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Tuesday, February 28

कुछ ऐसे प्रश्न,जो आप स्वयं से पूछकर पता लगा सकते हैं कि आप बीमार हैं या स्वस्थ्य !



क्या आप स्वस्थ्य हैं ?  आईये, जानते हैं कुछ ऐसे प्रश्नों के माध्यम से जो आप अपने आप से पूछकर अपने स्वास्थ्य सम्बंधी सवालों का पता लगा सकते हैं -


स्वस्थ्य व्यक्ति की पहचान 

• क्या आप अपनी वास्तविक उम्र से कम दिखते हैं?
• क्या आपका शारीरिक व्यक्तित्व सामान्य है?
• क्या आपके चेहरे की रंगत लालिमायुक्त है?
• क्या आपकी आंखों में जीवन की चमक है?
• क्या आपकी मुखमुद्रा प्रसन्नचित्त है?
• क्या आप अपने शरीर में चुस्ती-फुर्ती व शक्ति का अनुभव करते हैं?
• क्या आप हमेशा स्वच्छ रहते हैं?
• आपका पेट ठीक रहता है तथा आपको खुलकर भूख लगती है?
• आपको समय से अच्छी नींद आती है?
• शौच साफ, बंधा हुआ एवं नियमित होता है?
• क्या भूख प्राकृतिक रूप से लगती है?
• दिन-भर शरीर में चुश्ती-फुर्ती बनी रहती है?
• क्या पेट छाती से कम है?
• मदक एवं उत्तेजक पदार्थों की चाह नहीं है?
• रचनात्मक कार्यों में लगे रहने की प्रवृत्ति है?
• चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है?
• सभी शारीरिक क्रियायें सामान्य हैं?
इन सभी प्रश्नों में यदि आपका उत्तर सकारात्मक है तो आप निश्चित ही स्वस्थ हैं परंतु एक भी प्रश्न के उत्तर में यदि आपका उत्तर नकारात्मक हो तो आप पूर्ण स्वस्थ नहीं हैं।

अस्वस्थ्य व्यक्ति की पहचान 

• यदि शारीरिक क्रियायें असामान्य हों।
• चेहरे एवं आंखों की चमक समाप्त हो गई है और आंखों के नीचे काले घेरे पड़ रहे हैं।
• अधिक चिड़चिड़ापन, बात-बात पर गुस्सा करना एवं निराशापूर्ण बातें करना।
• छोटे-छोटे कार्यों में थकावट महसूस करना एवं अधिक हताश रहना।
• भूख न लगना एवं नींद न आना।
• मल पतला या गांठ के रूप में आना।
• भूख न लगना।
• पेट छाती से बड़ा होना।
• मन में हमशा नकारात्मक विचार उत्पन्न होना।
• छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होना।
• आलस्य छाया रहना।
• नशीले पदार्थों का सेवन करना।
• मोटापा अधिक या कम शारीरिक बजन।

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Thursday, February 23

क्या आपको ग्रीन टी का सही प्रयोग पता है ?


By- Dr. Kailash Dwivedi

आजकल ग्रीन टी का प्रयोग तेज़ी से बढ़ रहा है | इसे पारंपरिक चाय के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है | ऐसा इसके स्वास्थ्यवर्धक गुणों के चलते हो रहा है | लेकिन क्या आपको ग्रीन टी बनाने एवं इसके प्रयोग की सही विधि पता है, यदि नहीं तो पढ़ें यह आलेख -

ग्रीन टी एक प्रकार की चाय है, जो कैमेलिया साइनेन्सिस नामक पौधे की पत्तियों से बनायी जाती है। इसके बनाने की प्रक्रिया में ऑक्सीकरण न्यूनतम होता है। इसके सेवन के अनेकों लाभ होते हैं। ग्रीन टी हृदय रोग होने की संभावनाओं को कम करने, कोलेस्ट्राल को कम करने के साथ ही शरीर के वजन को भी नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होती है।

ग्रीन टी में चीनी एवं दूध न मिलाएं :


चीनी को सफ़ेद जहर की संज्ञा दी गयी है | ग्रीन टी में चीनी मिलाने से उसमें कैलोरीज़ बहुत बढ़ जाती हैं।फलस्वरूप वजन नियंत्रित करने के लिए ग्रीन टी पीने का उद्देश्य पूरी तरह समाप्त हो जाता है। अत: इसे बिना चीनी के पीना अधिक लाभदायक है | चीनी के स्थान पर स्वाद के लिए आप शहद मिला सकते हैं।
ग्रीन टी में दूध मिलाने से भी यह प्रभावकारी नहीं होती। क्योंकि दूध में उपस्थित पोषक तत्वों के कारण वज़न कम करने में बाधा आती है।

बची हुयी ग्रीन टी को दोबारा गर्म न करें: 

ग्रीन टी को पुन: गर्म करने से उसमें उपस्थित प्राकृतिक गुण समाप्त हो जाते हैं। अच्छा होगा कि आप ताज़ी बनी हुई चाय ही पियें |

ग्रीन टी पीने का समय एवं मात्रा निश्चित करें :

ग्रीन टी पीने का एक सही समय भी तय होना चाहिए, वरना ये नुकसानदेह भी हो सकता है. ग्रीन टी में कैफीन और टेनिन्स पाए जाते हैं, जो गैस्ट्रिक जूस को डाइल्यूट करके पेट को नुकसान पहुंचा सकते हैं |  इसके अधि‍क इस्तेमाल से चक्कर आने, उल्टी आने और गैस होने जैसी प्रॉब्लम हो सकती हैं | ग्रीन टी कभी भी पी लेना ठीक नहीं है | पूर्ण लाभ के लिए  इसके सेवन का एक समय निश्चित करना उचित होगा | कभी भी भोजन के तुरंत बाद इसका सेवन न करें | बिलकुल खाली पेट भी ग्रीन टी न पिएं | एक दिन में दो या तीन कप ये ज्यादा ग्रीन टी पीना खतरनाक हो सकता है |

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Tuesday, February 21

जानिए, गंजेपन के कारण एवं इससे बचने के उपाय !



By- Dr. Kailash Dwivedi
WHO (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन)  की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 100 वर्षों में गंजापन सबसे तेजी से फैला है |  इसका सबसे बड़ा कारण बालों की सही ढंग से देखभाल न करना है |  फलस्वरूप हेयर फॉल, ड्राय हेयर और डैंड्रफ जैसी समस्यायों का सामना करना पड़ता है। इस आलेख में जानें वे कारण जो मुख्यतः गंजापन का कारण बन रहे हैं |

संतुलित आहार :


गंजापन के प्रमुख कारणों में संतुलित आहार न लेना है | अनाप-शनाप भोजन से से बाल झड़ना, ड्राय एवं बालों का दो मुंहा होने की प्रॉब्लम होने लगती हैं। हरी पत्तेदार सब्ज़ियां एवं मौसम के फल इन समस्यायों को रोकने में मददगार साबित होते हैं | ध्यान रहे कि भोजन में विटामिन B-12 और विटामिन C को आवश्यक रूप से शामिल करें।

बालों में ज्यादा हीट देना :


बालों को सुखाने के लिए आवश्यकता से अधिक हीट देने पर बाल डैमेज होने और झड़ने लगते हैं। इससे बालों का प्राकृतिक रंग भी प्रभावित होता है | इस समस्या से बचने के लिए बालों को स्ट्रेट करने के लिए जिस मशीन का प्रयोग किया जाता है उसे सही तापमान पर सेट करना चाहिए।

बालों में तेल लगाकर सोना :

रात्रि में बालों में तेल लगाकर सोने से बालों के टूटने और डस्ट लगने की समस्या होने लगती है। अतः गंजेपन से बचने के लिए नहाने के एक घंटे पहले ही बालों में तेल लगाना चाहिए। एवं नियमित रूप से बालों की मसाजभी करनी चाहिए |

गीले बालों रगड़ना एवं बांधना  :


गीले बालों की जड़ों में नमी होती है। इसलिए गीले बालों को बाँधने से यह टूटने लगते है | गीले बालों को तौलिया से ज्यादा रगडने से भी यह टूटने लगते हैं। इसलिए पहले बालों को हवा में सुखाएं इसके बाद ही हल्के हाथों से पोछें।

प्रतिदिन शैम्पू करना :


प्रतिदिन बालों में शैम्पू करने से बाल कमजोर होने लगते हैं |फलस्वरूप यह आसानी से टूटने लगते हैं। अतः गंजेपन से बचने के लिए ध्यान रखें कि प्रतिदिन बालों को शैम्पू न करें |


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Thursday, February 16

जानिए, दुनिया के सबसे बड़े 11 डॉक्टर




  1. प्रातःकाल १५ मिनिट सूर्य किरणों का सेवन
  2. रोज़ाना ६-८ घंटे की नींद
  3. शुद्ध शाकाहारी भोजन
  4. हर सुबह ४५ मिनिट व्यायाम्
  5. अपने आप पर पूर्ण आस्था एवं विश्वास
  6. हर दिन ३-५ लि० पानी सेवन
  7. नकारात्मक परिस्थितियों में भी पूर्ण रूप से सकारात्मक विचार
  8. परिपूर्ण ४५-६० मिनिट मनोरंजन
  9. मानसिक तनाव रहित दिनचर्या
  10. ग्रंथों या फिर अतिश्रेष्ठ प्रवचनों द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान वृद्धि
  11. बहुत ही अच्छे, परिपूर्ण व बुद्धिमान मित्र


इन ग्यारह/११ नियमों का, आज और अभी से, पूर्ण दृढ़ता एवं विश्वास के साथ, अपनी दैनंदिनी में पालन करना शुरू कीजिये और आजीवन निरोगी जीवन व्यतीत कीजिये...यही मेरा भी दृढ़ विश्वास है...और इसीलिये मैं भी निरोगी जीवन जी रहा हूँ...यानी २१वीं सदी में १९वीं सदी का जीवन...!!!

किसी भी प्रकार की कठिनाई, असमंजस या फिर असमर्थन होने पर, मुझसे यहां पर, यानी मेल द्वारा भी, सलाह लीजियेगा...

onemanarmyindia@ymail.com
कुमार गोयल गुरूजी-पुणे"
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Friday, February 10

500 KG वजनी महिला ईलाज के लिए भारत आई ..


नई दिल्ली.दुनिया की सबसे मोटी महिला मानी जा रही इमान अहमद सर्जरी के लिए शनिवार को भारत पहुंचेगी। मिस्त्र की रहने इमान का वजन 500 Kg है। मुंबई के डॉक्टर मफी लकड़ावाला और उनकी टीम 36 साल की इस महिला का तीन महीने तक फ्री इलाज करेगी। डॉक्टर्स की टीम स्पेशल प्लेन से इमान को मिस्त्र से लेकर आ रही है। उसके जमीन और एयर ट्रैवल के लिए खास इंजताम किए गए हैं। ज्यादा वजन के चलते इमान 25 साल से घर से बाहर नहीं निकल पाई और ना ही कभी स्कूल गई। ट्रक में हॉस्पिटल ले जाया जाएगा...


डॉक्टर लकड़वाला ने कहा, ''देश में पहली बार सभी जरूरी मेडिकल इक्विपमेंट्स एक ट्रक में लगाए गए हैं। जिसमें इमान को एयरपोर्ट से हॉस्पिटल लाया जाएगा। इसके पीछे एक एम्बुलेंस और आगे पुलिस की गाड़ी चलेगी। सैफी हॉस्पिटल में उसके लिए खास कमरा तैयार किया गया है।''
''इस तरह के मरीजों को शिफ्ट करने में काफी रिस्क होता है। इसलिए हमारी टीम काफी एहतियात बरत रही है। भारत और मिस्त्र में जमीन-आसमान में ट्रैवल के लिए खास इंतजाम किए गए हैं।''
डॉक्टर ने सुषमा से मांगी थी मदद
इमान को भारत लाने में काफी परेशानियां सामने आईं। पहले कोई एयरलाइंस उसे भारत लाने को तैयार नहीं थी। फिर वीजा मिलने में भी दिक्कत आई।
लकड़ावाला ने विदेश मंत्री को ट्वीट कर बताया था, ''मैम, 500 Kg की इमान अहमद ने अपनी जान बचाने के लिए मुझसे मदद मांगी है। उसे नॉर्मल प्रॉसेस के तहत वीजा नहीं मिल पाया। प्लीज उसे मेडिकल वीजा दिलवाने में मदद करें।''
इस पर सुषमा स्वराज ने ट्वीट कर कहा था, ''इस गंभीर मामले को मेरे सामने लाने के लिए शुक्रिया (डॉक्टर), हम निश्चित तौर पर उनकी मदद करेंगे।''
डॉक्टर्स ने कहा- मोटापा नहीं, बीमारी है
कुछ डॉक्टरों ने इमान को एलिफेंटाइसिस का मरीज बताया है, इसमें पैरों में काफी सूजन आ जाती है, यह एक पैरासाइट से होता है।
डॉक्टर्स का यह भी कहना है कि उसकी बॉडी में जरूरत से ज्यादा पानी जमा हो गया है, इन वजहों से महिला का वजन बढ़ रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मिस्र के डॉक्टर उसका इलाज नहीं कर पा रहे हैं। फैमिली ने अपने प्रेसिडेंट को ऑनलाइन पिटीशन दी।
लेकिन आखिर में इमान की फैमिली मदद के लिए भारत के डॉक्टर लकड़ावाला तक पहुंच गई।
कौन हैं इमान?
बता दें कि 36 साल की इमान अहमद अब्दुलाती मिस्र के ऐलेग्जैंड्रिया में रहती हैं। भारी-भरकम शरीर की वजह से 25 साल से घर से नहीं निकल सकी हैं।
यहां तक कि अपने बिस्तर तक से भी नहीं हिल पाती हैं। जन्म के वक्त ही इमान का वजन पांच किलो था। वह कभी स्कूल नहीं गईं।
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Thursday, February 9

हर्पीस जोस्टर रोग के लक्षण एवं उपचार


. By- Dr. Kailash Dwivedi

हर्पीस जोस्टर को शिन्गल्स के नाम से भी जाना जाता है। यह चिकनपॉक्स की उत्पत्ति करने वाले वेरिसेला ज़ोस्टर वायरस द्वारा होता है।  इस रोग में त्वचा पर दर्द एवं घावयुक्त  दाने उत्पन्न हो जाते हैं । सामान्यतः हर्पीस ज़ोस्टर 2 से 3 सप्ताह में ठीक हो जाता है। यदि इसे अधिक दिनों तक नज़रअंदाज किया जाए तो रोगी को सर्पेटिक न्यूराल्जिया जैसी गंभीर परेशानी हो सकती है फलस्वरूप नसों में दर्द की शिकायत हो सकती है। इस स्थिति को पोस्ट हर्पेटिक न्यूराल्जिया कहा जाता है |

कारण :

शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना |
लंबे समय तक स्टेरॉयड्स जैसे प्रेडनिसोन जैसी दवाइयों का सेवन करना |

लक्षण :


  • शरीर के एक तरफ की त्वचा पर पानी वाले दाने होना
  • त्वचा में खुजली या दर्द या जलन या सुन्नपन या झनझनाहट होना 
  • त्वचा बेहद संवेदनशील हो जाना
  • दानों के निकलने के पहले दर्द होना तत्पश्चात उस जगह की त्वचा पर लाल-लाल फुंसियां होना
  •  बुखार, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, थकान आदि की शिकायत 
  • फुंसियों में दर्द होना इस बीमारी का प्रमुख लक्षण है
  • प्रभावित क्षेत्र के आसपास जलन, फड़कन या खुजली होना
  • आँखों में लालिमा, उत्तेजना या पानी होना
  • धुंधला दिखाई देना
  • सिरदर्द होना 


उपचार :


  • प्रतिदिन ताज़ी गिलोय का रस का सेवन करें |
  • प्रातः पत्तागोभी का जूस पियें |
  • घाव या फफोले को ढीली, ना चिपकने वाली, जीवाणुरहित पट्टियों से बांधें।
  • रोगग्रस्त अंग पर ठंडी, गीली पट्टियाँ या बर्फ के पेक्स लगाएँ या गुनगुने पानी में डुबोकर रखें।
  • अधिक तापमान से बचें अन्यथा खुजली बढ़ सकती है |
  • ढीले वस्त्र पहनें।


आहार चिकित्सा :

अंकुरित अन्न, पत्तागोभी, फूलगोभी आदि लें, इनमें इन्डोल-3-कार्बिनोल होता हैं, जो हर्पीस वायरस की प्रतिकृति बनने से रोकता है। मूंगफली, चॉकलेट्स, बादाम, चीनी एवं रिफाइंड से पूर्णतया परहेज रखें |

सावधानियां :

  • घाव को खुरचे नहीं |
  • गंभीर स्थिति में तुरंत अपने चिकित्सक से संपर्क करें |
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टखने में मोच आ जाये तो करें यह उपचार


. By- Dr. Kailash Dwivedi

टखने की मोच एक पीड़ादायक स्थिति है यह चलते-फिरते, खेलों अथवा शारीरिक चुस्ती की गतिविधियां करते हुए, ऊँची-नीची सतह पर एकाएक पैर पड़ जाने से हो जाती है | मोच टखनों को सहारा देने वाले स्नायुओं (लिगामेंट्स) में खिंचाव से आने वाली चोट है। टखने के बाहरी तरफ के स्नायु, टखने के मुड़ने के कारण, सबसे आसानी से चोटग्रस्त होते हैं। यदि एक ही टखने में बार-बार मोच आती है या 4 सप्ताह से अधिक समय तक दर्द का रहता हो तो यह जीर्ण मोच (क्रोनिक स्प्रेन) हो सकती है। इस लेख में जानिये टखने में मोच आ जाने पर क्या करना चाहिए |

टखने की मोच के लक्षण :


  • टखने में दर्द
  • सूजन 
  • चोटग्रस्त क्षेत्र के आस-पास सूजन एवं नीला निशान

रोकथाम (बचाव) :


  • व्यायाम एवं परिश्रम के कार्य करने के पूर्व शरीर को वार्म-अप करें।
  • ऊँची एड़ी के जूते या सैंडल न पहनें।
  • चलते समय, दौड़ते समय या असमतल धरातल पर कार्य करते समय सावधानी रखें ।

इन स्थितियों में चिकित्सक से संपर्क करें :

सामान्यतः टखने की मोच पर आई सूजन एवं दर्द 48 घंटों में सामान्य हो जाता हैं। गंभीर मोच में, कई सप्ताह लग सकते हैं। यदि निम्न लक्षण हों तो तुरंत अपने चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए |

  • चल नहीं पा रहे हों।
  • बर्फ से सिंकाई, विश्राम एवं  दर्द निवारक दवाएं लेने के बाद भी दर्द में कमी ना हो।
  • 5-7 दिनों बाद भी मोच में कोई सुधार न हो।
  • यदि  टखना लाल, काला, या नीला पड़ रहा हो या सुन्न हो रहा हो।

जाँच और परीक्षण :

  • एक्स-रे
  • बोन स्केन
  • सीटी स्केन (कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी)।
  • एमआरआई (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग)।


घरेलू  उपचार :


  • चोट लगने पर तुरन्त तुलसी की कुछ पत्तियों को पीसकर पेस्ट बना लें | इस पेस्ट को चोट वाले स्थान पर लगायें।
  • बेड रेस्ट करें |
  • पैरों के नीचे तकिया आदि लगाकर टखने को ह्रदय की ऊँचाई से ऊपर उठाएँ।
  • उँगलियों से लेकर टखने के थोड़ा ऊपर तक एक समान दबाव देते हुए इलास्टिक बैंडेज लगाएँ। सूजन समाप्त होने तक इसे लगाये रखें।
  • सूजन एवं दर्द हो तो दिन में तीन से चार बार 10 से 15 मिनट के लिए आइस पैक या बर्फ से सिंकाई करें। बर्फ मिले पानी में पैर रखने से भी आराम मिलता है। 
  • दो चम्मच हल्दी एवं एक चम्मच चूना अच्छी तरह से एक में मिलाकर धीमी आंच में एक-दो मिनट रखने के बाद उतार लें | इसे  सहने लायक गर्म अवस्था में ही मोच वाले जगह पर लगायें। यह जब तक न सूखे लगा रहने दें, सूखने के बाद गुनगुने गर्म पानी से धो लें। इस लेप को दिन में दो बार लगा सकते हैं। 



क्या खाएं :


प्रोटीन युक्त खाद्य जैसे - डेरी उत्पाद, सोया और फलियों का सेवन करें |
ताजे फल और हरी सब्जियों का अधिक प्रयोग करें ।

क्या न खाएं :

शीतल पेय, आइसक्रीम आदि का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए | यह खाद्य रक्तसंचरण को धीमा कर देते हैं, जिसके कारण चोट के सुधरने की गति भी धीमी हो जाती है।
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इस साधारण से प्रयोग से हिलते दांत हो जायेंगे मजबूत !



यह एक ऐसा प्रयोग है जिसमे किसी औषधि की आवश्यकता नहीं होती है | इसको आप स्वयं बड़ी आसानी से कर सकते हैं | आईये जानते हैं इस प्रयोग की विधि -

जब भी मूत्र त्याग करें तब ऊपर-नीचे के दांतों को आपस में भींचकर रखें | इतने मात्र से ही मसूड़ों में रक्तसंचार बढ़ने लगेगा जिससे दांतों की कमजोरी दूर होने के साथ-साथ कई रोगों में लाभ मिलगा |
  • इससे दांतों का पायरिया,खून या पीप आना, दांतों का हिलना बहुत शीघ्र बन्द हो जाता है। 
  • हिलते दांत आश्चर्यजनक रूप से दृढ़ हो जाते हैं |
  • इस प्रयोग को करने से मुंह का लकवा मारने का डर नहीं रहता। 


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Tuesday, February 7

हमारा मन एक श्रेष्ठ चिकित्सक है !


                                    - डॉ.कैलाश द्विवेदी

हमारा शरीर ब्रह्माण्ड में व्याप्त पाँच तत्वों आकाश,वायु,अग्नि,जल एवं पृथ्वी से बना है | कहा गया है - “यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे” अर्थात जो ब्रह्माण्ड में है वह सब इस पिंड (शरीर) में व्याप्त है |
पंच महाभूत प्राकृतिक चिकित्सा के साधन हैं इन पंच्च्तत्वों का मूल आधार महत्तत्व होता है ।  पञ्चतत्वों को रोगनिवारक शक्ति महत्तत्व से ही प्राप्त होती है | प्रत्येक प्राणी के अन्दर आरोग्य प्रदान करने वाली एक शक्ति होती है जो उसे स्वस्थ्य रखती है । प्रकृति के विरुद्ध आचरण के फलस्वरूप जब व्यक्ति के शरीर में विजातीय द्रव्यों की मात्रा बढ़ जाती है तब आंतरिक शक्ति शरीर को स्वच्छ और निरोग बनाने के लिए तीव्र रोगों की उत्पत्ति करती है, तथा उन रोगों को नष्ट भी करती है । इस शक्ति को सभी लोग अलग-अलग नामों जैसे - शक्ति, परमात्मा, अंतरात्मा तथा कोई राम,अल्लाह आदि कहकर पुकारते है । सम्पूर्ण निरोगता के लिए यह आवश्यक है कि रोगी व्यक्ति के मन, आत्मा तथा शरीर तीनो का शुद्धिकरण किया जाये | जिस व्यक्ति का मन, आत्मा तथा शरीर तीनों निरोग होगा वही व्यक्ति निरोगी हो सकेगा। प्राकृतिक चिकित्सा के उपचार में सबसे समर्थ उपचार अपने इष्ट की स्तुति, सदाचार एवं सद्विचार है, यह सभी रोगों को रोकने का सबसे प्रभावी,सरल व सुलभ उपाय है । क्योंकि विचार शक्ति का शरीर पर विचारों के अनुसार अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है, रोगी होने पर व्यक्ति संशयग्रस्त हो जाता है जिससे भले ही वास्तविकता कुछ और ही हो परन्तु मन में रोग की भयानकता प्रगट होने लगती है | मन जब किसी विचार को स्वीकार कर लेता है तब शरीर उसी के अनुसार बनने लगता है इसीलिए निरोग होने के लिए सर्वप्रथम ईश् प्रार्थना पर जोर दिया जाता है, क्योंकि लिस क्षण मनुष्य अपने ईश के प्रति सच्चे मन से प्रार्थना करता है उस क्षण शरीर पर से नकारात्मक विचारों का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है ।

                शब्द, सदाचार, सद्विचार जैसे गुणों को शक्ति तो महत्तत्व से मिलती है परन्तु यह कारक हैं आकाश तत्व के आकाश तत्व पंचतत्वों में सबसे अधिक उपयोगी एवं प्रथम तत्व है जिस प्रकार महत्तत्व निराकार किन्तु सत्य है उसी प्रकार आकाश तत्व निराकार भी है और सत्य भी है महत्तत्व अविनाशी है उसी प्रकार आकाश तत्व का भी कभी नाश नही होता | आकाश विशुद्ध तथा निर्विकार होता है इसीलिए हमें इस तत्व से विशुद्धता एवं निर्मलता की प्राप्ति होती है | जो शक्ति हमें महत्तत्व अथवा आकाशतत्व से मिलती है वह अमोघ होती है एवं आत्मिक मानसिक तथा शारीरिक तीनों प्रकार के स्वास्थ्य को उन्नत बनाने वाली होती है |

पंचतत्वो में अन्य चार तत्व – वायु,अग्नि,जल तथा पृथ्वी को आकाश तत्व से शक्ति मिलती है अन्य चारों तत्व आकाश तत्व के साथ मिलकर शरीर में अपना कार्य करते हैं | शरीर में आकाश तत्व के विशेष स्थान सिर, कण्ठ, हृदय, उदर एवं कटिप्रदेश है | मस्तिष्क में स्थित आकाश वायु का भाग जो प्राण का मुख्य स्थान है | हृदयदेशगत तेज का भाग है जो पित्त का मुख्य स्थान है, इससे अन्य का पाचन होता है | उदर देशगत आकाश जल का भाग है इससे सब प्रकार की मल विसर्जन क्रिया सम्भव होती है | कटि देशगत आकाश पृथ्वी का भाग है यह अधिक स्थूल होता है और गन्ध का आश्रय है | इन सब में जो सर्वोच्च आश्रय है वह है मस्तिष्क में स्थित आकाश तत्व का भाग | इसी के कारण व्यक्ति में सोचने की क्षमता उत्पन्न होती है।

 सम्पूर्ण स्वास्थ्य का अर्थ 

आप- आर्क्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘हेल्थ’ के शाब्दिक अर्थ से समझ सकते हैं इसके अनुसार “शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा से पुष्ट होना- ‘हेल्थ’ है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य को ठीक बनाये रहने में अनेकों कारण गिनाये जा सकते हैं पर सबसे प्रमुख कारण है- व्यक्ति की मानसिक स्थिति । प्रसन्नचित्त, उत्साही एवं आशावादी लोग अनेक बाधाओं के होते हुए भी निरोग बने रहते हैं। मनोबल के कारण ऐसे व्यक्तियों के नाड़ी संस्थान में एक प्रचण्ड विद्युत प्रवाह का संचार होता रहता है जो शरीर के प्रत्येक अंग को रोगों से लड़ने की सामर्थ्य प्रदान करता रहता है |
        कोई भी शारीरिक रोग प्रकट होने पर व्यक्ति के मन में भी विचारों द्वारा निर्मित अनेक काल्पनिक  रोग उत्पन्न होते रहते है | इनका उतना ही भयंकर प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है जितना कि क्षय,कैंसर जैसे घातक रोगों का ।

       मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सा शास्त्रियों का कहना है वास्तव में रोगियों में ऐसे व्यक्तियों संख्या बहुत कम होती हैं, जो वास्तव में किसी रोग से पीड़ित हों । अधिकांश ऐसे व्यक्ति होते हैं जो किसी न किसी काल्पनिक रोग के शिकार होते हैं । सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति में विचारों का अत्यधिक महत्व है । जो व्यक्ति स्वयं के प्रति रोगी, शक्तिहीन और असमर्थ होने का भाव रखते हैं और सोचते रहते हैं कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, उनको कोई रोग नहीं भी होता है तो भी इन नकारात्मक विचारों के फलस्वरूप कोई न कोई रोग उत्पन्न हो जाता है और वे वास्तव में रोगी बन जाते । इसके विपरीत जो स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक विचार रखते हैं, वे रोगी होने पर भी शीघ्र स्वस्थ्य हो जाते हैं।  औषधियों तथा तरह- तरह की जड़ी- बूटियों का उपयोग कोई स्थाई लाभ नहीं करता, उनसे रोग के बाह्य लक्षण दब भर जाते हैं, रोग का मूल कारण नष्ट नहीं होता । सच बात तो यह है कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य की  प्राप्ति का प्रभावशाली उपाय आन्तरिक स्थिति का अनुकूल प्रयोग ही है । व्यक्ति की  जीवनी शक्ति उसकी मनोदशाओं के अनुसार बढ़ती- घटती रहती है । यह शक्ति आरोग्य का आधार है, यदि रोगी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाय कि उसे अपने रोग के विषय में नकारात्मक सोचने का मौका ही न मिले, वह अधिक से अधिक प्रसन्न तथा उल्लसित रहने लगे, तो उसकी जीवनी- शक्ति बढ़ जाती फलस्वरूप रोग निवारण प्रारंभ हो जाता है ।

       शरीर पर मस्तिष्क का पूर्ण नियंत्रण होता है एनेस्थीसिया देकर जब मस्तिष्क को संज्ञा शून्य कर दिया जाता है तब शरीर में आंतरिक अवयवों के सक्रिय रहते हुए भी शरीर मुर्दे की तरह हो जाता है | इसी तरह से पागल,नशेड़ी,मानसिक विकारों से ग्रस्त व्यक्तियों को भी देखा जा सकता है, इन सब का शरीर ठीक- ठाक होते हुए भी सिर्फ मस्तिष्क के असंतुलित होने के कारण ही तो उपहास या दया के पात्र बनना पड़ता हैं | इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही शरीर में श्वसन,रक्तसंचरण,पाचन,आत्मसातीकरण,उत्सर्जन  आदि क्रियायों का महत्व है परन्तु सर्वाधिक महत्व मस्तिष्क की चेतना प्रवाह क्रिया का ही है।

आरोग्यता के लिए मनःशक्ति का प्रयोग :

मन जो विचार करता है ,बुद्धि उसे प्राप्त करने के उपाय तलाशने लग जाती है | विचारों के एक स्थान पर केन्द्रित होते रहने पर उनकी सूक्ष्म चेतनशक्ति घनीभूत होती जाती है जिससे एक प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता है । परिणामस्वरूप विचार के अनुसार ही परिस्थितियां बनने लगती हैं | यह स्थिति मात्र शरीर तक ही सीमित नही है –अन्य क्षेत्रों में भी चाहे वह हमारा आर्थिक क्षेत्र हो सामाजिक या अन्य कोई क्षेत्र , सबमें यही सिद्धांत लागू होता है | मन जैसा विचारता है वैसी ही प्रतिक्रिया वातावरण में होती है। यह स्थिति एक प्रकार से कुएं की प्रतिध्वनि की तरह है कि कुएं में जैसी ध्वनि की, ठीक वैसी ही प्रतिध्वनि वापस आ गयी | बल्कि ध्वनि से भी तेज प्रतिध्वनि बन गयी | मनुष्य जैसा सोचता है उसके आसपास वैसी ही परिस्थितियां बनने लगती हैं । विचार शक्ति अपने समानधर्मी विचारों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। एक ही प्रकार के विचारों के घनीभूत होने पर विचार के अनुसार ही क्रिया प्रारंभ हो जाती है,फलस्वरूप  वैसे ही स्थूल परिणाम प्राप्त  हो जाते हैं । भय, चिन्ता और निराशा में डूबे रहने वाले मनुष्य के सामने ठीक वैसी ही परिस्थितियाँ आ जाती हैं जैसी कि वे सोचते रहते हैं । व्यक्ति जिस प्रकार के विचारों को प्रश्रय देता है उसके अनुसार ही उसका रहन-सहन,मुद्रा आदि बन जाते हैं | यदि स्वास्थ्य की कामना करने वाला व्यक्ति इस प्रकार विचार करे कि - मेरा रोग साधारण है, मेरा उपचार उपयुक्त व पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन-प्रतिदिन  मेरा रोग घटता जा रहा है एवं मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव कर रहा हूँ । मेरे आरोग्यता प्राप्ति में अब अधिक समय नही लगेगा। जब इस प्रकार के विचार बार-बार किये जायेंगे तो विचारों के अणु घनीभूत होकर सम्पूर्ण स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त करने लग जायेंगे |

विचारों का शरीर पर प्रभाव :

व्यक्ति जिस प्रकार के विचारों में रहता है उसके चेहरे पर उनका प्रतिबिम्ब स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है | विचारों का यह प्रभाव चेहरे या बाह्य अंगो तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि आंतरिक अवयवों जैसे -पाचन, रक्त संचार एवं वायु प्रवाह उत्पन्न करने वाले अंगों पर भी पड़ता है । आमाशय, आँत, फुफ्फुस, हृदय, यकृत, वृक्क, मूत्राशय, मस्तिष्क, नेत्र, कान, शिश्न, जिह्वा जैसे भीतरी अंगों पर भी उनका असर होता है और उनकी कार्य प्रणाली एवं गतिविधि में मन्दता, तीव्रता, अव्यवस्था तथा व्यतिक्रम आदि पर प्रभाव विचारों के अनुसार ही परिलक्षित  होने लगता है |

 नकारात्मक एवं कुविचारों का प्रभाव शरीर पर अत्यंत घातक रूप में पड़ता है । इनके प्रभाव से शरीर में ऐसी शिथिलता एवं विकृति उत्पन्न हो जाती है कि पाचन रक्त संचार आदि प्रक्रिया में गतिरोध उत्पन्न होने से रोग लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं | यदि यही प्रक्रिया लगातार चलती रहे तो स्वस्थ्य व्यक्ति भी  रोगी हो जाता है । मनःस्थिति अथवा विचारों का शरीर पर कैसा होता है यह इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है - एक माता को एक दिन किसी बात पर बहुत क्रोध हो आ रहा था,स्थिति यह थी कि क्रोध में उसके मुंह से झाग निकल रहा था | आवेश में उसका पूरा शरीर कांप रहा था। उसी आवेश की अवस्था में अपने बच्चे को स्तनपान कराया और एक घण्टे के भीतर ही बच्चे की हालत खराब हो गई एवं अंततः उसकी मृत्यु हो गई। शव परीक्षा के परिणाम से विदित हुआ कि मानसिक क्षोभ के कारण माता का रक्त तीक्ष्ण परमाणुओं से विषैला हो गया और उसके प्रभाव से उसका दूध भी विषाक्त हो गया था, जिसे पी लेने से बच्चे की मृत्यु हो गई।


          मन:स्थिति के सदर्भ में रायल मेडिकल सोसायटी के चिकित्साविज्ञानी डा. ग्लॉस्टन का कहना है कि “शारीरिक रोग उत्पन्न होने से लेकर निरोग होने अथवा कष्टसाध्य बनने में मानसिक स्थिति की बहुत बड़ी भूमिका होती है। मन को सशक्त एवं सकारात्मक बनाकर कठिन से कठिन रोगों पर विजय पाई जा सकती है । विकृत मन:स्थिति मनुष्य को राक्षस या जिंदा लाश बनाकर छोड़ देती है। यह सब हमारी इच्छा-आकांक्षा एवं विचारणा पर निर्भर करता है कि हम स्वास्थ्य-समुन्नत बनें अथवा रूग्ण एवं हेय । रोगोत्पत्ति या रोगों के उतार-चढ़ाव में जितना गहरा संबंध शारीरिक कारणों अथवा परिस्थितियों का माना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा प्रभाव मनोदशा का पड़ता है। यदि व्यक्ति मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ हो तो फिर रोगों की संभावना बहुत ही कम रह जाती है। आक्रमण करने पर भी रोग बहुत समय तक ठहर नहीं सकेंगे। मन की प्रगति या अवगति ही रूग्णता या निरोगता का मूल है। इस तथ्य को समझना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।“

सकारात्मक भोजन से आरोग्य प्राप्ति :

सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु अपने रोग के प्रति सकारात्मकता तो आवश्यक है ही इसके अतिरिक्त हमारा भोजन जिसे प्राकृतिक चिकित्सा में औषधि की संज्ञा दी गयी है का निर्माण से लेकर एवं ग्रहण करने तक जो मनोभाव रहने चाहिए वे समझना आवश्यक है |
जो भोजन ग्रहण करते हैं,  उसके द्वारा  शरीर का पोषण और नव निर्माण ही नहीं होता, अपितु  भोजन करते समय व्यक्ति की जो मन:स्थिति होती है एवं जिन संस्कारों या वातावरण में भोजन ग्रहण किया जाता हैं,  वे मनोभाव, विचार एवं भावनाएं भी अलक्षित रूप में भोजन और जल के साथ शरीर  ग्रहण कर लेता हैं | भोजन कितना भी प्राकृतिक क्यों न हो यदि उसको बनाते समय रसोइया की मनःस्थिति एवं भोजन करते समय ग्राही की मनःस्थिति सात्विक व सकारात्मक नही है तो वह प्राकृतिक भोजन भी शरीर में विष का कार्य करता है | इसलिए सम्पूर्ण स्वास्थ्य पाने के लिए भोजन के सन्दर्भ में इन बिन्दुओं को धयान रखना आवश्यक है –

भोजन बनाने वाले का व्यक्तित्व


  • भोजन को बनाते समय रसोईये की प्रवृत्ति,मनःस्थिति एवं शारीरिक स्थिति का अच्छा या बुरा प्रभाव भोजन पर पड़ता है | अतृप्त, भूखा, लालची, क्रोधी, हिंसावृत्ति युक्त, गंदा रसोइया अपने सम्पर्क से ही भोजन को दूषित कर देता है। एक तो वह शरीर या वस्त्रों से स्वच्छ नहीं होता दूसरे उसकी उपर्युक्त मन:स्थिति भोजन को दूषित कर देती है । यह  भोजन  विष के समान हो जाता है । बाजार में भी बिकने वाले  भोजन, मिठाइयां, नमकीन, दूध इत्यादि असंख्य अतृप्त भूखे व्यक्तियों की लुब्ध दृष्टियां पड़कर उन्हें दूषित बना देती हैं। अत: वे ऐसे विचार अणुओं से इतना अधिक दूषित हो जाते हैं कि शरीर के लिए अस्वास्थ्यकर हो जाते हैं | अतः सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को ऐसे खाद्यों से बचना ही हितकर है |इस तथ्य का हमेशा ध्यान रखें कि भोजन बनाने वाले की वृत्ति सात्विक हो , वह रोगी न हो, भूखा न हो | वह प्रेमपूर्ण भाव से भोजन तैयार करने वाला हो |

  • भोजन ग्रहण करते समय मन:स्थिति की आन्तरिक स्वच्छता आवश्यक है,अर्थात भोजन के समय जैसे बाह्य स्वच्छ्ता आवश्यक है उसी प्रकार हमारे विचारों की सात्विकता भी आवश्यक है। जैसे अच्छे –बुरे विचार होंगे वैसा ही प्रभाव भोजन पर पड़ेगा फलस्वरूप भोजन से मिलने वाले पोषण में भी विचारों के अनुरूप अधिकता या न्यूनता आ जाएगी |  यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उत्तम से उत्तम भोजन दूषित मन:स्थिति से विकारयुक्त अथवा विषमय हो जाता है। 
  • चिन्ता, आवेश, क्रोध, जल्दबाज़ी, चिड़चिड़ापन, आदि उद्वेगों की स्थिति में किया गया भोजन विषैला हो जाता है। यह शरीर को पोषित करने के स्थान पर हानि पहुंचाता और पाचन-क्रिया को विकारमय कर देता है। 
  • क्रोध की स्थिति में किये गए भोजन का ढंग से पाचन नही हो पाता |
  • चिंतित मन:स्थिति में किया गया भोजन आमाशय में अल्सर जैसा घातक रोग उत्पन्न कर सकता है । 

इसके विपरीत आनंद एवं सकारात्मक विचारों के साथ किया गया भोजन स्वास्थ्य पर जादू-जैसा गुणकारी प्रभाव डालता है। अन्त:करण की शान्त-सुखद वृत्ति में किये हुए भोजन के साथ-साथ हम प्रसन्नता, सुख-शान्ति और उत्साह की स्वस्थ भावनाएं भी ग्रहण करते हैं फलस्वरूप इसका स्वास्थ्यप्रद प्रभाव शरीर पर पड़ता है। अतः
    भोजन स्वच्छ स्थान पर शान्तिपूर्वक प्रसन्न मुद्रा से ग्रहण करें । जो कुछ रूखा-सूखा प्राप्त हुआ है, उसे भगवान् का प्रसाद मानकर ग्रहण करें । भोजन जब सामने आये, तब नेत्र बंदकर ईश्वर का चिन्तन करते हुए करें | पुनः स्मरण रखें - मन में जैसी विचारधाराएं उठती हैं शरीर उनका उसी के अनुरूप प्रभाव पड़ता है।

विचार के विषय में महापुरुषों का चिंतन :

स्वामी रामतीर्थ जी के अनुसार - 
‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही उसका जीवन बनता है |"

 स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार -
 ‘‘स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, इनका निवास हमारे विचारों में ही है।"

 भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था- 
‘‘भिक्षुओ! वर्तमान में हम जो कुछ हैं अपने विचारों के ही कारण और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह भी अपने विचारों के कारण।"

 शेक्सपीयर ने लिखा है- 
‘‘कोई वस्तु अच्छी या बुरी नहीं है। अच्छाई- बुराई का आधार हमारे विचार ही हैं।"

 ईसामसीह ने कहा था- 
‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वह बन जाता है।"

 प्रसिद्ध रोमन दार्शनिक मार्क्स आरीलियस ने कहा है- 
‘‘हमारा जीवन जो कुछ भी है, हमारे अपने ही विचारों के फलस्वरूप है।"

 प्रसिद्ध अमरीकी लेखक डेल कार्नेगी ने अपने अनुभवों पर आधारित तथ्य प्रकट करते हुए लिखा है- ‘‘जीवन में मैंने सबसे महत्त्वपूर्ण कोई बात सीखी है तो वह है विचारों की अपूर्व शक्ति और महत्ता, विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है।"


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Wednesday, January 25

विभिन्न अंगों में कैसर के लक्षण एवं योग उपचार :







By- Dr.Kailash Dwivedi

जीभ और मुँह :
  • ठीक न होने वाला अलसर या धब्बा या रसौली बाद में जबड़े के नीचे या गर्दन की लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना |
स्वर यंत्र :
  • आवाज़ का फट जाना, गर्दन में लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना, खास तरह के शीशे से जांच करना ज़रूरी
श्वसनी : 
  • खाना निगलने में मुश्किल होना, गले में वृद्धि होना और गर्दन में लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना
फेफड़े :
  • चिरकारी खॉंसी व बलगम में खून आना। छाती की एक्स रे फिल्म में व्याधि विकास दिख जाता है
ग्रासनली :
  • खाना निगलने में मुश्किल होना और ऐसा लगना कि खाना छाती में अटक गया है
अमाशय :
  • भूख न लगना, घंटों घंटों तक पेट भरा भरा सा लगता रहना, कभी कभी उल्टी आना, पेट के ऊपरी हिस्से में गांठ या रसौली महसूस हो सकती है, उल्टी में खून आ सकता है
आंतें और मलाशय :
  • मल में खून आना, मलत्याग की आदतों में बदलाव होना
स्तन :
  • स्तन में सख्त सी गांठ होना, त्वचा में ठीक न होने वाला अल्सर या वृद्धि, बगलों में लसिका ग्रंथियों में सूजन
गर्भाशय :
  • रक्तस्त्राव जो कि माहवारी से या गर्भावस्था से जुड़ा हुआ न हो, गर्भाशय ग्रीवा पर कोई असामान्य वृद्धि महसूस होना, पेट के निचले हिस्से में कोई वृद्धि महसूस होना
खून :
  • रक्तस्त्राव की प्रवृति, लिवर या तिल्ली का बढ़ जाना, बार बार संक्रमण होना
डिंबवाही ग्रंथियॉं :
  • पेट के निचले हिस्से में गांठ होना
वृषण :
  • वृषण या वृषण कोश में सूजन
शिश्न :
शिश्न की त्वचा पर मस्से जैसी या अनियमित वृद्धि और बीच बीच में खून निकलना
मूत्राशय :
  • बीच बीच में पेशाबद्वारा खून निकलना
पुरस्थ ग्रंथी :
  • पेशाब करने में परेशानी, थोड़ी थोड़ी पेशाब निकलते रहना, पेशाब में पीप, पुरस्थ और मलाशय में सख्त वृद्धि होना
लिवर/ जिगर :
  • बढ़ा हुआ लिवर, पीलिया या सफेद मल
हड्डियॉं :
  • हड्डियों से जुड़ी हुई सख्त वृद्धि, जल्दी जल्दी बढ़ती जाती है पर दर्द रहित होती है
लसिका ग्रंथियॉं :
  • कई जगहों में लसिका ग्रंथियों में सूजन, रबर जैसी हो जाना, बुखार और वजन घटना


यदि प्रारंभिक अवस्था में किसी भी प्रकार के कैंसर का पता चलता है ‍तो यह करें -

  • तीन से चार बारअनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए | 
  • रात्रि में भी सोने से पूर्व पांच मिनट अनुलोम-विलोम का अभ्यास करें तत्पश्चात प्रतिदिन क्रमश: कपालभाती, भस्त्रिका, नाड़ी शोधन प्राणायाम और पांच मिनट के ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बना लें।
इसके अतिरिक्त :
  • स्वच्छ हवा में रहें 
  • पर्याप्त मात्रा में जल का सेवन करें 
  • प्राकृतिक आहार लें
  • जितनी भूख हो उससे कम खाएं
  • प्रातः खाली पेट 7 तुलसी पत्र + 4 नीम की कोमल पत्तियों के रस को 50 मिली. गेहूं के ज्वारा या एलोवेरा के साथ लें | (पत्तियों को चबाकर भी खा सकते हैं) इनका योग कीमोथेरेपी जैसा ही असर करेगा ।


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Monday, January 16

दर्द से पीड़ित महिला के पेट से जो निकला, उसे देखकर डॉक्टर्स भी हैरान रह गये




By- Dr. Kailash Dwivedi

चिकित्सकों के अनुसार बिना धुले फल / साब्जियों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के वैक्टीरिया हमारे शरीर के अंदर चले जाते हैं। जिससे हमारे शरीर को काफी नुकसान हो सकता है। बिना धोए हुए फल / सब्जियां का प्रयोग करने से कितना बड़ा खतरा हो सकता है इसका एक ताज़ा उदहारण उत्तर प्रदेश के जनपद चंदौली में देखने को मिला है, जिसमें महिला को पेट दर्द की समस्या थी। लेकिन बाद में जो निकला वो हैरान करने वाला था।
चिकित्सकों ने महीनों से दर्द से जूझ रही महिला के पेट से जो निकाला उससे महिला के साथ-साथ डॉक्टर्स भी हैरान थे। कि ऐसा कैसे हो सकता है।

मुगलसराय जिले की नई बस्ती निवासी दिलशाद अहमद की पत्नी नेहा बेगम के पेट में अचानक दर्द उठा। इसके बाद परिजनों ने तत्काल नेहा को के.जी. नंदा अस्पताल में भर्ती कराया, जहां चिकित्सकों ने महिला के पेट का अल्ट्रासाउंड कराया तो पता चला कि उसकी आंत में सैकड़ों केंचुए फंसे हैं। दो दिन बाद शनिवार को चिकित्सकों ने चार घंटे तक चले आपरेशन में कुल 150 केंचुए महिला के पेट से बाहर निकाले। महिला अब स्वस्थ है, जल्द ही उसे अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी।

हैरानी की बात तो यह है, हर कीड़े की लंबाई 10 इंच थी। जो कि महिला के पेट को चारों तरफ से जकड़े हुए थे। महिला का इलाज करने वाले वरिष्ठ डॉक्टर आनंद तिवारी ने बताया कि आमौतर पर किसी के शरीर में 3-4 कीड़े ही हो सकते है। चिकित्सक ने कहा कि ऐसा साग-सब्जी में केंचुए के अंडे होने की वजह से हो सकता है। इसलिए खाने में साग-सब्जी का इस्तेमाल हमेशा अच्छी तरह धोकर ही करें। 
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हकलाने (STAMMERING) की घरेलू चिकित्सा







By- Dr. Kailash Dwivedi

प्राकृतिक उपचार :
सूर्य की तरफ पीठ करके एक आइना पकड़कर और मुँह खोलकर ऐसी स्थिति में बैठें ताकि सूर्य की रोशनी आईने से प्रतिम्बिबित होकर आपके खुले मुँह में प्रवेश करे। गहरी साँस लें और धीरे धीरे अपना मुँह खोलें, और आईने को अपनी जीभ पर प्रतिम्बिबित करें। जीभ आपके मुँह के निचले भाग की तरफ होनी चाहिए अगर आपने सही तरह से निर्देशों का पालन किया है। अपनी जीभ को ढीला छोड़ दें, उसे कभी भी कड़ा न करें, क्योंकि ऐसा करने से हकलाहट बनी रहेगी। स्पष्ट रूप से ‘क्या हो’ शब्द का बार बार उच्चारण करें। आपकी जीभ को सुचारू रूप से कार्यशील करने के लिए यह एक उत्तम उपाय माना जाता है।

घरेलू उपचार :

  • नियमित रूप से एक आँवले का सेवन करने से हकलाहट कम होती है । सुबह सवेरे एक चम्मच सूखे आँवले का पाउडर और एक चम्मच देसी घी का सेवन करने से भी हकलाहट में लाभ मिलता है।
  • सोने से पहले छुआरों का सेवन करें पर कम से कम 2 घंटों तक पानी न पीयें। इससे आवाज़ भी साफ़ हो जायेगी और हकलाहट भी दूर हो जायेगी।
  • 12 बादाम पूरी रात पानी में सोख कर रखें, और सुबह उनके छिलके उतार कर पीस लें, और उन्हें 30 ग्राम मक्खन के साथ सेवन करने से भी हकलाहट में लाभ मिलता है।
  • हकलाहट दूर करने के लिए 10 बादाम और 10 काली मिर्च मिश्री के साथ पीस कर दस दिन तक सेवन करें।
  • गुनगुने ब्राह्मी तेल से सिर पर 30 से 40 मिनट तक मालिश करें। उसके बाद गुनगुने पानी से नहा लें। इससे स्मरण शक्ति में सुधार होता है और अटककर और हकला कर बोलने का दोष मिट जाता है ।
  • योग में खेचरी मुद्रा करने से भी हकलाहट में लाभ होता है (इस मुद्रा को करने के लिए अपनी जिव्हा को मोडकर तालू में लगायें, कुछ समय तक इसी स्थिति में रहें | दिन में कई बार इसे करें |
  • दिन में तीन-चार बार 10 बार गहरी श्वास भरें और छोड़ें |
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Thursday, January 12

कद्दू है गुणों की खान जिन्हें पढ़कर आप भी आश्चर्यचकित रह जायेंगे !




By- Dr. Kailash Dwivedi


कद्दू में प्रचुर मात्रा में विटामिन ए, सी, ई, एवं एंटी ऑक्सीडेंट, कैरोटिन व अनेकों खनिजों का स्रोत है | इस लेख में जानते हैं कद्दू के स्वास्थ्य लाभ |


नेत्र ज्योति बढाए :

राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार कद्दू में पाया जाने वाला विटामिन ए नेत्र ज्योति बढाने में अत्यंत मददगार होता है | अनुसन्धान से पता चला है कि कद्दू का प्रयोग कम रौशनी में भी देखने में सक्षमता  प्रदान करता है |  शोध में यह भी पता चला है कि कद्दू अंधापन रोकने में भी प्रभावी होता है |

त्वचा को तंदरुस्त रखे :

कद्दू स्वस्थ त्वचा को मेंटेन करने में बेहद प्रभावी होता है | विटामिन ए एक शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट के रूप में त्वचा की खूबसूरती बनाए रखता है | इसमें मौजूद बीटा कैरोटिन त्वचा पर सूर्य की रोशनी से होने वाले दुष्प्रभावों से बचाता है एवं अल्फ़ा कैरोटिन त्वचा पर पड़ने वाली झुर्रियों से बचाता है | अन्य विटामिन जैसे विटामिन – सी एवं ई त्वचा के गोरेपन एवं चमक को बढाता है |

रोग प्रतिरोधी शक्ति बढ़ाता है कद्दू :

चूँकि कद्दू में अनेकों महत्वपूर्ण एंटी ऑक्सीडेंटस, विटामिन ए, सी एवं ई  के साथ-साथ आवश्यक खनिज जैसे- आयरन, मैग्नीशियम आदि का अच्छा स्रोत है इसीलिए यह शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है | इसमें प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला विटामिन ए  शरीर के उतकों को रोग जनकों से बचाता है तथा बीटा कैरोटिन शरीर के इम्यून सिस्टम को सक्रिय करता है |

वजन कम करने में सहायक है कद्दू :

कद्दू प्राकृतिक रूप से पोटैशियम एवं फाइबर से भरपूर तथा लो कैलोरी खाद्य है | इसमें पाया जाने वाला फाइबर भूख को कम करता है एवं पोटैशियम अतिरिक्त जल व नमक की मात्रा को शरीर से बाहर निकालता है | यह दोनों प्रक्रियाएं शरीर का वजन कम करने में अत्यंत सहायक हैं |

दाह शामक :

कद्दू का नारंगी रंग इसमें पाए जाने वाले कैरोटीन ओइड्स की वजह से होता है | यह एक एंटी इंफ्लेमेटरी एजेंट है जोकि शरीर से इंफ्लेमेशन कम करता है |

कैंसर रोधी :

ताज़े शोध के अनुसार कद्दू में प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाल  विटामिन ए  फेफड़ों एवं मुख कैंसर के खतरे को कम करता है | यह अल्झाइमर की समस्या से निजात दिलाने में भी सहायक होता है |

पाचन शक्ति बढाए :

कद्दू में प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला फाइबर पाचन एवं भोजन के अवशोषण में अत्यंत सहायक है | यह कब्ज एवं डायरिया जैसे रोगों से बचाता है | कद्दू का सेवन एसिडिटी तथा आंत के कीड़ों को भी दूर करने में सहायक है |

प्रजनन क्षमता में वृद्धि करता है कद्दू :

कद्दू के सेवन से प्रजनन क्षमता में वृद्धि होती है | यह स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी है | कद्दू पाया जाने वाला विटमिन बी काम्प्लेक्स एवं एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन ई इसमें बहुत सहायक होता है | कद्दू का प्रयोग करने से पुरुषों में वीर्य की वृद्धि होती है  | कद्दू के बीज ओमेगा -3 का अच्छा स्रोत हैं |

उच्च रक्तचाप नियंत्रित करे :

कद्दू पोटैशियम एवं विटामिन सी का अच्छा स्रोत है जोकि उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है | कद्दू के बीज में प्रचुर मात्रा में Phyto एस्ट्रोजन होता है जो तनाव को दूर कर उच्च रक्तचाप घटाता है |

अच्छी नींद लाए :

कद्दू के बीजों में पाया जाने वाला ट्रिपटोफान शरीर में सेरोटोनिन का निर्माण करता है | इससे व्यक्ति तनावमुक्त होकर अच्छी नींद आती है |

ह्रदय को स्वस्थ रखता है कद्दू :

कद्दू ह्रदय के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है | यह ह्रदय के फंक्शन के साथ-साथ फेफड़ों और गुर्दों की क्रियाशीलता को भी बढ़ाता है | कद्दू कोलेस्ट्रोल के स्तर को नियंत्रित कर हार्ट अटैक से भी बचाता है |

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Wednesday, January 11

जानिए, 24 घंटे में मूत्र त्याग की सामान्य स्थिति क्या होनी चाहिए



                     By-Dr. Kailash Dwivedi

हमारे शरीर में अन्य तत्वों की तुलना में जल की मात्रा सबसे अधिक है | हमारे द्वारा पिया गया जल शरीर में विभिन्न कार्यप्रणालियों को सक्रिय करने में सहायक होता है | सामान्यतः गुर्दों को क्रियाशील रखने के लिए प्रतिदिन 2 से 4 लीटर जल का सेवन आवश्यक होता है | इससे कम या अधिक जल का सेवन गुर्दों की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है |

 पिए गए पानी से शरीर को जितनी आवश्यकता होती है उतना वह अपने उपयोग में ले लेता है, शेष जल मूत्राशय के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है | इस जल में विभिन्न विषैले तत्व भी होते हैं, जिनकी शरीर को आवश्यकता नहीं है | अतः स्वस्थ शरीर के लिए नियमित रूप से मूत्र त्याग करना आवश्यक है | आईये जाने कि एक स्वस्थ व्यक्ति के मूत्र का रंग क्या होना चाहिए एवं 24 घंटे में मूत्र की सामान्य आवृत्ति कितनी होनी चाहिए -


  • मूत्र त्याग करते समय किसी प्रकार का दर्द या जलन न होना अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है |
  • मूत्र का रंग हल्का सुनहरा (Beer Colour) होना चाहिए |
  • स्त्रियों में मूत्र त्याग की सामान्य आवृत्ति 24 घंटों में 5 से 6 बार तक होनी चाहिए |
  • पुरुषों में मूत्र त्याग की सामान्य आवृत्ति 24 घंटों में 4 से 5 बार तक होनी चाहिए |
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Friday, January 6

इस समय करेंगे भोजन तो नहीं होगा कोई रोग !

By- Dr.Kailash Dwivedi

हम सभी जानते हैं कि एक दिन में 24 घंटे होते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन 24 घंटों को किस प्रकार व्यवस्थित किया जाए कि प्रकृति के अनुरूप हमारी दिनचर्या व्यवस्थित व स्वास्थ्यकर हो जाए | इस लेख में हम आपको बता रहे हैं कि आपको स्वास्थ्य की दृष्टि से चौबीस घंटे में कब सोना है, कब भोजन करना है एवं अन्य दैनिक कार्य करने हैं | इसके लिए सबसे पहले यह समझना होगा कि शरीर की कौन सी जैव उर्जा किस समय शरीर को प्रभावित करती है | तीन प्रमुख उर्जा जिसे आयुर्वेद वात, पित्त एवं कफ़ के रूप में परिभाषित करता है, के अनुसार दिन के चौबीस घंटों का विभाजन किया जा सकता है |


वात : शरीर की प्रत्येक प्रकार की  चेष्टाओं एवं गतियों का संचालक होता है | रात्रि 12 बजे से प्रातः 8 बजे तक शरीर में वात सक्रिय रहता है |

पित्त : शरीर में होने वाली विभिन्न रासायनिक क्रियायों में पित्त की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | दिन के 24 घंटों में प्रातः 8 बजे से अपराह्न् 4 बजे तक पित्त का समय माना गया है |

कफ़ : शरीर में स्थिरता का प्रतीक माना गया है | पूरे दिन सक्रियता के बाद विश्राम के लिए आवश्यक तन्द्रा हमें कफ़ से मिलती है | शरीर में कफ़ का समय अपराह्न् 4 बजे से रात्रि 12 बजे तक होता है |

प्रातः का भोजन 10 बजे से :

जैव घड़ी के अनुसार शरीर में पित्त का समय प्रातः 8 बजे से प्रारंभ होता है | प्रातः 8  बजे से अपराह्न् 4 बजे तक के पित्त के समय का उपविभाजन करने पर प्रातः 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक का समय |  पित्त पाचन के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार होता है,  अतः प्रातः 10 बजे से प्रातःकालीन भोजन का समय निर्धारित किया जा सकता है |

सायंकालीन भोजन सायं 6 से 8 बजे तक :

अपराह्न् 4 बजे से रात्रि 12 बजे तक का समय शरीर में कफ़ का समय होता है इसका उपविभाजन करने पर सायं 6 बजे से 8 बजे तक का समय कफ़-पित्त का समय है | अर्थात इस समय कफ़ के साथ पित्त का भी संयोग है अतः भोजन के पाचन के लिए यह समय उपयुक्त है |

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Tuesday, January 3

जानिए - जैविक घड़ी के अनुसार आपकी दिनचर्या क्या हो !




  • प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से फेफड़ो में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहनेवालो का जीवन निस्तेज हो जाता है ।
  • प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
  • प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार ) घूँट-घूँट पिये।
  • प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है। दोपहर 12 बजे के आसपास मध्याह्न संध्या (आराम ) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसीलिए भोजन वर्जित है । इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।
  • दोपहर 1 से 3 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है |
  • दोपहर 3 से 5 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।
  • शाम 5 से 7 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।
  • रात्रि 7 से 9 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।
  • रात्रि 9 से 11 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।
  • रात्रि 11 से 1 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।
  • रात्रि 1 से 3 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।



शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को लाइट  बंद करके सोयें। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और लाइट  चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। 
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अच्छे स्वास्थ्य के लिए विश्राम को न भूलें :








विश्राम शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है विश्राम के बिना कोई व्यक्ति लम्बे समय तक कार्य नहीं कर सकता। थकान दूर करने व मन की शांति के लिए विश्राम आवश्यक है। पूर्ण विश्राम न ले पाने के कारण मानसिक व शारीरिक कार्य करने की क्षमता कम होने लगती है। इसके अतिरिक्त थकावट, मानसिक परेशानी, बेचैनी और घबराहट उत्पन्न होने लगती है।

विश्राम न करने के दुष्परिणाम :


  • विश्राम न करने से शरीर में विभिन्न रोग उत्पन्न होने लगते है जैसे- पेट के रोग, हृदय रोग तथा अन्य आंतरिक गड़बड़ियां।
  • विश्राम के अभाव में सिर दर्द, सिर में भारीपन, एकाग्रता की कमी जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
  • विश्राम न करने के फलस्वरूप चेहरे की सुन्दरता नष्ट होने लगती है, त्वचा पर काले धब्बे पड़ने लगते हैं, इससे शरीर जल्दी थक जाता है,एवं क्रोध,चिड़चिड़ापन आलस्य जैसे लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं।

विश्राम को दिनचर्या में इस प्रकार शामिल करें :


  1. देर रात तक कार्य न करें, हर हालत में रात्रि 11 बजे तक सो जाएँ |
  2. अच्छी नींद के लिए सोने से 2 घंटे पहले भोजन कर लें |
  3. हमेशा शाकाहारी एवं संतुलित भोजन करें |
  4. नशीले पदार्थ जैसे – शराब,तम्बाखू,गुटखा,सिगरेट,चाय,काफी,का सेवन न करें |
  5. सोने से पहले हिंसक या उत्तेजक फिल्में आदि न देखें ।
  6. विश्राम में शारीरिक अवस्था का विशेष महत्व है, शरीर को स्वच्छ रखें। दिन में कम से कम एक बार ताज़े पानी से अवश्य नहाए। सोने से पहले हाथ-पैरों को स्वच्छ पानी से धोकर ही बिस्तर पर जाएं तथा सोने से पूर्व ईश्वर का ध्यान अवश्य करें।
  7. सोने से पूर्व अपने दिन भर की सभी मानसिक परेशानियों को भूल जाएं।
  8. सोने से 10 से 15 मिनट पहले बिस्तर पर बैठकर अपने कल करने वाले कार्यों को एक कागज पर लिख लें और फिर उसे बार-बार पढ़ें। साथ ही कल किये जाने वाले कार्यों की योजना अपने मन में बनाएं।
  9. विश्राम के लिए अपने प्रत्येक कार्य का समय निश्चित करें, जैसे – निश्चित समय पर सोना और उठना, निश्चित समय पर भोजन करना इत्यादि |
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इन खाद्यों से हो सकता है माईग्रेन अटैक



माईग्रेन एक प्रकार की बीमारी होती है जिससे सिर में भयानक दर्द होता है और मरीज को बहुत ही असहजता महसूस होती है। कई प्रकार के फूड के सेवन से भी माईग्रेन की समस्‍या हो सकती है।
कई बार हारमोन्‍स के प्रभाव, तनाव, साईकोलॉजी फैक्‍टर और कुछ प्रकार की दवाईयों का सेवन करने से भी माईग्रेन की समस्‍या हो सकती है। साथ ही बेकार लाइफ स्‍टाइल भी इस बीमारी की वजह बन सकता है। जो लोग देर तक भूखे रहते हैं उन्‍हें भी यह समस्‍या हो सकती है।

सोडियम नाईट्रेड :


यह उन खाद्य पदार्थो में पड़ा होता है जिन्‍हें प्रीजर्व किया जाता है जैसे कि हॉट डॉग, बेकन या मीट आदि। इससे सेवन से माईग्रेन का अटैक आ सकता है। साथ ही प्रीर्जेवेटिव, बेनजोइक भी माईग्रेन का कारण बन सकता है। इसलिए कोशिश करें कि आप इनका सेवन न करें।

एमएसजी, मोनोसोडियम ग्‍लूटामेट :


यह एक प्रकार का फ्लेवर इन्‍हेंसर होता है जिसे कई फूड में इस्‍तेमाल किया जाता है। इसकी वजह से कई बार माईग्रेन अटैक पड़ सकता है। सभी प्रकार के प्रोसेस्‍ड फूड में यह पाया जाता है।

चीज़ :


यदि आपको चीज बहुत ज्‍यादा पसंद है तो आपको माईग्रेन का दर्द झेलना पड़ सकता है क्‍योंकि रखे हुए चीज़ में सैचुरेटेड टायरामाइन होता है तो कि प्रोटीन के ब्रेकडाउन होने से बन जाता है। इससे कई लोगों को माईग्रेन अटैक पड़ने की शिकायत होती है।

कैफीन :


कैफीन को सामान्‍य से ज्‍यादा मात्रा में सेवन करने पर सिरदर्द यानि माईग्रेन की समस्‍या हो सकती है। चॉकलेट में फिनाइलेथाइमाइन पाया जाता है जिससे माईग्रेन की समस्‍या हो सकती है। रेड वाइन और एस्‍पार्टमे में भी यह पाया जाता है।
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Sunday, January 1

रोने से बढ़ती है आंखों की रोशनी




जिस तरह आपकी सेहत के लिए हंसने के फायदे हैं, उसी तरह थोड़ा – बहुत रोने से न सिर्फ आपका दिल हल्का होगा बल्कि आपके स्वास्थ्य को भी फायदा मिलेगा। मनोचिकित्सकों का कहना है कि कभी कभी रो लेने से किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं पहुंचता बल्कि रो लेने से व्यक्ति तनाव रहित व हल्का फुल्का महसूस करता है। आंसू दुःख, चिंता, क्लेश तथा मानसिक तनाव को झेलने में मदद करते हैं। डाक्टरों का कहना है कि रो लेने से मानसिक तनाव में मुक्ति मिलती है इसके साथ ही हाई ब्लड प्रेशर, भगन्दर आदि रोगों से छुटकारा पाने में सहायता मिलती है। तनाव से उत्पन्न होने वाली बीमारियों की भी शिकायत नहीं रहती। रो लेने से हृदय रोग भी कम हो जाता है।रोते समय जब आँखों में आंसू आते हैं तो यह आंसू आँखों में पड़े विजातीय द्रवों को बाहर निकालने का कार्य करते हैं तथा आँखों को नम रखने और उन्हें संक्रमण से बचाने का भी कार्य करते हैं।
मेडिकल युनिवर्सिटी ऑफ ओहियो के शोधकर्ताओं ने आपके आंसुओं के फायदे अपने अध्ययन में भी पाए जिसमें उन्होंने कि रोने के बाद अधिकतर लोग हल्का और तरोताजा महसूस करते हैं। शोध में 88.8 प्रतिशत लोग रोने के बाद हल्का महसूस करते हैं और सिर्फ 8.4 प्रतिशत लोग रोने से दुखी होते हैं।

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यदि आप अपने दुख को सीने में छिपाकर रखते हैं, तो कभी-2 दिल खोलकर रोने से गुरेज न करें क्योंकि रोने से ‌न सिर्फ दिल हल्का होगा बल्कि आपकी सेहत को ये फायदे भी मिलेंगे।

रोने से बढ़ती है आंखों की रोशनी :

आंखों में आंसू आने से आंख की पुतली और पलकों को नमीं मिलती है. वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि रोने से आँखों की खूबसूरती बढती है।इन वैज्ञानिकों के मतानुसार आँखों के कार्निया की परत कंजकटाईवा को लेक्रिमल ग्रन्थि द्वारा आंसुओं को नम कर देने के कारण, आंसुओं में मिले शारिय तत्वों द्वारा सुन्दरता निखर जाती है। आंसुओं के निकलने पर हारडेरियन ग्रन्थि से एक तैलीय द्रव निकलता है, जिसकी मदद से कार्निया नम और गहरा बन जाता है। स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा अधिक आंसुओं का उत्पादन होता है इसलिए स्त्रियों की आँखें अधिक खुबसूरत होती हैं। हालांकि बहुत अधिक रोने से भी आंखों की रोशनी जाने का खतरा हो सकता है।

बैक्टीरिया नष्ट होते हैं :

आंसुओं में लिसोजाइम नामक लिक्विड होता है जो सिर्फ 5-10 मिनटों में 90-95 प्रतिशत बैक्टीरिया का सफाया कर सकता है।

शरीर से विष निकालने में सहायक :

कई शोधों में यह बात मानी गई है कि जब हम बहुत अधिक दुख या अवसाद में होते हैं तो शरीर में कुछ टॉक्सिक केमिकल्स बनने लगते हैं। आंसू के रास्ते से जहरीले तत्व शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

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मूड ठीक होता है एवं तनाव घटता है :

कई बार शरीर में मैगनीज की अधिकता से घबराहट, उलझन, थकान, गुस्सा जैसी समस्याएं होती हैं। रोने से शरीर में मैगनीज का स्तर कम होता है जिससे आपको हल्का और अच्छा महसूस होता है। बहुत अधिक तनाव में रोने से थोड़ी राहत मिलती है। रोने की प्रक्रिया के दौरान शरीर में एंडोर्फिन, ल्यूकाइन-एंकाफालिन और प्रोलैक्टिन नामक तत्वों का स्तर कम होता है जिससे तनाव कम होता है लेकिन बहुत अधिक रोने से इसके उल्टे असर भी हो सकते हैं.
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