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Monday, November 20

किस रोग में कौन सा आसन करे


By- Dr.Kailash Dwivedi

👉🏻 पेट की बिमारियों में- उत्तानपादासन, पवनमुक्तासन, वज्रासन, योगमुद्रासन, भुजंगासन, मत्स्यासन।
👉🏻 सिर की बिमारियों में- सर्वांगासन, शीर्षासन, चन्द्रासन।
👉🏻 मधुमेह- पश्चिमोत्तानासन, नौकासन, वज्रासन, भुजंगासन, हलासन, शीर्षासन।
👉🏻 वीर्यदोष– सर्वांगासन, वज्रासन, योगमुद्रा।
👉🏻 गला- सुप्तवज्रासन, भुजंगासन, चन्द्रासन।
👉🏻 आंखें- सर्वांगासन, शीर्षासन, भुजंगासन।
👉🏻 गठिया– पवनमुक्तासन, पद्ïमासन, सुप्तवज्रासन, मत्स्यासन, उष्ट्रासन।
👉🏻 नाभि- धनुरासन, नाभि-आसन, भुजंगासन।
👉🏻 गर्भाशय– उत्तानपादासन, भुजंगासन, सर्वांगासन, ताड़ासन, चन्द्रानमस्कारासन।
👉🏻 कमर दर्द – हलासन, चक्रासन, धनुरासन, भुजंगासन।
👉🏻 फेफड़े- वज्रासन, मत्स्यासन, सर्वांगासन।
👉🏻 यकृत- लतासन, पवनमुक्तासन, यानासन।
👉🏻 गुदा,बवासीर,भंगदर आदि में- उत्तानपादासन, सर्वांगासन, जानुशिरासन, यानासन।
👉🏻 दमा- सुप्तवज्रासन, मत्स्यासन, भुजंगासन।
👉🏻 अनिद्रा- शीर्षासन, सर्वांगासन, हलासन, योगमुद्रासन।
👉🏻 गैस– पवनमुक्तासन, जानुशिरासन, योगमुद्रा, वज्रासन।
👉🏻 जुकाम– सर्वांगासन, हलासन, शीर्षासन।
👉🏻 मानसिक शांति के लिए– सिद्धासन, योगासन, शतुरमुर्गासन, खगासन योगमुद्रासन।
👉🏻 रीढ़ की हड्डी के लिए- सर्पासन, पवनमुक्तासन, सर्वांगासन, शतुरमुर्गासन करें।
👉🏻 गठिया के लिए- पवनमुक्तासन, साइकिल संचालन, ताड़ासन किया करें।

👉🏻 गुर्दे की बीमारी में– सर्वांगासन, हलासन, वज्रासन, पवनमुक्तासन करें।
👉🏻 गले के लिए- सर्पासन, सर्वांगासन, हलासन, योगमुद्रा करें।
👉🏻 हृदय रोग के लिए- शवासन, साइकिल संचालन, सिद्धासन किया करें।
👉🏻 दमा के लिए- सुप्तवज्रासन, सर्पासन, सर्वांगासन, पवनतुक्तासन, उष्ट्रासन करें।
👉🏻 रक्तचाप के लिए– योगमुद्रासन, सिद्धासन, शवासन, शक्तिसंचालन क्रिया करें।
👉🏻 सिर दर्द के लिए- सर्वांगासन, सर्पासन, वज्रासन, धनुरासन, शतुरमुर्गासन करें।
👉🏻 पाचन शक्ति बढ़ाने के लिए- यानासन, नाभि आसन, सर्वांगासन, वज्रासन करें।
👉🏻 मधुमेह के लिए- मत्स्यासन, सुप्तवज्रासन, योगमुद्रासन, हलासन, सर्वांगासन, उत्तानपादासन करें।
👉🏻 मोटापा घटाने के लिए– पवनमुक्तासन, सर्वांगासन, सर्पासन, वज्रासन, नाभि आसन करें।
👉🏻 आंखों के लिए- सर्वांगासन, सर्पासन, वज्रासन, धनुरासन, चक्रासन करें।
👉🏻 बालों के लिए– सर्वांगासन, सर्पासन, शतुरमुर्गासन, वज्रासन करें।
👉🏻 प्लीहा के लिए- सर्वांगासन, हलासन, नाभि आसन, यानासन करें।
👉🏻 कमर के लिए– सर्पासन, पवनमुक्तासन, सर्वांगासन, वज्रासन, योगमुद्रासन करें।
👉🏻 कद बड़ा करने के लिए- ताड़ासन, शक्ति संचालन, धनुरासन, चक्रासन, नाभि आसन करें।
👉🏻 कानों के लिए– सर्वांगासन, सर्पासन, धनुरासन, चक्रासन करें।
👉🏻 नींद के लिए– सर्वांगासन, सर्पासन, सुप्तवज्रासन, योगमुद्रासन, नाभि आसन करें |
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Friday, February 24

ईशा क्रिया : ध्यान की एक सरल प्रक्रिया

By- Dr. Kailash Dwivedi

ईशा क्रिया सद्गुरु की ओर से एक भेंट है। यह शरीर और मन से परे ध्यान की अवस्था का अनुभव करने के लिए एक सरल और शक्तिशाली प्रक्रिया है।  इस वीडियो में आप सद्गुरु के मार्गदर्शन में ईशा क्रिया का अभ्यास कर सकते हैं।







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Friday, February 17

खूबसूरती में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि करती है यह मुद्रा !




लाभ :


  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा शरीर और चेहरे को सुंदर बनाती है।

  • इस मुद्रा को करने से चेहरे की लाली बढ़ती है।

  • इस मुद्रा को करने से रक्त शुद्ध होता है एवं शरीर में लाल रक्त के कणों की वृद्धि होती है।

  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा के अभ्यास से दिमागी शक्ति भी तेज होती है।

  • रक्त विकार जैसे - खाज, खुजली, छाजन, फोड़े-फुंसी आदि सारे त्वचा के रोगों को यह मुद्रा समाप्त कर देती है।

विशेष :


  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा स्त्रियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है , इसके नियमित अभ्यास से खूबसूरती में आश्चर्यजनक रूप से  वृद्धि होती है ।

विधि :


  1. जमीन पर आसन बिछाकर बैठ जाएँ

  2. दोनों हाथों की अंगुलियों एवं अंगूठे के अग्रभाग को जमीन पर टिका दें |

इसे रक्तशोधिनी हरिमुद्रा कहते है, इस स्थिति में अंगुलिया एवं अंगूठा सीधा रहना चाहिए एवं इनके अग्रभाग जमीन पर अच्छे से टिके रहने चाहिए |

कितने समय तक और कब करें :


प्रातः सूर्योदय के समय तथा सांयकाल सूर्यास्त से पहले इस मुद्रा को किया जा सकता है |
प्रारंभ में पांच मिनट से शुरू करके 15 मिनट तक कर सकते हैं |

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Friday, February 10

चेहरे की बारीक रेखाओं और झुर्रियों से परेशान हैं तो इसे जरुर करें !



By- Dr. Kailash Dwivedi

चेहरे में लगभग 52 मांसपेशियां होती हैं। नियमित रूप से इन मांसपेशियों का व्यायाम न सिर्फ चेहरे, गर्दन और आंखों के तनाव को कम करता है बल्कि चेहरे की बारीक रेखाओं और झुर्रियों को भी दूर करता है | यह अभ्यास मांसपेशियों को टोन करता है, जिससे चेहरे की अतिरिक्त चर्बी से भी छुटकारा मिलता है। इस लेख में हम आपको बता रहे हैं ऐसे व्यायाम जिन्हें आप किसी भी समय कर सकते हैं |


करें यह व्यायाम :

  • गालों को फुलाएं, मुंह के अन्दर की वायु को एक गाल से दूसरे गाल में दायें-बाएं 5 -5 बार घुमाएं | और फिर होंठों को गोल 'O'  आकर बनाकर वायु को बाहर निकाल दें।
  • होठों से छोटा ‘o’ बनाएं और फिर होठों को फैलाते हुए क्रमशः बड़ा  ‘O’ बनाएं | इस अभ्यास को 10 बार करें।
  • होठों को बंद रखते हुए मुस्कुराएं। फिर अपने गालों को अंदर की ओर खींचें और मछली के मुंह के जैसे मुंह बनाएं।
  • जीभ को यथाशक्ति मुंह से बाहर निकालें | लगभग 1 मिनट इसी स्थिति में बने रहें |
  • श्वास भरते हुए अपने सिर को एक तरफ कंधे तक ले जाएं, थोड़ी देर रुकें एवं श्वास छोड़ते हुए वापस आयें | इसी तरह दूसरी तरफ श्वास भरते हुए कंधे तक ले जाएं, थोड़ी देर रुकें एवं पुनः श्वास छोड़ते हुए वापस आयें ।  दोनों तरफ 3-3 बार इस अभ्यास को करने के बाद 3 बार गर्दन को दोनों दिशाओं में गोल-गोल घुमाएं।
  • ऊपर की ओर देखते मुंह को चूमने की स्थिति में सिकोड़ें 5 सेकंड तक इसी स्थिति में रहें | इसे भी कम से कम 5 बार दोहराएँ |
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Wednesday, February 1

जानिए, सिर दर्द दूर करने की एक चमत्कारिक विधि !



प्रथम स्थिति :

अपने दाहिने हाथ को कन्धे के बराबर सीध में उठाते हुए हाथ को कोहनी से मोड़कर हथेली को दाहिनी कनपटी (कान के आगे मस्तक के दाहिने साइड में) पर जमायें | श्वास को अन्दर भरते हुए दाहिनी कनपटी पर हथेली का दबाब बायीं ओर बनायें एवं सिर से दाहिनी ओर दबाब बनायें | अर्थात हथेली के दबाब के विपरीत दिशा में सिर से जोर लगायें | जब तक आराम से श्वास को अन्दर रोक सकते हों इसी प्रकार दबाब बनाकर रखें, तत्पश्चात श्वास को बाहर छोड़कर दबाब हटा लें | इस प्रक्रिया को पांच बार दोहराएँ | ध्यान रहे कि हथेली एवं सिर का एक-दूसरे के विपरीत इतना दबाब बनाना है कि सिर में एक एक प्रकार का कम्पन उत्पन्न हो जाये |



दूसरी स्थिति :

अब अपने बाएं हाथ को कन्धे के बराबर सीध में उठाते हुए हाथ को कोहनी से मोड़कर हथेली को बायीं कनपटी (कान के आगे मस्तक के बाएं साइड में) पर जमायें | श्वास को अन्दर भरते हुए बायीं कनपटी पर हथेली का दबाब दाहिनी ओर बनायें एवं सिर से दाहिनी ओर से बायीं ओर दबाब बनायें | अर्थात प्रथम स्थिति की तरह हथेली के दबाब के विपरीत दिशा में सिर से जोर लगायें | जब तक आराम से श्वास को अन्दर रोक सकते हों इसी प्रकार दबाब बनाकर रखें, तत्पश्चात श्वास को बाहर छोड़कर दबाब हटा लें | इस प्रक्रिया को पांच बार दोहराएँ | ध्यान रहे कि हथेली एवं सिर का एक-दूसरे के विपरीत इतना दबाब बनाना है कि सिर में एक एक प्रकार का कम्पन उत्पन्न हो जाये |





तीसरी स्थिति :

अपने दोनों हाथों की ऊँगलियो को आपस में फंसाकर हाथों को कन्धों के बराबर सीध में उठाते हुए हथेलियों को मस्तक पर जमायें | श्वास को अन्दर भरते हुए मस्तक पर हथेलियों का दबाब पीछे की ओर बनायें एवं सिर से आगे की तरफ दबाब बनायें | जब तक आराम से श्वास को अन्दर रोक सकते हों इसी प्रकार दबाब बनाकर रखें, तत्पश्चात श्वास को बाहर छोड़कर दबाब हटा लें | इस प्रक्रिया को पांच बार दोहराएँ | इसमें भी ध्यान रहे कि हथेली एवं सिर का एक-दूसरे के विपरीत इतना दबाब बनाना है कि सिर में एक एक प्रकार का कम्पन उत्पन्न हो जाये |



चौथी स्थिति :

तीसरी स्थिति की तरह से अपने दोनों हाथों की ऊँगलियो को आपस में फंसाकर हाथों को सिर के उपर उठाते हुए हथेलियों को सिर के पीछे जमायें | श्वास को अन्दर भरते हुए हथेलियों का दबाब पीछे से आगे की तरफ बनायें एवं सिर से पीछे की तरफ दबाब बनायें | जब तक आराम से श्वास को अन्दर रोक सकते हों इसी प्रकार दबाब बनाकर रखें, तत्पश्चात श्वास को बाहर छोड़कर दबाब हटा लें | इस प्रक्रिया को पांच बार दोहराएँ | इसमें भी ध्यान रहे कि हथेली एवं सिर का एक-दूसरे के विपरीत इतना दबाब बनाना है कि सिर में एक एक प्रकार का कम्पन उत्पन्न हो जाये |

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Thursday, January 26

पढ़िए -ताज़गी से भर देने वाली गहरी निद्रा के लिये ध्यान की एक विधि






संभव है आप रात्रि में ठीक तरह से न सो पाते हों। बहुत कम लोग ठीक तरह से सो पाते हैं। जब आप रात्रि में ठीक से नहीं सो पाते तो दिन में थोड़ा थका महसूस करते हैं। यदि ऐसा है तो आपको अपनी नींद के साथ कुछ करना होगा। इसे गहरी करना होगा। बात इतनी समय की नहीं है — आप आठ घंटे सो सकते हैं परंतु यदि नींद गहरी नहीं है तो आप नींद के भूखे होंगे, इसके लिये तरसेंगे—प्रश्न गहराई का है।

हर रात सोने से पहले एक छोटी सी तकनीक का प्रयोग करें और आप बेहद बेहतर महसूस करेंगे। बिजली बुझा दे और अपने बिस्तर में सोने के लिये तैयार होकर बैठ जायें, लेकिन बैठें पंद्रह मिनट के लिये । अपनी आंखें बंद कर लें और कोई भी अनर्गल, उबानेवाली ध्वनि निकालना शुरू करें, जैसे कि ला, ला , ला— और प्रतीक्षा करें कि मन और नयी ध्वनियां पैदा करे। स्मरण रखने योग्य एक ही बात है कि वह ध्वनि या शब्द किसी ऐसी भाषा के न हो जिसे आप जानते हैं। यदि आप अंग्रेज़ी, जर्मन या इतालियन भाषा जानते हैं तो वे अंग्रेज़ी, जर्मन या इतालियन भाषा के नहीं होने चाहियें। किसी भी उस भाषा की आपको अनुमति है जिसे आप नहीं जानते—तिब्बती, चीनी, जापानी। लेकिन यदि आप जापानी जानते हैं तो उसकी अनुमती नहीं है, हां इतालियन बढ़िया रहेगी ।

कोई भी भाषा जो आप नहीं जानते बोल सकते हैं। पहले दिन आप कुछ क्षणों के लिये थोड़ा मुश्किल महसूस करेंगे क्योंकि उस भाषा को कैसे बोलें जो आप नहीं जानते? इसे आप बोल सकते हैं और एक बार शुरू हो जाये,कोई भी ध्वनि, कोई भी अनर्गल शब्द जो चेतन मन को हटाकर अवचेतन को बोलने दें...जब अवचेतन मन बोलता है तो उसकी कोई भाषा नहीं होती।

यह बहुत ही प्राचीन विधि है। यह ओल्ड टैस्टामैंट से आती है। उन दिनों इसे ग्लासोलेलिया कहा जाता था। अभी भी अमेरिका के कुछ चर्चों में इसका इस्तेमाल होता है। वे इसे“ जिव्हा में बोलना” कहते हैं। और यह एक अभूतपूर्व विधि है-एक ऐसी विधि जो अवचेतन में बहुत गहरे तक जाती है। आप “ला, ला, ला” से प्रारंभ करते हैं और फिर जो भी ध्वनि उभरती है आप उसे आने देते हैं। केवल पहले दिन आप थोड़ा मुश्किल महसूस करते हैं और यदि यह एक बार यह ध्वनि उठने लगी तो आपके हाथ गुर आ जाता है। फिर पंद्रह मिनट के लिये आप उन शब्दों को बोल सकते हैं जो अवचेतन से उठ रहे है और उनका एक भाषा की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं, सच तो यह है कि आप पहले ही उस भाषा में बोल रहे हैं। यह आपके चेतन मन को बहुत गहरे में विश्रांत कर देगा।

पंद्रह मिनट— और फिर आप बस लेट जायें और सो जायें। आपकी नींद गहरी हो जायेगी। कुछ ही सप्ताह में आप अपनी नींद में एक गहराई का अनुभव करेंगे और सुबह बिलकुल तरोताज़ा महसूस करेंगे।
साभार :योगा: दि साइंस ऑफ दि सोल |


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Wednesday, January 25

विभिन्न अंगों में कैसर के लक्षण एवं योग उपचार :







By- Dr.Kailash Dwivedi

जीभ और मुँह :
  • ठीक न होने वाला अलसर या धब्बा या रसौली बाद में जबड़े के नीचे या गर्दन की लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना |
स्वर यंत्र :
  • आवाज़ का फट जाना, गर्दन में लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना, खास तरह के शीशे से जांच करना ज़रूरी
श्वसनी : 
  • खाना निगलने में मुश्किल होना, गले में वृद्धि होना और गर्दन में लसिका ग्रंथियों का सख्त हो जाना
फेफड़े :
  • चिरकारी खॉंसी व बलगम में खून आना। छाती की एक्स रे फिल्म में व्याधि विकास दिख जाता है
ग्रासनली :
  • खाना निगलने में मुश्किल होना और ऐसा लगना कि खाना छाती में अटक गया है
अमाशय :
  • भूख न लगना, घंटों घंटों तक पेट भरा भरा सा लगता रहना, कभी कभी उल्टी आना, पेट के ऊपरी हिस्से में गांठ या रसौली महसूस हो सकती है, उल्टी में खून आ सकता है
आंतें और मलाशय :
  • मल में खून आना, मलत्याग की आदतों में बदलाव होना
स्तन :
  • स्तन में सख्त सी गांठ होना, त्वचा में ठीक न होने वाला अल्सर या वृद्धि, बगलों में लसिका ग्रंथियों में सूजन
गर्भाशय :
  • रक्तस्त्राव जो कि माहवारी से या गर्भावस्था से जुड़ा हुआ न हो, गर्भाशय ग्रीवा पर कोई असामान्य वृद्धि महसूस होना, पेट के निचले हिस्से में कोई वृद्धि महसूस होना
खून :
  • रक्तस्त्राव की प्रवृति, लिवर या तिल्ली का बढ़ जाना, बार बार संक्रमण होना
डिंबवाही ग्रंथियॉं :
  • पेट के निचले हिस्से में गांठ होना
वृषण :
  • वृषण या वृषण कोश में सूजन
शिश्न :
शिश्न की त्वचा पर मस्से जैसी या अनियमित वृद्धि और बीच बीच में खून निकलना
मूत्राशय :
  • बीच बीच में पेशाबद्वारा खून निकलना
पुरस्थ ग्रंथी :
  • पेशाब करने में परेशानी, थोड़ी थोड़ी पेशाब निकलते रहना, पेशाब में पीप, पुरस्थ और मलाशय में सख्त वृद्धि होना
लिवर/ जिगर :
  • बढ़ा हुआ लिवर, पीलिया या सफेद मल
हड्डियॉं :
  • हड्डियों से जुड़ी हुई सख्त वृद्धि, जल्दी जल्दी बढ़ती जाती है पर दर्द रहित होती है
लसिका ग्रंथियॉं :
  • कई जगहों में लसिका ग्रंथियों में सूजन, रबर जैसी हो जाना, बुखार और वजन घटना


यदि प्रारंभिक अवस्था में किसी भी प्रकार के कैंसर का पता चलता है ‍तो यह करें -

  • तीन से चार बारअनुलोम-विलोम प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए | 
  • रात्रि में भी सोने से पूर्व पांच मिनट अनुलोम-विलोम का अभ्यास करें तत्पश्चात प्रतिदिन क्रमश: कपालभाती, भस्त्रिका, नाड़ी शोधन प्राणायाम और पांच मिनट के ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बना लें।
इसके अतिरिक्त :
  • स्वच्छ हवा में रहें 
  • पर्याप्त मात्रा में जल का सेवन करें 
  • प्राकृतिक आहार लें
  • जितनी भूख हो उससे कम खाएं
  • प्रातः खाली पेट 7 तुलसी पत्र + 4 नीम की कोमल पत्तियों के रस को 50 मिली. गेहूं के ज्वारा या एलोवेरा के साथ लें | (पत्तियों को चबाकर भी खा सकते हैं) इनका योग कीमोथेरेपी जैसा ही असर करेगा ।


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Sunday, January 22

इन 6 आसनों से बनाएं अपनी बॉडी स्लिम !





By- Dr. Kailash Dwivedi

उर्ध्व हस्तोत्तानासन :

खड़े होकर पैरों को थोड़ा खोलें। हाथों की उंगलियों को फंसाकर सिर के ऊपर उठा लें। श्वास निकालें और कमर को लेफ्ट साइड में झुका लें। दाहिनी ओर से भी इसी प्रकार करें। दोनों साइड से 10-10 बार करें |

उत्तानपादासन :

कमर के बल लेटकर हाथों को जंघाओं के नीचे जमीन पर रखें। श्वास भरते हुए दोनों पैरों को 90 डिग्री तक ऊपर उठाएं एवं श्वास छोड़ते हुए वापस नीचे लायें। इस प्रकार जमीन पर बिना टिकाए बार-बार पैरों को ऊपर-नीचे करते रहें। कमर दर्द वाले इसे न करें।

हृदय स्तंभासन :

कमर के बल लेटकर हाथों को जंघाओं के ऊपर रखें। सांस भरकर पैरों को उठाएं। सिर और कमर को उठाएं। इस दौरान शरीर का भार हिप्स पर रहेगा।

द्विपाद साइकलिंग :

कमर के बल लेटे-लेटे ही दोनों पैरों को मिलाकर एक साथ साइकलिंग की तरह घुमाएं। थकान होने तक लगातार घुमाते रहें। हाथों को कमर के नीचे रखें।

कपालभाति :

सांस को तेजी से नाक से बाहर फेंकें, जिससे पेट अंदर जाएगा। 5-10 मिनट करें। हाई बीपी वाले धीरे-धीरे करें और कमर दर्द वाले कुर्सी पर बैठकर करें।

अग्निसार :

खड़े होकर पैरों को थोड़ा खोलकर हाथों को जंघाओं पर रखें। सांस को बाहर रोक दें। फिर पेट की पंपिंग करें यानी पेट अंदर खींचें, फिर छोड़ें। स्लिप डिस्क, हाई बीपी या पेट का ऑपरेशन करा चुके लोग इसे न करें।

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Saturday, January 21

स्वप्न और मृत्यु पर अधिकार - विज्ञान भैरव तन्त्र - 7




साभार: ओशो वल्र्ड फाउंडेशन
ललाट के मध्य में सूक्ष्म श्वास (प्राण) को टिकाओ। जब वह सोने के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा तब स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा।

तुम अधिकारिक गहरी पर्तों में प्रवेश कर रहे हो।

‘’ललाट के मध्य में सूक्ष्म श्‍वास (प्राण) को टिकाओ।‘’

अगर तुम तीसरी आँख को जान गए हो तो तुम ललाट के मध्य में स्थिर सूक्ष्म श्वास को, अदृश्य प्राण को जान गए, और तुम यह भी जान गए कि वह उर्जा, वह प्रकाश बरसता है।

‘’जब वह सोने के क्षण में ह्रदय तक पहुंचेगा—जब वह वर्षा तुम्हारे ह्रदय तक पहुँचेगी—‘’तब स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’

इस विधि को तीन हिस्सों में लो। एक, श्वास के भीतर जो प्राण है, जो उसका सूक्ष्म, अदृष्य, अपार्थिव अंश है, उसे तुमको अनुभव करना होगा। यह तब होता है, जब तुम भृकुटियों के बीच अवधान को थिर रखते हो। तब यह आसानी से घटित होता है। अगर तुम अवधान को अंतराल में टिकाते हो, तो भी घटित होता है, मगर उतनी आसानी से नहीं। यदि तुम नाभि केंद्र के प्रति सजग हो, जहां श्वास आती है। और छूकर चली जाती है। तो भी यह घटित होता है, पर कम आसानी से। उस सूक्ष्म प्राण को जानने का सबसे सुगम मार्ग है, तीसरी आँख में थिर होना। वैसे तुम जहां भी केंद्रित होगें। वह घटित होगा। तुम प्राण को प्रभावित होते अनुभव करोगे।

यदि तुम प्राण को अपने भीतर प्रवाहित होता अनुभव कर सको तो तुम यह भी जान सकते हो कि कब तुम्हारी मृत्यु होगी। यदि तुम सूक्ष्म श्वास को, प्राण को महसूस करने लगे। तो मरने के छह महीने पहले से तुम अपनी आसन्न मृत्यु को जानने लगते हो। कैसे इतने संत अपनी मृत्यु की तिथि बना देते है? यह आसान है। क्योंकि यदि तुम प्राण के प्रवाह को जानते हो तो जब उसकी गति उलट जाएगी। तब उसको भी तुम जान लोगे। मृत्यु के छह महीने पहले प्रक्रिया उलट जाती है। प्राण तुम्हारी बाहर जाने लगता है। तब श्वास इसे भीतर नहीं ले जाती, बल्कि उलटे बाहर ले जाने लगती है—वह श्वास।

तुम इसे जान पाते हो, क्योंकि तुम उसके अदृश्य भाग को नहीं देखते, केवल वाहन को ही देखते हो। और वाहन तो एक ही रहेगा। अभी श्वास प्राण को भीतर ले जाती है और वहां छोड़ देती है। फिर वाहन बाहर खाली वापस जाता है। और प्राण से पुन: भरकर भीतर जाता है। इसलिए याद रखो कि भीतर आने वाली श्वास और बाहर जाने वाली श्वास, दोनों एक नहीं है। वाहन के रूप में तो पूरक श्वास और रेचक श्वास एक ही है, लेकिन जहां पूरक प्राण से भरा होता है। वहीं रेचक उससे रिक्त रहता है। तुमने प्राण को पी लिया और श्वास खाली हो गई।

जब तुम मृत्यु के करीब होते हो, तब उलटी प्रक्रिया चालू होती है। भीतर आने वाली श्वास प्राण विहीन आती है। रिक्त आती है। क्योंकि तुम्हारा शरीर अस्तित्व से प्राण को ग्रहण करने में असमर्थ हो जाता है। तुम मरने वाले हो, तुम्हारी जरूरत न रही। पूरी प्रक्रिया उलट जाती है। अब जब श्वास बाहर जाती है, जब प्राण को साथ लिए बाहर जाती है।

इसलिए जिसने सूक्ष्म प्राण को जान लिए वह अपनी मृत्यु का दिन भी तुरंत जान सकता है। छह महीने पहले प्रक्रिया उलटी हो जाती है।

यह सूत्र बहुत-बहुत महत्‍वपूर्ण है।

‘’ललाट के मध्‍य में सूक्ष्म श्वास (प्राण) को टिकाओ। जब सोने के क्षण में वह ह्रदय तक पहुंचेगा। तब स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’

जब तुम नींद में उतर रहे हो, तभी इस विधि को साधना है, अन्य समय में नहीं। ठीक सोने का समय इस विधि के अभ्यास के लिए उपयुक्त समय है।

तुम नींद में उतर रहे हो, धीरे-धीर नींद तुम पर हावी हो रही है। कुछ ही क्षणों में भीतर तुम्हारी चेतना लुप्त होगी। तुम अचेत हो जाओगे। उस क्षण के आने के पहले तुम अपनी श्वास और उसके सूक्ष्म अंश प्राण के प्रति सजग हो जाओ। और उसे ह्रदय तक जाते हुए अनुभव करो। अनुभव करते जाओ कि वह ह्रदय तक आ रहा है। ह्रदय तक आ रहा है। प्राण ह्रदय से होकर तुम्हारे शरीर में प्रवेश करता है, इसलिए यह अनुभव करते ही जाओ। कि प्राण ह्रदय तक आ रहा है। और इस निरंतर अनुभव के बीच ही नींद को आने दो। तुम अनुभव करते जाओ और नींद को आने दो; नींद को तुमको अपने में समेट लेने दो।

यदि यह संभव हो जाए कि तुम अदृश्य प्राण को ह्रदय तक जाते देखो और नींद को भी, तो तुम अपने सपनों के प्रति भी सजग हो जाओगे। तब तुमको बोध रहेगा कि तुम सपना देखते हो तो तुम समझते हो कि यह यथार्थ ही है। वह भी तीसरी आँख के कारण ही संभव होता है। क्‍या तुमने किसी को नींद में देखा है। उसकी आंखे ऊपर चली जाती है, और तीसरी आँख में स्थिर हो जाती है। यदि नहीं देखा तो देखो।

तुम्हारा बच्चा सोया है, उसकी आंखे खोलकर देखो कि उसकी आंखे कहां है। उसकी आँख की पुतलियाँ ऊपर को चढ़ी है। और त्रिनेत्र पर केंद्रित है। मैं कहता हूं कि बच्चों को देखो, सयानों को नहीं। सयाने भरोसे योग्य नहीं है। क्योंकि उनकी नींद गहरी नहीं है। वे सोचते भर है कि सोये है। बच्चों को देखो। उनकी आंखें ऊपर को चढ़ जाती है।

इसी तीसरी आँख में थिरता के कारण तुम अपने सपनों को सच मानते हो। तुम यह नहीं समझ सकते की वे सपने है। वह तुम तब जानोंगे, जब सुबह जागोगे। तब तुम जानोंगे कि यह स्वप्न है। यदि समझ जाओ तो दो तल हो गए—स्वप्न है और तुम सजग हो, जागरूक हो। जो नींद में स्वप्न के प्रति जाग सके, उसके लिए यह सूत्र चमत्कारिक है।

यह सूत्र कहता है: ‘’स्वप्न पर और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’

यदि तुम स्वप्न के प्रति जागरूक हो जाओ तो तुम दो काम कर सकते हो। एक कि तुम स्वप्न पैदा कर सकते हो। आमतौर से तुम स्वप्न नहीं पैदा कर सकते। आदमी कितना नपुंसक है। तुम स्वप्न भी नहीं पैदा कर सकते। अगर तुम कोई खास स्वप्न देखना चाहो तो नहीं देख सकते; यह तुम्हारे हाथ में नहीं है। मनुष्य कितना शक्तिहीन है। स्वप्न भी उससे नहीं निर्मित किए जा सकते। तुम स्वप्नों के शिकार भर हो। उनके स्त्रष्टा नहीं। स्वप्न तुम में घटित होता है। तुम कुछ नहीं कर सकते हो। न तुम उसे रोक सकते हो, न उसे पैदा कर सकते हो।

लेकिन अगर तुम यह देखते हुए नींद में उतरो कि ह्रदय प्राण से भर रहा है। निरंतर हर श्वास में प्राण से स्पर्शित हो रहा है तो तुम अपने स्वप्नों के मालिक हो जाओगे। और यह मलकियत बहुत अनूठी है, दुर्लभ है। तब तुम जो भी स्वप्न देखना चाहते हो, तुम वह स्वप्न देख सकते हो। और सोत समय कहो कि मैं फलां स्वप्न देखना चाहता हूं और वह स्वप्न कभी तुम्हारे मन में प्रवेश नहीं कर सकेगा।


लेकिन अपने स्वप्नों के मालिक बनने का क्या प्रयोजन है। क्या यह व्यर्थ नहीं है? नहीं, यह व्यर्थ नहीं है। एक बार तुम स्वप्न के मालिक हो गए तो दुबारा तुम कभी स्वप्न नहीं देखोगें। वह व्यर्थ हो गया। जरूरत नहीं रही। जैसे ही तुम अपने स्वप्नों के मालिक होते हो, स्वप्न बंद हो जाते है। उनकी जरूरत नहीं रहती। और जब स्वप्न बंद हो जाते है, तब तुम्हारी नींद का गुण धर्म ही और होता है। वह गुणधर्म वही है, जो मृत्यु का है।

मृत्यु गहन नींद है। अगर तुम्हारी नींद मृत्यु की तरह गहरी हो जाए तो उसका अर्थ है कि सपने विदा हो गए। सपने नींद को उथला करते है। सपनों के चलते तुम सतह पर ही घूमते रहते हो। सपनों में उलझे रहने के कारण तुम्हारी नींद उथली हो जाती है। और जब सपने नहीं रहते, तब तुम नींद के सागर में उतर जाते हो। उसकी गहराई छू लेते है। वही मृत्यु है।

इसलिए भारत न सदा कहा है कि नींद छोटी मृत्यु है। और मृत्यु लंबी नींद है। गुणात्मक रूप से दोनों समान है। नींद दिन-दिन की मृत्यु है, मृत्यु जीवन-जीवन की नींद है। प्रतिदिन तुम थक जाते हो, तुम सो जाते हो, और दूसरी सुबह तुम फिर अपनी शक्ति और अपनी जीवंतता को वापस पा लेते हो। तुम मानो फिर से जन्म लेते हो। वैसे ही सत्तर या अस्सी वर्ष के जीवन के बाद तुम पूरी तरह थक जाते हो। अब छोटी अविधि की मृत्यु से काम नहीं चलेगा, अब तुमको बड़ी मृत्यु की जरूरत है। उस बड़ी मृत्यु या नींद के बाद तुम बिलकुल नए शरीर के साथ पुनर्जन्म लेते हो।

और एक बार यदि तुम स्वप्न-शुन्य नींद को जान जाओ और उसमे बोध पूर्वक रहो तो फिर मृत्यु का भय जाता रहता है। कोई कभी नहीं मर सकता। मृत्यु असंभव है, अभी एक दिन पहले मैं कहता था कि केवल मृत्यु निश्‍चित है। और अब कहता हूं कि मृत्यु असंभव है। कोई कभी नहीं मरा है। कोई कभी मर नहीं सकता। संसार में यदि कुछ असंभव है तो वह मृत्यु है। क्योंकि अस्तित्व जीवन है। तुम फिर-फिर जन्मते हो। लेकिन नींद ऐसी गहरी है कि पुरानी पहचान भूल जाते हो। तुम्हारे मन से स्मृतियां पोंछ दी जाती है।

इसे इस तरह सोचो। मान लो कि आज तुम सोने जा रहे हो, और कोई ऐसा यंत्र बन गया है—शीध्र ही बनने वाला है—जो कि जैसे टेपरिकार्डर के फीते से आवाज पोंछ दी जाती है, वैसे ही मन से स्मृति को पोंछ डालता है। क्योंकि स्मृति भी एक गहरी रिकार्डिंग है। देर-अबेर हम ऐसा यंत्र निकाल लेंगे। जो तुम्हारे सिर में लगा दिया जाएगा। और जो तुम्‍हारे दिमाग को पोंछकर बिलकुल साफ कर देगा। तो कल सुबह तुम वही आदमी नहीं रहोगे जो सोने गया था। क्योंकि तुमको याद नहीं रहेगा कि कौन सोने गया था। तब तुम्हारी नींद मृत्यु जैसी हो जाएगी। एक गैप आ जाएगा। तुमको याद नहीं रहेगा। कि कौन सोया था। यही चीज स्वाभाविक ढंग से घट रही है। जब तुम मरते हो ओर फिर जन्म लेते हो तब तुमको याद नहीं रहता है कि कौन मरा। तुम फिर से शुरू करते हो।

इस विधि के द्वारा पहले तो तुम स्वप्नों के मालिक हो जाओगे। उसका अर्थ हुआ कि सपने आना बंद हो जाएंगे। या यदि तुम खुद सपने देखना चाहोगे तो सपना देख भी सकते हो। लेकिन तब वह ऐच्छिक सपना होगा। वह अनिवार्य नहीं रहेगा। वह तुम पर लादा नहीं जाएगा। तुम उसके शिकार नहीं होंगे। और तब तुम्हारी नींद का गुणधर्म ठीक मृत्यु जैसा हो जाएगा। तब तुम जानोगे कि मृत्यु भी नींद है।

इसलिए यह सूत्र कहता है: ‘’स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा।‘’

तब तुम जानोंगे कि मृत्यु एक लंबी नींद है—और सहयोगी है, और सुंदर है। क्योंकि वह तुमको नव जीवन देती है। वह तुमको सब कुछ नया देती है, फिर तो मृत्यु भी समाप्त हो जाती है। स्वप्न के शेष होते ही मृत्यु समाप्त हो जाती है।

मृत्यु पर नियंत्रण पाने, अधिकार पाने का दूसरा अर्थ भी है। अगर तुम समझ लो कि मृत्यु नींद है तो तुम उसको दिशा दे सकते हो। अगर तुम अपने सपनों को दिशा दे सकते हो। तो मृत्यु को भी दे सकते हो। तब तुम चुनाव कर सकते हो, कि कहां पैदा हो? कब पैदा हो, किससे पैदा हो, और किस रूप में पैदा हो, तब तुम अपने जीवन के मालिक होते हो।

बुद्ध की मृत्यु हुई, मैं उनके अंतिम जन्म के पूर्व के जन्म की चर्चा कर रहा हूं। जब वे बुद्ध नहीं थे। मरने के पूर्व उन्होंने कहा: ‘’मैं अमुक मां बाप से पैदा होऊंगा, ऐसी मेरी मां होगी, ऐसे मेरे पिता होंगे, और मेरी मां मेरे जन्म के बाद ही मर जायेगी। और जब मैं जनमुगां तो मेरी मां ऐसे-ऐसे सपने देखेगी। न तुमको सिर्फ अपने सपनों पर अधिकार होगा दूसरे के स्वप्नों पर भी अधिकार हो जायेगा। सो बुद्ध ने उदाहरण के तौर पर बताया कि जब मैं मां के पेट में होऊंगा, तब मेरी मां ये-ये स्वप्न देखेगी। और जब कोई इस क्रम से इन स्वप्नों को देखे, तब तुम समझ जाना की मैं जन्म लेने वाला हूं।

और ऐसा ही हुआ। बुद्ध की माता ने उसी क्रम से सपने देखे। वह क्रम सारे भारत को पता था। विशेषकर उनको जो धर्म में, जीवन की गहन चीजों में और उसके गुह्म पथों में उत्सुक थे। पता था, इसलिए उन स्वप्नों की व्याख्या हुई। स्वप्नों की व्याख्या करने वाला पहला आदमी फ्रायड नहीं था। और न उसकी व्याख्या में गहराई थी। पला वह केवल पश्चिम के लिए था।

तो बुद्ध के पिता ने स्वप्नों के व्याख्याकारों को, उस जमाने के फ्रायडों और जुंगों को तुरंत बुलवाया और उनसे पूछा, इस क्रम का क्या अर्थ है। मुझे डर लगता है, ये सपने अद्भुत है। और एक ही क्रम से आ रहे है, एक ही तरह के सपने, बारी-बारी से आ रहे है। मानों कोई एक ही फिल्म को बार-बार देखता हो। क्या हो रहा है।

और व्याख्याकारों ने बताया कि आप एक महान आत्मा के पिता होने जा रहे है। वह बुद्ध होने वाला है। लेकिन आपकी पत्नी को संकट है। क्योंकि जब ऐसे बुद्ध जन्म लेते है, तब मां का जीना कठिन हो जाता है। बुद्ध के पिता ने कारण पूछा। व्याख्याकारों ने कहा कि हम यह नहीं बता सकते। लेकिन जो आत्मा पैदा होने वाली है, उसका ही वक्तव्य है कि उसके जन्म लेने पर उसकी मां की मृत्यु हो जायेगी।

बाद में बुद्ध से पूछा गया कि आपकी माता की मृत्यु तुरंत क्यो हुई? उन्‍होंने कहा कि एक बुद्ध को जन्म देना इतनी बड़ी घटना है कि उसके बाद और सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। इसलिए मां जीवित नहीं रह सकती। उसे नया जीवन शुरू करने के लिए फिर से जन्म लेना होगा। एक बुद्ध को जन्म देना परम अनुभव है। ऐसा शिखर है कि मां उसके बाद नहीं बची रह सकती। इसलिए मां की मृत्यु हुई।

बुद्ध ने अपने पिछले जन्म में कहा था कि मैं उस समय जन्म लूंगा, जब मेरी मां एक ताड़ वृक्ष के नीचे खड़ी होगी। और वही हुआ। बुद्ध का जब जन्म हुआ तब उनका मां ताड़ वृक्ष के नीचे खड़ी थी। और बुद्ध ने यह भी कहां की। जन्म लेने के बाद में तुरंत सात कदम चलूंगा। यह-यह पहचान होगी। जो बताए देता हूं, ताकि तुम जान सको कि बुद्ध का जन्म हो गया। और बुद्ध ने सब कुछ का इंगित किया।

और यह केवल बुद्ध के लिए ही सही नहीं है। यही जीसस के लिए सही है, यही महावीर के लिए सही है। यही और भी कई अन्यों के लिए सही है। प्रत्येक जैन तीर्थंकर ने अपने पिछले जन्म में भविष्‍यवाणी की थी कि उनका जन्म किस तरह होगा। उन्होंने भी स्वप्नों के क्रम बताए थे। उन्होंने भी प्रतीक बताए थे, और कहा था कि किस तरह सब कुछ घटित होने वाला है।

तुम दिशा दे सकते हो, एक बार तुम अपने स्वप्नों को दिशा देने लगो तो सब कुछ को दिशा दे सकते हो। क्योंकि यह संसार स्वप्नों का ही बना हुआ है। और स्वप्नों का ही यह जीवन बना है। इसलिए जब तुम्हारा अधिकार सपने पर हुआ तब सब कुछ पर हो गया।

यह सूत्र कहता है: ‘’स्वयं मृत्यु पर।‘’

तब कोई व्‍यक्‍ति अपने को एक विशेष तरह का जन्‍म भी दे सकता है। विशेष तरह का जीवन भी दे सकता है।

हम लोग तो शिकार है। हम नहीं जानते है कि क्यों जन्मते है, क्यों मरते है। कौन हमें चलाता है और क्यों? काई कारण नहीं दिखाई देता है। सब कुछ अराजकता, संयोग जैसा है। ऐसा इसलिए है कि हम मालिक नहीं है। एक बार मालिक हो जाएं तो फिर ऐसा नहीं रहेगा।
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Wednesday, January 18

इस मुद्रा से बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और मोटापा हो जायेगा ख़त्म !



By- Dr. Kailash Dwivedi

लाभ :

  • सूर्य मुद्रा शरीर की सूजन मिटाकर उसे हलका बनाती है।
  • सूर्य मुद्रा का रोज दो बार 5 से 15 मिनट के लिए अभ्यास करने से रक्त से कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है। 
  • इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर का बढ़ा हुआ वजन तेजी कम होने लगता है।
  • पेट संबंधी रोगों में भी सूर्य मुद्रा लाभदायक है। 
  • इस मुद्रा को करने से बेचैनी और चिंता कम होकर मस्तिष्क शांत बना रहता है। 

मुद्रा करने की विधि :


सूर्य की अँगुली (रिंग फिंगर) को हथेली की ओर मोड़कर उसे अँगूठे के अग्रभाग से स्पर्श कराएँ । बाकी बची तीनों अँगुलियों को सीधा रखें।

कितने समय तक और कब करें :

  • प्रातः सूर्योदय के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर इस मुद्रा को करने से अधिक लाभ होता है |
  • सांयकाल सूर्यास्त से पहले इस मुद्रा को किया जा सकता है |
  • प्रारंभ में पांच मिनट से शुरू करके 15 मिनट तक किया जा सकता है |
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Monday, January 16

जुकाम एवं छींक की योगिक चिकित्सा



By- Dr.Kailash Dwivedi

जुकाम में लाभकारी-अग्नि मुद्रा
लाभ :

  1. अग्निमुद्रा को करने से बलगम, खांसी, पुराना जुकाम, नजला, सांस का रोग, ज्यादा ठंड लगना तथा निमोनिया आदि रोग दूर हो जाते हैं l
  2. इससे शरीर में अग्नि की मात्रा तेज हो जाती है।

विधि :

अग्नि मुद्रा बहुत ही आसान मुद्रा है। इसे बनाने के लिए अंगूठों के आगे के भाग (अग्रभाग) को मिलाएं और
बाकी की सभी अंगुलियाँ सीधी रखें। हथेलियां नीचे की ओर रहें।
कितने समय तक करें
अग्नि मुद्रा को दिन में 3-4 बार 15-15 मिनटों के लिए कर सकते हैं।


ज्यादा छींक आना जैसे रोग को दूर करे ; अदिती मुद्रा
लाभ
इस मुद्रा को करने से हर समय उबासी आना, ज्यादा छींक आना जैसे रोगों को दूर किया जा सकता है।

विधि -
अंगूठे के आगे के भाग को अनामिका (छोटी उंगली के साथ वाली उंगली) उंगली की जड़ में टेढ़ा लगाने से अदिती मुद्रा बन जाती है।

कितने समय तक करें
अदिती मुद्रा को दिन में 3-4 बार 15-15 मिनटों के लिए कर सकते हैं।

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Monday, January 2

षट्कर्म - कुंजल क्रिया



       


यह क्रिया उन लोगों के लिए है जो धौति क्रिया नहीं कर सकते हैं। इस क्रिया में हल्के गर्म पानी को पीकर उस पानी को अन्दर से बाहर निकाला जाता है। जिससे पेट व आहार नली साफ होती है।
विधि-
        कुंजल  क्रिया को सुबह सूर्योदय से पहले और शौच से आने के बाद करें। शौच के बाद मुंह-हाथ साफ करके 1 लिटर पानी को गर्म करके रखें। पानी जब हल्का गुनगुना रह जाए तो कागासन की स्थिति में बैठकर जितना सम्भव हो पानी पियें। फिर खड़े होकर सामने की ओर झुकें और तीन अंगुलियों तर्जनी, मध्यमा और अनामिका को मिलाकर मुंह के अन्दर जीभ के पिछले हिस्से पर घुमाएं। इससे उल्टी की इच्छा होगी और पानी बाहर निकलने लगेगा। जब पानी निकलने लगे तो अंगुली को बाहर निकाल लें और जब तक पानी बाहर निकलता रहे, अंगुली को बाहर रखें। जब पानी निकलना बन्द होने लगे तो पुन: अंगुली को अन्दर डालकर उल्टी करें। इस क्रिया को तब तक करें। जब तक पेट से सारा पानी बाहर न निकल जाएं। फिर जब पानी खटटा या कड़वा निकलने लगे तो फिर 2 गिलास पानी पीकर पहले की तरह ही अंगुली को जीभ पर घुमाकर उल्टी करें। इस क्रिया में पानी की मात्रा बढ़ाते हुए 2 लिटर तक ले जा सकते हैं।
सावधानी- 

  • इस क्रिया को शौच के बाद और सूर्योदय से पहले करना चाहिए। 
  • कुंजल क्रिया के लिए पानी में नमक या सौंफ आदि कुछ भी न मिलाएं। कुंजल क्रिया हमेशा शौच के बाद करें अन्यथा कब्ज होने की संभावना रहती है। इस क्रिया का अभ्यास हृदय एवं उच्च रक्तचाप के रोगी को नहीं करना चाहिए।
  • कुन्जल करने के 2 घंटे बाद स्नान करें या कुंजल  करने से पहले स्नान करें। 

लाभ-

  1. कुंजल से कपोल दोष, मुंहासे, दांतों के रोग, जीभ के रोग, रक्तविकार, छाती के रोग, कब्ज, वात, पित्त व कफ से होने वाले रोग दूर होते हैं। 
  2. यह रतोंधी, खांसी, दमा, मुंह का सूखना, कण्ठमाला आदि को खत्म करती है। 
  3. यह पेट को साफ करती है, पाचन शक्ति को बढ़ाती है, बदहजमी व गैस विकार आदि रोगों को दूर करती है।  
  4. जिगर को शक्तिशाली बनाती है जिससे जिगर से संबन्धित रोग नहीं होते। 
  5. यह सर्दी, जुकाम, नजला, खांसी, दमा, कफ आदि रोगों में भी लाभकारी है।


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Wednesday, December 28

यौगिक षट्कर्म - त्राटक




By-Dr. Kailash Dwivedi

योगशास्त्र में त्राटक के बारे में कहा गया है कि एकाग्र होकर पलकों को बिना झपकाए किसी सूक्ष्म वस्तु (छोटे वस्तु या बिन्दू) पर आंखो में आंसू आने तक ध्यान केन्द्रित करना और आंसू आने पर आंखों को बंद कर लेना त्राटक कहलाता है।
त्राटक,  ध्यान के अभ्यास की एक साधना है | इस क्रिया में  किसी वस्तु पर एकटक दृष्टि केन्द्रित कर मन को एकाग्र किया जाता है। त्राटक को हठयोग का ही एक अंग माना गया है। इसके अभ्यास से व्यक्ति में एकाग्रता में वृद्धि होती है एवं सम्मोहन शक्ति का जागरण होता है।

 विधि :

    त्राटक के अंतर्गत बिंदु पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए सफेद कागज पर एक रूपये के बराबर  आकर में गोल निशान बना लें। निशान का रंग काला या हरा होना चाहिए। या कमरे में कोई दीपक या मोमबत्ती जलाकर स्वयं से लगभग साढ़े चार हाथ की दूरी पर आंखों की बराबर ऊंचाई पर रखें। दीपक के लिए देशी घी का प्रयोग करें।
       अब नीचे आसन  बिछाकर पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाएँ ।  शरीर को स्थिर रखते हुए अपनी दृष्टि को कागज पर बनाए गये निशान परअथवा  मोमबत्ती से निकलने वाली लौ (ज्योति) पर केन्द्रित करें। इस क्रिया में बिना पलक झपकाए तब तक उस पर दृष्टि रखे, जब तक आंखों में आंसू आने की स्थिति न बन जाए। आंखों में आंसू आने से पहले ही आंखों को बंद कर लें और अपनी दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर आंखों के पलकों को सहलाएं। इस तरह इस क्रिया को 15 मिनट तक करने के बाद आपको उस  बिंदु या दीपक की ज्योति  के आस-पास अनेक बिन्दुओं में किरणें नजर आने लगेगी। परंतु अपनी दृष्टि को पहले वाली ज्योति या बिंदु पर ही केन्द्रित रखें | कुछ देर तक एकाग्र होकर प्रकाश को देखते रहने के बाद पहले की तरह ही प्रकाश आ जायेगा। यह क्रिया तब होती है, जब दृष्टि एकाग्र कर जिस दिशा में रखी जाती है उस दिशा में प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देने लेगेगा।

सावधानियां

  • जिन्हें आँखों से सम्बंधित कोई गंभीर रोग हो उन्हें त्राटक नहीं करना चाहिए |
  • त्राटक का अभ्यास ब्रहामुहूर्त अथवा  मध्यरात्रि के समय करना चाहिए। 
  • त्राटक क्रिया को तब तक करें जब तक आंखों में जलन न होने लगे। 
  • इस क्रिया को शुरू-शुरू में एक बार ही करें। 
  • त्राटक के लिए कभी भी कैरोसिन तेल का प्रयोग न करें तथा बल्ब पर भी त्राटक क्रिया को न करें।
  • इस क्रिया को शांत स्थान पर करें और मन को एकाग्र करें। इसमें दीपक के लौ के अलावा किसी दूसरी वस्तु पर भी कर सकते हैं जैसे- आप अपने मन के अनुसार किसी बगीचे में शांत स्थान पर बैठकर फूल पर दृष्टि एकाग्र कर सकते हैं। इसमें सफलता मिलने के बाद चांदनी रात में चन्द्रमा पर अपनी दृष्टि केन्द्रित कर सकते हैं।

चिकित्सकीय लाभ 

  1. त्राटक से आंखों के विकार दूर होकर आंखों की रोशनी बढ़ती है। 
  2. इससे धारणा में लाभ मिलता है और मन स्थिर रहता है। इच्छा शक्ति बढ़ती है और प्राणवायु स्थिर रहती है। 
  3. त्राटक की पूर्ण सिद्धि होने के बाद यदि वह व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति को बढ़ाकर किसी व्यक्ति की आंखों से आंखों को मिलाकर देखें तो व सम्मोहित (हिप्नोटाइज) हो जाता है और जो भी कहता है वह करने को तैयार हो जाता है।

आध्यात्मिक लाभ :

  1.  हठयोग के षट्कर्म से कुण्डलिनी जागरण में सहायता मिलती है। 

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Saturday, December 10

गंजापन दूर करना है तो इसे करें


माण्डुकी मुद्रा

मुखं संमुद्रितं कृत्वा जिह्वामूलं प्रचालयेत्। शनैर्ग्रसेदमृतं तां माण्डूकीं मुद्रिकां विदुः ॥६२॥
वलितं पलितं वैव जायते नित्ययौवनम्। न केशे जायते पाको यः कुर्यान्नित्यमाण्डुकीम् ॥६३॥ श्रीघेरण्डसंहिता |

माण्डूकी मुद्रा की विधि :

  1. सुखपूर्वक किसी आसन में बैठकर अपने मुंह को बंद कर लें । आँखें बंद रहें एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रहे
  2. जीभ को पूरे तालू के ऊपर दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं।
  3. जीभ को इस तरह से घुमाने के फलस्वरूप उत्पन्न लार का पान करें (निगलते रहें) योग शास्त्र में इस लार को सुधा या अमृत की संज्ञा दी गयी है।

सावधानियां :

  • माण्डूकी मुद्रा करते समय आपका पूरा ध्यान जीभ के संचालन पर रहना चाहिए |
  • आँखें बंद रखें एवं मन की आँखों से (अन्तःचक्षु) से जीभ के क्रियाकलाप को देखते रहें |
  • भोजन के तुरंत बाद या पहले माण्डूकी मुद्रा न करें | कम-से-कम 30 मिनट के अंतर पर कर सकते हैं |

मुद्रा करने का समय व अवधि :माण्डूकी मुद्रा करने का सबसे उपयुक्त समय प्रातः एवं सायंकाल का है |

यह मुद्रा 5 मिनट से प्रारंभ करके धीरे-धीरे 15 मिनट तक बढ़ा सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ :

  1. बाल झड़ना, गंजापन एवं असमय सफेद हो रहे बालों को रोकने के लिए योगशास्त्र में माण्डुकी मुद्रा को सबसे श्रेष्ठ उपाय बताया गया है।
  2. माण्डुकी मुद्रा करने से शरीर में झुर्रियां पड़ना रुक जाता है तथा यौवन की प्राप्ति होती है।
  3. माण्डुकी मुद्रा के निरंतर अभ्यास से जीभ, गले और आंखों के रोग समाप्त हो जाते हैं |
  4. इस मुद्रा के प्रभाव से चेहरे एवं शरीर में चमक पैदा हो जाती है।
  5. माण्डुकी मुद्रा से पाचन सम्बन्धी रोग समाप्त हो जाते हैं |

आध्यात्मिक लाभ :

माण्डुकी मुद्रा से इच्छाओं पर सयंम होता है एवं मन को नियंत्रित करने की शक्ति उत्पन्न होती है |
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Friday, May 8

सूर्यभेदी प्राणायाम



 विधिः 

  1. किसी भी ध्यानात्मक आसन जैसे- पद्मासन,सिद्धासन अथवा  सुखासन में बैठकर बायें नासाछिद्र  को बंद कर लें एवं  दायें नासाछिद्र से धीरे-धीरे श्वास भरें। 
  2. जालन्धर बन्ध लगाकर तब तक अन्तः कुम्भक करें जब तक सिर-से लेकर पाँव तक पसीना न आ जाए |अर्थात अधिकाधिक जितने समय तक रोक सकते हैं उतने समय तक वायु को अन्दर ही रोक कर रखें तत्पश्चात श्वास को  बाएं नासाछिद्र से बाहर निकाल दें |
  3. फिर दायें नासाछिद्र से श्वास भरकर अन्तः कुम्भक करें एवं बाएं नासाछिद्र से श्वास को छोड़ दें | इस प्रकार 3 से 5 चक्र  इस क्रिया को दोहराएँ |
लाभ : 
सूर्यभेदी प्राणायाम नियमित रूप से करने से कफ-सम्बन्धी समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं।
सर्दी, खाँसी जुकाम दूर हो जाते हैं व पुराना जमा हुआ कफ पिघल जाता है।
इस प्राणायाम से शरीर की अग्नि प्रदीप्त होती है जिससे पाचन शक्ति भी प्रबल हो जाती है |
सावधानियां :                                                                                                                                                                 
जिन व्यक्तियों का ब्लड प्रेशर हाई रहता हो उन्हें सुर्यभेदी  प्राणायाम नहीं करना चाहिए |
शरीर की बढ़ी हुयी गर्मी की अवस्था में भी यह  निषेध है |

Thursday, May 7

प्राणायाम - अनुलोम-विलोम

विधि:

  1. किसी भी पदमासन,सिद्धासन या सुखासन में बैठ जाएँ |
  2.  कमर से  गर्दन तक रीढ़ की हड्डी सीधी रखें एवं आंखें बंद कर लें। 
  3. दाहिने हाँथ के अंगूठे से दाहिने नासाछिद्र  को बंद कर लें। 
  4. अब बाएं नासाछिद्र  से धीरे-धीरे श्वास को बाहर की ओर निकालें। संपूर्ण श्वास निकालने के पश्चात पुन: बाएं नासाछिद्र से ही श्वास भरना प्रारंभ करें। 
  5. अधिक से अधिक सांस भरने के बाद बाएं नासाछिद्र को अनामिका और कनिष्ठा अंगुलियों से बंद कर लें व अंगूठे को दाएं नासाछिद्र से हटाकर दाईं नासिका से ही श्वास को  धीरे-धीरे बाहर निकालें। 
  6. पूरा श्वास बाहर निकल जाने के बाद दाएं नासाछिद्र  से ही श्वास भरना प्रारंभ करें और पूरा श्वास  भर जाने के पश्चात दाएं नासाछिद्र  को अंगूठे से बंद कर श्वास को बाएं नासाछिद्र  से अंगुलियां हटाकर धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। 
  7. यह एक चक्र अनुलोम-विलोम प्राणायाम कहलाता है।प्रारंभ में इस प्राणायाम का अभ्यास कम से कम 11 चक्र करें।

लाभ:

  • अनुलोम-विलोम प्राणायाम के अभ्यास से शरीर की समस्त नाड़ियां शुद्ध हो जाती हैं, जिससे शरीर दोषरहित, पवित्र, निर्मल एवं  हल्का हो जाता है। शरीर की ऊर्जा व्यवस्थित होकर ऊर्ध्वगामी होने लगती है। 
  • इस प्राणायाम से स्नायु तंत्र संबंधी रोग दूर होते हैं एवं मन शान्त एवं  एकाग्र हो जाता है। विचारों में सकारात्मकता, सृजनात्मकता व रचनात्मकता बढ़ती है। 
  • अनुलोम-विलोम के अभ्यास से तनाव, क्रोध, चिन्ता, चिड़चिड़ापन, भय, घबराहट, अशांति, बेचैनी, हाई ब्लडप्रेशर, माइग्रेन, नींद न आना, कम्पवात आदि विकार दूर हो जाते हैं। 
  • अनुलोम-विलोम प्राणायाम  के नियमित अभ्यास से गठिया, आमवात, वैरीकोज वेन्स, शीतपित्त, ऐसिडिटी, साइनस तथा इंद्रियों की दुर्बलता दूर होती है। 




प्लाविनी प्राणायाम

विधि :

  1. जमीन पर आसन बिछाकर पदमासन, सुखासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ |
  2. दोनों नासिका (नाक के छिद्र) से वायु को को खींचकर फेफड़ों एवं पेट तक भरें |
  3. श्वास  को तब तक अन्दर रोककर रखें जब तक आराम से श्वास  को रोकना सम्भव हो। 
  4. दोनों नासा छिद्रों से धीरे-धीरे श्वास  छोड़ें अर्थात वायु को बाहर निकालें। 
  5. आराम से जितनी देर तक कर सकते इस तरह इस क्रिया को करें |

सावधानियां :

  • इसका अभ्यास को करने में जबरदस्ती बिलकुल न करें।
  • प्राणायाम भोजन के पहले खाली पेट करें |

लाभ :

  1. प्लाविनी प्राणायाम का अभ्यास सिद्ध  होने के बाद व्यक्ति कई दिनों तक बिना भोजन के रह सकता है |
  2. प्लाविनी प्राणायाम के नियमित अभ्यास से  जठराग्नि  प्रबल होकर पाचनशक्ति बढती है एवं  कब्ज से छुटकारा मिलता है। 
  3. इसके अभ्यास से  प्राण शुद्धि एवं आयु में वृद्धि होती है। 
  4. मन स्थिर व शांत होता है एवं  स्मरण शक्ति बढ़ती है। 
  5. प्लाविनी प्राणायाम का  पूर्ण रूप से अभ्यास कर लेने पर व्यक्ति बिना हाथ-पैर हिलाएं पानी में तैर सकता है।

Tuesday, April 28

योगासन करते समय पालन योग्य नियम

  1. योगासन को सुबह सूरज उगने से पहले से लेकर शाम को सूरज डूबने तक किसी भी समय किया जा सकता है। परंतु प्रतिदिन योगासन करने का एक निश्चित समय  होना चाहिए। 
  2. यदि योगासन करने के समय शरीर में कोई दर्द या अति थकान लगे तो योगासन नहीं करना चाहिए।  जिन योगासनों का अभ्यास खास तौर से रोगों को दूर करने के लिए ही किया जाता है, उन्हें  किया जा सकता है।
  3. योगासन को करते समय शौच क्रिया से निवृत हो जाना चाहिए। स्नान के बाद आसन  करें तो सबसे अच्छा है। 
  4. प्रारंभ  में किसी भी आसन को करने में बहुत परेशानी आती है तथा हाथ-पैर आदि शरीर के अंगों को मोड़ पाना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन धीरे-धीरे लगातार अभ्यास करते रहने से कुछ ही दिनों में सारी परेशानियां समाप्त हो जाती हैं और सारे अंग बड़ी ही आसानी से मुड़ जाते हैं। योगासन के शुरुआती दिनों में जो क्रिया जितनी हो सके उतनी ही करनी चाहिए तथा फिर धीरे-धीरे इनको करने का समय बढ़ाते जाए। जबरदस्ती नही करनी चाहिए |
  5. योगासन को भोजन करने से कम से कम 2 घंटे पहले या भोजन करने के 4 घंटे बाद करना चाहिए। खाली पेट योगासन करना अति उत्तम है |
  6. योगासन का अभ्यास 24 घंटे में 1 बार करना चाहिए। अभ्यास कम से कम 15 मिनट और ज्यादा से ज्यादा 1 घंटे तक करना चाहिए। 
  7. योगासन करने वाले व्यक्ति को  हल्का, जल्दी पचने वाला भोजन करना चाहिए। अधिक  तला हुआ एवं मिर्च-मसालेदार भोजन नहीं करना चाहिए। हरी सब्जियां, सलाद, दूध, मक्खन आदि जल्दी पचने वाले और पौष्टिक भोजन उपयुक्त हैं | भूख से थोड़ा सा कम भोजन ही करना चाहिए। योगासन काल में चाय और काफी ना पी जाए तो उत्तम  है। 
  8. प्रत्येक आसन करते समय अपनी श्वास पर ध्यान रखें | आसन के अनुसार ही श्वास-प्रश्वास रखें |
  9. अभ्यासी को एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि आगे झुकने वाले आसन रीढ़  के रोगी,पीछे की झुकने वाले आसन पेट के रोगियों के लिए हानिकारक हैं , अतः यदि रीढ़ या पेट का कोई रोग है तो इन्हें नही करना चाहिए |
  10.  जब  भूख लगे तब ही भोजन करना चाहिए। यदि कब्ज हो तो थोड़ा सा नमक डालकर 2-3 गिलास हल्का गर्म पानी पी लें। फिर कुछ देर तक टहलने के बाद पवन-मुक्तासन, ताड़ासन, भुजंगासन आदि कब्ज को दूर करने वाले आसानों को करने के बाद ही शौच क्रिया के लिए जाना चाहिए। इन आसनों को करने से कब्ज के रोग में बहुत जल्दी लाभ होता है।  कब्ज दूर करने के लिए  फल, फलों का रस, सब्जियों का सूप एवं दूध का सेवन किया जा सकता है । कब्ज को दूर करने के लिए जुलाब आदि किसी रेचक औषधि का  सेवन न करें।
  11. भोजन  को आराम-आराम से और अच्छी तरह चबा - चबाकर करना चाहिए, इससे भोजन जल्दी पच जाता है। भोजन जल्दबाजी में करना अच्छा नही होता है। भोजन में नमक कम रखा जाए तो अच्छा रहता है।
  12. योगासन का अभ्यास खत्म करने के बाद जितने समय तक योगासन किया गया हो उसका चौथाई हिस्से का समय आराम करना चाहिए। जैसे यदि  30 मिनट तक अभ्यास किया गया हो तो कम से कम 8 मिनट तक आराम करना चाहिए। इसी तरह से अगर 1 घंटे तक अभ्यास किया गया हो तो कम से कम 15 मिनट तक आराम अवश्य करना चाहिए।
  13. योगासन करते समय अपने दिमाग से चिंता, गुस्सा, घबराहट, जलन, डर, घमंड और बदले की भावना को दूर रखना चाहिए। इसके साथ ही दिमाग पर किसी भी तरह का कोई दबाव नही पड़ना चाहिए। अगर योगासन करते समय उसमें दिल न लगे तो उसका अभ्यास तुरंत ही बंद कर देना चाहिए। शांत मन से की गई क्रिया ही स्वास्थ्य के लिए अच्छी रहती है। 
  14. योगासन करने से 2 घंटे पहले और 2 घंटे बाद किसी भी तरह के नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। शराब, भांग, गांजा, अफीम, चरस और तंबाकू का तो बिल्कुल इस्तेमाल न करें तो बहुत अच्छा है। 
  15. योगासन करने से पहले एक गिलास ताजा पानी पी लेना लाभकारी है।
  16. यदि आपको कोई रोग है और आप रोगों को दूर करने वाले आसन कर रहे हैं तो उस हालत में भोजन में उन्हीं चीजों को सेवन करना चाहिए जो रोग के शमन में लाभकारी हों , इसके लिए अपने चिकित्सक से सलाह कर लेनी चाहिए | 
  17. योगाभ्यासी को प्रतिदिन रात्रि को 10 बजे तक सोना एवं प्रातः सूर्योदय से पूर्व  जागना चाहिए |
  18. सांस लेने की क्रिया हमेशा नाक के द्वारा ही करनी चाहिए। मुंह से सांस लेना और छोड़ना सही नहीं कहा जा सकता। सांस को हमेशा गहरी ही लेनी चाहिए। जल्दी-जल्दी नही लेना चाहिए। प्राकृतिक सांस हमेशा पेट से ली जाती है सीने से नही।
  19. अभ्यासी को कपड़े हमेशा ढीले, मौसम के अनुसार और साफ-सुथरें ही पहनने चाहिए। 
  20. योगासनों की समाप्ति के बाद उसी समय ठंडी हवा में बाहर नही निकलना चाहिए। जिस स्थान पर योगासन किया जाता है वहां पर ज्यादा तेज हवा नही आनी चाहिए। इसी तरह योगासनों का अभ्यास खत्म करने के बाद तुरंत ही नहाना नहीं चाहिए।
  21. सर्दी के मौसम में योगासनों को करते समय छाती को हमेशा ढककर रखना चाहिए। 
  22. योगासनों का अभ्यास पूरा हो जाने के  तुरंत बाद लघुशंका जाना चाहिए। इससे इकट्ठा हुआ विष शरीर से बाहर निकल आता है। 
  23. सबसे पहले योगासन, इसके बाद प्राणायाम और आखिरी में ध्यान लगाना सबसे अच्छा रहता है। लेकिन बहुत से लोग इनमें से कोई सी भी एक या दो क्रियाओं को करना चाहते हैं तो वे अपनी इच्छा के मुताबिक कर सकते हैं। सिर्फ योगासन, सिर्फ प्राणायाम या सिर्फ ध्यान भी लाभकारी रहते हैं। 
  24. योगासन के लिए 30 मिनट, प्राणायाम के लिए 10 मिनट और ध्यान के लिए 10 मिनट तथा हर एक के बीच में और आखिरी में 10-10 मिनट का आराम करना चाहिए। इस तरह से अगर 80 मिनट का समय रोजाना इस काम को दिया जा सके तो उसका पूरी तरह से लाभ प्राप्त होता है।
  25. भोजन को आराम-आराम से और अच्छी तरह चबा चबाकर करना चाहिए, इससे भोजन जल्दी पच जाता है। भोजन जल्दबाजी में करना अच्छा नही होता है। भोजन में अगर नमक कम ही रखा जाए तो अच्छा रहता है।
  26. यदि योगासन को करते समय - लघुशंका,शौच आदि आए तो तुरंत ही उससे निवृत हो जाना चाहिए और फिर योगासन प्रारंभ करना चाहिए।

Wednesday, April 22

अखिल भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा परिषद्,दिल्ली द्वारा संचालित प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग का पाठ्यक्रम - DNYS

     
अखिल भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा परिषद्,दिल्ली द्वारा संचालित पाठ्यक्रम - DNYS
  DNYS (Diploma in naturopathy & yoga science) अखिल भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा परिषद् दिल्ली, द्वारा संचालित साढ़े तीन वर्षीय कोर्स है . यह कोर्स डिस्टेंस एजुकेशन (दूरस्थ शिक्षा) से कर सकते हैं . वर्तमान में प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है . रोगमुक्ति के लिए दवाएं खा-खा कर परेशान हो चुके लोग पुनः भारत की इन प्राचीनतम चिकित्सा पद्धतियों का सहारा ले कर रोगमुक्त हो रहे हैं . ऐसे में योग/प्राकृतिक चिकित्सकों की मांग भी बढ़ रही है . यदि आप प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग में अपना कैरियर बनाना चाहते हैं तो अखिल भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा परिषद् द्वारा संचालित "प्राकृतिक एवं योग चिकित्सा का साढ़े तीन वर्षीय डिप्लोमा –DNYS" में प्रवेश लेकर आप प्राकृतिक चिकित्सक बन सकते हैं .
प्रवेश हेतु शैक्षिक योग्यता :
DNYS में प्रवेश हेतु - जीव विज्ञान के साथ 12 वीं उत्तीर्ण अथवा परिषद की CNYT परीक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है . यदि आपने 12 वीं की परीक्षा किसी अन्य वर्ग से उत्तीर्ण की है तो DNYS प्रथम वर्ष की परीक्षा के साथ सामान्य विज्ञान विषय अनिवार्य रूप से लेना होगा |( MBBS,BAMS,BHMS,BUMS,B.Pharma,GNM डिग्री/डिप्लोमा धारकों को सीधे द्वितीय वर्ष में प्रवेश)

कोर्स करने के बाद आप 

  • अपना नेचुरोपैथी हास्पीटल खोल सकते हैं .
  • डॉक्टर के रूप में किसी भी प्राकृतिक चिकित्सालय में जॉब कर सकते हैं |
  • स्वयं का योगा ट्रेनिंग सेंटर खोल सकते हैं अथवा योग की  होम ट्यूशन कर सकते हैं .
  • बहुत कम साधनों में रोगियों की घर पर ही चिकित्सा कर उन्हें रोगमुक्त कर धन व यश अर्जित कर सकते हैं .


DNYS  पाठ्यक्रम का शुल्क 

  • डी.एन. वाई. एस. की प्रथम वर्ष का शुल्क - 6000/रु. (यदि 12वीं में जीवविज्ञान नही थी तो 300 रु.विज्ञान    शुल्क अतिरिक्त होगा . इस प्रकार 12 वीं में जीव विज्ञान न होने की दशा में कुल शुल्क 6300/रु.) 
  • द्वितीय वर्ष का शुल्क - 6300/रु.
  • तृतीय वर्ष का शुल्क -  6500/रु.
  • पुस्तकों का व्यय अतिरिक्त होगा . 
  • ऑनलाइन एडमिशन के लिए आवेदन पत्र को भरकर भेजें एवं 10+2 के अंकपत्र/प्रमाणपत्र स्कैन कर info.intri@gmail.com पर मेल करें |
  • शुल्क ICICI बैंक के खाता नं. 101701501400 (IFS Code- ICIC0001017) में डिपाजिट करें 
  • अधिक जानकारी हेतु निम्न नं. पर संपर्क करें  अथवा कृपया इस लिंक पर जाएँ - DNYS Course
                                                                                       



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Friday, April 17

षट्कर्म - धौति क्रिया

धौति का अर्थ होता है-धोना, यह  क्रिया हठयोग का एक अंग है। इस क्रिया में पेट को के द्वारा धोया जाता है। इसलिए इसे धौति क्रिया कहते हैं। यह हठयोग के 6 कर्मों में से सबसे अधिक महत्वपूर्ण कर्म है। धौति क्रिया कई प्रकार से की जाती है- वस्त्र धौति, दंत धौति, अग्निसार या वाहनीसर धौति, मूल धौति और जिव्हा शोधन धौति। वस्त्र धौति क्रिया के लिए एक मुलायम कपड़े की आवश्यकता पड़ती है, जिसकी लम्बाई 5 से 6 मीटर हो और चौड़ाई 2 से 3 इंच हो।
वस्त्र धौति क्रिया की विधि-
          इस क्रिया के लिए 5 से 6 मीटर लम्बा और 2 से 3 इंच चौड़ा साफ व स्वच्छ कपड़ा लें। इस कपड़े को अच्छी तरह से धोकर 5 मिनट तक पानी में डालकर उबालें और फिर सुखा लें। सूखने के बाद उस कपड़े की चार तह करके गोल लपेट लें। अब एक साफ बर्तन में उबले हुए नमक मिले पानी को डालें। फिर कागासन की स्थिति में बैठ जाएं और कपड़े को उस पानी में भिगो लें। अब कपड़े के ऊपरी सिरे को मध्यमा व अनामिका अंगुली के बीच में दबाकर मुंह के अन्दर डालकर धीरे-धीरे कपड़े को निगलें और साथ ही गर्म पानी का घूंट पीते रहें। इससे कपड़े को निगलने में आसानी होती है। शुरू-शुरू कपड़े को निगलना कठिन होता है, परन्तु प्रतिदिन अभ्यास से यह आसानी से होने लगता है। पहले दिन में 1 फुट कपड़ा निगलें और फिर धीरे-धीरे इसे बाहर निकाल लें। इस तरह से इस क्रिया में कपड़े को निगलने की लम्बाई बढ़ाते हुए 4 फुट तक कपड़े को निगल लें।
सावधानी-  

  • इस क्रिया का अभ्यास बहुत कठिन है। इसलिए इसका अभ्यास किसी योग शिक्षक की देख-रेख में ही करें। 
  • इस क्रिया में कपड़े को निगलना कठिन होता है। इसलिए इस क्रिया को धीरे-धीरे करें। 
  • कपड़ा निगलते समय सावधानी रखें, क्योंकि निकालते समय कभी-कभी कपड़ा अटक जाता है, परन्तु घबराएं नहीं कपड़े को पुन: अन्दर निगलें और फिर बाहर निकालें।

रोगों में लाभ-

  1.  इसके अभ्यास से शरीर से सभी रोग नष्ट हो जाते हैं तथा शरीर में असीम बल की वृद्धि होती है। 
  2. इस क्रिया के द्वारा शरीर से पित्त व कफ दोनों बाहर निकल जाते हैं। 
  3. इससे कंठमाला, मंदाग्नि थायराईड, मलेरिया, ज्वर आदि रोग ठीक होते हैं। 
  4. यह तोतलापन को दूर कर आवाज को साफ करता है। 
  5. दमे के रोग में भी लाभकारी है। इसके अभ्यास से खांसी, सांस संबन्धी रोग, जुकाम, मुंह के छाले तथा पित्त से उत्पन्न होने वाले सभी रोग ठीक होते हैं। 
  6. इसके अभ्यास से पेट साफ होता है, जिससे कब्ज, बदहजमी, गैस आदि विकार नष्ट होते हैं। 
  7. यह पाचनशक्ति को शक्तिशाली बनाता है। इससे श्वासनली, नाक, कान, आंख, पेट व आंतों की अच्छी सफाई हो जाती है। 
  8. यह मानसिक बीमारियों को खत्म करता है। 
  9. बवासीर, भगंदर आदि रोगों को ठीक करने में भी यह क्रिया  लाभकारी  है। हठयोग के अनुसार इस क्रिया को करने से कास, श्वास, प्लीहा, कुष्ठ तथा 20 प्रकार के कफ से उत्पन्न होने वाले रोग ठीक हो जाते हैं।