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Saturday, February 22

नेचुरल कॉफी घर पर बनाएँ, हानिकारक चाय-कॉफी से छुटकारा पाएँ !

हम आपको एक ऐसा नुस्खा बताने जा रहे हैं जो शायद आज तक किसी ने ही सुना या प्रयोग किया होगा | एक ऐसा नुस्खा जिसे यदि किसी व्यक्ति को बिना बताए पिलाया जाए तो वह यह जान नहीं पाएगा कि यह कॉफी थी या कुछ और, क्योंकि इस नुस्खे के द्वारा बनाई गयी कॉफी का स्वाद व स्मेल बिलकुल कॉफी की तरह ही होती है | इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर को कोई नुकसान भी नहीं करती, बल्कि इसके फायदे ही फायदे हैं | विश्वास नहीं होता .... तो देर किस बात की है, नीचे दी गयी विधि से कॉफी बनाएँ और इसके स्वास्थ्य लाभ लें -
आवश्यक सामग्री :
  1. गेहूं
  2. मेथी
इन दोनों को बराबर मात्रा मे ले लें और इन्हे अलग-अलग कड़ाही मे अच्छे से भून लें | ठंडा हो जाने पर इन्हे एक मे मिलाकर मिक्सी मे पीसकर पाउडर बना लें | बस तैयार है आपकी नेचुरल कॉफी | एक कप गरम दूध मे एक चम्मच इस पाउडर को मिलाएँ | स्वादानुसार चीनी या शहद मिला सकते हैं | नेचुरल कॉफी का आनंद लें | इससे न सिर्फ कब्ज,गैस, जैसी बीमारियाँ ठीक होंगी, हानिकारक चाय या कॉफी की लत भी छूट जाएगी |


Saturday, November 25

शरीर में कैसी भी गाँठ हो, ख़त्म कर देता है यह नुस्खा !





By- Dr. Kailash Dwivedi

शरीर के किसी भी अंग में उत्पन्न हुयी गाँठ साधारण गाँठ से लेकर कैंसर तक हो सकती हैं। ठीक न होने वाली असामान्य गांठ अथवा आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि सभी गांठे कैंसर ही हों। परन्तु फिर भी इस सम्बन्ध में सावधानी रखते हुए समय से इसकी जाँच एवं उपचार बहुत आवश्यक है | साधारण गांठे भले ही कैंसर की न हों लेकिन इनका भी इलाज आवश्यक होता है। उपचार के अभाव में ये असाध्य रूप ले लेती हैं, परिणाम स्वरूप उनका उपचार लंबा और जटिल हो जाता हैएवं इनका कैंसर में परिवर्तित होने की सम्भावना भी बढ़ जाती है | इस लेख में जानिये एक ऐसे नुस्खे के विषय में जिससे कैसी भी गांठ हो, ठीक हो सकती है | यह औषधि स्वाद में कड़वी होती है परंतु अत्यधिक प्रभावी है। जब तक गाँठ पूरी तरह से समाप्त न हो जाये इस औषधि को बंद नहीं करना चाहिए |

निम्न गांठो में प्रभावी है यह नुस्खा :



  • गर्भाशय की गांठ
  • स्त्री पुरुष के स्तनो की गांठ
  • टॉन्सिल 
  • गले की गाँठ  (बढ़ी हुयी थायराइड ग्लैण्ड -Goiter) 
  • फैट की गांठ (LIPOMA)
  • प्रोस्टेट की गांठ 
  • जांघ के पास की गांठ
  • काँख की गांठ
  • गले के बाहर की गांठ

आवश्यक सामग्री :

पंसारी के यहाँ से निम्न औषधि ले लें -

  • कचनार की शाखा की ताजी छाल 25-30 ग्राम (यदि सूखी छाल हो तो - 15 ग्राम )
  • गोरखमुंडी पाउडर  - 1 चम्मच 

तैयार करने की विधि :

कचनार की छाल को कूटकर  1 गिलास पानी मे उबाले। 2 मिनट तक उबालने के पश्चात् इसमे पिसी हुयी गोरखमुंडी 1 चम्मच की मात्रा में मिला दें | इस मिश्रण को 1 मिनट तक उबालकर छान लें ।

सेवन विधि :

प्रतिदिन प्रातः खाली पेट इस काढ़े को बनाकर गुनगुना रह जाये तब पियें । गाँठ पुरानी होने की स्थिति में इस काढ़े को प्रातः-सायं दोनों समय ले।







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Friday, March 10

दमा के लिए कुछ कारगर घरेलू उपाय



दमा एक आम बीमारी है जिसमें सांस लेने में और छोड़ने में तकलीफ होती है।  दमा कई कारणों से हो सकता है जैसे ख़राब मौसम, धूल, धुंआ जैसे अलर्जन्स , अलेर्जिक खाद्य पदार्थ, इत्र इत्यादि।

दमा के लिए कुछ कारगर घरेलू नुस्खे



  • दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें, यह घरेलू उपाय काफी फायदेमंद होता है। 4-5 लौंग लें और 125 मिली पानी में 5 मिनट तक उबालें। इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाएँ और गरम-गरम पी लें। हर रोज दो से तीन बार यह काढ़ा बनाकर पीने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है।
  • अदरक का एक चम्मच ताजा रस, एक कप मैथी के काढ़े और स्वादानुसार शहद इस मिश्रण में मिलाएं। दमे के मरीजों के लिए यह मिश्रण लाजवाब साबित होता है। मैथी का काढ़ा तैयार करने के लिए एक चम्मच मैथीदाना और एक कप पानी उबालें। हर रोज सबेरे-शाम इस मिश्रण का सेवन करने से निश्चित लाभ मिलता है ।
  • अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियां मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। सबेरे और शाम इस चाय का सेवन करने से मरीज को फायदा होता है।
  • रोगियों को दिन में तीन बार लेने से आराम मिलता है।
  • अदरक का रस और शहद समान मात्रा में लेकर चाटने से श्वास कष्ट दूर होता है और हिचकियाँ बंद हो जाती हैं।
  • 10 ग्राम तुलसी के रस को 5 ग्राम शहद के साथ सेवन करने से हिचकी एवं अस्थमा के रोगी को ठीक किया जा सकता है।
  • करेले की  जड़ का चूर्ण -1 चम्मच  + 1 चम्मच  शहद दोनों को मिलाकर । शहद के स्थान पर  तुलसी के पत्तों का रस भी मिला सकते हैं। इसे एक माह तक प्रतिदिन रात्रि सोते समय लें |यह दमे के लिए बहुत हीं प्रभावकारी औषधि का काम करता है। 
  • लहसुन के लगभग 10 कलियों को लगभग 30 मिली लिटर दूध में उबाल लें। इस मिश्रण को प्रतिदिन एक बार लें |
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Saturday, February 25

कमर दर्द : कारण और घरेलू उपचार



By- Dr. Kailash Dwivedi

कारण :

  1. हमेशा ऊंची एड़ी के जूते या सेंडिल पहनना।
  2. मांसपेशियों पर अत्यधिक तनाव।
  3. गलत तरीके से अधिक वजन।
  4. गलत तरीके से बैठना।

उपचार :

  1. रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन-चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियां काली न हो जायें) गर्म कर लें। ठंडा होने पर इस तेल से कमर की मालिश करें।
  2. नमक मिले गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। इसके बाद पेट के बल लेट जाएं। दर्द के स्थान पर तौलिये से भाप लें। कमर दर्द से राहत पहुंचाने का यह एक अचूक उपाय है।
  3. कढ़ाई में दो-तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। इस नमक को थोड़े मोटे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। कमर पर इस पोटली से सेक करने से भी दर्द से आराम मिलता है।
  4. अजवाइन को तवे के पर थोड़ी धीमी आंच पर सेंक लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चबाते हुए निगल जाएं। इसके नियमित सेवन से कमर दर्द में लाभ मिलता है।
  5. अधिक देर तक एक ही पोजीशन में बैठकर काम न करें। हर चालीस मिनट में अपनी कुर्सी से उठकर थोड़ी देर टहल लें।
  6. नर्म गद्देदार सीटों से परहेज करना चाहिए। कमर दर्द के रोगियों को थोड़ा सख्ते बिस्तर बिछाकर सोना चाहिए।
  7. योग भी कमर दर्द में लाभ पहुंचाता है। भुजंगासन, शलभासन, हलासन, उत्तानपादासन, शवासन आदि कुछ ऐसे योगासन हैं जो की कमर दर्द में काफी लाभ पहुंचाते हैं। कमर दर्द के योगासनों को योगगुरु की देख रेख में ही करने चाहिए।
  8. कैल्शियम की कम मात्रा से भी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, इसलिए कैल्शियमयुक्त चीजों का सेवन करें।
  9. कमर दर्द के लिए व्यायाम भी करना चाहिए। सैर करना, तैरना या साइकिल चलाना सुरक्षित व्यायाम हैं। तैराकी जहां वजन तो कम करती है, वहीं यह कमर के लिए भी लाभकारी है। साइकिल चलाते समय कमर सीधी रखनी चाहिए। व्यायाम करने से मांसपेशियों को ताकत मिलेगी तथा वजन भी नहीं बढ़ेगा।
  10. कमर दर्द में भारी वजन उठाते समय या जमीन से किसी भी चीज को उठाते समय कमर के बल ना झुकें बल्कि पहले घुटने मोड़कर नीचे झुकें और जब हाथ नीचे वस्तु तक पहुंच जाए तो उसे उठाकर घुटने को सीधा करते हुए खड़े हो जाएं।
  11. कार चलाते वक्त सीट सख्त होनी चाहिए, बैठने का पोश्चर भी सही रखें और कार ड्राइव करते समय सीट बेल्ट टाइट कर लें।
  12. ऑफिस में काम करते समय कभी भी पीठ के सहारे न बैठें। अपनी पीठ को कुर्सी पर इस तरह टिकाएं कि यह हमेशा सीधी रहे। गर्दन को सीधा रखने के लिए कुर्सी में पीछे की ओर मोटा तौलिया मोड़ कर लगाया जा सकता है।
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इससे गुर्दे की पथरी हो जाएगी गायब !



By- Dr.Kailash Dwivedi 
गुर्दे की पथरी (वृक्कीय कैल्कली, नेफरोलिथियासिस) मूत्रतंत्र की एक ऐसी स्थिति है जिसमें गुर्दे के अन्दर छोटे-छोटे पत्थर जैसे कठोर पदार्थों का निर्माण होता है। गुर्दें में एक समय में एक या अधिक पथरी हो सकती है। सामान्यत: ये पथरियाँ बिना किसी तकलीफ मूत्रमार्ग से शरीर से बाहर निकाल दी जाती हैं, किन्तु यदि ये पर्याप्त रूप से बड़ी हो जाएं (२-३ मिमी आकार के) तो ये मूत्रवाहिनी में अवरोध उत्पन्न कर सकती हैं। इस स्थिति में मूत्रांगो के आसपास असहनीय पीड़ा होती है। 

पथरी के लक्षण :

  • पीठ के निचले हिस्से में अथवा पेट के निचले भाग में अचानक तेज दर्द होना
  • गुर्दे की पथरी का दर्द अधिकांश रोगी की पीठ से पेट की तरफ आता हैं।
  • पेशाब के साथ-साथ दर्द होना
  • बार बार और एकदम से पेशाब आना
  • रुक रुक कर पेशाब आना
  • रात में अधिक पेशाब आना
  • मूत्र में रक्त भी आ सकता है
  • पेशाब का रंग असामान्य होना
  • कब्ज या दस्त का लगातार बने रहना
  • उल्टी जैसा होना
  • बैचेनी, थकान, तेज पेट दर्द कुछ मिनटो या घंटो तक बने रहना
  • मूत्र संबंधी संक्रमण साथ ही बुखार, कपकपी, पसीना आना

पथरी से ऐसे बचें :

  1. अत्यधिक मात्रा में सोयाबीन, मूंगफली, पालक आदि का सेवन न करें
  2. पानी अधिक पिएं
  3. भोजन में प्रोटीन, नाइट्रोजन व सोडियम की मात्रा कम लें 
  4. विटामिन-सी की भारी मात्रा न लें
  5. नारंगी आदि का रस (जूस) लेने से पथरी का खतरा कम होता है
  6. सप्ताह में एक बार प्रातः खाली पेट एक चम्मच अजवाइन पानी के साथ निगलें

पथरी के घरेलू उपचार :

  1. 250 ग्राम कुल्थी रात्रि में तीन लिटर पानी में भिगो दें। प्रातः भीगी हुई कुल्थी उसी पानी सहित धीमी आग पर चार घंटे तक पकाएं। जब एक लिटर पानी रह जाए तब नीचे उतार लें। तत्पश्चात इस पानी में 30 ग्राम से 50 ग्राम देशी घी का छोंक लगाएं। छोंक में थोड़ा-सा सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा, हल्दी डाल सकते हैं। दोपहर के भोजन के स्थान पर यह सारा सूप पी जाएं। 250 ग्राम पानी अवश्य पिएं। प्रतिदिन एक-दो सप्ताह इस प्रयोग से गुर्दे तथा मूत्राशय की पथरी गल कर बिना ऑपरेशन के बाहर आ जाती है |
  2. भोजन में करेले की सब्जी का प्रयोग करें | करेले का जूस भी लाभकारी है।
  3. मिश्री की चाशनी में एक चम्मच जीरा मिलाकर शहद के साथ लेने पर पथरी घुलकर पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है।
  4. एक मूली को खोखला करके उसमे 20 ग्राम गाजर व 20 ग्राम शलगम के बीज भर दें। उसके बाद मूली को भून लें, मूली से बीज निकाल कर पीस लें। प्रतिदिन प्रातः पांच ग्राम पाउडर पानी के साथ एक माह तक पियें |
  5. गुर्दे की पथरी में प्रतिदिन चुकंदर का रस पीने से पथरी बाहर निकल जाती है। चुकंदर के सूप का सेवन करने से भी पथरी समाप्त हो जाती है।
  6. प्रतिदिन प्रातः 4 छुहारों का सेवन करने से भी पथरी का रोगी ठीक हो सकता है।
  7. प्रतिदिन नियमित रूप से छाछ का सेवन करते रहने से भी पथरी छोटी होकर बाहर निकल जाती है।

विशेष :

  • पालक, टमाटर, बैंगन, चावल, उड़द, लेसदार पदार्थ, सूखे मेवे, चॉकलेट, चाय, मद्यपान, मांसाहार आदि का सेवन न करें
  • मूत्र को रोकना नहीं चाहिए
  • लगातार एक घंटे से अधिक एक आसन पर न बैठें।
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Wednesday, February 22

खुजली का घरेलू उपचार



  • नींबू का रस एवं अलसी के तेल को बराबर मात्रा में  मिलाकर खुजली वाली जगह पर मलने से हर तरह की खुजली से छुटकारा मिलता है।

  • नारियल के ताज़े रस और टमाटर का मिश्रण खुजली वाली जगह पर लगाने से भी खुजली दूर हो जाती है।
  • यदि  खुजली पूरे शरीर में फैल रही है तो 3 या 4 दिनों तक पीसी हुई अरहर की दाल दही में मिश्रित करके पूरे शरीर पर लगायें। 

  • शुष्क त्वचा के कारण होनेवाली खुजली पर  दूध की क्रीम लगाने से यह कम हो जाती है।

  • खुजली वाली त्वचा पर नारियल तेल अथवा अरंडी का तेल लगाने से बहुत लाभ होता  है |

  • बबूल के पेड़ की छाल से एक्ज़िमा के कारण हो रही खुजली नियंत्रण में आती है।
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Sunday, February 19

शीतपित्त ; कारण,लक्षण और उपचार



शीतपित्त के कारण :

  • गर्मी से आने के बाद ठंड़ा पानी, कोल्ड ड्रिंक या आइसक्रीम खाना |
  • तेल-मिर्च, गर्म मसाले और अम्ल रसों से बने चटपटे खाद्य पदार्थों और बाजार में बिकने वाले फास्ट फूट व चाइनीज खाना खाने से भी यह रोग होता है।


लक्षण :
शरीर पर लाल-लाल चकत्ते या ददोड़ पड़ना जिनमें मीठी- मीठी खुजली होना या चींटी की तरह काटने सा एहसास होता है। यह पूरे शरीर में फैल जाती है। चकत्ते की जगह त्वचा लाल और सूजनयुक्त हो जाती है और उनमें उभार दिखाई देता है।

घरेलू उपचार :
काली मिर्च पीसकर घी में मिलाकर चाटने से शीत पित्त में आराम मिलता है।
गेरु, हल्दी, मजीठ, काली मिर्च, अडूसा सब 10-10 ग्राम लेकर कूट- पीसकर मिलाकर सुबह-शाम चाटने से शीत पित्त में आराम होता है।
गुड के साथ हल्दी भुनकर खाने से शीत -पित्त और खुजली में बहुत आराम मिलता है।
अजवाइन और गुड़ खाने से शीतपित्त मिट जाता है।

परहेज :

  1. हरी साग-सब्जी, फल, रेशेदार खाद्य पदार्थ, पुराने चावल, जौ, मूंग, चना आदि का सेवन करें। नहाने में गर्म पानी का उपयोग करें।
  2. यदि  पित्ती उछल रही है तो उस समय नहाना नहीं चाहिए, ठंड़ी हवा से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में यदि कूलर या A/c चल रहा हो तो उसे बन्द कर दें |
  3.  भोजन में नमक की मात्रा कम कर दें ।
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Wednesday, February 15

मोटापा कम करने के कुछ घरेलू उपाय



वजन कम करना और चर्बी को गला देना दोनों ही अलग अलग बातें हैं। आज कल हम तरह तरह के जंक फूड खाते रहते हैं, जिनमें खाद्य पदार्थ और पोषण के नाम पर कुछ भी नहीं होता, लेकिन हां, इससे फैट खूब मिल जाता है। यही फैट आपके शरीर में जम जाता है जो कई दिनों तक रहने से विष का रूप ले लेता है।

कुछ घरेलू उपायों से आप इस चर्बी तथा टॉक्‍सिन को अपने शरीर से निकाल सकते हैं। जब आप शरीर से इस फैट को निकालेगें तो आपके शरीर की सफाई भी होगी, जिससे पेट साफ रहेगा और त्‍वचा दमकने लगेगी। यह घरेलू उपचार हैं, जिनका कोई साइड इफेक्‍ट नहीं होगा और मोटापा भी अलग से दूर होगा।

आप इन पेय को अपने घर पर ही बना सकते हैं। यह घरेलू पेय अभी से नहीं बल्कि कई दशको से अलग-अलग देशों में प्रयोग किये जाते आ रहे हैं। तो आइये देखते हैं कौन से हैं वे पेय जो शरीर से फैट को गला देते हैं।

नींबू, शहद और गरम पानी :

रोज सुबह खाली पेट इसे पीने से आपको पेट सही रहेगा, स्‍किन साफ रहेगी और मोटापा भी दूर रहेगा।

ग्रीन टी :

ग्रीन टी में एंटीऑक्‍सीडेंट होता है जो कि झुर्रियों को दूर रखती है। अगर आपको अपना मोटापा घटाना है तो ग्रीन टी को बिना चीनी मिलाए पियें।

लौकी जूस :

यह एक पौष्टिक सब्‍जी है। इसे पीने से पेट भर जाता है, इसमें फाइबर होता है और यह पेट को ठंडक पहुंचाती है। लौकी का जूस पीने से घंटो तक पेट भरा रहता है और मोटापा भी कंट्रोल होता है।

धनिया जूस :

इस जूस को पीने से किडनी सही रहती है और मोटापा भी कंट्रोल रहता है। इसे पीने से पेट देर तक भरा रहता है और यह शरीर की शुद्धि करता है।
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Monday, February 13

अनगिनत रोगों की औषधि है पीपल का वृक्ष - जानिए उपयोग




  • स्कन्द पुराण के अनुसार - अश्वत्थ (पीपल) के मूल में भगवान विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं। पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप है।
  • भगवान कृष्ण कहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ। स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है।
  • शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।
  • प्रसिद्ध ग्रन्थ व्रतराज के अनुसार -  अश्वत्थोपासना में पीपल वृक्ष की महिमा का उल्लेख है। अश्वत्थोपनयनव्रत में महर्षि शौनक द्वारा इसके महत्त्व का वर्णन किया गया है।
  • अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेद के अनुसार -  पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र, जप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया है।
  • श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए।
पीपल के बीज राई के दाने के आधे आकार में होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों वर्षो तक खड़ा रहता है। पीपल के वृक्ष के पत्ते मार्च के महीने में झड़ जाते हैं और गर्मी के मौसम में इसमें फल की बहार आती है, जो बारिश के मौसम में पकते हैं। पुराने पीपल के पेड़ से लाक्षा (लाख, चपड़ा) भी प्राप्त होती है।
पीपल के पेड़ के अनेक अलौकिक स्वास्थ्यकर गुणों के कारण इसे हिन्दू धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना गया है |पीपल पाचनशक्तिवर्द्धक, वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला), मधुर-रसायन, वातकफनाशक, हल्की, दस्तावर, श्वास (दमा), खांसी, बुखार, कोढ़, प्रमेह (वीर्य विकार), बवासीर, प्लीहा शूल तथा आमवात आदि रोगों में लाभकारी है। यह पेशाब और मासिक-धर्म के बहने को जारी करती है, गर्भ को गिरने नहीं देती है। हृदय (दिल) की बीमारियों को हटाती है। कृमि (कीड़े) रोगों का नाश करती है। पीपल की छाल का लेप सूजन को मिटाता है, नासूर के लिए लाभकारी है तथा घावों को भरता है।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

हिंदी       :  पीपरि, पीपल।
संस्कृत    :  अश्वत्थ, पिप्पल, चलपत्र, गजाशन, बौधिद्रु।
बंगाली     :  पिपुल, अश्वत्थ।
मराठी      :  पिम्पली, पीपल।
कर्नाटकी   :  अरलीमारा।
तैलगू       :  रावीचेट्टु।
तमिल     :  आराकमरं, अष्वत्थम।
कन्नड़     :  अश्वत्थ।
गुजराती   :  लिंडी पीपर, पीपलों।
मलयलम :  अरायल।
फारसी    :  फिल-फिल दराज, दरख्तलरजा।
अंग्रेजी    :  डारफिल, सेक्रेड फिग, पोपलरलिब्ड फिग ट्री।
लैटिन    :  पाइपर लांगम, फाइकरिलिजियोजा।
  • रंग : इसका रंग भूरा और हरा होता है।
  • स्वाद : पीपल खाने में चरपरा होता है। कच्चा पीपल बाखट और पका पीपल फीका और मीठा होता है।
  • स्वरूप : यह एक प्रकार की गुल्म जातीय लता है। इसमें ही फल लगा करते हैं। पीपल के पत्ते पान की तरह छोटे, गोल तथा बड़ी नोक वाले नुकीले होते हैं। पीपल के फल पत्तों की जड़ में छोटे-छोटे गोल-गोल झड़बेरी के समान लगते हैं, पीपल के फल आधा व्यास के पकने पर बैंगनी या काले हो जाते हैं। इसकी डाली में लाख भी पैदा होती है।
  • स्वभाव : पीपल की तासीर गर्म होती है। पीपल का पत्ता और छाल ठंडी और रूखी होती है। बाकी भाग गर्म होता है।

रोगों में सेवन योग्य मात्रा :

  • पीपल की छाल और फलों का चूर्ण :  1 से 3 ग्राम।
  • लाक्षा (गोंद का) चूर्ण :  1 से 2 ग्राम।
  • छाल, पत्तों का काढ़ा :  50 से 100 मिलीलीटर।
  • पत्तों का रस :  10 से 20 मिलीलीटर |

विभिन्न रोंगों का पीपल से उपचार :

 मुंह के छाले :

पीपल की छाल के काढ़े से सुबह-शाम गरारे करने और छाल के चूर्ण को शहद में मिलाकर छालों पर लगाने से छालों में आराम मिलता है।

अफीम का नशा उतारने हेतु :

पीपल की छाल का काढ़ा रोगी को पिलाने से अफीम का जहर उतर जाता है |

हिचकी का रोग:

  • 1 ग्राम की मात्रा में पीपल का चूर्ण शहद या शर्करा के साथ चाटने से हिचकी आना बंद हो जाती है।
    पीपल के पेड़ की छाल पानी में घोलकर कुछ देर छोड़ दें। फिर इसके पानी को निथारकर पीने से हिचकी ठीक हो जाती है।
  • 1 ग्राम पीपल की लाख का चूर्ण शहद में मिलाकर रोगी को चटाने से हिचकी का रोग दूर हो जाता है।

खूनी दस्त :

पीपल की कोमल टहनियां, धनिये के बीज तथा मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर 3-4 ग्राम रोजाना सुबह-शाम सेवन कराने से खूनी दस्त के रोग में लाभ होता है।

उपदंश (सिफलिस):

पीपल के तने की 50 ग्राम सूखी छाल की राख, उपदंश पर छिड़कने से उपदंश के घाव ठीक हो जाते हैं।

पेट में दर्द:

पीपल के मुलायम 3 पत्तों को बारीक पीसकर गुड़ को मिलाकर छोटी-छोटी गोली बना लें। इन गोलियों को सुबह-शाम 1-1 गोली खुराक के रूप में खाने से पेट के दर्द में लाभ हो जाता है।

रक्त शुद्धि हेतु :

1-2 ग्राम पीपल के बीजों के चूर्ण को शहद के साथ सुबह-शाम चाटने से खून साफ हो जाता है।

प्रदर:

40 ग्राम पीपल के गोंद को कूट-पीसकर इसे 5 ग्राम गाय के कच्चे दूध के साथ प्रातः सेवन करने से प्रदर रोग मिट जाता है।
• पीपल के सूखे गोंद को आटे में मिलाकर गाय के दूध में हलवा बनाकर खाने से प्रदर में लाभ मिलता है।

श्वास (दमा) :

पीपल की लाख का चूर्ण घी और शक्कर के साथ मिलाकर खाने से दमा के रोग में आराम आता है।

कब्ज:

  • पीपल के 5-10 फल को प्रतिदिन खाने से कब्ज समाप्त हो जाती है ।
  • पीपल के पत्ते और कोमल कोपलों का 40 मिलीलीटर काढ़ा पीने से पेट साफ होता है।
घाव :
• पिसी हुई पीपल की छाल का काढ़ा बनाकर उससे घाव को धोने से घाव जल्दी भर जाता है।
• पीपल की छाल का बारीक चूर्ण घाव पर लगाने से रक्तस्राव (खून का बहना) बंद होकर घाव जल्दी भर जाता है।
• पीपल की छाल का बारीक चूर्ण लगाने से सड़े हुए तथा न भरने वाले घाव जल्दी ठीक होकर भर जाते हैं। भगंदर और कंठमाला के रोग में भी इससे लाभ होता है।
• पीपल की सूखी छाल को पीसकर जले हुए स्थान पर बुरकने से आग से जला हुआ घाव ठीक हो जाता है।

पुरानी खांसी में कफ के साथ खून आना :

  • लगभग आधा ग्राम पीपल की लाख, 1 चम्मच शहद, 2 चम्मच घी और थोड़ी सी मिश्री को मिलाकर दिन में 5-6 बार रोगी को देने से खून की खांसी बंद हो जाती है।
  • पीपल की लाख का चूर्ण घी और शक्कर के साथ खाने से सूखी खांसी में आराम आता है।

बुखार:

  • पीपल के पेड़ की टहनी तोड़कर उसे चबाकर रस को चूसे और लकड़ी थूक दें। इससे मलेरिया व हर प्रकार का बुखार उतर जायेगा।
  • हल्का बुखार, सूखी खांसी और कमजोरी के रोग में घी, शहद और चीनी के साथ पीपल की लाख देनी चाहिए।

बच्चों का शारीरिक दर्द एवं अनिद्रा :

एक चुटकी पीपल की लाख को थोड़े से दूध में मिलाकर बच्चों को पिलाने से बच्चों के दर्द और नींद न आना दूर होता है।

दांतों के रोग :

पीपल की ताजी टहनी को दांतों से चबाकर दातुन करने से और इसकी छाल के काढ़े से गरारे करने से मुंह की दुर्गंध मिटती है, दांतों का दर्द, पायरिया एवं मसूढ़ों की सूजन में भी लाभ होता है ।

चर्म रोग:

  • पीपल के पत्तों को पानी में उबालकर उसके काढ़े से नहाने से त्वचा के अनेक रोग दूर हो जाते हैं।
  • पीपल की कोमल कोपलें खाने से खुजली और त्वचा पर फैलने वाले चर्मरोग दूर हो जाते हैं। इसका 40 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर पीने से भी यही लाभ होता है।
  • 6 ग्राम पीपल के पेड़ की जड़ के चूर्ण को 5 कालीमिर्च के साथ बारीक पीसकर और छानकर पीने से और इसी लेप बनाकर श्वेत कुष्ठ (कोढ़) में लगाने से श्वेत कुष्ठ दूर होता है।

गर्भ का न ठहरना :

  • 250 ग्राम पीपल के पेड़ की सूखी पिसी हुई जड़ों में 250 ग्राम बूरा मिलाकर रख लें। जिस दिन से पत्नी का मासिक-धर्म आरम्भ हो, उस दिन से इसे पति व पत्नी दोनों 4-4 चम्मच गर्म दूध के साथ 11 दिनों तक फंकी लें। जिस दिन यह मिश्रण समाप्त हो, उसी रात से 12 बजे के बाद प्रतिदिन संभोग (स्त्री प्रंसग) करने से बांझपन की स्थिति में भी गर्भधारण की संम्भावना बढ़ जाती है।
  • पीपल के सूखे फलों के 1-2 ग्राम चूर्ण कच्चे दूध के साथ मासिक-धर्म के शुद्ध होने के बाद 14 दिनों तक देने से बांझपन में लाभ होता है।

हकलाहट :

आधा चम्मच पीपल के पके फलों का चूर्ण शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से हकलाहट में लाभ होता है।

नपुंसकता :

आधा चम्मच पीपल के फल का चूर्ण दिन में 3 बार दूध के साथ सेवन करते रहने से नपुंसकता (नामर्दी) दूर होकर, बल, वीर्य तथा पौरुष बढ़ता है।

वीर्यवर्धक :

  • पीपल की जड़ की छाल का प्रयोग करने से वीर्य अधिक गाढ़ा होता है |
  • छाया में सुखाये गए पीपल के फल को पीसकर छान लें। इस चौथाई चम्मच चूर्ण को 250 मिलीलीटर गर्म दूध में मिलाकर प्रतिदिन पीने से वीर्य बढ़ जाता है। नपुंसकता दूर होती है। इससे मासिक-धर्म के रोग, श्वेतप्रदर एवं कब्ज में भी अत्यंत लाभ होता है।

पीलिया :

पीपल के 3-4 पत्तों को मिश्री के साथ खरल में खूब घोंटकर बारीक पीस लें इसमें 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर छान लें। 3- 5 दिनों तक प्रतिदिन यह पेय पीने से लाभ होता है |

अपच :

  • पीपल का 1 पत्ता + 4 कलियां शीशम की + थोड़ा-सा हरा धनिया आपस में मिलाकर 1 कप पानी में तब तक उबालें जब तक पानी आधा कप न बच जाए, फिर इसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर पीने से आराम होगा।
  • पीपल के पेड़ की कोपलों को मिट्टी के बर्तन में बंद करके जलाकर उसकी राख बना लें। इस राख को खाने से मंदाग्नि एवं  अजीर्ण में लाभ होता है।
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Sunday, February 12

हल्दी के बेहद असरकारी औषधीय प्रयोग



By-Dr. Kailash Dwivedi
हल्दी (टर्मरिक) भारतीय वनस्पति है। यह अदरक की प्रजाति का ५-६ फुट तक बढ़ने वाला पौधा है जिसमें जड़ की गाठों में हल्दी मिलती है। हल्दी को आयुर्वेद में प्राचीन काल से ही एक चमत्कारिक द्रव्य के रूप में मान्यता प्राप्त है।

  • लैटि‍न नाम : करकुमा लौंगा
  • अंग्रेजी नाम : टरमरि‍क (Turmeric)

हल्‍दी में पाए जाने वाले तत्‍व (100 ग्राम में) :

  •     जल 13.1  ग्राम 
  •     प्रोटीन 6.3  ग्राम 
  •     वसा 5.1  ग्राम 
  •     खनिज पदार्थ 3.5  ग्राम 
  •     रेशा 2.6  ग्राम 
  •     कारबोहा‍‍इड्रेट 69.4 ग्राम 
  •     कैल्शियम 150 मिलीग्राम 
  •     फासफोरस 282 मिलीग्राम 
  •     लोहा 15 मिलीग्राम 
  •     विटामिन ए 50 मिलीग्राम 
  •     विटामिन बी 03 मिलीग्राम 
  •     कैलोरी (प्रति 100 ग्राम में) : 349 कैलोरी 

हल्‍दी की औषधीय मात्रा

वयस्‍क व्‍यक्ति के लिये निश्चित की गयी मात्रा :
  •  कच्‍ची हल्‍दी का रस : 1 से 3 चाय चम्‍मच तक 
  •  सूखी हल्‍दी का चूर्ण : 1 ग्राम से 4 ग्राम तक 
किशोंरों के लिये :
  • 500 मिलीग्राम से 1 ग्राम तक 
बच्‍चों के लिये :
  • 50 मिलीग्राम से 100 मिली ग्राम तक 
लेने का तरीका :

 इसे आवश्‍यकतानुसार गुनगुनें पानीं, गरम चाय अथवा दूध के साथ दिन मे, तकलीफ के हिसाब से, एक बार से लेकर चार या पांच बार तक ले सकते हैं | इसके कोई साइड इफेक्‍ट नहीं हैं और हल्‍दी पूर्ण रूप से सुरक्षित औषधि है |

    विभिन्न रोगों में हल्दी का प्रयोग :




    दमा (अस्थमा) :

    दमा रोग में हल्‍दी का चूर्ण 2 से 3 ग्राम + अदरख के एक या दो चम्‍मच रस + एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में चार बार खानें से दमा रोग में लाभ होता है | कुछ दिनों तक यह प्रयोग लगातार करना  चाहिये | अगर रोगी एलापैथी की दवायें खा रहा है, तो भी यह प्रयोग कर सकते हैं जैसे जैसे आराम मिलता जाए, एलापैथी दवाओं की मात्रा कम करते जाएँ |

    लिवर के रोग :

    लिवर के सभी विकारों में - पीलिया , पान्‍डु रोग इत्‍यादि में हल्‍दी का चूर्ण 1 ग्राम , कुटकी का चूर्ण 500 मिलीग्राम मिलाकर दिन में तीन बार सादे पानीं के साथ खाना चाहिये | प्‍लीहा (तिल्ली) की सभी बीमारियों में भी यह चूर्ण लाभकारी है |

    मूत्र रोग :

    प्रमेह ,बहुमूत्र , गंदा पेशाब , पेशाब में जलन , पेशाब में एल्‍बूमन जाना , पेशाब में रक्‍त , पीब के कण आदि रोगों में हल्‍दी चूर्ण 1 ग्राम दिन में चार बार सादे पानीं से सेवन करें |

    मधुमेह :

    मधुमेह  में हल्‍दी 2 ग्राम + जामुन की गुठली का चूर्ण 2 ग्राम + कुटकी 500 मिलीग्राम मिलाकर दिन में चार बार सादे पानीं से खायें |

    अनचाहे बाल हटाने के लिए :

    यदि  त्वचा पर अनचाहे बाल उग आये हों तो इन बालों को हटाने के लिये हल्दी पाउडर को गुनगुने नारियल तेल में मिलाकर पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट को हाथ-पैरों पर लगाएं। ऐसा करने से शरीर के अनचाहे बालों से निजात मिलती है।

    चोट-मोच :

    चोट लगने या मोच होने पर हल्दी बहुत फायदा करती है। मांसपेशियों में खिंचाव  या अंदरूनी चोट लगने पर हल्दी का लेप लगाएं या गर्म दूध में हल्दी पाउडर डालकर पियें।

    सौन्दर्य हेतु :

    हल्दी को दूध में मिलाकर इसका पेस्ट बना लीजिए। इस पेस्ट को चेहरे पर लगाने से त्वचा का रंग निखरता है।

    चेहरे के दाग-धब्बे :

    • दाग, धब्बे व झाइंया मिटाने के लिए हल्दी बहुत फायदेमंद है। चेहरे के दाग-धब्बे और झाइयां हटाने के लिए हल्दी और काले तिल को बराबर मात्रा में पीसकर पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाएं।
    • हल्‍दी का चूर्ण 1 ग्राम और आवश्‍कतानुसार दूध मिलाकर बनाया हुआ पेस्‍ट मुहासों , सफेद दाग या काले दाग , रूखी त्‍वचा , खुजली , खारिश आदि तकलीफों में लगानें से आरोग्‍य प्राप्‍त होता है |
    • चेहरे का सौंदर्य , त्‍वचा का सौंदर्य ‍निखारनें के लिये हल्‍दी का उबटन प्रयोग करना चाहिये |

    त्वचा रोग :

    • एलर्जी , शीतपित्‍ती , जलन का अनुभव , ददोरे आदि पड़ जानें की तकलीफ में हल्‍दी को पानी के साथ पेस्‍ट जैसा बनाकर लगानें से आराम मिलता है |
    • फोड़ा फुन्‍सी पकानें के लिये - हल्‍दी की पुल्टिस रखनें से फोड़ा फुंसी शीघ्र पक जाते हैं |
    • घाव , कटे एवं पके हुये , पीब से भरे घावों में हल्‍दी का चूर्ण छिड़कनें से घाव शीघ्र भरते हैं |
    • चाकू या धारदार अस्‍त्र से शरीर का कोई अंग कट जानें पर हल्‍दी का चूर्ण छिड़कनें से लाभ प्राप्‍त होता है |

    मुंह के छाले :

    मुंह में छाले होने पर गुनगुने पानी में हल्दी पाउडर मिलाकर कुल्ला करें या हलका गर्म हल्दी पाउडर छालों पर लगाएं। इससे मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।

    बबासीर का दर्द :

    बवासीर के मस्‍सों का दर्द अथवा जलन ठीक करनें के लिये हल्‍दी का चूर्ण मस्‍सों पर छिड़कना चाहिये |

    सूजन-दर्द :

    शरीर के किसी भी स्‍थान की सूजन के साथ दर्द और जलन हो तो हल्‍दी के पेस्‍ट का बाहरी प्रयोग करनें से इन तकलीफों में आराम मिल जाता है |

    जुखाम, बुखार, खांसी :

    सभी प्रकार के बुखार , जुखाम एवं खांसी में हल्‍दी का चूर्ण 1 से 3 ग्राम तक गरम पानीं से दिन में दो बार , सुबह शाम , खानें से लाभ होता है
    • नाक से संबंधित सभी तरह की तकलीफों , पुराना जुकाम , पीनस , नाक का मांस बढ़ जानें , साइनुसाइटिस में हल्‍दी का चूर्ण 1 से 2 ग्राम की मात्रा में दिन में दो बार खाने से लाभ होता है उक्‍त तकलीफों से होनें वाले सिर दर्द , बुखार , बदन दर्द आदि लक्षण भी ठीक हो जाते हैं |

    इस्‍नोफीलिया :

    इस्‍नोफीलिया मे  2 से 3 ग्राम हल्‍दी चूर्ण गुनगुनें पानीं से , दिन में तीन बार , खानें से इस रोग में आराम मिलता  है कुछ दिनों तक लगातार खानें से रोग समूल नष्‍ट हो जाते हैं | जैसे जैसे इस्नोफिल काउन्‍ट कम होता जाये, वैसे हल्‍दी की मात्रा घटाते जाना चाहिये |
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    Saturday, February 11

    स्वप्नदोष दूर करने के कुछ सरल घरेलू उपाय




    • प्रतिदिन रात्रि को सोने से पहले 4- 5 चमच्च की मात्रा में तुलसी की जड़ का काढा  कुछ हफ़्तों तक पीने से स्वप्नदोष दूर होता है |
    • एक चमच्च की मात्रा में बड़े गोखरू के फल का चूर्ण , थोडा घी और मिश्री मिलाकर एक हफ्ते तक सुबह शाम लेने से भी स्वप्नदोष दूर होता है |
    • अपामार्ग की जड़ का चूर्ण और मिश्री को समान मात्रा में पीस कर एक साथ मिश्रण कर लें ! इस मिश्रण को एक चमच्च की मात्रा में दिन में तीन बार दो हफ्ते तक सेवन करने से स्वप्नदोष से छुटकारा मिल जाता है |
    • इसबगोल और मिश्री बराबर मिलाकर एक चमच्च एक कप दूध के साथ रात को सोने से एक घंटे पहले लें और उसके बाद सोते समय मूत्र त्याग करके सो जाएँ ! इससे भी स्वप्नदोष का निराकरण होता है l
    • आँवले के रस में इलायची के दाने और इसबगोल बराबर की मात्रा में मिलाकर सुबह शाम एक एक चमच्च का सेवन करने से भी स्वप्नदोष दूर होता है |
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    Friday, February 10

    अमृत रसायन है लहसुन, जानिए क्यों !



    पौराणिक मान्यता के अनुसार -  देव-दानव के बीच हुए अमृत युद्ध में अमृत की कुछ बूंदे धरती पर बिखर गई उन्हीं बूंदों से धरती लहसुन के पौधे की उत्पत्ति हुयी | इसीलिए इसे अमृत रसायन कहा जाता है।

    लहसुन का रोगों में उपयोग :

    काली खाँसी :  

    लहसुन के रस की पाँच-पाँच बूंदें सुबह- शाम लेने से काली खांसी में अत्यधिक लाभ मिलता है |

    गठिया एवं  अन्य जोड़ों के रोग : 

    इसमें लहसुन का सेवन बहुत ही लाभदायक है। लहसुन का इस्तेमाल जोड़ों के दर्द या गठिया में होता है तथा यह सूजन का भी नाश करती है। यह जोड़ों के दर्द के उद्दीपन को घटाता है। लहसुन की पुल्टिस को किसी भी सूजे भाग पर बाँधने या ताजा स्वरस रगड़ने से सूजन मिटती है।

    पेचिश : 

    पेचिश में 10 ग्राम लहसुन का रस मट्ठे में मिलाकर सुबह, दोपहर, शाम कुछ दिनों तक लें। रस हर बार ताजा निकालें। आशातीत लाभ होने पर बंद कर दें।

    हृदय रोग :

    यदि रोज नियमित रूप से लहसुन की पाँच कलियाँ खाई जाएँ तो हृदय संबंधी रोग होने की संभावना में कमी आती है।



    साँप तथा बिच्छू का जहर : 

    साँप तथा बिच्छूके काटे पर लहसुन की ताजी कलियाँ पीसकर लगाएँ। जहाँ तक ज़हर चढ़ गया हो, वहाँ तक इस लेप को लगाकर पट्टी बाँध देने से ज़हर उतर जाता है। बिच्छू के काटे स्थान पर डंक साफकर लहसुन और अमचूर पीसकर लगाने से ज़हर उतर जाता है।

    जी मचलाना : 

    जी मचलने पर लहसुन की कलियाँ चबा लें या लहसुनादि वटी चूसें, लहसुन के हरे पत्तों की चटनी भी लाभकारी रहती है।

    एंटीसेप्टिक : 

    यह शरीर के लिए एंटीसेप्टिक का काम करता है। लहसुन में एंटीबायोटिक दवाओं से अधिक गुण हैं, जिसकी वजह से वह रोगाणुओं का नाश करती है। यही कारण है कि घाव धोने के लिए लहसुन के एक भाग रस में तीन भाग पानी मिलाकर काम में लिया जाता है।

    कैंसर : 

    लहसुन में जर्मेनियम तत्व पाया जाता है जो एंटी कैंसर के रूप में काम करता है। कैंसर के इलाज में भी डाॅक्टरस लहसुन की महत्वपूर्ण भूमिका बताते हैं।

    पोषक तत्व : 

    प्रतिदिन लहसुन की एक कली के सेवन से शरीर को विटामिन ए, बी और सी के साथ आयोडीन, आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम और मैग्निशयम जैसे कई पोषक तत्व एक साथ मिल जाते हैं।

    मोटापा : 

    यदि आप लहसुन की 2-3 की कलियों को पीसकर गर्म पानी के साथ लेते हैं तो ये आपको ओवरवेट की समस्या से छूटकारा दिलायेगा।

    श्वास रोग : 

    लहसुन की कलियों को तवे पर भूनकर बच्चों को खिलाने से सांस की तकलीफ दूर होती है। ये 3-4 कलियों से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।


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    Wednesday, February 8

    स्वस्थ्य रहने के लिए इन बातों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें




    By- Dr. Kailash Dwivedi
    • प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त (4-6 बजे ) के मध्य अर्थात सूर्योदय से पूर्व बिस्तर छोड़ दें।
    • सुबह दंतधावन एवं शौचादि से पूर्व तांबे के लोटे में रात्रि को रखा पानी पीयें,इससे मल खुलकर आता है तथा कब्ज की शिकायत नहीं होती है।
    • नाश्ता या भोजन हमेशा भूख से थोड़ा कम करें तथा योग्य आहार का ही सेवन करें तथा भोजन के साथ - साथ पानी पीने क़ी प्रवृति से बचें।
    • दिनचर्या में जानबूझकर,अनजाने में या असयंमित होकर किये गए आचरण को प्रज्ञापराध की श्रेणी में रखा जाता है,इससे से बचें क्योंकि यह सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों का कारण है।
    • आहार स्वयं एक औषधि है,अत:ज्ञानेन्द्रिय को वश में करते हुए ही भोजन सहित अन्य आचरण करना स्वस्थ रहने में मददगार होता है।
    • आयुर्वेद के अनुसार शुद्ध जल एवं वायु का सेवन रोगों से मुक्ति का मार्ग है।
    • भोजन में गाय के दूध का सेवन आयुर्वेद में जीवनीय माना गया है तथा यह स्वयं में एक रसायन औषधि है जिसके नित्य सेवन से बुढापा देर से आता है।
    • एक हरड का नित्य सेवन लम्बी आयु देता है,कहा भी गया है की मां कभी नाराज हो सकती है परन्तु हरड़ नहीं।
    • साल में एक बार शरीर रूपी मशीन का शोधन प्राकृतिक चिकित्सक के निर्देश में अवश्य करवाएं, जिससे लम्बी एवं रोगरहित आयु प्राप्त होती है।
    • रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के लिए आंवले का सेवन नित्य करें।
    • घी का नियंत्रित मात्रा में प्रयोग करें।

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    Monday, February 6

    अलसी के फायदे




    • ऊर्जा, स्फूर्ति व जीवटता प्रदान करता है।
    • तनाव के क्षणों में शांत व स्थिर बनाए रखने में सहायक है।
    • कैंसररोधी हार्मोन्स की सक्रियता बढ़ाता है।
    • रक्त में शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है।
    • जोड़ों का कड़ापन कम करता है।
    • प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रखता है।
    • हृदय संबंधी रोगों के खतरे को कम करता है।
    • उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है।
    • त्वचा को स्वस्थ रखता है एवं सूखापन दूर कर एग्जिमा आदि से बचाता है।
    • बालों व नाखून की वृद्धि कर उन्हें स्वस्थ व चमकदार बनाता है।
    • इसका नियमित सेवन रजोनिवृत्ति संबंधी परेशानियों से राहत प्रदान *करता है। मासिक धर्म के दौरान ऐंठन को कम कर गर्भाशय को स्वस्थ रखता है।
    • अलसी का सेवन त्वचा पर बढ़ती उम्र के असर को कम करता है।
    • अलसी का सेवन भोजन के पहले या भोजन के साथ करने से पेट भरने *का एहसास होकर भूख कम लगती है। इसके रेशे पाचन को सुगम बनाते हैं, इस कारण वजन नियंत्रण करने में अलसी सहायक है।
    • चयापचय की दर को बढ़ाता है एवं यकृत को स्वस्थ रखता है।
    • प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रख कब्ज से मुक्ति दिलाता है। 

    अलसी के प्रयोग की विधि :

    अलसी को धीमी आँच पर हल्का भून लें। फिर मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भरकर रख लें। रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच पावडर पानी के साथ लें। इसे सब्जी या दाल में मिलाकर भी लिया जा सकता है।




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    Wednesday, February 1

    वसंत ऋतुचर्या



    वभिन्न ऋतुओं में मौसम की दशाएं एक खास प्रकार की होती हैं। यह अवधि एक वर्ष को कई भागों में विभाजित करती है जिनके दौरान पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा के परिणामस्वरूप दिन की अवधि, तापमान, वर्षा, आर्द्रता इत्यादि मौसमी दशाएँ एक चक्रीय रूप में बदलती हैं। भारत में परंपरागत रूप से मुख्यतः छः ऋतुएं परिभाषित की गयी हैं।
    ऋतुहिन्दू मासग्रेगरियन मास
    वसन्त (Spring)चैत्र से वैशाखमार्च से अप्रैल
    ग्रीष्म (Summer)ज्येष्ठ से आषाढमई से जून
    वर्षा (Rainy)श्रावन से भाद्रपदजुलाई से सितम्बर
    शरद् (Autumn)आश्विन से कार्तिकअक्टूबर से नवम्बर
    हेमन्त (pre-winter)मार्गशीर्ष से पौषदिसम्बर से 15 जनवरी
    शिशिर (Winter)माघ से फाल्गुन16 जनवरी से फरवरी

    वसंत ऋतु :

    शीत व ग्रीष्म ऋतु का सन्धिकाल वसन्त ऋतु होता है। इस समय में न अधिक सर्दी होती है न अधिक गर्मी होती है। इस मौसम में सर्वत्र मनमोहक आमों के बौर की सुगन्ध से युक्त सुगन्धित वायु चलती है। वसन्त ऋतु को ऋतुराज भी कहा जाता है।
    वसन्त ऋतु में रक्तसंचार तीव्र हो जाता है जिससे शरीर में स्फूर्ति रहती है। शिशिर के बाद बसन्त ऋतु आती है और हेमन्त शिशिर का एकत्र कफ पिघलने लगता है, यह कफ का प्रकोप काल भी है। जिस प्रकार जल अग्नि को बुझा देता है उसी प्रकार वसंत ऋतु में पिघला हुआ कफ़ जठराग्नि को मंद कर देता है l यदि वसन्त ऋतु में आहार-विहार के उचित पालन पर पूरा ध्यान दिया जाये एवं बदपरहेजी न की जाये तो वर्तमान स्वास्थ्य रक्षा के साथ ही ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में स्वास्थ्य की रक्षा करने की शक्ति भी शरीर में आ जाती है।

    वसन्त ऋतु में होने वाले रोग :

    वसन्ते निचितः श्लेष्मा दिनकृभ्दाभिरितः।
    चरक संहिता के अनुसार हेमन्त ऋतु में संचित हुआ कफ वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से प्रेरित (द्रवीभूत) होकर कुपित होता है जिससे इस ऋतु में खाँसीसर्दी-जुकामटॉन्सिल्स में सूजनगले में खराशशरीर में सुस्ती व भारीपन आदि की शिकायत होने की सम्भावना रहती है। जठराग्नि मन्द हो जाती है अतः इस ऋतु में आहार-विहार के प्रति सावधानी रखनी चाहिए।


    वसन्त ऋतु में सेवन योग्य आहार :

    • इस ऋतु में गरिष्ठ पदार्थों की मात्रा धीरे-धीरे कम करते हुए गर्मी बढ़ते हुए बन्द कर के सादा सुपाच्य आहार लेना प्रारंभ कर देना चाहिए।
    • महर्षि चरक के अनुसार इस ऋतु में भारी, चिकनाईवाले, खट्टे और मीठे पदार्थों का सेवन व दिन में सोना वर्जित है।
    • इस ऋतु में कटु, तिक्त, कषारस-प्रधान द्रव्यों का सेवन करना हितकारी है।
    • वसन्त ऋतु में प्रातःकाल  15-20 नीम की नई कोंपलें चबा-चबाकर खाने से वर्षभर चर्मरोग, रक्तविकार, ज्वर आदि रोगों से रक्षा करने की प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती है।
    • इस ऋतु में जौ, चना, ज्वार, गेहूँ, चावल, मूँग, अरहर, मसूर की दाल, बैंगन, मूली, बथुआ, परवल, करेला, तोरई, अदरक, सब्जियाँ, केला, खीरा, संतरा, शहतूत, हींग, मेथी, जीरा, हल्दी आँवला आदि कफनाशक पदार्थों का सेवन करना अत्यंत लाभकारी होता है।

    क्या करें :

    • उबटन लगाना
    • तेलमालिश
    • धूप का सेवन
    • हल्के गर्म पानी से स्नान
    • योगासन व हल्का व्यायाम

    क्या न खाएं :

    • इस ऋतु में पचने में भारी पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए l ठन्डे पेय,आइसक्रीम, बर्फ के गोले ,चाकलेट, मैदा, खमीरी चीज़ें , दही आदि का इस ऋतु में बिलकुल त्याग कर देना चाहिए l
    • गन्ना, आलू, भैंस का दूध, उड़द, सिंघाड़ा, खिचड़ी, खट्टे, मीठे, चिकने, पदार्थों का सेवन हानिकारक है। ये कफ में वृद्धि करते हैं।

    क्या न करें :

    इस ऋतु में दिन में सोना रोगों को आमंत्रण देने जैसा है क्योंकि इस ऋतु में दिन में सोने से कफ़ कुपित होता है l अतः वसंत ऋतु में दिन में नहीं सोना चाहिए l
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    Tuesday, January 31

    यह प्रयोग सभी तरह के वात दर्द को कर देगा चुटकियों में गायब !



    . By- Dr. Kailash Dwivedi

    जानिए एक अनुभूत एवं अदभुत तेल बानाने की विधि जो जोड़ों के दर्द, घुटनो के दर्द, कंधे की जकड़न , साइटिका, कमर दर्द आदि को कर देगा चुटकियों में गायब।

    आवश्यक सामग्री :


    • सरसों या तिल का तेल :  500 ग्राम
    • दालचीनी  :                     25 ग्राम
    • कायफल की छाल  :      250 ग्राम
    • कपूर :                          5 टिकिया


    कायफल :

    कायफल की छाल देखने मे गहरे लाल रंग की खुरदरी होती है | यह लगभग 2 इंच के टुकड़ों मे मिलती है। यह जड़ी बूटी बेचने वाली दुकानों पर आसानी से मिल जाता है। तेल बनाने के लिए कायफल की छाल को कूट कर बारीक पीस लेना चाहिए।



    तेल बनाने की विधि : 


    सर्वप्रथम लोहे की कड़ाही मे धीमी आंच पर सरसों या तिल का तेल गर्म करें। जब तेल गर्म हो जाए तब थोड़ा थोड़ा करके कायफल छाल का चूर्ण डालते जाएँ। कायफल छाल का चूर्ण डालने के पश्चात् दालचीनी का पाउडर डालें। जब सारा चूर्ण खत्म हो जाए तब कड़ाही के नीचे से आग बंद कर दे।
    ठंडा हो जाने पर इस तेल को एक महीन सूती कपड़े छान ले। छानने के बाद इस तेल को हल्का गर्म कर इसमें  5 टिकिया कपूर का पाउडर मिला दे | इस तेल को कांच की बोतल मे रख ले। कुछ दिन मे तेल मे से लाल रंग का पदार्ध नीचे बैठ जाएगा। इसके बाद ऊपर के साफ़ तेल को दूसरी शीशी मे भर लें एवं 25 ग्राम दालचीनी का चूर्ण और मिला लें |
    तेल छानने के बाद जो लाल रंग का पदार्थ बच जाए उसे फेंके नहीं बल्कि सुरक्षित रख लें |

    प्रयोग विधि :

    तेल को हल्का गर्म करके दर्द वाले अंग कम दबाव के साथ धीरे धीरे मालिश करें। इसके बाद लाल रंग वाले पदार्थ को कपड़े की पोटली में भरकर पोटली को तवे पर गर्म करके इस पोटली से दर्दयुक्त अंग की 10 मिनट तक सिंकाई करें |

    सावधानी :

    तेल मालिश एवं सेक के 2 घंटे बाद तक ठंडा पानी न पियें।


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    Monday, January 30

    नीम के औषधीय प्रयोग




    By- Dr.Kailash Dwivedi

    नीम भारतीय मूल का एक सदाबहार वृक्ष है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे तो अनेक और बहुत प्रभावशाली है।नीम के चिकित्सीय गुणों को पाठकों के हितार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ |

    उपयोग :

    • नीम की छाल का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों और घावों के निवारण में सहायक है।
    • नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।
    • नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है। 
    • नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं, और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
    • नींबोली (नीम का छोटा सा फल) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।
    • नीम के द्वारा बनाया गया लेप वालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
    • नीम की पत्तियों के रस और शहद को 2 : 1  के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है, और इसको कान में डालने कान के विकारों में भी फायदा होता है।
    • नीम के तेल की 5 : 10  बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फायदा होता है।
    • नीम के बीजों के चूर्ण को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।
                                       

    विभिन्न रोगों में नीम का उपयोग :

    घाव, फोड़े-फुंसी, बदगांठ, घमौरी तथा नासूर  :

    घाव एवं चर्मरोग बैक्टेरियाजनित रोग हैं और नीम का हर अंग अपने बैक्टेरियारोधी गुणों के कारण इस रोग के लिए सदियों से रामवाण औषधि के रूप में मान्यता प्राप्त है। घाव एवं चर्मरोग में नीम के समान आज भी विश्व के किसी भी चिकित्सा-पद्धति में दूसरी कोई प्रभावकारी औषधि नहीं है। इसे आज दुनियाँ के चिकित्सा वैज्ञानिक भी एकमत से स्वीकारने लगे हैं।

    • दुष्ट व न भरने वाले घाव को नीम पत्ते के उबले जल से धोने और उस पर नीम का तेल लगाने से वह जल्दी भर जाता है। नीम की पत्तियाँ भी पीसकर लगाने से लाभ होता है।
    • गर्मी के दिनों में घमौरियाँ निकलने पर नीम पत्ते के उबले जल से नहाने पर लाभ होता है।
    • नीम की पत्तियों का रस, सरसों का तेल और पानी, इनको पकाकर लगाने से विषैले घाव भी ठीक हो जाते हैं।
    • हमेशा बहते रहने वाले फोड़े पर नीम की छाल का भस्म लगाने से लाभ होता है।
    • छाँव में सूखी नीम की पत्ती और बुझे हुए चूने को नीम के हरे पत्ते के रस में घोटकर नासूर में भर देने से वह ठीक हो जाता है। 
    • जिस घाव में नासूर पड़ गया हो तथा उससे बराबर मवाद आता हो, तो उसमें नीम की पत्तियों का पुल्टिस बांधने से लाभ होता है।

    चर्मरोग  :

    रक्त की अशुद्धि तथा परोपजीवी कीटाणुओं के प्रवेश से उकवत, खुजली, दाद-जैसे चर्मरोग होते हैं। इसमें नीम का अधिकांश भाग उपयोगी है।

    • मजिष्ठादि क्वाथ + नीम की छाल +पीपल की छाल एवं गिलोय का क्वाथ बराबर मात्रा में मिलाकर प्रतिदिन एक महीने तक लगाने से एक्जिमा नष्ट होता है।
    • एक्जिमा में नीम का रस नियमित कुछ दिन तक लगाने और एक चम्मच रोज पीने से भी १०० प्रतिशत लाभ होता है। 
    • नीम के पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लगाने से  दाद मिट जाता है।
    • वसंत ऋतु में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती तथा गोलमीर्च पीसकर खाली पेट पीने से साल भर तक कोई चर्मरोग नहीं होता, रक्त शुद्ध रहता है।

    जले-कटे में नीम  :

    • आग से जले स्थान पर नीम का तेल लगाने अथवा नीम तेल में नीम पत्तों को पीस कर लेप करने  से शान्ति मिलती है।
    • नीम की पत्ती को पानी में उबाल कर ठंडा होने पर उसमें जले हुए अंग को डुबोने से भी शीघ्र राहत मिलती है।
    • कटे स्थान पर नीम का तेल लगाने से टिटनेस का भय नहीं होता।

    कुष्ठरोग :

    यह रोग एक छड़नुमा ‘माइक्रोबैक्टेरिया लेबी’ से होता है। चमड़ी एवं तंत्रिकाओं में इसका असर होता है। यह दो तरह का होता है-पेप्सी बेसीलरी, जो चमड़ी पर धब्बे के रूप में होता है, स्थान सुन्न हो जाता है। दूसरा मल्टीबेसीलरी, इसमें मुँह लाल, उंगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी तथा नाक चिपटी हो जाती है। नाक से खून आता है। दूसरा संक्रामक किस्म का रोग है।
    प्राचीन आयुर्वेद का मत है कि कुष्ठरोगी को बारहों महीने नीम वृक्ष के नीचे रहने, नीम के खाट पर सोने, नीम का दातुन करने, प्रात:काल नित्य 50 ग्राम नीम की पत्तियों को पीस कर पीने, पूरे शरीर में नित्य नीम तेल की मालिश करने, भोजन के वक्त नित्य पाँच तोला नीम का रस  पीने, शैय्या पर नीम की ताजी पत्तियाँ बिछाने, नीम पत्तियों का रस जल में मिलाकर स्नान करने तथा नीम तेल में नीम की पत्तियों की राख मिलाकर घाव पर लगाने से पुराना से पुराना कोढ़ भी नष्ट हो जाता है।

    सफ़ेद दाग (ल्यूकोडर्मा ) :

    शरीर के विभिन्न भागों में चकते के रूप में चमड़ी का सफेद हो जाना, फिर पूरे शरीर की चमड़ी का रंग बदल जाना,ल्यूकोडर्मा रोग है। नीम की ताजी पत्ती के साथ बाकुची का बीज तथा चना पीसकर लगाने से इस रोग में अत्यंत लाभ होता है।

    बवासीर  :

    • प्रतिदिन नीम की 21 पत्तियों को मूंग की भिगोई और धोयी हुई दाल मे पीसकर बिना कोई मसाला डाले पकौड़ी बनाकर 21 दिन तक खाने से हर तरह का बवासीर निर्बल होकर गिर जाता है। पथ्य में सिर्फ ताजा मट्ठा, भात एवं सेंघा नमक लिया जाना चाहिए।

    मसूड़ों से खून आने और पायरिया होने पर नीम का उपयोग  :

    • नीम  के तने की भीतरी छाल या पत्तों को पानी में औंटकर कुल्ला करने से लाभ होता है। इससे मसूड़े और दाँत मजबूत होते हैं। नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर पीने से भी इसमें लाभ होता है।
    • नीम का दातुन नित्य करने से दाँतों के अन्दर पाये जाने वाले कीटाणु नष्ट होते हैं। दाँत चमकीला एवं मसूड़े मजबूत व निरोग होते हैं।

    बालों के जुंए, भूरापन तथा कील-मुहांसा :

    • नीम के तने का भीतरी छाल घिसकर चेहरे पर लगाने से , त्वचा कोमल तथा कील-मुहांसों से मुक्त हो जाती है |
    • बालों में नीम का तेल लगाने से जुएं तथा रूसी नष्ट होते हैं।
    • नीम तेल नियमित सिर में लगाने से गंजापन या बाल का तेजी से झड़ना रूक जाता है। यह बालों को भूरा होने से भी बचाता है।

    पेट-कृमि :

    • आंत में पड़ने वाली सफेद कृमि या केचुए को जड़ से नष्ट करने में संभवत: नीम जैसी गुणकारी कोई अन्य औषधि नहीं है। नीम की पत्ती 20 नग तथा काली मिर्च 10 नग थोड़े से नमक के साथ पीसकर एक गिलास जल में घोलकर खाली पेट 3-4 दिन तक पी लेने से इन कृमियों से कम से कम 2-3 वर्ष तक के लिए मुक्ति मिल जाती है।

    मलेरिया :

    नीम वृक्ष मलेरिया-रोधी के रूप में प्रसिद्ध है। इसकी छाया में रहने और इसकी हवा लेने वालों पर मलेरिया का प्रकोप नहीं होता। मलेरिया मुख्यत: मच्छरों के काटने से होता है। सर्दी, कंपकपाहट, तेज बुखार, बेहोशी, बुखार उतरने पर पसीना छूटना, इसके प्रमुख लक्षण हैं।
    इस रोग में नीम के तने की छाल का काढ़ा दिन में तीन बार पिलाने अथवा नीम के जड़ की अन्तर छाल 50 ग्राम,  600 मिली. पानी में 20 मिनट तक उबालकर और छानकर ज्वर चढ़ने से पहले २-३ बार पिलाना चाहिए। इससे ज्वर उतर जाता है।  नीम तेल में नारियल या सरसो का तेल मिलाकर शरीर पर मालिश करने से भी मच्छरों के कारण उत्पन्न मलेरिया ज्वर उतर जाता है।

    सामान्य एवं विषम ज्वर :

    • नीम के अन्तर छाल का चूर्ण, सोंठ तथा मीर्च का काढ़ा विषम ज्वर में देने से लाभ होता है। इसमें नीम के तेल की मालिश करने भी लाभ होता है। ये औषधियाँ रोगी को कुछ खिलाने से पहले दी जानी चाहिए।
    • तेज सिहरनयुक्त ज्वर के साथ उल्टी होने पर नीम की पत्ती के रस शहद एवं गुड़ के साथ देने से लाभ होता है। नीम का पंचांग (पता, जड़ फूल, फल और छाल) को एक साथ कूटकर घी के साथ मिलाकर देने से भी लाभ होता है।

    चेचक :

    इसकी भयंकरता के कारण इस रोग को दैवी प्रकोप माना जाता रहा है। यह जब उग्र रूप धारण करता है तब बड़े-बड़े चिकित्सकों की भी कुछ नहीं सुनता। आयुर्वेद में चेचक के रोकथाम के जो निदान बातये गये हैं उनमें नीम का उपयोग ही सर्वाधिक वर्णित है। इसके सेवन से या तो चेचक निकलता ही नहीं अथवा निकलता भी है तो उग्र नहीं होता, क्रमश: शान्त हो जाता है। नीम में चूंकि दाहकता शान्त करने के शीतल गुण हैं, इसलिए यह लोक जीवन में शीतला देवी के रूप में भी पूजित है।

    चेचक कभी निकले ही नहीं, इसके लिए आयुर्वेद में उपाय है कि चैत्र में दस दिन तक प्रात:काल नीम की कोमल पत्तियाँ गोल मिर्च के साथ पीस कर पीना चाहिए। नीम का बीज, बहेड़े का बीज और हल्दी समान भाग में लेकर पीस-छानकर कुछ दिन पीने से भी शीतला/चेचक का डर नहीं रह जाता।

    चेचक निकलने पर रोगी को स्वच्छ घर में नीम के पत्तों पर लिटाना, घर में नीम की ताजा पत्तियों की टहनी का बन्दनवार लटकाना तथा नीम का चंवर बनाकर रोगी को हवा देना चाहिए। बिस्तर की पत्तियाँ नित्य बदल देनी चाहिए। रोगी को यदि अधिक जलन महसूस हो तो नीम की पत्तियों को पीसकर पानी में घोलकर तथा मथानी से मथकर उसका फेन चेचक के दानों पर सावधानी पूर्वक लगाना चाहिए। इससे भी राहत नहीं मिलने पर नीम की कोमल पत्तियाँ पीसकर चेचक के दानों पर हल्का लेप चढ़ाना चाहिए। नीम के बीज की गिरी को पीसकर भी लेप करने से दाहकता शीघ्र कम होती है। रोगी को प्यास लगने पर नीम के छाल को जलाकर उसके अंगारों को पानी में बुझाकर उस पानी को छान कर पिलाना चाहिए। नीम की पत्तियों को पानी में औंटकर पिलाने से भी दाहकता शान्त होती है। इससे चेचक का विष एवं ज्वर भी कम होता है, चेचक के दाने शीघ्र सूखते हैं। चेचक के दाने ठीक से न निकलने पर भी बेचैनी होती है। अत: नीम की पत्तियाँ पीस कर दिन में तीन बार पिलाने से वह शीघ्र निकल आते हैं। जब दाने सूख जाएँ तब नीम का पत्ता जल में उबालकर रोगी को कुछ दिन नियमित स्नान और नीम तेल की मालिश करनी चाहिए। इससे चेचक के दाग भी मिट जाते हैं। नीम बीज की गिरी पानी में गाढ़ा पीस कर दाग पर लगाना भी फायदेमंद होता है। चेचक होने पर कई रोगियों के कुछ बाल भी झड़ जाते हैं। इसमें नीम तेल माथे पर लगाने से बाल पुन: उग आते हैं।

    प्लेग :

    वायरस कीटाणुओं से होने वाला यह एक संक्रामक बीमारी है। मिट्टी, जल और वायु के प्रदूषण से इसके कीटाणु (पिप्सू) संक्रमित होते हैं, जो पहले चूहों में लगते हैं, फिर चूहों से मिट्टी, खाद्य पदार्थ, जल एवं वायु के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। तेज बुखार, साँस लेने में कठिनाई, खून की उल्टियाँ, आँत में दर्द, बगल तथा गले में सूजन अथवा गांठे पड़ जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। आयुर्वेद में इसे ग्रन्थिक या वातलिकार ज्वर कहा जाता है। यह बहुत तेजी से फैलता है। इसके वायरस शरीर की कोशिकाओं को नष्ट कर व्यक्ति को अपनी चपेट में तुरन्त ले लेते हैं।
    प्लेग के शिकार रोगी को नीम का पंचाग (बीज, छाल, पत्ता, फूल, गोद) कूटकर पानी मे छानकर दस-दस तोले की मात्रा हर पन्द्रह मिनट पर देनी चाहिए। तत्काल नीम के पांचों अंग न मिले तो जो भी मिले उसी को देना चाहिए। शरीर के जोड़ों पर नीम की पत्तियों की पुल्टिस बांधने तथा आस-पास नीम की लकड़ी-पत्तों की घूनी करने से भी प्लेग का शमन होता है।
    प्लेग फैलते ही स्वस्थ लोगों को नीम के पत्ते पीस कर नित्य पीते रहना चाहिए, इससे प्लेग का उनपर असर नही होता।

    हैजा :

    यह अशुद्ध/दूषित जल के उपयोग से फैलने वाला संक्रामक रोग है। इसके जीवाणु पहले आंत में प्रतिक्रिया करते हैं। तत्काल उपाय न होने पर देखते-देखते रोगी मर जाता है। ग्लूकोज या नमक चीनी का घोल तुरन्त दिया जाना लाभदायक होता है। इसके फैलने पर व्यक्ति को पानी उबालकर पीना चाहिए, मांस-मंछली वर्जित करना चाहिए, खुले स्थान के मल को मिट्टी से ढक देना या लैट्रिन की विधिवत सफाई होती रहनी चाहिए।
    हैजा ‘विब्रियो कैलेरा’ नामक जीवाणु से संक्रमित होता है। कूड़े-कचड़ों के सड़न में इनका निवास अधिक होता है। इस बैक्टेरिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने मल द्वारा हैजे के करोड़ों जीवाणु वातावरण में छोड़ता है, उससे जल, मिट्टी, खाद्य पदार्थ तथा वायु संक्रमित होते हैं। मक्खियाँ भी इसके संवाहक बनती हैं। उल्टी-दस्त, हाथ-पांव में ऐठन और तेज प्यास इसके प्रमुख लक्षण हैं।
    नीम के पत्तों को पीसकर, गोला बनाकर तथा कपड़े में बांधकर ऊपर सनी हुई मिट्टी का मोटा लेप चढ़ाकर उसे आग के धूमल (भभूत) में पकाना चाहिए, जब वह लाल हो जाय तब थोड़ी-थोड़ी देर पर उस पके हुए गोले को अर्क गुलाब के साथ रोगी को देने से दस्त, वमन एवं प्यास रूकता है। नीम तेल की मालिश से शरीर का ऐंठन कम होता है। हैजे में नीम तेल पानी के साथ पीने से भी लाभ होता है। नीम छाल का काढ़ा पतले दस्त में भी लाभकारी होता है।

    पीलिया :

    नीम का रस  या छाल का क्वाथ(काढ़ा)  शहद में मिलाकर नित्य सुबह लेने से पीलिया में लाभ होता है।

    मधुमेह/डायबिटीज :

    नीम के तने की भीतरी छाल तथा मेथी के चूर्ण का काढ़ा बनाकर कुछ दिनों तक नियमित पीने से मधुमेह की हर स्थिति में लाभ मिलता है।

    गठिया, वातरोग, साइटिका, जोड़ों में दर्द (अर्थराइटीस) :

    इन रोगों में नीम तेल की मालिश, नीम की पत्तियों को पीसकर एवं गर्म कर जोड़ों पर लेप करने , नीम का रस  पीने, नीम के सूखे बीज का चूर्ण हर तीसरे दिन महीने भर खाने से काफी लाभ मिलता है। नीम के छाल को पानी के साथ पीस कर जोड़ों के दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करने से भी दर्द दूर होता है।

    सूजन, लकवा, चोट-मोच :

    नीम के छाल का अर्क २ से ४ तोले तक नित्य पीने और इसके सेवन के २ घंटे बाद तत्काल बनी रोटी घी के साथ खाने से लकवा अर्द्धांश में लाभ होता है। पक्षाघात वाले अंगों पर नीम तेल की मालिश करने की भी सलाह दी जाती है।
    चोट लगने के कारण आयी मोच और गिल्टियों के सूजन पर नीम की पत्तियों की वाष्प  देने से लाभ होता है।

    कफ, पित्त  :

    • नीम तथा वक के छाल का काढ़ा कफ में लाभदायक होता है।
    • नीम का फूल, इमली तथा शहद के साथ खाने से कफ एवं पित्त दोनों का शमन होता है।

    दमा  :

    नीम का शुद्ध तेल ३० से ६० बूंद तक पान में रखकर खाने से दमा से छुटकारा मिलता है। नीम के २० ग्राम पत्ते को आधा लीटर पानी में उबालकर जब एक कप रह जाय, कुछ दिन पीते रहने से भी दमा जड़ से नष्ट होता है।

    पथरी  :

    नीम की पत्तियों की राख २ ग्राम,  जल के साथ नियमित कुछ दिन तक खाते रहने से पथरी गलकर नष्ट हो जाती है।

    मन्दाग्नि, वायुरोग  :

    • नीम की पकी निबोली अथवा नीम का फूल कुछ दिन नित्य खाने से मंदाग्नि में काफी लाभ होता है।
    • नीम तेल ३० बूंद पान के साथ खाने से वायु विकार तथा पेट का मरोड़ दूर होता है।

    वमन, विरेचन तथा नशा एवं विष उतारने के लिए  :

    • नीम बीज जल के साथ खिलाने पर वमन होता है। यह मृदु विरेचक है।
    • कई वर्षों तक लगातार हर साल १०-१५ दिन तक नीम की पत्तियों का सेवन किये हुए व्यक्ति को सर्प, बिच्छू आदि के विष का असर नहीं होता।
    • बिच्छू तथा मधुमक्खी के काटने पर नीम की पत्तियों को पीसकर लेपनी  चाहिए। 
    • इसको पीने से संखिया का विष भी उतर जाता है। 
    • नीम पत्तों का तेज अर्क अफीम के विष का नाशक है। 
    • कच्ची या पक्की निबोली गर्म पानी से पिलाने पर उल्टी होती है, इससे विष का असर नष्ट होता है।
    • नीम बीज का चूर्ण गर्म पानी के साथ पीने से भी विष उतरता है।

    शुद्धिकरण में नीम  :

    • पुराने देशी घी या तेल को शुद्ध करने के लिए गर्म करते समय नीम की पत्तियाँ डाली जाती हैं।
    • अधिक नीम के सेवन से उत्पन्न हुए विकार दूध या सेंधा नमक खाने से दूर होते हैं।
    • नीम की पत्तियों से उबला जल या नीम तेल पानी में मिलाकर फर्श धोने से वातावरण शुद्ध होता है।
    • शवदाह के बाद लौटने या कोई घृणित चीज देखने से उत्पन्न हुए चित्त विकार नीम की पत्तियाँ/टूसे चबाने से दूर होते हैं।

    कोलेस्ट्रोल नियंत्रण :

    कोलेस्ट्रोल रक्त में पाया जाने वाला पीले रंग का एक मोमी पदार्थ है। जब रक्त में यह अधिक हो जाता है, तब रक्त-वाहिनी धमनियों के अन्दर यह जमने लगता है, थक्का बनाकर रक्त-प्रवाह को अवरुद्ध करता है।
    कोलेस्ट्रोल दो तरह के होते हैं- एच.डी.एल. और एल.डी.एल.। इसमें पहला स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, दूसरा बुरा। बुरा कोलेस्ट्रोल अधिक वसायुक्त पदार्थ (तेल, घी, डालडा), माँस, सिगरेट तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से पैदा होता है। बुरा कैलेस्ट्रोल की वृद्धि से रक्त दूषित होता है, उसका प्रवाह रुकता है और दिल का  दौरा पड़ता है।

    नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कोलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है। नीम का महीने में १० दिन तक सेवन करते रहने से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है।

    मासिक धर्म एवं सुजाक  :

    • आयुर्वेद मत में नीम की कोमल छाल 5 ग्राम  तथा पुराना गुड २ तोला, डेढ़ पाव पानी में औटाकर जब आधा पाव रह जाय तब छानकर स्त्रियों को पिलाने से रुका हुआ मासिक धर्म पुन: शुरू हो जाता है।
    • नीम छाल २ तोला सोंठ, ५ ग्राम  एवं गुड़ २ तोला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर देने से मासिक धर्म की गड़बड़ी ठीक होती है।
    • स्त्री योनि में सुजाक (फुंसी, चकते) होने पर नीम के पत्तों के उबले गुनगुने जल से धोने से लाभ होता है
    • नीम पत्ती के उबले पर्याप्त जल में जो सुसुम हो, कटि स्नान से सुजाक का शमन होता है और शान्ति मिलती है। पुरूष लिंग में भी सुजाक होने पर यही उपचार करना चाहिए |इससे सूजन भी उतर जाती  है और पेशाब ठीक होने लगता है।

    प्रदर रोग :

    प्रदर रोग मुख्यत: दो तरह के होते हैं-श्वेत एवं रक्त। जब योनि से सड़ी मछली के समान गन्ध जैसा, कच्चे अंडे की सफेदी के समान गाढ़ा पीला एवं चिपचिपा पदार्थ निकलता है, तब उसे श्वेत प्रदर कहा जाता है। यह रोग प्रजनन अंगों की नियमित सफाई न होने, संतुलित भोजन के अभाव, बेमेल विवाह, मानसिक तनाव, हारमोन की गड़बड़ी, शरीर से श्रम न करने, मधुमेह, रक्तदोष या चर्मरोग इत्यादि से होता है। इस रोग की अवस्था में जांघ के आस-पास जलन महसूस होता है, शौच नियमित नहीं होता, सिर भारी रहता है और कभी-कभी चक्कर भी आता है।
    • श्वेत प्रदर में नीम की पत्तियों के क्वाथ से योनिद्वार को धोना और नीम छाल को जलाकर उसका धुआं लगाना लाभदायक माना गया है। इससे दुर्गन्ध तथा चिपचिपापन दूर होने के साथ योनिद्वार शुद्ध एवं संकुचित होती  है। यह आयुर्वेद ग्रंथ ‘गण-निग्रह’ का अभिमत है।
    रक्त प्रदर भी  एक गंभीर रोग है। योनि मार्ग से अधिक मात्रा में रक्त का बहना इसका मुख्य लक्षण है। यह मासिक धर्म के साथ या बाद में भी होता है। इस रोग में हाथ-पैर में जलन, प्यास ज्यादा लगना, कमजोरी, मूर्च्छा तथा अधिक नींद आने की शिकायतें होती हैं।
    • रक्त प्रदर में नीम के तने की भीतरी छाल का रस तथा जीरे का चूर्ण मिलाकर पीने से रक्तस्राव बन्द होता है तथा इस रोग की अन्य शिकायतें भी दूर होती हैं।

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