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Thursday, December 29

स्नायु दौर्बल्य एवं अनिद्रा का अमोघ उपचार – सुसम जल स्नान



शरीर को स्वस्थ्य रखने के लिए प्राचीन काल से ही जल के आंतरिक एवं बाह्य रूप में विविध प्रयोग होते आ रहे हैं | इन प्रयोगों को समझ कर यदि वैज्ञानिक ढंग से प्रयोग किया जाये तो निश्चि त रूप से हमारा स्वास्थ्य अधिक उन्नत होगा | इस लेख में प्रस्तुत है गर्म जल स्नान के कुछ चिकित्सकीय प्रयोग, रोगनिवारण में उनकी भूमिका एवं सावधानियां |

स्नायु दौर्बल्य एवं अनिद्रा का अमोघ उपचार – सुसम जल स्नान (neutral bath):


विधि :

किसी ऐसे टब, जिसमे आराम से लेटा जा सके में हल्का गर्म पानी (लगभग 92 से 100 डिग्री फारनहाईट) भरकर लेट जाएँ | यह स्नान 92 डिग्री फारनहाईट  से प्रारंभ कर 97, 100 डिग्री फारनहाईट तक ले जाना चाहिए तथा स्नान को समाप्त करने के पहले जल के तापमान को धीरे-धीरे कम करते हुए 92 डिग्री फारनहाईट तक लाना चाहिए | तापमान कम-ज्यादा करने के लिए  लिए टब में गर्म -ठंडा जल मिला सकते हैं | इस प्रयोग  में ध्यान रखें कि सिर गर्म पानी में न डूबे | यदि सिर में गर्मी महसूस हो रही हो तो ठन्डे पानी में भिगोकर एक छोटा तौलिया माथे पर रख लें | 30 मिनट से 1 घंटा तक इस स्नान को किया जा सकता है

लाभ :

  • सुसम अथवा हलके गर्म जल से भरे टब में लेटने से रक्त प्रवाह बढ़ता है एवं शरीर का शिथिलीकरण हो जाता है फलस्वरूप अनिद्रा एवं स्नायु दौर्बल्य दूर करने में अत्यधिक लाभ मिलता है |

  • स्नायु संस्थान के रोग जैसे – हिस्टीरिया, मिर्गी, लकवा के अतिरिक्त क्षय, गुदा सम्बन्धी रोग, उच्चरक्तचाप, दस्त, मन्दाग्नि आदि रोगों में लाभकारी है |

  • ऐसे व्यक्ति जोकि लम्बी बीमारी से गुजरे  हैं , उनके लिए सुसम जल का स्नान बहुत लाभ करता है |

  • सुसम जल के प्रयोग से त्वचा में असाधारण रूप से निखार आ जाता है |

क्रिया –प्रतिक्रिया :

सुसम  जल के स्नान में प्रारंभ में प्रयोग किए जाने वाले जल का तापमान शरीर के ताप से कम होने के फलस्वरूप शरीर में अपेक्षाकृत अधिक गर्मी उत्पन्न होने की क्रिया सतेज हो जाती है | इसमें प्रभाव से त्वचा में फैलाव आता है एवं त्वचा के छिद्रों में स्थित लवण आदि पदार्थों से युक्त पसीना निकलने लगता है जिससे अनेकों  दूषित तत्व शरीर से बाहर निकल जाते हैं |

त्वचा की कार्यशीलता बढ़ाये 2 से 5 मिनट का गर्म स्नान (Hot Bath) :


2 से 5 मिनट तक गर्म पानी से स्नान करने के लाभ निम्नवत हैं –

  1. मांसपेशियों को फैलाता है एवं स्नायु संस्थान व शरीर को शिथिलता प्रदान करता है |

  2. त्वचा की कार्यशीलता को बढ़ाता है |

  3. पोषण शक्ति को मजबूत करता है |

  4. श्वास क्रिया को बढाता है |

सावधानियां :

  • वृद्ध एवं कमजोर व्यक्तियों तथा ह्रदय रोगियों को अधिक गर्म जल के स्नान नहीं देना चाहिए |

  • यदि गर्म स्नान लेना है तो भोजन के एक-डेढ़ घंटा पहले ले लेना चाहिए एवं स्नान के एक दो घंटा बाद ही भोजन करना उचित है |

  • सिर पर गर्म जल नहीं डालना चाहिए |

गर्म पैर स्नान (HOT FOOT BATH)- यह स्नान दिला सकता है कई रोगों से मुक्ति :


गर्म पैर स्नान को करने के लिए आवश्यक साधन :

बाल्टी - 1

गर्म पानी 8-10 ली.

कुर्सी या स्टूल – 1

कम्बल – 1

छोटा तौलिया – 1

विधि :

पैरों के गर्म स्नान के लिए एक बाल्टी में गर्म पानी भर लें। ध्यान रखें कि बाल्टी में पानी उतना ही रखें जितना कि घुटने तक आ सके। पानी हल्का गर्म रहने पर एक कुर्सी पर बैठ जाएं और पैरों को पानी में रखें। जब पानी धीरे-धीरे ठंडा होने लगे तो उसमें से पानी निकाल लें और ऊपर से गर्म पानी मिला दें। साथ ही एक कम्बल से सिर को छोड़कर पूरे शरीर को ढककर रखें। कम्बल को ऐसे लपेटे की बाल्टी समेत पूरा शरीर कम्बल से ढक जाए। इस स्नान में शुरू में और बीच-बीच में हल्का गर्म पानी थोड़ा-थोड़ा करके पीते रहें। साथ ही सिर पर एक पानी से भीगा हुआ तौलिया रखें। यह स्नान 10-20 मिनट तक करें। स्नान के बाद शरीर पर आए पसीने को तौलिये से अच्छी तरह पोंछकर सुखा लें। यदि इच्छा हो तो इसके बाद ठंडे पानी से साधारण स्नान भी कर सकते हैं।

लाभ :

  1. तीव्र सर्दी, माइग्रेन, अस्थमा, हृदय रोग व थकान की अवस्था में गर्म पानी का पैर स्नान जादू सा असर करता है।

  2. सामान्य अवस्था में इस प्रयोग को करने से शरीर स्फूर्ति का अनुभव करता है।

  3. इस प्रयोग को अस्थमा रोग की तीव्र अवस्था में भी कराया जाए तो अस्थमा रोगी को तुरंत लाभ मिलता है।

  4. आधाशीशी दर्द की प्रारंभिक स्थिति में इस प्रयोग को किया जाए तो आशातीत लाभ मिलता है।

  5. शारीरिक रूप से थकने पर यदि पैर स्नान किया जाए तो थकान में बहुत राहत मिलती है।

  6. इस स्नान से सर्दी-जुकाम, बेहोशी आदि रोग दूर होते हैं।

  7. यह नींद का न आना तथा दमा के रोग को ठीक करता है।

  8. जिन स्त्रियों का मासिकधर्म आना बन्द हो गया हो उन्हें यह स्नान करना चाहिए। इससे मासिकधर्म की परेशानी दूर होती है। इस स्नान को 20 से 30 मिनट तक किया जाए तो अधिक लाभ होता है।

  9. यदि रोगी की नाक बहती है और उसे गर्म पानी का पैर स्नान करा दिया जाए तो बहती नाक कुछ ही समय में बहना बंद हो जाती है।

  10. पैर स्नान वाष्प स्नान का श्रेष्ठ विकल्प है।

  11. गर्म पानी का पैर स्नान करने से हृदय, मस्तिष्क व फेफड़ों में रक्त का प्रवाह कम होता है व शरीर आराम का अनुभव करता है।

  12. यह स्नान उच्चरक्तचाप को नियंत्रित करता है |

सावधानी :

मिर्गी के रोगी इस उपचार को न करें |

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Wednesday, December 28

द्रव्य एनिमा





भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा के विख्यात चिकित्सक महात्मा जगदीश्वरानन्द जी ने पिछले 60 वर्षों से लाखों रोगियों पर द्रव्य एनिमा का प्रयोग किया है एव रोगनिवारण में चमत्कारिक सफलता प्राप्त की है | आईये जानते हैं कि द्रव्य एनिमा क्या है |

तालिका में दिए गए रोगानुसार द्रव्यों को 1 से 1.5 ली. गुनगुने पानी में लिया जाता है |



क्रम नाम द्रव्य रोगों में लाभ
1एक नींबू का रस (छानकर)आँतों के शुद्धिकरण हेतु
2250 मिली. पानी में 50 ग्राम त्रिफला पकाकर एवं छानकरआँतों की विशेष शुद्धि के लिए
3200 से 300 ग्राम दही अथवा दही का तोड़, छानकरचिपके हुए आंव को उखाड़ने के लिए
4200-300 ग्राम नीम की पत्तियां पानी में पकाकर, छानकररक्त शोधक
54-5 कण पोटैशियम परमैगनेट (लाल दवा)कीड़े (कृमि) नाशक
6500 ग्राम पालक/ चौलाई/ बथुआ अथवा पुनर्नवा का रसइसके प्रयोग से आंतें लौह तत्व एवं प्राकृतिक लवणों का प्रचूषण कर सबल बनती हैं
7100 ग्राम शीरा अथवा गुड़ + 10 ग्राम राई, आपस में पीस छानकरकृमि नाशक
850 ग्राम अरंड का तेल (कैस्टर आयल) – इसे एनिमा पात्र की नली में डालकर आंत में चढ़ाएं ऊपर से 1 से 1.5 ली. गुनगुने पानी चढ़ाएंआँतों में चिकनाहट या मल को सरकाने की प्रवृत्ति पैदा करना
91 ली. गुनगुने दूध में 100 ग्राम शहद मिलाकर एनिमा लेने के बाद कुछ समय तक रोकेंआँतों की शक्ति बढ़ाने के लिए
10200 ग्राम इसबगोल पानी में पकाकरआंव उखाडकर बाहर लाना, मरोड़ में भी लाभकारी
11200 ग्राम मुल्तानी मिटटी पानी में घोल एवं छानकरपेट की गर्मी को समाप्त करने के लिए
12100 ग्राम प्याज + 25 ग्राम लहसुन का रसकृमि नाश के लिए



एनिमा लेने की विधि :

पैरों की तरफ से टेबल के पायों के नीचे ईंट आदि लगाकर थोड़ा ऊँचा कर लें। एनिमा पाट को पैरों की तरफ स्टैण्ड पर या दीवार के सहारे टांग दें। पाट में आवश्यकतानुसार गुनगुना पानी भर लें। अब टेबल पर सीधे लेटकर पैरों को घुटनों से मोड़ लें तत्पश्चात् एनिमा पाट से लगी पाइप के नोजल पर थोड़ा सा तेल लगाकर गुदा द्वार से 2-3 इन्च अन्दर प्रवेश करा दें तथा पानी खोल दें। पानी स्वतः आंत में पहुँचने लगेगा। नोजल एनिमा पॉट के साथ ही आता है, परन्तु यदि नोजल की जगह 10 नं. का रबड़ का कैथेटर प्रयोग में लिया जाये तो अधिक लाभ होगा | वयस्क व्यक्ति के गूदा द्वार से लगभग 8-10 इंच कैथेटर प्रवेश कराके पानी खोल देना चाहिए | पूरा पानी आंत में पहुँचने के बाद 2-3 मिनट दाहिनी करवट लेटें फिर 2-3 मिनट बाईँ करवट लेटें यदि प्रेशर न बना हो तो 10-15 मिनट टहलें, तत्पश्चात् शौच के लिए जाएं।

सवधानियाँ :

  • एनिमा के पानी का तापमान शरीर के तापमान के बराबर रहना चाहिए।

  • एनिमा के बाद शौच के समय जोर नहीं लगाना चाहिए। अपने आप पानी के साथ जो मल निकले उसे निकलने देना चाहिए
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Sunday, December 25

आईये जानते हैं कि घर में कैसे करें - स्पा !


By- Dr. Kailash Dwivedi
स्पा शब्द जल चिकित्सा से जुड़ा हुआ है, जिसे स्नान चिकित्सा के रूप में भी जाना जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य शरीर का शोधन करना अर्थात शरीर में एकत्र विषैले तत्वों को बाहर निकालकर शरीर में एक नई स्फूर्ति भरना है | आजकल दिवस स्पा जिसमे कि अधिकाँश ब्यूटी ट्रीटमेंट होता है का खूब चलन है | प्राचीन काल से ही महिलाएं अपनी सुन्दरता को लेकर बहुत सजग रही हैं |
सर्दियों के मौसम में स्किन केयर की बहुत जरूरत होती है। क्योंकि इस मौसम में त्वचा संबंध‍ित कई तरह की समस्याएं होने की भी आशंका रहती हैं। ऐसे में स्पा लेने का विचार बेहतर सिद्ध हो सकता है।
आईये जानते हैं कि कैसे शुरु करें स्पा

वातावरण को सुगन्धित करें :
जहाँ पर आप स्पा ले रही हों सबसे पहले वहां का वातावरण सुगन्धित करने का इंतजाम करना चाहिए इसके लिए गुलाब की पंखुड़ियों से बना रूम फ्रेशनर उपयोगी सिद्ध हो सकता है | इसे बनाने के लिए गुलाब की पंखुड़ियों को पानी में उबालें। तत्पश्चात पानी को ठंडा करके छान लें। इस गुलाब जल से आप गुलाब की खुशबु फैला सकती हैं।
त्वचा को साफ करें :
त्वचा की सफाई के लिए शरीर को रोंयेदार तौलिये से रगड़ कर साफ करें। शुरुआत पैरों से करते हुए ऊपर की ओर ले जाएं। तत्पश्चात दोनों हाथों को भी इसी तरह साफ करें। इसके बाद कंधे, और पेट पर तौलिये से हलके हांथो से रगड़ें | शरीर को रगड़ने के बाद चेहरे सहित पूरे शरीर पर 10 से 15 मिनट के लिए पके पपीता का गुदा लगाएं | तत्पश्चात नरम गीले तौलिए से साफ करें।  इससे डेड स्किन सेल्स हटेंगी एवं शरीर में रक्त संचार नियमित होगा। इसके अतिरिक्त नीचे दिए गए नुस्खे के अनुसार भी आप स्क्रब कर सकती हैं –
आवश्यक सामग्री :
  • ·        5 चम्मच शहद
  • ·        4 चम्मच चीनी – दरदरी पीसी हुयी
  • ·        2 चम्मच संतरे के सूखे छिलके का पाउडर
  • ·        1 चम्मच बादाम का पेस्ट
  • ·        जैतून का तेल (आवश्यकतानुसार)
                                                      इसे भी पढ़ें - चौंक जायेंगे आप अंकुरित लहसुन के लाभ जानकर !

जैतून के तेल को छोड़कर बाकी सभी चीजों को आपस में मिक्स कर लें, इसके बाद जैतून के तेल को मिला दें |
इस स्क्रब का प्रयोग अपने हाथों, पैरों और शरीर पर हलके हाथों से गोलाई में मालिश करते हुए करें। एक समय पर एक ही भाग पर ध्यान केंद्रित करें। सबसे अंत में अपने चेहरे पर स्क्रब का प्रयोग करें | इसे 10 मिनट के लिए लगा रहने दें तत्पश्चात त्वचा को दोनों हाथों से रगड़ते हुए हल्के गर्म पानी से धो लें।
सुगन्धित स्नान :
नहाने के टब में पानी भरकर आधा कप गुलाब जल मिला लें | अधिक सुगंध के लिए गुलाब की कुछ पंखुडि़यां भी मिलायी जा सकती हैं | यदि टब की व्यवस्था नहीं है तो और आप शॉवर बाथ ले रही हैं, तो बाल्टी भर पानी में कुछ बूंदें एसेंशियल ऑयल और गुलाब जल की मिलाकर उससे स्नान करें ।
फुल बॉडी मसाज :
सर्दियों को ध्यान में रखते हुए मालिश के लिए तिल का तेल सर्वोत्तम विकल्प है | जैतून का तेल भी अच्छा है | मसाज ऑयल में 8-10 बूंदें एसेंशियल ऑयल की मिला लें | इससे पूरे शरीर की अच्छे से मसाज करें | निम्न रक्तचाप रहता हो तो नीचे से ऊपर की तरफ हल्का दबाब बनाते हुए मसाज करें | आनंदपूर्वक धीरे-धीरे मसाज करें | जल्दी-जल्दी करके थकान को न लायें |

स्पा पैक लगाएं
आवश्यक सामग्री
  • ·        1 पका हुआ केला
  • ·        आधा सेब
  • ·        आधा खीरा
  • ·        1 टमाटर
  • ·        10 हरे अंगूर
  • ·        2 चम्मच ब्रांडी (Brandy)
  • ·        5 चम्मच या इससे ज़्यादा मुल्तानी मिट्टी

उपर्युक्त सामग्री में से फलों को अच्छी तरह से बहते हुए पानी में धो लें एवं इन्हें छीले बगैर  मिक्सर ग्राइंडर (mixer grinder) में पीसकर एक महीन पेस्ट तैयार कर लें। इस मिश्रण को कांच के बर्तन में रखकर ब्रांडी मिला लें | तत्पश्चात इसमें पर्याप्त मात्रा में मुल्तानी मिट्टी मिला लें | बस तैयार है आपका स्पा पैक । इस पैक को 15-20 मिनट के लिए अपने चेहरे एवं शरीर पर लगायें | तत्पश्चात हाथों को पानी में भिगोकर त्वचा को धीरे धीरे रगड़कर इस पैक को उतारने के बाद पानी से इस पैक को धो दें एवं एक नरम तौलिए से शरीर को अच्छे से पोंछकर बॉडी लोशन लगाएं। 15 मिनट बाद गीले तौलिए से पूरा शरीर साफ कर लें।


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Tuesday, December 20

सावधान ! सर्दियों में पानी कम पिया तो हो सकती हैं यह समस्याएं





सर्दी के मौसम में शरीर में अक्सर पानी की मात्रा कम हो जाती है | हम जो भी खाना खाते हैं, उसे पचाने के लिए पर्याप्त पानी की जरूरत होती है | इसके अलावा शरीर के मेटाबॉलिज्म, पाचन शक्ति और एब्जरप्शन के लिए पानी बहुत जरूरी है | कुछ लोगों को तो सर्दियों में प्यास ही नहीं लगती या बहुत कम लगती है, यदि यह शिकायत आपकी भी है तो सावधान हो जायें। सर्दियों में डिहाइड्रेशन की स्थिति कई रोगों को जन्म दे सकती है |

सर्दियों में क्यों होता है डिहाइड्रेशन ?

सर्दियों में शरीर में पानी की कमी के निम्न कारण हो सकते हैं -
  • बाहर के मौसम के अनुरूप शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने के लिये शरीर को अधिक परिश्रम करना पड़ता है, जिससे शरीर में पानी की कमी होने लगती है।
  • कम मात्रा में पानी पीना और अधिक मात्रा में चाय और काॅफी का सेवन करना डिहाइड्रेशन की आशंका को बढ़ा देता है।
  • अधिक देर तक रूम हीटर में बैठे रहना भी शरीर की नमी को कम करता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों के मौसम में सांस लेने पर काफी मात्रा में रेसपिरेटरी फ्लुइड का नुकसान होता है।

डिहाइड्रेशन के लक्षण :

  1. मुह सूखना
  2. त्वचा का मुरझाना
  3. होंठ फटना
  4. थकावट महसूस होना
  5. पेशाब कम व पीला आना
  6. चक्कर आना

शरीर में पानी क्यों आवश्यक है ?

हमारे शरीर में दो-तिहाई पानी होता है, अगर इसमें 1.5 प्रतिशत की कमी आ जाती है तो इसे माइल्ड डिहाइड्रेशन कहते हैं। पानी के स्तर में 3-8 प्रतिशत की कमी आने पर शरीर की कार्यप्रणाली और दूसरे अंगों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है।

डिहाइड्रेशन से शरीर को होने वाले नुकसान :

कब्ज :

शरीर को पर्याप्त पानी नहीं मिलने से शरीर पानी की उस कमी को मल से पूरा करता है। जिससे मल कड़ा हो जाता है फलस्वरूप कब्ज उत्पन्न हो जाती है ।

हृदय रोग :

शरीर में पानी की कमी होने पर रक्त गाढ़ा होने लगता है। जिससे शरीर में रक्तसंचार प्रभावित होने लगता है एवं रक्त व आॅक्सीजन के शरीर के सभी अंगों में आपूर्ति हेतु ह्रदय को अधिक श्रम करना पड़ता है फलस्वरूप रक्तचाप बढ़ने लगता है। इससे कोलेस्ट्राॅल का स्तर बढ़ जाता है। यह स्थिति कृत्रिम हार्ट वाल्व लगवा चुके या एंजियोप्लास्टी करवाने वाले जिन लोगों में धातु निर्मित स्टेंट लगा होता है, उनके लिए ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है | पानी की कमी होने पर गाढ़ा रक्त हृदय स्नायुओं से चिपकने लगता है, जिससे स्टेंट अवरूद्ध हो सकता है। यह अवस्था हार्ट अटैक का कारण बन सकती है।

मंसपेशियों में ऐंठन :

सर्दियों में पर्याप्त पानी नहीं पीने से शरीर नाजुक अंगों की सुरक्षा के लिये जरूरी फ्लुइड का इस्तेमाल करने लगता है। इससे मांसपेशियों की ओर रक्त संचार कम होता है और उनमें ऐंठन होने लगती है। इससे कमर व पीठ दर्द, मांसपेशियों में खिंचाव जैसी समस्या हो सकती है।

अधिक मीठा खाने की इच्छा होना :

जब शरीर में पानी का स्तर कम होता है तब हम भूख का अनुभव अधिक करते हैं। जिससे मीठा या कार्बोहाइड्रेट युक्त चीजें खाने की इच्छा अधिक होने लगती है। यह स्थिति मोटापा जैसे रोग को जन्म दे सकती है |

त्वचा का रूखापन :

शरीर में पानी की कमी त्वचा एवं बालों को रूखा व बेजान बना देती है।

मुंह से दुर्गंध आनाः

लार में बैक्टीरिया नष्ट करने की क्षमता होती है, जब शरीर में पानी की कमी होती है तो मुंह में लार की मात्रा कम हो जाती है | जिससे बैक्टिीरिया पनपने लगते हैं और मुंह से दुर्गन्ध आने लगती है।

एकाग्रता की कमी :

पानी की कमी से मानसिेक क्रियाशीलता भी प्रभावित होती है। जिससे उत्पन्न बेचैनी एकाग्रता को नष्ट करती है।

सिरदर्द :

पानी की कमी के कारण शरीर के सभी अंगों तक पर्याप्त आॅक्सीजन नहीं पहुँच पाती जिससे सिरदर्द और चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो जाता है।

शरीर में पानी की कमी से बचने के उपाय :

  1. यदि आपको सादा पानी पीना कम पसंद है तो नीबू पानी, नारियल पानी, छाछ या सूप अधिक मात्रा में लें।
  2. तले-भुने व परिशोधित खाद्य पदार्थों में पानी की मात्रा कम होती है। अतः ऐसे खाद्यों से बचें |
  3. भोजन में फल, दही, लस्सी जैसे खाद्यों को भी शामिल करें ।
  4. चाय, काॅफी, कोल्ड ड्रिंक्स जैसे पेय पदार्थों से बचें | यह शरीर में पानी की आपूर्ति नहीं करते बल्कि शरीर में पानी की जरुरत को और अधिक बढ़ा देते हैं।
  5. भोजन में टमाटर, शिमला मिर्च, फूलगोभी, पालक, लौकी, तोरई, स्ट्राबेरीज, अंगूर, ब्रोकली, तरबूज, संतरा व सेव जैसे फल व सब्जियों को शामिल करें |
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Friday, December 2

बिना दवा का यह उपाय सर्दी-खाँसी को कर देगा छू-मंतर !

सर्दी के मौसम में यदि कोई रोग सबसे ज्यादा परेशान करता है तो वह है - खाँसी | सर्दी जनित खाँसी - जुकाम के साथ गले में दर्द यदि एक बार हो जाये तो समझो हफ्ते दस दिन की छुट्टी !
इस लेख में हम बता रहे हैं गले का दर्द, श्वासनली की सूजन (Bronchitis), खाँसी, जुकाम जैसे रोगों को दूर करने का आसन परन्तु बेहद प्रभावी घरेलू उपाय | इन रोगों से परेशान व्यक्ति बिना औषधि के इस उपाय को अवश्य करें और परिणाम देखें |

1. गले की सेंक :

रबड़ की गर्म पानी की बोतल (Hot water bag) में गर्म पानी भरकर 10 मिनट तक गले की सेंक करें | सेंक के बाद 10 मिनट के लिए गले को किसी तौलिया आदि से ढक लें | इस बीच पानी या कुछ अन्य न खाएं-पियें | इस सेंक को दिन में 2-3 बार करें |

2. गर्म पैर स्नान (HOT FOOT BATH) :

गर्म पैर स्नान को करने के लिए आवश्यक साधन :
  • बाल्टी - 1
  • गर्म पानी 8-10 ली.
  • कुर्सी या स्टूल – 1
  • कम्बल – 1
  • छोटा तौलिया – 1
विधि :
पैरों के गर्म स्नान के लिए एक बाल्टी में गर्म पानी भर लें। ध्यान रखें कि बाल्टी में पानी उतना ही रखें जितना कि घुटने तक आ सके। पानी हल्का गर्म रहने पर एक कुर्सी पर बैठ जाएं और पैरों को पानी में रखें। जब पानी धीरे-धीरे ठंडा होने लगे तो उसमें से पानी निकाल लें और ऊपर से गर्म पानी मिला दें। साथ ही एक कम्बल से सिर को छोड़कर पूरे शरीर को ढककर रखें। कम्बल को ऐसे लपेटे की बाल्टी समेत पूरा शरीर कम्बल से ढक जाए। इस स्नान में शुरू में और बीच-बीच में हल्का गर्म पानी थोड़ा-थोड़ा करके पीते रहें। साथ ही सिर पर एक पानी से भीगा हुआ तौलिया रखें। यह स्नान 10-20 मिनट तक करें। स्नान के बाद शरीर पर आए पसीने को तौलिये से अच्छी तरह पोंछकर सुखा लें। यदि इच्छा हो तो इसके बाद ताज़े पानी से साधारण स्नान भी कर सकते हैं।

Tuesday, April 5

द्रव्य एनिमा

भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा के विख्यात चिकित्सक महात्मा जगदीश्वरानन्द जी ने पिछले 60 वर्षों से लाखों रोगियों पर द्रव्य एनिमा का प्रयोग किया है एव रोगनिवारण में चमत्कारिक सफलता प्राप्त की है | आईये जानते हैं कि द्रव्य एनिमा क्या है |
तालिका में दिए गए रोगानुसार द्रव्यों को 1 से 1.5 ली. गुनगुने पानी में लिया जाता है |
क्रम
नाम द्रव्य
रोगों में लाभ
1
एक नींबू का रस (छानकर)
आँतों के शुद्धिकरण हेतु
2
250 मिली. पानी में 50 ग्राम त्रिफला पकाकर एवं छानकर
आँतों की विशेष शुद्धि के लिए
3
200 से 300 ग्राम दही अथवा दही का तोड़, छानकर
चिपके हुए आंव को उखाड़ने के लिए
4
200-300 ग्राम नीम की पत्तियां पानी में पकाकर, छानकर
रक्त शोधक
5
4-5 कण पोटैशियम परमैगनेट (लाल दवा)
कीड़े (कृमि) नाशक
6
500 ग्राम पालक/ चौलाई/ बथुआ अथवा पुनर्नवा का रस
इसके प्रयोग से आंतें लौह तत्व एवं प्राकृतिक लवणों का प्रचूषण कर सबल बनती हैं
7
100 ग्राम शीरा अथवा गुड़ + 10 ग्राम राई, आपस में पीस छानकर
कृमि नाशक
8
50 ग्राम अरंड का तेल (कैस्टर आयल) – इसे एनिमा पात्र की नली में डालकर आंत में चढ़ाएं ऊपर से 1 से 1.5 ली. गुनगुने पानी चढ़ाएं
आँतों में चिकनाहट या मल को सरकाने की प्रवृत्ति पैदा करना
9
1 ली. गुनगुने दूध में 100 ग्राम शहद मिलाकर एनिमा लेने के बाद कुछ समय तक रोकें
आँतों की शक्ति बढ़ाने के लिए
10
200 ग्राम इसबगोल पानी में पकाकर
आंव उखाडकर बाहर लाना, मरोड़ में भी लाभकारी
11
200 ग्राम मुल्तानी मिटटी पानी में घोल एवं छानकर
पेट की गर्मी को समाप्त करने के लिए
12
100 ग्राम प्याज + 25 ग्राम लहसुन का रस
कृमि नाश के लिए

एनिमा लेने की विधि :
पैरों की तरफ से टेबल के पायों के नीचे ईंट आदि लगाकर थोड़ा ऊँचा कर लें। एनिमा पाट को पैरों की तरफ स्टैण्ड पर या दीवार के सहारे टांग दें। पाट में आवश्यकतानुसार गुनगुना पानी भर लें। अब टेबल पर सीधे लेटकर पैरों को घुटनों से मोड़ लें तत्पश्चात् एनिमा पाट से लगी पाइप के नोजल पर थोड़ा सा तेल लगाकर गुदा द्वार से 2-3 इन्च अन्दर प्रवेश करा दें तथा पानी खोल दें। पानी स्वतः आंत में पहुँचने लगेगा। नोजल एनिमा पॉट के साथ ही आता है, परन्तु यदि नोजल की जगह 10 नं. का रबड़ का कैथेटर प्रयोग में लिया जाये तो अधिक लाभ होगा | वयस्क व्यक्ति के गूदा द्वार से लगभग 8-10 इंच कैथेटर प्रवेश कराके पानी खोल देना चाहिए | पूरा पानी आंत में पहुँचने के बाद 2-3 मिनट दाहिनी करवट लेटें फिर 2-3 मिनट बाईँ करवट लेटें यदि प्रेशर न बना हो तो 10-15 मिनट टहलें, तत्पश्चात् शौच के लिए जाएं।
सवधानियाँ :
  • एनिमा के पानी का तापमान शरीर के तापमान के बराबर रहना चाहिए।
  • एनिमा के बाद शौच के समय जोर नहीं लगाना चाहिए। अपने आप पानी के साथ जो मल निकले उसे निकलने देना चाहिए

Thursday, April 23

प्राकृतिक चिकित्सा- एनिमा ENIMA


  • एनिमा क्रिया आंतों को साफ करने की एक क्रिया है, जिसमें यंत्र के द्वारा पानी को मलद्वार से मलाशय में पहुंचाकर आंतों को साफ किया जाता है। एनिमा क्रिया वैसे ही है जैसे योग में आंतरिक अंगों को साफ करने के लिए षटक्रिया होती है। षटक्रिया में पानी, दूध, रस्सी तथा धौति आदि के द्वारा शरीर के आंतरिक अंगों को साफ किया जाता है। षटक्रिया में एक अन्य क्रिया भी है जिसे बस्तिक्रिया कहते हैं। बस्ति क्रिया का छोटा रूप ही एनिमा क्रिया है। एनिमा क्रिया में पानी को मलद्वार से अंदर पहुंचाकर मलाशय को साफ किया जाता है। एनिमा क्रिया द्वारा केवल आंतों को साफ करके शरीर के विभिन्न रोगों को उत्पन्न होने से रोककर शरीर को स्वस्थ्य बनाए रखा जा सकता है। एनिमा क्रिया से रोग दूर होता है और शरीर कोमल, सुंदर बनता है। एनिमा से आंतों की सफाई के साथ-साथ शरीर का खून भी साफ होता है, जिससे त्वचा कोमल और चेहरे पर चमक आती है।
  • एनिमा क्रिया देखने में साधारण क्रिया लगती है, जिससे आंते साफ होती हैं। परंतु यह क्रिया शरीर में उत्पन्न करने वाले अनेक प्रकार के रोगों का मुख्य स्रोत पेट की कब्ज को दूर करता है। इस क्रिया से कब्ज जड़ से ही समाप्त होता है और शरीर में विभिन्न प्रकार के रोगों को उत्पन्न होने से रोकता है।
  • एनिमा से आंतों की गर्मी और खुश्की दूर होती है। दस्त या रेचक को ठीक करने के लिए प्रयोग की जाने वाले दवाईयां शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक होती हैं। इन दवाईयों के प्रयोग से कब्ज दूर होने के स्थान पर आंतों को कमजोर हो जाती है। इन दवाईयों के प्रयोग से कब्ज दूर नहीं होती बल्कि वह दब जाता है, जो धीरे-धीरे गैस या अन्य विकार उत्पन्न करता है। इससे खून दूषित होकर शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी कब्ज पुराना हो जाने पर आंतों में सड़ने लगता है, जिससे आंतों में कीड़े आदि बन जाते हैं। परंतु एनिमा क्रिया से आंत में जमा हुआ मल, पुराना कब्ज तथा कीड़े आदि नष्ट होते हैं और मलद्वार से बाहर निकल जाते हैं।
  •  बुखार उत्पन्न होना शरीर में बनने वाले अन्य रोगों को संकेत देता है। अत: बुखार में एक एनिमा रोगी को देने से बुखार ठीक हो जाता है और उत्पन्न होने वाले रोग अपने आप समाप्त हो जाता है।
  • गर्भावस्था के अनेक विकार जैसे- उल्टी (वमन), भोजन का न पचना आदि रोग दूर होते हैं। गर्भवती स्त्री को प्रसव के समय उत्पन्न होने वाले दर्द के समय एनिमा देने से प्रसव का कष्ट दूर होता है और बच्चे का जन्म सुखपूर्ण होता है।
  • गर्म पानी के एनिमा के बाद ठंडे पानी का एनिमा देने से पीलिया रोग दूर होता है। एनिमा से विभिन्न रोग जैसे- गठिया, बवासीर, पुराना कब्ज, मन्दाग्नि (पाचन क्रिया का कमजोर होना), खून की खराबी, सांस का रोग, सिरदर्द, बेहोशी, चक्कर आना, अफारा, खांसी, मुंह से बदबू आना आदि रोग ठीक होते हैं। एनिमा यकृत विकार, शारीरिक कमजोरी, निस्तेज हो जाना, फोड़े-फुंसी, दाद, खाज आदि चर्म रोगों को दूर करता है। यह जीभ के छाले, मुंह के छाले तथा स्नायु विकार को दूर करता है। एनिमा क्रिया करने के बाद शारीरिक और मानसिक शांति व स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। इस तरह एनिमा सभी प्रकार के रोगों को दूर करने वाली एक आसाधारण क्रिया है |
  • एनिमा पानी के अतिरिक्त रोगानुसार अन्य कई चीजों से दिया जाता है जैसे मट्ठा, नीम के पानी से,दशमूल क्वाथ से आदि | यहाँ हम सामान्य रूप से प्रचलित सादे पानी का एनिमा के विषय में बता रहे हैं 

 एनिमा की विधि :
साधन:
 एनिमा पाट,(चित्र देखें) एक टेबल जिस पर आराम से लेटा जा सके, सरसों का तेल (लगभग 50 मिली)। रबड़ का कैथेटर – 10 नं. का |

विधि:- पैरों की तरफ से टेबल के पायों के नीचे ईंट आदि लगाकर थोड़ा ऊँचा कर लें। एनिमा पाट को पैरों की तरफ स्टैण्ड पर या दीवार के सहारे टांग दें। पाट में आवश्यकतानुसार गुनगुना पानी भर लें। अब टेबल पर सीधे लेटकर पैरों को घुटनों से मोड़ लें तत्पश्चात् एनिमा पाट से लगी पाइप के नोजल पर थोड़ा सा तेल लगाकर गुदा द्वार से 2-3 इन्च अन्दर प्रवेश करा दें तथा पानी खोल दें। पानी स्वतः आंत में पहुँचने लगेगा। नोजल एनिमा पॉट के साथ ही आता है, परन्तु यदि नोजल की जगह 10 नं. का रबड़ का कैथेटर प्रयोग में लिया जाये तो अधिक लाभ होगा | वयस्क व्यक्ति के गूदा द्वार से लगभग 8-10 इंच कैथेटर प्रवेश कराके पानी खोल देना चाहिए | पूरा पानी आंत में पहुँचने के बाद 2-3 मिनट दाहिनी करवट लेटें फिर 2-3 मिनट बाईँ करवट लेटें यदि प्रेशर न बना हो तो 10-15 मिनट टहलें, तत्पश्चात् शौच के लिए जाएं।
विभिन्न आयु वर्ग के लिए एनिमा में पानी की मात्रा 
06 माह से 01 वर्ष के बच्चे को – 100 – 200 मिली.
01 वर्ष से 06 वर्ष के बच्चे को – 200 – 500 मिली.
06 वर्ष से 12 वर्ष के बच्चे को – 500 – 1000 मिली.
12 वर्ष से ऊपर – 1000 – 1200 मिली.
सवधानियाँ:-
एनिमा के पानी का तापमान शरीर के तापमान के बराबर रहना चाहिए।
एनिमा के बाद शौच के समय जोर नहीं लगाना चाहिए। अपने आप पानी के साथ जो मल निकले उसे निकलने देना चाहिए।

विभिन्न अंगों पर एनिमा का प्रभाव
 गर्म पानी से एनिमा क्रिया करने से स्राव होने वाले सभी अंगों पर प्रभाव पड़ता है। इस क्रिया से यकृत, क्लोम ग्रंथि, आमाशय, छोटी आंत और बड़ी आंत प्रभावित होती है। एनिमा क्रिया से आंतों की सफाई होती है, जिससे कब्ज दूर हो जाती है और रोगी को अनेक प्रकार के रोग होने की संभावना समाप्त हो जाती है। इससे पाचन शक्ति बढती है। एनिमा से गैस व कब्ज के कारण उत्पन्न होने वाला मानसिक तनाव दूर होता है और यह मन को शांत करता है। ठंडे पानी का एनिमा लेने से आंते शक्तिशाली बनती हैं और भूख बढ़ती है।
        

Monday, March 30

बदलते मौसम में कफ, जुकाम,से ऐसे बचें !

  मौसम के करवट बदलने पर जुकाम की समस्या आमतौर पर हो जाती है। ऐसे में इनसे आराम के लिए जो दवाएं लेते हैं उससे दिक्कत कम होने के बजाय बढ़ जाती है। यहाँ प्रस्तुत हैं इससे बचने एवं उपचार के कुछ उपाय |

बचाव  :
दिन में न सोयें |
फ्रिज का पानी बिलकुल बंद कर दें |
नींद से उठते ही ताज़ा (ठंडा) पानी न पियें बल्कि गुनगुना पानी पीना लाभदायक है |
रात्रि भोजन में दही,चावल जैसे खाद्यों का प्रयोग कदापि न करें |
दिन में एक – दो बार पानी में अदरख,तुलसी पत्र डालकर उबालें कप में छानने के बाद  
        स्वादानुसार शहद मिलाकर सिप करके पियें |
प्रातःकाल  सायं की भरी हुयी टंकी के पानी से स्नान न करें | इस पानी में थोडा गर्म पानी  
        मिलाकर तापमान को सामान्य करके स्नान करें |
प्रतिदिन 5 मिनट भस्त्रिका प्राणायाम करें | ह्रदय रोगी सावधानी पूर्वक धीरे-धीरे करें |
       (भस्त्रिका प्राणायाम – श्वास को फोर्सली लेना और फोर्सली ही छोड़ना)

यदि , जुकाम से ग्रस्त हो जाएँ तो निम्न उपाय करें  :


  1. यदि एक तरफ की नासिका बंद हो गयी है तो जिस तरफ की नासिका बंद है तो कुछ देर उसके विपरीत करवट ले कर लेट जाएँ, जैसे बायीं नासिका बंद है तो दाहिने करवट लेतें | नासिका खुल जाएगी | ज्यादा देर तक नासिका को बंद न रहने दें, बंद होते ही तुरंत उसको खोल लें ऐसा करने से जुकाम ज्यादा दिन  नही रुक सकता |
  2. भस्त्रिका प्राणायाम के अतिरिक्त सुर्यभेदी प्राणायाम करें |


सूर्यभेदी प्राणायाम की विधिः 
प्रातः पद्मासन अथवा सुखासन में बैठकर बायें नथुने को बंद करें और दायें नथुने से धीरे-धीरे अधिक से अधिक गहरा श्वास भरें। श्वास लेते समय आवाज न हो इसका ख्याल रखें। अब अपनी क्षमता के अनुसार श्वास भीतर ही रोक रखें।  जब श्वास न रोक सकें तब बायें नथुने से धीरे धीरे बाहर छोड़ें। झटके से न छोड़ें। यह 1 चक्र हुआ | पुनः दाहिने नथुने से ही श्वास भरें और बाएं से छोड़ें | इस प्रकार 3 से 5 चक्र करें इससे सूर्य नाड़ी क्रियाशील हो जाती है। पाँच सूर्यभेदी प्राणायाम नियमित रूप से करने से कफ-सम्बन्धी समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं। सर्दी, खाँसी जुकाम दूर हो जाते हैं व पुराना जमा हुआ कफ पिघल जाता है।

इसके अतिरिक्त  :

  • गर्म पानी, सूप आदि का सेवन कफ ढीला करने में मदद करता है।
  • कैफीन और एल्कोहल का सेवन न करें क्योंकि इनसे यूरीन अधिक होती है और शरीर का  फ्लूएड कम होता है।
  • भाप लेने से भी कफ की स्थिति में बहुत आराम मिलता है लेकिन अगर भाप के पानी में यूकोलिप्टस के तेल या पेपरमेंट ऑयल की दो बूंद डाल लें तो इससे कफ की जकड़न तेजी से खुल जाती है।
  • तीन से चार लहसुन के जवे लें, उनके बारीक काट लें और शहद में मिलाएं। दिन में दो बार एक चम्मच इस मिश्रण का सेवन रोज करें |
  • खाँसी होनेपर प्याज की 8 से 10 बूंदों में 1 चम्मच शहद मिलाकर चाटे |
  • सर्दी-खाँसी और छींक होनेपर एक छोटी इलायची, एक टुकड़ा अदरक, लौंग तथा पाँच तुलसी  के पत्ते एक साथ पान में रखकर खाएँ।
  • त्रिकटु चूर्ण चौथाई चम्मच को एक चम्मच शहद में मिलाकर दिन में तीन बार चाटें |
  • सोते समय गर्म पानी में 10 मिनट तक पैर डालकर बैठे,तत्पश्चात पैर पोंछकर तलवों में सरसों के तेल की मालिश करें एवं पैरों को ढककर सो जाएँ |


Saturday, March 7

कटि स्नान ; सब रोगों की एक दवा

साधन :-
टब, छोटा स्टूल, छोटा तौलिया, कम्बल, पानी |
जल का तापमान :-
कटि स्नान में प्रयोग में लाये जाने वाले जल का तापमान शरीर के तापमान से कम रहना चाहिए तभी जल का प्रभाव शरीर पर हो सकेगा | सामान्यतः गर्मी के दिनों में जल का तापमान 55 डिग्री फारनहाईट तथा सर्दियों में ७५ से ८४ डिग्री फारनहाईट रहना चाहिए | ठन्डे जल का तापमान बढ़ाने के लिए उसमे अलग से गर्म पानी मिला देना चाहिए |
कटि स्नान करने का समय :-
कटि स्नान प्रारंभ में पांच मिनट से शुरू करके प्रतिदिन एक -एक मिनट बढ़ाते हुए पंद्रह मिनट तक किया जा सकता है | बच्चों व् कमजोर व्यक्तियों को पांच मिनट से अधिक नही लेना चाहिए | प्रातः खाली पेट कटि स्नान करना चाहिए |

कटि स्नान करने की विधि :-
  • टब में लगभग 12 से 14 इंच गहराई तक पानी भरें जिससे कि टब में बैठने पर पानी उपर नाभि तक एवं नीचे आधी जंघाओं तक आ जाये |
  • टब में अधलेटी अवस्था [ जैसे आराम कुर्सी पर बैठते हैं ] में बैठ जाएँ | दोनों पैर टब के बाहर चौकी पर रख लें | ध्यान रहे कि पानी से पैर न भीगने पायें |
  • रोयेंदार तौलिये से पेडू पर दायें से बाएं अर्ध चंद्राकर घर्षण करें [ मालिश करें ] |
  • कटि स्नान के बाद  शरीर में गर्मी लाने के लिए लगभग 15 -20 मिनट टहलें,व्यायाम करें अथवा कम्बल ओढ़कर लेट जाएँ |
विशेष :-
  • यदि कमजोरी अधिक हो तो सिर को छोडकर टब सहित पूरा शरीर एक कम्बल से ढक लें |
  • कटि स्नान करते समय तब में पीछे से पीठ को बीच-बीच में हिलाते रहें, इससे रीढ़ के स्नायु उद्दीप्त होंगे फलस्वरूप शरीर में चेतनता आयेगी और रोगप्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि होगी |
कटि स्नान से शरीर में होने वाली प्रतिक्रिया :-
साधारण सी दिखने वाली इस क्रिया का प्रभाव सम्पूर्ण शरीर पर पड़ता है | यदि यह कहा जाय कि “कटि स्नान प्राकृतिक चिकित्सा की संजीवनी बूटी है |” तो अतिशयोक्ति नही होगा |
पानी का तापमान शरीर के तापमान से कम होने के कारण टब में बैठते ही पेडू की अतिरिक्त गर्मी कम होकर पूरे पाचन तंत्र में संकुचन की स्थिति उत्पन्न होती है जिससे कई अंग जैसे लीवर,क्लोम ग्रंथि,आमाशय, छोटी आंत आदि में सक्रियता आती है और वे पर्याप्त मात्रा में पाचक रसों को स्रवित करना प्रारंभ कर देते हैं जिससे पाचन तंत्र की मजबूती के साथ ही जीर्ण कब्ज, जो सभी रोगों की जननी है , से भी छुटकारा मिलता है | इसके अतिरिक्त रीढ़ की हड्डी में पानी का स्पर्श होने से स्नायुविक रोग भी दूर हो जाते हैं |

कटि स्नान से लाभ :-
  • छोटी व् बड़ी आंत के अधिकांशतः सभी रोग कटि स्नान से दूर हो जाते हैं |
  • पेडू की अतिरिक्त गर्मी के फलस्वरूप मल में जो स्वाभाविक नमी होती है, वह सूख जाती है जिसके कारण मल आंत में सूखकर कड़ा हो जाता है, इसी अवस्था को जीर्ण कब्ज या कोष्ठबद्धता कहते हैं | कटि स्नान से पेट की अतिरिक्त गर्मी पानी में निकल जाती है एवं कब्ज से मुक्ति मिलती है |
  • दर्द रहित पेडू की पुरानी सूजन में विशेष लाभकारी है |
  • पीलिया रोग में स्टीम बाथ के तुरंत बाद २-३ मिनट कटि स्नान करने के उपरांत पूर्ण स्नान करने से पित्त पर्याप्त मात्रा में निकलता है एवं पीलिया समाप्त हो जाता है |
  • नये एक्जिमा में कटि स्नान अत्यंत लाभकारी है |
  • नियमित कटि स्नान करने से शरीर की जीवनीशक्ति आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है जिससे कैंसर, लकवा, क्षय जैसे भयंकर रोगों से बचाव होता है |
  • कटि स्नान जननेंद्रिय की दुर्बलता एवं वीर्य के पतलेपन को दूर करता है |
  • बबासीर , आंत, गर्भाशय की रक्तस्राव की अवस्था में कटि स्नान अत्यंत हितकारी है | रक्तस्राव की अवस्था में कटि स्नान लेते समय यह ध्यान रहे कि दोनों पैर चौकी पर रखने की बजाय किसी बर्तन में गर्म पानी में डुबोकर रखें |इस क्रिया को करने से पेडू में स्थित अतिरिक्त रक्त पैरों में उतर जाता है तथा पानी की ठंडक से पेडू सिकुड़ने लगता है, फलस्वरूप रक्तस्राव बंद हो जाता है |
  • अनिद्रा, हिस्टीरिया, चिडचिडापन, स्नायुविक रोगों में कटि स्नान अति लाभप्रद है |
स्त्री रोगों में कटि स्नान से लाभ :-
  • स्त्रियों के लगभग सभी रोगों में कटि स्नान बहुत लाभकारी है |
  • पुराने रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर में कटि स्नान लाभ करता है |
  • गर्भाशय की स्थानभ्रष्टता एवं जब गर्भाशय आदि अन्दर से बाहर आते मालूम हों तो कटि स्नान से आश्चर्यजनक रूप से  लाभ पहुंचता है |
  • गर्भवती स्त्री प्रसव से दो माह पूर्व से ही कटि स्नान लेना प्रारंभ कर दे तो बिना कष्ट के सामान्य रूप से प्रसव होगा |
  • गर्भपात के लक्षण दिखाई पड़ने पर यदि २० से ३० मिनट तक कटि स्नान लिया जाय तो गर्भपात रुक सकता है | इस अवस्था में सावधानीपूर्वक पेट को बहुत धीरे -धीरे रगड़ना आवश्यक है |
बाल रोगों में कटि स्नान से लाभ :-
  • बच्चों को कटि स्नान करने से उनकी स्मरण शक्ति व् बुद्धि का विकास होता है |
  • बच्चों को सोते समय बिस्तर में पेशाब करना एक ऐसा रोग है जिससे बच्चे में इस रोग के आलावा हीनभावना आनी प्रारंभ हो जाती है | इन बच्चों को यदि नियमित कटि स्नान कराना प्रारंभ कर दिया जाय तो कुछ ही दिनों में रोग से छुटकारा मिल जाता है |
सावधानियां :-
  • कटि स्नान खाली पेट ही लें |
  • कटि स्नान ऐसी जगह में करना चाहिए, जहाँ पर ठंडी हवा के झोंके न आ रहे हों |
  • पानी और शरीर का तापमान समान नही होना चाहिए |
  • कटि स्नान लेने के डेढ़-दो घंटे तक स्नान नहीं करना चाहिए |
  • न्युमोनिया, गठिया, दमा, साईटिका के तीव्र दर्द में कटि स्नान नही लेना चाहिए |
  • एपेंडिक्स, गर्भाशय, मूत्राशय, बड़ी आंत, जननेंद्रिय के विभिन्न अवयवों की नई सूजन तथा ह्रदय रोग की ख़राब स्थिति में कभी भी ठन्डे पानी से कटि स्नान नहीं करना चाहिए |
  • पहले दिन ही अधिक ठन्डे जल से कटि स्नान नहीं करना चाहिए बल्कि प्रथम दो-तीन दिन सामान्य जल [ शरीर के तापमान से थोडा कम तापमान का जल ] का प्रयोग करें तत्पश्चात क्रमशः प्रतिदिन जल के तापमान को कम करते जाएँ |
सामान्यतः कटि स्नान लम्बे समय तक करने पर भी कोई हानि नही है बल्कि लम्बे समय तक ही क्यों इसे अपनी जीवन शैली में ही सम्मिलित कर लेना चाहिए, ताकि आपका शरीर स्वस्थ्य एवं जीवन सुखमय रहे |