Showing posts with label आसन मुद्रा. Show all posts
Showing posts with label आसन मुद्रा. Show all posts

Tuesday, February 2

गंजापन दूर करना है तो करें यह योग

माण्डुकी मुद्रा



मुखं संमुद्रितं कृत्वा जिह्वामूलं प्रचालयेत्। शनैर्ग्रसेदमृतं तां माण्डूकीं मुद्रिकां विदुः ॥६२॥
वलितं पलितं वैव जायते नित्ययौवनम्। न केशे जायते पाको यः कुर्यान्नित्यमाण्डुकीम् ॥६३॥ श्रीघेरण्डसंहिता |

माण्डूकी मुद्रा की विधि :




  1. सुखपूर्वक किसी आसन में बैठकर अपने मुंह को बंद कर लें । आँखें बंद रहें एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रहे

  2. जीभ को पूरे तालू के ऊपर दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं।

  3. जीभ को इस तरह से घुमाने के फलस्वरूप उत्पन्न लार का पान करें (निगलते रहें) योग शास्त्र में इस लार को सुधा या अमृत की संज्ञा दी गयी है।



सावधानियां :




  • माण्डूकी मुद्रा करते समय आपका पूरा ध्यान जीभ के संचालन पर रहना चाहिए |

  • आँखें बंद रखें एवं मन की आँखों से (अन्तःचक्षु) से जीभ के क्रियाकलाप को देखते रहें |

  • भोजन के तुरंत बाद या पहले माण्डूकी मुद्रा न करें | कम-से-कम 30 मिनट के अंतर पर कर सकते हैं |




मुद्रा करने का समय व अवधि :



माण्डूकी मुद्रा करने का सबसे उपयुक्त समय प्रातः एवं सायंकाल का है |
यह मुद्रा 5 मिनट से प्रारंभ करके धीरे-धीरे 15 मिनट तक बढ़ा सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ :




  1. बाल झड़ना, गंजापन एवं असमय सफेद हो रहे बालों को रोकने के लिए योगशास्त्र में माण्डुकी मुद्रा को सबसे श्रेष्ठ उपाय बताया गया है।

  2. माण्डुकी मुद्रा करने से शरीर में झुर्रियां पड़ना रुक जाता है तथा यौवन की प्राप्ति होती है।

  3. माण्डुकी मुद्रा के निरंतर अभ्यास से जीभ, गले और आंखों के रोग समाप्त हो जाते हैं |

  4. इस मुद्रा के प्रभाव से चेहरे एवं शरीर में चमक पैदा हो जाती है।

  5. माण्डुकी मुद्रा से पाचन सम्बन्धी रोग समाप्त हो जाते हैं |



आध्यात्मिक लाभ :



माण्डुकी मुद्रा से इच्छाओं पर सयंम होता है एवं मन को नियंत्रित करने की शक्ति उत्पन्न होती है |

Tuesday, January 26

नभोमुद्रा

नभोमुद्रा की विधि :



सुखपूर्वक किसी आसन में बैठ जाएँ |अपनी दृष्टि को भ्रूमध्य (दोनों भौहों के बीच) को लगा दें एवं जीभ को मुंह के अंदर तालू में लगाएं | यह दोनों कार्य एक साथ करें |
अपनी सुविधा के अनुसार जितनी देर आराम से रुक सकते हैं, इसी स्थिति में रहें |

सावधानियां :




  • मुद्रा करते समय नजर दोनों भौहों के बीच,एवं जीभ तालू के साथ लगाने की किया एक साथ एक ही समय में होनी चाहिए |

  • भोजन के तुरंत बाद या पहले नभोमुद्रा न करें एक घंटे के अंतर पर कर सकते हैं |



मुद्रा करने का समय व अवधि :



प्रारंभ में नभोमुद्रा के अभ्यास को प्रातः एवं सायं 16-16 मिनट के लिए किया जा सकता है | फिर अपनी सामर्थ्य के अनुसार धीरे-धीरे मुद्रा का समय 48 मिनट तक बढ़ा सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ :




  1. नभोमुद्रा से अन्तःस्रावी तंत्र सक्रिय हो जाता है जिससे हार्मोन सम्बन्धी रोग दूर होने लगते हैं |

  2. विचार शक्ति प्रबल हो जाती है एवं मस्तिष्क में स्थिरता बढ़ जाती है जिससे मस्तिष्क सम्बन्धी रोग दूर हो जाते हैं

  3. नभोमुद्रा करने से आँख,जीभ एवं गला सम्बन्धी सभी रोग नष्ट होजाते हैं |

  4. घेरंड संहिता के अनुसार -स्थिर चित्त होकर योगी व्यक्ति यदि श्वास को रोककर अपनी जीभ को मुंह के अंदर तालू में लगाता है तो शरीर के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं |



आध्यात्मिक लाभ :



नभ का अर्थ आकाश होता है एवं नभोमुद्रा का अर्थ है कि जीभ को तालू में लगाना | यह एक रहस्यमयी मुद्रा है | मुद्रा सिद्ध हो जाने पर साधक के समक्ष प्रकृति के रहस्य खुलने प्रारंभ हो जाते हैं |

बवासीर व भगंदर को दूर करे महामुद्रा

अथ महामुद्राकथनम्।



पायुमूलं वामगुल्फे संपीड्य दृढयत्नतः। याम्यपादं प्रसार्याथ करेधृत पदांगुलः ॥६॥

कण्ठ संकोचनं कृत्वा भ्रुवोर्मध्ये निरीक्षयेत्। महामुद्राभिधामुद्रा कथ्यते चैव सूरिभिः ॥७॥

अथ महामुद्राफलकथनम्।

क्षयकांस गुदावर्त्तं प्लीहाजीर्णज्वरं तथा। नाशयेत्सर्वरागांश्च महामुद्रा च साधनात् ॥८॥

महामुद्रा की विधि


  1. सर्वप्रथम जमीन पर चटाई या दरी बिछाकर दोनों पैर आगे की तरफ सीधे फैलाकर बैठ जाएं।

  2. बाएं पैर को मोड़कर इस पैर की एड़ी को अपने मूत्रेन्द्रिय और गुदा द्वार (Anus) के बीच जो सिवनी जैसा भाग है वहां पर दबाबपूर्वक लगा दें | दाहिना पैर सीधा रहे |

  3. धीरे-धीरे श्वास अन्दर भरते हुए मूलबंध (गुदाद्वार को अंदर की तरफ सिकोड़ना) तथा जालंधर बंध (अपनी ठोड़ी (chin) को कंठ में लगाना) लगाते हुए आगे की ओर झुकें एवं दाहिने पैर का अंगूठा पकडकर अपने मस्तक को दाहिने पैर के घुटने पर टिका दें |

  4. आराम से जितना रोक सकते है,श्वास को अंदर ही रोककर रखें एवं यह भावना करें कि शरीर के अंदर जहाँ जिन अंगों में रोग है वहां यह प्राणवायु जाकर रोग को समाप्त कर रही है |

  5. आध्यात्मिक उन्नति के लिए श्वास को पेट में धीरे-धीरे घुमाते हुए यह भावना करनी चाहिए कि यह प्राण कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत कर रहा है एवं रीढ़ की सुषुम्ना नाडी (रीढ़ के बीच में सुषुम्ना नाडी होती है) में प्रवेश कर रहा है |

  6. जब श्वास अंदर रोकना कठिन हो जाये तो घुटने पर से मस्तक को धीरे से उठाते हुए श्वास छोड़ते हुए प्रारंभ की स्थिति में बैठ जाएँ |

  7. इस पूरे क्रम को दूसरे पैर से भी दोहराएँ |



सावधानियां :


  • गंभीर हृदय रोगी एवं उच्च रक्तचाप की स्थिति में महामुद्रा न करें |

  • जिनको स्लिप डिस्क (कमर दर्द)उन्हें यह मुद्रा नहीं करनी चाहिए।

  • महामुद्रा को खाली पेट करें एवं करने के 30 मिनट बाद ही कुछ खाएं-पियें |



मुद्रा करने का समय व अवधि :


  1. महामुद्रा को प्रातः स्नान के बाद खाली पेट करना चाहिए |

  2. महामुद्रा प्रारंभ में दोनों पैरो से 3-3 बार करना चाहिए फिर धीरे-धीरे सामर्थ्य के अनुसार प्राणायाम की संख्या बढ़ाते रहना चाहिए |



मुद्रा के लाभ :

चिकित्सकीय लाभ :


  1. महामुद्रा करने से पेट के लगभग सभी रोगों में लाभ मिलता है | इस मुद्रा से अजीर्ण,अपच,भूख न लगना जैसे रोग समाप्त हो जाते हैं |

  2. महामुद्रा से फेफड़ों को शक्ति मिलती है एवं क्षय, दमा,कफ़ आदि फेफड़ों से सम्बंधित रोग दूर हो जाते हैं |

  3. गोरक्ष पद्धति के अनुसार इस मुद्रा को करने से मलद्वार के आस-पास होने वाले फोड़े,गुल्म (गुदावर्त) एवं प्रमेह रोग समाप्त हो जाता है |

  4. महामुद्रा करने से गुदा के अन्य रोग जैसे बवासीर व भगंदर ठीक हो जाता है |

  5. स्त्रीरोग जैसे - प्रदर, डिसमिनोरिया, मासिकधर्म की परेशानी आदि समाप्त हो जाते हैं।

  6. महामुद्रा हर्निया, हाइड्रोसील और मानसिक रोगियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।



आध्यात्मिक लाभ :


  • महामुद्रा के अभ्यास से प्राणों के उर्ध्वगामी होने के फलस्वरूप अभ्यासी के मुख पर कान्ति आ जाती है |

  • लम्बे समय तक महामुद्रा के अभ्यास से सुषुम्ना में प्राणों का प्रवेश होकर प्राण शक्ति का उर्ध्वगमन प्रारंभ हो जाता है एवं साधक की कुण्डलिनी जाग्रत होने लगती है |