से बहुत तर्कशील होता है अर्थात ऐसा व्यक्ति किसी भी विषय में गहराई से खोज करता है तथा सोच-समझकर किसी कार्य को करता है। इस चक्र के प्रधान वाले लोग समाज सेवी तथा दूसरों का प्रवाह करने वाले होते हैं। इस चक्र के जागरण से लोगों में आध्यात्मिक और टेलीपैथी (दूर दृष्टि ज्ञान) जैसे गुणों का विकास होता है।


अनाहद चक्र जाग्रत करने की विधि :



  • अपने ध्यान को अनाहत चक्र अर्थात हृदय के पास स्थित चक्र पर लगाएं। 
  • मन को एकाग्र व शांत रखते हुए 12 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की कल्पना करें। कल्पना करें कि हृदय के पास चक्र में 12 पंखुड़ियों वाला कमल का फूल है, जिसका रंग सफेद हैं और इस फूल की सभी पंखुड़ियां आपस में बन्द है। इसके बाद अपनी आंतरिक दृष्टि से कमल की सभी पंखुड़ियों को खिलाएं और कुछ समय तक इस पर ध्यान को केन्द्रित करें। 

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3. मणिपूर चक्र






मणिपूर चक्र नाभि में स्थित होता है तथा यह अग्नि तत्व प्रधान है। इस चक्र का रंग नीला होता है। यहां 10 नाड़ियां आपस में मिलकर 10 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की आकृति बनाती है। इस कमल का रंग पीला होता है तथा यहां 10 प्रकार की ध्वनियां- डं, ढं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं, बं गूंजती रहती हैं। 

मणिपूर चक्र समान वायु का स्थान है। समान वायु का कार्य पाचन संस्थान द्वारा उत्पन्न रक्त एवं रसादि को पूरे शरीर के अंग-अंगं में समान रूप से पहुंचाना है। समान वायु का स्थान शरीर में नाभि से हृदय तक मौजूद है तथा पाचनसंस्थान इसी के द्वारा नियंत्रित होता है। पाचनसंस्थान का स्वस्थ एवं खराब होना समान वायु पर निर्भर करता है। इस चक्र पर ध्यान करने से साधक को अपने शरीर का भौतिक ज्ञान होता है। इससे व्यक्ति की भावनाएं शांत होती हैं। 

मणिपूर चक्र ऊर्जा शक्ति व गर्मी से सम्बंधित होता है। यह चक्र नाभि के पास स्थित होता है। इस चक्र का जागरण जिस व्यक्ति के अन्दर होता है, वह अपने जीवन में निरंतर शक्ति व आविष्कार की तलाश में रहता हैं। ऐसे लोगों में अधिकार करने की भावना रहती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों पर शासन करने में खुशी का अनुभव करते हैं। 

मणिपूर चक्र जाग्रत करने की विधि :



  • अपने मन को नाभि के पास स्थित मणिपूर चक्र में केन्द्रित करें। 
  • मन में कल्पना करें कि नाभि में पीले रंग का 10 दल वाला कमल का फूल है, जिसकी पंखुड़ियां आपस में मिली हुई है। 
  • ध्यान चक्र का अभ्यास करने वाले को चाहिए कि अपने मन को एकाग्र कर अपनी कल्पना के द्वारा उस फूल को खिलाएं और उससे मिलने वाले आनन्द का अनुभव करें। 
  • इस तरह नीले रंग के खिले हुए कमल के फूल पर अपने मन को कुछ देर तक केन्द्रित करें। 

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शरीर में मौजूद 7 चक्र



योग शास्त्रों में कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण एवं मन को भटकने से रोकने के लिए शरीर में मौजूद 7 चक्रों पर ध्यान किया जाता है। इससे यह शक्ति जागृत होकर सभी चक्रों का भेदन करती है अर्थात चक्रों को जगाती है |
शरीर में मौजूद चक्र का सम्बंध शक्ति पुंज अर्थात दिव्य ज्योति से है। देवी-देवताओं के पीछे दिखाई देने वाला तेज प्रकाश ही शक्ति पुंज है। 
योग शास्त्रों के अनुसार जिस तरह शरीर में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म तंत्र या सूक्ष्म कोश होते हैं, उसी तरह मानव शरीर में चक्र होते हैं। शरीर का यह चक्र ही भौतिक शरीर को अभौतिक शरीर से जोड़ता हैं। अभौतिक शरीर वह है, जिसे सीधे महसूस नहीं किया जा सकता। देवताओं के पीछे दिखाये गए इन आभामंडल का सम्बंध इन चक्रों से है तथा इन्हीं चक्रों के कारण एक साधारण मनुष्य योग क्रिया करके ईश्वर के सूक्ष्म रूप का दर्शन कर पाता हैं। योगाभ्यास के द्वारा इन चक्रों को देखा जा सकता है। इन चक्रों से निकलने वाली तेज रोशनी गोलाकार रूप में ध्यान करने वाले के चारों ओर घूमती रहती है।

आमतौर पर सभी लोगों में चक्र 3 अवस्था में जागृत रहते हैं। चक्र की पहली अवस्था संतुलन की होती है, परन्तु यह आदर्श स्थिति कम लोगों में पायी जाती है। व्यक्ति यदि अपने जीवन में लगातार किसी एक कार्य को ही करता रहता है, तो उस व्यक्ति में उससे सम्बंधित चक्र का जागरण हो जाता है। परन्तु जिस चक्र से सम्बंधित कोई कार्य नहीं होता वह सोई हुई स्थिति में चला जाता है।

महर्षि पतांजली ने अपने ´योग दर्शन´ शास्त्र में शरीर में मौजूद 7 चक्रों का वर्णन किया है, योग में इन चक्रों को सूक्ष्म शरीर का सप्तचक्र कहते हैं। इन सातों चक्रों पर ध्यान करने अर्थात मन को लगाने से आध्यात्मिक व अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। सूक्ष्म शरीर के इन 7 चक्रों का नाम इस प्रकार है-


  1. मूलाधार चक्र- यह जननेन्द्रिय और गुदा के बीच स्थित है। 
  2. स्वाधिष्ठान चक्र- यह उपस्थ में स्थित है।
  3. मणिपूर चक्र- यह नाभिमंडल में स्थित है।
  4. अनाहद चक्र- यह हृदय के पास स्थित है।
  5. विशुद्धि चक्र- यह चक्र कंठकूप में स्थित है।
  6. आज्ञा चक्र- यह भ्रमध्यम में स्थित है।
  7. सहस्त्रार चक्र- यह मस्तिष्क में स्थित है।


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कुण्डलिनी महाशक्ति क्या है ?







योग के अभ्यास से जो अनेक प्रकार की शक्तियां  प्राप्त होती है, उन सभी का सम्बंध कुण्डलिनी शक्ति से है। योगशास्त्रों में इस कुण्डलिनी शक्ति का स्थान मूलाधार चक्र बताया गया है। मूलाधार चक्र में यह शक्ति सोई हुई अवस्था में रहती है तथा योग के द्वारा जब कोई व्यक्ति इस शक्ति को जगाता है, तब उसे विभिन्न प्रकार की दिव्य शक्तियां प्राप्त होती है।

शरीर में कुण्डलिनी शक्ति कहाँ पर है ?

गुह्य देश से 2 अंगुली ऊपर और लिंग मूल से 2 अंगुली नीचे ´मूलाधार चक्र´ में यह कुण्डलिनी शक्ति सुप्तावस्था में स्थित होती है। योग में कुण्डलिनी का वर्णन करते हुए कहा गया है-

पश्चिमोभिमुखी योनिर्गुद मेढ़ान्तरालगा।तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ते कुण्डलिनी सदा।।संवेष्टा सकला नाड़ी: सार्ध-त्रि कुटिल्याकृत:।मुखे निवेश्य सा पुच्छ: सुषुम्ना-विवरे स्थिता।।

गुदा और लिंग के बीच में पीछे की ओर मुंह करके स्थित ´योनि मण्डल´ है। इस योनि मण्डल को ´कन्द´ भी कहते हैं। इसी ´कन्द´ के बीच में कुण्डलिनी शक्ति सभी नाड़ियों को लपेट कर साढ़े 3 बार गोलाकर घूमकर सर्प की तरह अपनी पूंछ को मुंह में डालकर सुषुम्ना मार्ग को रोककर सोई हुई अवस्था में स्थित रहती है। जब यह ´मूलाधार´ चक्र से जागृत होती है, तो यह एक-एक करके स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध तथा आज्ञा चक्र समेत 6 चक्रों को जागृत करती हुई सहस्त्रार में पहुंच जाती है।

ब्रह्माण्ड में जितनी शक्ति मौजूद है, उन सभी शक्तियों को भगवान ने मनुष्य के शरीर रूपी ´पिण्ड´ के मूलाधार में एकत्रित कर दिया है। परंतु सुषुम्ना नाड़ी का मुख त्रिकोण ´योनि मण्डल´ के बीच स्थान पर है, जहां से मेरूदण्ड के भीतर से होती हुई ऊपर की ओर चलती है। साधारण अवस्था में सुषुम्ना बन्द रहती है, जिसमे कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई अवस्था में रहती है। प्राणावायु केवल सुषुम्ना के दाएं और बाएं से ऊपर की ओर जाती हुई ´इड़ा´ और ´पिंगला´ नाड़ी से होते हुए चक्रों को स्पर्श करती हुई ऊपर जाती है। जिससे प्राणवायु पूरे शरीर में हमेशा प्रवाहित होता रहती है।इसी त्रिकोण ´योनिमण्डल´ में एक अति सूक्ष्म विद्युत के समान दिव्य शक्ति वाली नाड़ी लिपटी हुई है जिसे सर्पिण या कुण्डलिनी कहते हैं। यह नाड़ी जब तक सोई हुई अवस्था में रहता है, तब तक कोई भी शक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती। इस जागृत करने के लिए योग साधना करना पड़ती है। इसके जागरण के बिना शरीर के द्वारा होने वाले अनेक कार्य बाहर से दिखाई नहीं देता।


कुण्डलिनी महाशक्ति के विषय में वैज्ञानिक और योग गुरूओं के मत :


अनेकों योग गुरूओं ने अपने अन्दर इस शक्ति को वास्तविक रूप से अनुभव किया है। कुण्डलिनी शक्ति को विज्ञान भी मानता है, परंतु यह शक्ति दिखाई न देने के कारण विज्ञान इस बात को स्पष्ट नहीं कर पाता  कि क्या कुण्डलिनी शक्ति है? आज के शरीर वैज्ञानिक (फिजियोलोजिस्ट) अभी तक इस बात को जान नहीं पाएं हैं कि प्राचीन यूनान, रोम आदि देशों के तत्व ज्ञाता शरीर के अन्दर मौजूद इन शक्तिओं से परिचित थे या नहीं।प्लोटों और पिथागोरस जैसे आत्मदर्शी (आत्मा को जानने वाले) विद्धानों ने शरीर के इन शक्तियों के बारे में इस तरह लिखा है-नाभि के पास एक ऐसी अदभुत शक्ति मौजूद है, जो किसी साधना के द्वारा जागृत होकर मस्तिष्क में पहुंच जाती है और मस्तिष्क में तीव्र बुद्धि का विकास करती है, जिससे मनुष्य के अन्दर दिव्य शक्तियां उत्पन्न होने लगती है। यह शक्ति कोई अन्य वस्तु नहीं बल्कि कुण्डलिनी शक्ति होती है। कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर ही मनुष्य परमात्मा के सूक्ष्म स्वरूप का दर्शन कर पाता हैं तथा वह संसार में अनेक प्रकार के चमत्कारी कार्यो को करने में सफलता प्राप्त करता है।

कुण्डलिनी शक्ति के विषय में कहा गया है कि यह एक महान शक्ति है जो मनुष्य के शरीर की नाभि में स्थित सूर्य चक्र में सुप्तावस्था में रहती है। आज के समय में यह सौभाग्य ही है कि लोग कुण्डलिनी शक्ति के विषय में चेतना विज्ञान के रूप में जानने की इच्छा रखते हैं। योग ऋषियों ने कुण्डलिनी को अदृश्य और चमत्कारिक शक्ति कहा है। परंतु कुण्डलिनी शक्ति का अध्ययन एवं विश्लेषण करें तो पाएंगें कि इसका सम्बंध भौतिक शरीर से भी है, क्योंकि कुण्डलिनी शक्ति को जगाने के लिए स्थूल शरीर में स्थित चक्रों का  सहारा लिया जाता है। कुण्डलिनी शक्ति रूपी चेतना को शिव और आधार को शक्ति कहा गया है। 


गोरक्ष ऋषि के अनुसार :

षट्चक्रं शोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योम पंचकम्।स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिन:।।

गोरक्ष ऋषि के अनुसार शरीर में मौजूद चक्रों (7 चक्र), 16 आधारों, 3 लक्ष्यों और 5 शरीर पंचकोशों के ज्ञान के बिना योगाभ्यास कर पाना सम्भव ही नहीं है। 

योग में जिस कुण्डलिनी शक्ति व चक्रों को बताया गया है, उसे आज के वैज्ञानिक तरीके से शरीर को काटकर उसका अध्ययन करने की कोशिश की जा रही है परंतु इससे वैज्ञानिकों को शास्त्रों में बताए गए स्थान पर चक्र या कुण्डलिनी आदि कुछ भी प्राप्त नहीं होता। परंतु शास्त्रों में इसका वर्णन बहुत गम्भीर और महत्वपूर्ण ढ़ंग से किया गया है। इसलिए शरीर में मौजूद सूक्ष्म शक्ति तथा चक्रों के शरीर पर अधिकार को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। प्राचीन योग विज्ञान के द्वारा बताये गये शरीर की रचना तथा समाधि के द्वारा प्राप्त होने वाले सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों का ज्ञान प्राप्त करने में आज के शरीर-रचना-विज्ञान अभी भी असमर्थ हैं। शरीर में मौजूद दिव्य शक्ति व चक्र अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण इसे बाहर आंखों से या यंत्रों की सहायता से देख पाना सम्भव नहीं है। आज के विज्ञान के आधार पर जिसका ज्ञान शरीर-रचना-विज्ञान शास्त्र को प्राप्त नहीं है, वह नहीं है, ऐसे कहना बिल्कुल गलत है।योग शास्त्रों में चक्र और कुण्डलिनी शक्ति के आधार पर ही योगाभ्यास और योग क्रिया आदि का निर्माण किया गया है। अत: योग शास्त्रों में वर्णित इन शक्ति व चक्रों को काल्पनिक और अस्तित्वहीन कहना अज्ञानता है।

अष्टांग योग की साधना विधि से समाधि अवस्था प्राप्त करने से योगी को समाधि प्रज्ञा प्राप्त होती है। मनुष्य के अन्दर यह शक्ति उत्पन्न होने से उसे दिव्य ज्योति अर्थात दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है। योग के द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त होने के बाद ही व्यक्ति शरीर के आंतरिक सूक्ष्म अंगों को देख पाने में समर्थ होता है। ध्यान के द्वारा ही योगी अन्नमयकोश में स्थित शक्ति केन्द्र को जागृत करके योग के मार्ग में अत्यधिक ऊंचाई तक पहुंच सका है। इस शक्ति को प्राप्त करने के लिए और इसके द्वारा शरीर को अत्यधिक प्रभावित करने के लिए योग शास्त्रों में शोधन क्रिया, आसन, मुद्रा तथा प्राणायाम की क्रिया को बनाया गया है। इन क्रियाओं के अभ्यास से योग मार्ग पर चलते हुए समाधि आदि दिव्य शक्ति को प्राप्त करना आसान हो जाता है।

योग के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति के जागृत करने पर यह ऊर्जा शक्ति सुषुम्ना से होते हुए अपने रास्ते में आने वाले सभी चक्रों का भेद (जागृत) करते हुए अंत में सहस्त्रार में पहुंचकर शिव में लीन होकर स्वयं शिव रूप हो जाती है। 
कुण्डलिनी शक्ति को अग्नि व सूर्य के समान बताया गया है। शरीर में कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होने पर अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होती है। कुण्डलिनी जागरण योग साधना के द्वारा किया जाता है और इस शक्ति को स्थाई रखने के लिए हमेशा अभ्यास और पवित्र भावनाओं की आवश्यकता पड़ती है। हमेशा योगाभ्यास करने से यह शक्ति सुषुम्ना से होकर सभी चक्रों में ऊपर की ओर प्रवाहित होती रहती है। अगर नियमित अभ्यास न किया जाए तो शक्ति ऊपर के चक्रों से उतरकर पुन: निम्न चक्र मूलाधार में स्थित हो जाती है। इसके निरंतर अभ्यास से कुछ शक्तियां अपने आप ही प्राप्त हो जाती है। इन शक्तियों को प्राप्त करने के बाद व्यक्ति को अहंकार, क्रोध, लोभ आदि नहीं करना चाहिए तथा अपनी साधना से प्राप्त शक्ति को गुप्त ही रखना चाहिए।

कुण्डलिनी जागरण होकर आध्यात्मिकता की प्राप्ति होती है। योग में कहा गया है कि कुण्डलिनी शक्ति वशिष्ठ में रसिकता भाव संवेदना आदि अनेक कलाओं के रूप में विकासित होते हुए जीवन को अच्छा बना देती है। कुण्डलिनी शक्ति के जागरण का प्रभाव पूरे शरीर पर दिखाई देने लगता है तथा व्यक्ति को आलौकिक शक्ति का अनुभव होने लगता है। चेहरे पर चमक व तेज दिखाई देने लगता है। 

मनुष्य के अन्दर कुण्डलिनी जागरण होने के बाद उसके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं रहता। अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति ´यद् ब्रह्माडे तत् पिण्डे´ के अनुसार होती है। ध्यान के द्वारा अपने मन को अन्तर आत्मा में लगाना और अपनी अतिन्द्रिय शक्ति को जागृत कर कल्पना करना की विश्व का निर्माण जैसा हुआ है, वैसे ही हमारे शरीर का भी निर्माण हुआ है। इस तरह की इच्छा रखते हुए व्यक्ति अनेक चमत्कारों से परिपूर्ण हो जाता है। इस शक्ति के जागरण से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त होती है। इस चमत्कारी विद्या को जानने के बाद पतंजलि ´योग दर्शन´ में वर्णित समस्त विभूति, परिचित ज्ञान, पूर्व जन्म का ज्ञान, दूर स्थित वस्तुओं के बारे में जानने वाला, दूरदर्शी (भविष्य को जानने वाला) ज्ञान, सभी लोकों का ज्ञान, तारा-ग्रहों का ज्ञान, शरीर का ज्ञान, भूख-प्यास को रोकना तथा हवा में उड़ना आदि का ज्ञान, साधना पाद में विर्णत अहिंसा भाव, पृथ्वी के रत्नों का प्रकट होना, मैत्री, इष्ट साक्षात्कार तथा समाधि आदि योग साधना अपने आप प्राप्त हो जाता है।

नाक के बाईं छिद्र से ´इड़ा´ नाड़ी चलती है, जिसे चन्द्र नाड़ी कहते हैं। इसका रंग शुभ होता है। नाक के दाएं छिद्र से ´पिंगल´ नाड़ी चलती है, जिसे सूर्य नाड़ी कहते हैं। इसका रंग खून की तरह होता है। इन दोनों नाड़ियों की वक्रगति से 5 चक्र बनते हैं अर्थात दोनों नाड़िया जहां आपस में मिलती है, वहां चक्र बनते हैं। जब यह दोनों नाड़ियां समान गति से चलती है, तब सुषुम्ना नाड़ी में इन दोनों नाड़ियों का लय होता है। दोनों के मिलने वाले स्थान पर जब वायु का दबाव पड़ता है, तब कुण्डलिनी जागृत होकर सुषुम्ना में प्रवेश करती है। कुण्डलिनी सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करके सहस्त्रार चक्र में पहुंचकर जब शांत हो जाती है तब उस अवस्था को तंत्र योग में समाधि कहते हैं। समाधि तभी प्राप्त होती है, जब व्यक्ति अपने अन्दर की संसारिक वस्तुओं की इच्छा को छोड़ देता है। व्यक्ति का मन शून्य होने पर कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए सहस्त्रार में जाकर समाधि की स्थिति प्राप्त कराती है।कुण्डलिनी जागरण योग की परम सिद्धि है और इन सिद्धियों को प्राप्त करना आसान नहीं है। परंतु योग पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति श्रद्धा, विश्वास, धैर्य तथा गुरू की सहायता से कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने में सफलता प्राप्त कर पाते हैं। ऐसे सभी व्यक्ति जिनमें एक खास प्रकार के चमत्कारी गुणों को देखा जाता है, वे सभी किसी न किसी चक्र से प्रभावित रहते हैं अर्थात उससे सम्बंधित चक्र का उसमें जागरण हुआ होता है। जैसे मूलाधार चक्र से प्रभावित बच्चे अपनी असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहते हैं तथा स्वाधिष्ठ चक्र से प्रभावित व्यक्ति वीर, राजा, काल तथा साहित्य प्रेमी होते हैं। इसी प्रकार मणिपूर चक्र से प्रभावित व्यक्ति धर्म-अधर्म को समझने वाले, दानी, परोपकारी तथा कर्त्तव्य परायण होते हैं। अनाहत चक्र से प्रभावी व्यक्ति राजयोगी एवं स्थिर प्रज्ञा होते हैं। योग शास्त्रों में कुण्डलिनी शक्ति की प्राप्ति करने से पहले गुरू के द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हुए योग के अष्टांग यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि के ज्ञान तथा अभ्यास द्वारा सफलता प्राप्त होने के बाद ही कुण्डलिनी शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है।

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2. स्वाधिष्ठान चक्र







स्वाधिष्ठान चक्र उपस्थ में स्थित है। इसमें 6 पंखुड़ियों वाला कमल होता है। स्वाधिष्ठान चक्र में 6 नाड़ियां आपस में मिलकर 6 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की रचना करती है। इस चक्र में 6 ध्वनियां- वं, भं, मं, यं, रं, लं आती रहती है। 

स्वाधिष्ठान चक्र जलतत्व प्रधान है। स्वाधिष्ठान चक्र में पृथ्वी तत्व मिलने से परिवार और मित्रों से सम्बंध बनाने में कल्पना का उदय होने लगता है। इस चक्र का ध्यान करने से मन में भावना उत्पन्न होने लगती है और व्यक्ति का मन निर्मल व शुद्ध होने लगता है। स्वाधिष्ठान चक्र भी ´अपान´ वायु के अधीन होता है। इस चक्र वाले स्थान से ही प्रजनन क्रिया सम्पन्न होती है तथा इसका सम्बंध सीधे चन्द्रमा से है। समुद्रों में उत्पन्न होने वाला ज्वार-भाटा चन्द्रमा से नियंत्रित है। मनुष्य के शरीर का तीन चौथाई भाग जल है और शरीर में उत्पन्न उथल-पुथल इस चक्र के असंतुलन के कारण होती है। इसी चक्र के कारण मनुष्य के मन की भावनाओं प्रभावित होती है, स्त्रियों में मासिकधर्म आदि चन्द्रमा से सम्बंधित है और इन कार्यो का नियंत्रण स्वाधिष्ठान चक्र से होता है। इस चक्र के द्वारा मनुष्य के आंतरिक और बाहरी संसार में समानता स्थापित करने की कोशिश रहती है। इसी चक्र के कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है। स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान करने से मन शांत होता है तथा धारणा व ध्यान की शक्ति प्राप्त होती है। स्वाधिष्ठान चक्र मानव जीवन में सेक्स व आराम पसन्द व्यवहार से सम्बंधित है। इस चक्र के जागृत होने पर व्यक्ति का स्वभाव कामुक और आराम पसन्द हो जाता है। ऐसे व्यक्ति अपने पूरे जीवन में केवल एक्साइटमेंट या उत्तेजना की तलाश करता रहता है। जिस व्यक्ति में स्वाधिष्ठान चक्र का जागरण नहीं होता, उसकी इच्छा सेक्स के प्रति कम होती हैं।

मंत्र : वं

जाग्रत करने की विधि  : 


  • अपने ध्यान को उपस्थ में स्थित स्वाधिष्ठ चक्र पर ले जाएं और 6 पंखुड़ियों वाले कमल के पीले रंग के फूल की कल्पना करें। साथ ही कल्पना करें कि इसकी सभी पंखुड़ियां आपस में कली की तरह मिली हुई है। 
  • इस कमल के फूल को अपनी आंतरिक दृष्टि से देखने तथा मन को वहां केन्द्रित करते हुए एक के बाद एक पंखुड़ियों को खिलाएं। 
  • जब पूर्ण रूप से पीले रंग का कमल खिल जाए तो उसके सौन्दर्य को महसूस करें और उसके आनन्द का भी अनुभव करें। 
  • इस तरह कुछ समय अपने मन को वहां स्थिर करके उस चक्र पर ध्यान को केन्द्रित करें।



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1. मूलाधार चक्र






यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9%
लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है। इस चक्र में श्री गणेश जी का वास होता है।  

इस चक्र का रंग लाल होता है तथा इसमें 4 पंखुड़ियों वाले कमल की आकृति होती है। अत: मनुष्य के अन्दर पृथ्वी के सभी तत्व मौजूद होते हैं। मूलाधार चक्र पृथ्वी तत्व प्रधान है तथा 4 पंखुड़ियों वाला कमल अर्थात चतुर्भुज के आकार का है। इसका सांसारिक जीवन में बड़ा महत्व है, चक्र में स्थित यह 4 पंखुड़ियां वाला कमल पृथ्वी की चार दिशाओं की ओर संकेत करता है। मूलाधार चक्र का आकार 4 पंखुड़ियों वाला है और इस स्थन पर 4 नाड़ियां आपस में मिलकर 4 पंखुडियों वाले कमल की आकृति की रचना करती है। 

मूलाधार चक्र में 4 प्रकार की ध्वनियां- वं, शं, षं, सं होती रहती है। यह ध्वनि मस्तिष्क एवं हृदय के भागों को कंपित करती है। शरीर का स्वास्थ्य इन्ही ध्वनियों पर निर्भर करता है। मूलाधार चक्र रस, रूप, गन्ध, स्पर्श, भावों व शब्द का मेल है। यह ´अपान´ वायु का स्थान है तथा मल, मूत्र, वीर्य, प्रसव आदि इसी के अधिकार में है। 

मूलाधार चक्र कुण्डलिनी शक्ति, मानव जीवन की परमचैतन्य शक्ति तथा जीवन शक्ति का मुख्य स्थान भी यही है। यही चक्र मनुष्य की दिव्य शक्ति का विकास, मानसिक शक्ति का विकास और चैतन्यता का मूल स्थान है।मूलाधार को स्वस्थ रखने के लिए व्यक्ति को अपने भय पर जीत प्राप्त कर सांसारिक व आध्यात्मिक शक्ति के बीच तालमेल बनाए रखना चाहिए। योग क्रिया के द्वारा इस शक्ति को जागृत कर अपने अन्दर अदभुत शारीरिक शक्ति का अनुभव किया जा सकता है।

मंत्र :  लं


चक्र जगाने की विधि : 

मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्‍यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना। इसके अभ्यास के लिए -


  • किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएं। 
  • अपने दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा या अंजलि मुद्रा में रखें तथा अपनी आंखों को बन्द करके रखें। 
  • अपनी गर्दन, पीठ व कमर को सीधा करके रखें। 
  • अब सबसे पहले अपने ध्यान को गुदा से 4 अंगुली ऊपर मूलाधार चक्र पर ले जाएं। फिर मूलाधार चक्र पर अपने मन को एकाग्र व स्थिर करें और अपने मन में चार पंखुड़ियों वाले बन्द लाल रंग वाले कमल के फूल की कल्पना करें। फिर अपने मन को एकाग्र करते हुए उस फूल की पंखुड़ियों को एक-एक करके खुलते हुए कमल के फूल का अनुभव करें। 
  • इसकी कल्पना के साथ ही उस आनन्द का अनुभव करने की कोशिश करें। उसकी पंखुड़ियों तथा कमल के बीच परागों से ओत-प्रोत सुन्दर फूल की कल्पना करें। इस तरह कल्पना करते हुए तथा उसके आनन्द को महसूस करते हुए अपने मन को कुछ समय तक मूलाधार चक्र पर स्थिर रखें। 


प्रभाव : 

इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।
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