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Saturday, July 29

भू समाधि - त्वचा रोगों में रामबाण उपचार

By- Dr.Kailash Dwivedi

विधि :

  • रोगी के शरीर की लम्बाई के अनुसार लगभग 6 फीट लम्बा, 2 फीट चौड़ा एवं डेढ़ फीट गहरा गड्ढा खोदें | 
  • गड्ढे की गहराई सिर की तरफ कम रहे !
  • ध्यान रहे कि गड्ढा साफ जमीन पर बनाया जाए 
  • अब रोगी को इस गड्ढे में पीठ के बल सीधा लिटायें 
  • रोगी के सिर को छोड़कर पूरे गड्ढे को मिटटी से भर दें |
  • अब इस मिटटी के ऊपर पानी डालकर इसे अच्छी तरह से गीला कर दें 
  • यदि धूप हो तो सिर के ऊपर छाया का प्रबंध करें एवं सिर पर ठण्डे पानी से भीगा हुआ तौलिया रखें 
  • लगभग 30 से 45 मिनट बाद रोगी को गड्ढे से निकाल कर स्नान कराएँ |

लाभ :
  • यह उपचार सभी प्रकार के त्वचा रोगों में रामबाण है |
  • मिटटी में चूषण की शक्ति होने के कारण यह शरीर से विष को खींच लेती है फलस्वरूप शरीर से समस्त रोग दूर होकर रोगी को नया जीवन मिलता है |
  • यह उपचार पहले किसी योग्य प्राकृतिक चिकित्सक की देखरेख में ही करें |



Saturday, March 11

रोग क्या है ?



By- Dr. Kailash Dwivedi
रोग किसी एक दिन का परिणाम नहीं है बल्कि यह दीर्घकाल तक हमारी अनियमित दिनचर्या एवं अप्राकृतिक खान-पान का फल है| रोगों का कारण जीवाणु भी हम नहीं मानते क्योंकि जीवाणु तो वातावरण में मौजूद ही हैं , यदि वे एक व्यक्ति को संक्रमित कर सकते हैं तो फिर उसी जैसे दूसरे या तीसरे व्यक्ति को संक्रमण क्यों नहीं होता |दो व्यक्ति जो एक ही उम्र के ,हैं ,समान परिवेश में रहते हैं उनमें से एक व्यक्ति को सर्दी,जुकाम,बुखार,फोड़े-फुंसी अथवा किसी अन्य प्रकार संक्रमण हो जाता है जबकि संक्रमित होने के पहले वे दोनों एक साथ रहे, साथ भोजन किया एवं एक ही कमरे में सोये भी, तो फिर दूसरा व्यक्ति क्यों रोग-ग्रस्त नही हुआ ? कारण स्पष्ट है की पहले व्यक्ति के शरीर में रोग-जीवाणुओं को पनपने के लिए उपयुक्त पृष्ठभूमि मिल गयी जिससे जीवाणुओं ने उस व्यक्ति पर आक्रमण कर दिया | अब प्रश्न यह है की शरीर में वह उपयुक्त पृष्ठभूमि क्या है जो रोग जीवाणुओं को पनपाने के लिए उत्तरदायी है ?यहाँ पर यह जान लेना आवश्यक है कि जीवाणुओं को गंदगी से पोषण मिलता है | जिस व्यक्ति ने अपने अन्दर अनियमित दिनचर्या एवं अप्राकृतिक खान-पान से विजातीय द्रव्यों को एकत्र कर रखा है तो स्वाभाविक है वह विजातीय द्रव्य जीवाणुओं के लिए पोषण का कार्य करेंगे और हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को क्षीण करेंगे फलस्वरूप शरीर विभिन्न रोगों से घिर जायेगा |


इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक लुई कूने ने अपनी पुस्तक “द न्यू साइंस ऑफ़ हीलिंग ” में एक उदाहरण से स्पष्ट किया है कि – ‘ यदि किसी कमरे में सीलन, दूषित हवा आदि है तो निश्चित रूप से उसमें कई तरह के जीवाणु , मच्छर , मक्खी आदि उत्पन्न हो जायेंगे यदि इन जीवाणुओं को विष औषधि के द्वारा नष्ट कर दिया जाये तो कुछ समय के लिए वह नष्ट हो जायेंगे परन्तु चूँकि कमरे में जीवाणुओं के पनपने का जो कारण [ गंदगी ] था वह नष्ट नही हुआ है अतः कमरे में जीवाणु पुनः उत्पन्न हो जायेंगे, बल्कि इस बार उनका स्वरुप और भीषण होगा क्योंकि जीवाणुओं को मारने के लिए प्रयुक्त विष कि मात्रा वहाँ पर और बढ़ चुकी होगी | ठीक यही स्थिति शरीर कि होती है अनाप-शनाप भोजन एवं दूषित वातावरण में रहने से शरीर में विजातीय द्रव्य बढ़ जाते हैं जिस कारण मल निष्कासक अंगों पर अतिरिक्त कार्य पड़ता है फलस्वरूप धीरे-धीरे उनकी शक्ति क्षीण होने लगती है और शरीर से मल-निष्कासन कि गति मंद पड़ जाती है | प्राकृतिक रूप से मल निष्कासन न होने पर उक्त मल शरीर में ही एकत्र होने लगता है जो कि सर्वप्रथम पेट एवं गर्दन पर परिलक्षित होता है | यही विषाक्त पदार्थ जब किसी आंतरिक अवयव में एकत्र होने प्रारंभ होते हैं तो वह अवयव रोग-ग्रस्त हो जाता है और आंतरिक अवयव में दर्द,सूजन आदि महसूस होने लगता है | इस स्थिति में हम दवा के प्रयोग से उसे दबा देते हैं | यह स्थिति ठीक नही है क्योंकि यह दर्द/सूजन कमरे कि गंदगी पर उत्पन्न जीवाणुओं कि तरह शरीर की दूषित स्थिति का परिणाम मात्र है|

यह तो रोग का लक्षण मात्र है,यह प्रकृति द्वारा दी गई चेतावनी है कि ‘ सावधान हो जाओ , इस अंग पर विजातीय द्रव्यों की अधिकता के कारण अतिरिक्त कार्य पड़ रहा है | इस विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल दो अन्यथा यह अवयव कमजोर हो कर मृत्यु तक का कारण बन सकता है|’ परन्तु प्रकृति कि इस चेतावनी को कितने लोग सुनते हैं ? जैसे ही रोग-लक्षण प्रकट हुआ कि तुरंत दवाओं का प्रयोग प्रारंभ ………परन्तु क्या यह रोग का स्थाई समाधान है ?
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Monday, March 6

होली में घर में बनायें हानिरहित प्राकृतिक रंग - जानिये विधि !



By- Dr.Kailash Dwivedi
वसंत ऋतु के आरम्भ होते ही रंगों के त्योहार होली का बेसब्री से इंतजार होने लगता है। लेकिन इस त्योहार में पिचकारी, गुब्बारों, डाई तथा गुलाल में प्रयोग किए जाने वाले रंग त्वचा एवं बालों के लिए सुरक्षित नही होते हैं | इस लेख में हम आपको बता रहे हैं प्राकृतिक रंग बनाने की विधियाँ ..

लाल रंग बनाने की विधि :

पिसा हुआ लाल चंदन जिसे रक्तचंदन भी कहा जाता है, के दो छोटे चम्मच पाँच लीटर पानी में उबालने के पश्चात् इसे 15 लीटर पानी में मिला लें 20 लीटर रंगीन पानी तैयार हो जायेगा। यह त्वचा के लिए भी लाभदायक है। लाल चन्दन का पाउडर गुलाल की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
छाया में सुखाए गए गुड़हल के फूलों के पाउडर से लाल रंग तैयार किया जा सकता है।
लाल अनार के छिलकों को पानी में उबाल कर भी सुर्ख लाल रंग बनाया जा सकता है।
आधे कप पानी में दो चम्मच हल्दी पाउडर के साथ चुटकी भर चूना मिलाइए। फिर 10 लीटर पानी के घोल में इसे अच्छी तरह मिलाइए बस होली का रंग तैयार।
टमाटर और गाजर के रस को भी पानी में मिला कर रंग तैयार किया जा सकता है।

हरा रंग बनाने की विधि :

मेहँदी या हिना पाउडर को भी बतौर गुलाल इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही इसमें पानी मिला कर रंग तैयार किया जा सकता है | ध्यान रहे इस रंग के दाग आसानी से नहीं छूटते। परन्तु यह रंग बालों के लिए बहुत लाभदायक होता है |
गुलमोहर के पत्तों को अच्छी तरह सुखा कर पीस लें, प्राकृतिक हरा गुलाल तैयार हो जायेगा।
गेहूँ की हरी बालियों को अच्छी तरह पीसकर गुलाल तैयार कर सकते हैं।
पालक, धनिया या पुदीने के पत्तों के पेस्ट को पानी में मिलाकर रंग तैयार किया जा सकता है।

गुलाबी रंग बनाने की विधि :

चुकंदर के टुकड़ों को 1 लीटर पानी में पूरी रात भीगने के लिए छोड़ दीजिए। इस घोल को आवश्यकतानुसार पानी में मिलाकर गुलाबी रंग तैयार कर सकते हैं।

केसरिया रंग बनाने की विधि :

केसरिया रंग टेसू के फ़ूलों से बनता है, जिसे पलाश भी कहा जाता है। टेसू के फूलों को रात भर के लिए पानी में भीगने के लिए छोड़ दीजिए। सुबह तक रंग तैयार हो जायेगा , इस पानी में औषधिय गुण होते हैं।
चुटकी भर चंदन पाउडर 1 लीटर पानी में मिलाने पर केसरिया रंग तैयार हो जाता है।
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Saturday, March 4

हृदय रोग एवं प्राकृतिक चिकित्सा



डा. हर्ष वर्धन                          एम.बी.बी.एस.,एम.एस. (ई.एन.टी.)         

आम धारणा है कि हृदय रोग में एलोपैथी एवं आधुनिक चिकित्सा पद्धति ही कारगर है, लेकिन यहां जानकारी के लिए बताना आवश्यक है कि आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा के विशेषज्ञों ने भी इस रोग के संदर्भ में चिन्ता की है तथा अपने अनुभवों के आधार पर बहुमूल्य जानकारियां दी हैं। ऐसे पाठक जिन्हें आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों की उपयोगिता में विश्वास हो उनके लिए हृदय के स्वास्थ्य से संबंधित जानकारियों की चर्चा भी यहां की जा रही है। मुख्यत: हृदय रोग पश्चिमी देशों में 20वीं सर्दी का रोग माना जाता है। यूरोप में 1930 तथा अमेरिका में 1940 के दशकों में यह रोग फैला,    परन्तु भारतीय चिकित्सा ग्रंथों में इसका उल्लेख चरक और सुश्रुत के समय से ही मिलता है। हृदय के बारे में चरक संहिता में उल्लेख है-


षडङ्गमङ्ग विज्ञानमिन्द्रियाण्यर्थपंचकम्।
आत्मा च सगुणश्चेतश्चिन्त्यं च हृदि संश्रितम्।।
अर्थात छह अंगों से युक्त हमारा शरीर ज्ञान इंद्रियां, आत्मा, मन और चिंतन-हृदय पर ही निर्भर है।
यही नहीं, महर्षि चरक ने हृदय रोग के कारणों का भी उल्लेख इस प्रकार किया है-
अत्यादानं गुरुस्निग्धमचिन्तनमचेष्टनम्।
निद्रासुखं चाप्यधिकं कफहृद्रोगकारणम्।।


अर्थात्-आवश्यकता से ज्यादा, वसायुक्त एवं गरिष्ठि भोजन करना, अधिक चिंताग्रस्त रहना, एक ही स्थान पर बैठे-बैठे समय व्यतीत करना और निद्राप्रिय होना-कफ को बढ़ाते हैं और हृदय की बीमारी पैदा करते हैं।

हृदय रोग की तात्कालिक चिकित्सा :



जब हृदय रोग का दौरा पड़ता है तब स्थिति अत्यंत नाजुक हो जाती है और जीवन पर मृत्यु का खतरा मंडराने लगता है। ऐसी स्थिति में रोगी को शारीरिक और मानसिक विश्राम देने के लिए किसी एकांत स्थान तथा साफ-सुथरे बिस्तरे पर सिर को ऊंचा रखते हुए लिटा देना चाहिए। उसके पहने हुए कपड़ों को ढीला कर देना चाहिए। रोगी उत्तेजित न होने पाये, इसका पूरा ध्यान रखना चाहिए तथा इसके लिए उसके समक्ष उत्तेजना पैदा करने वाले क्रियाकलाप अथवा शब्दों के इस्तेमाल से परहेज करना चाहिए। जब तक रोगी इस संकट से उबर न जाये, उसे उपवास पर रखना चाहिए। यदि शरीर बहुत कमजोर हो तो जरूरत के अनुसार संतरे, अंगूर, अनार या कागजी नीबू का रस दे देना चाहिए। इस दौरान पेट को साफ रखने पर विशेष ध्यान देना चाहिए तथा पेट साफ होने में परेशानी हो तो एनिमा दे देना चाहिए। उपवास के समाप्त होने पर रोगी को कुछ समय के लिए फलों के जूस, फिर फल और दूध पर रखना चाहिए। प्रतिदिन दो बार 15 मिनट से बढ़ाकर आधे घंटे तक हृदय पर बदल-बदल कर कपड़े की ठंडी पट्टी रखनी चाहिए और अंत में सूखे कपड़े से रगड़ कर लाल कर देना चाहिए।


सांस की तकलीफ हो अथवा कफ तेज हो तो पैरों को गरम करने लिए उन पर ऊनी पट्टी या गरम कपड़ा लपेट देना चाहिए। साथ ही ठंडे जल से भीगे कपड़े की एक पट्टी अलग से रखकर पूरी छाती पर एक घंटे के लिए पट्टी लगानी चाहिए। यह प्रयोग प्रत्येक बीस मिनट बाद करना चाहिए तथा प्रत्येक बार गीली पट्टी हटाने के उपरांत सूखे कपड़े से रगड़कर उस स्थान को लाल कर देना चाहिए। यदि घबराहट अधिक हो रही हो तो पट्टी के बजाय साधारण पानी में तर करके फिर बर्फ के पानी में तरकर और निचोड़कर लगानी चाहिए।




हृदय शूल (दिल का दर्द अथवा एंजाइना पेक्टोरिस) में पांच मिनट तक गरम जल में कपड़े को भिगो-निचोड़ कर उससे सिकाई करके 15 मिनट तक ठंडी पट्टी का प्रयोग करना चाहिए। इस क्रिया को 4-5 बार दोहराना चाहिए या पांच मिनट तक हॉट फुट बॉथ (पैरों का गरम स्नान) देने के आधे घंटे तक हाथों और पैरों को गरम कपड़ा लपेट कर गरम रखना चाहिए।


यदि हृदय बैठ रहा हो तथा धड़कन बंद हो रही हो तो रीढ़ पर ठंडी और गरम सिकाई करनी चाहिए तथा बीच-बीच में "स्पंज बाथ" या गरम पानी में भिगो और निचोड़ कर कपड़े की पट्टी से हृदय की तब तक सिकाई करनी चाहिए जब तक हृदय की धड़कन अपनी स्वाभाविक अवस्था में न आ जाए। सिकाई के बाद लेटे-लेटे ही या टब में बैठकर मेहन स्नान ले लिया जाए तो अधिक लाभ होता है।


दिल की धड़कन बढ़ने की स्थिति में आधे-आधे घंटे पर 20 मिनट के लिए ठंडी पट्टी हृदय पर रखनी चाहिए। पट्टी पूरे हृदय क्षेत्र एवं पूरी दाहिनी पंजरी तक लगानी चाहिए और परेशानी बढ़ने पर रीढ़ पर भी और हर बार पट्टी उतरने पर उस स्थान को सूखे कपड़े से रगड़कर लाल कर देना चाहिए। नित्य कर्म से निवृत्त होने के उपरांत 12-21 पत्ते काली तुलसी तथा उपलब्ध न हो तो हरी तुलसी को चबाकर थोड़ा पानी पी लेना चाहिए। इसके उपरांत तीन घंटे तक कुछ नहीं खाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस प्रयोग से 3-4 दिनों में भयानक हृत्कम्प (इसमें जोर-जोर से दिल धड़कने के दौरे आते हैं। ऐसी अवस्था में रोगी को घबराहट होती है। यह रोग पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में ज्यादा होता है) दूर हो जाता है।


हृदय रोग के साथ शरीर में सूजन आ जाये और जलोदर के लक्षण दिखाई देने लगें तो रोगी के पूरे शरीर को गीली चादर से लपेट दें तदोपरांत ऊनी कंबलों से पुन: लपेट कर तीन-चार घंटों तक रखें। पसीना निकालने के प्रयोगों के उपरंत तौलिया स्नान देना चाहिए। उसके पश्चात् कटि-स्नान या मेहन स्नान अथवा साधारण स्नान देना चाहिए। हृदय रोग में यदि नींद न आती हो तो सोने से पूर्व 15 मिनट तक सिर पर ठंडे जल से भीगे और निचोड़े कपड़े को रखकर तथा पैरों को गरम पानी में रखने से लाभ होता है।


हृदय रोग में शहद का सेवन अत्यधिक फायदेमंद होता है। इसे थोड़ा-थोड़ा इस्तेमाल करें फिर धीरे-धीरे बढ़ाकर 100 ग्राम प्रतिदिन नीबू के रस के साथ ठंडे पानी से लेना चाहिए। सूजन अथवा हृदय रोग के गंभीर हो जाने पर नमक को त्याग देना चाहिए तथा प्रयास यह करना चाहिए कि सायंकाल का भोजन सूर्य अस्त होने के पूर्व संपन्न हो जाए।




पाठकों की जानकारी हेतु यह बताना आवश्यक है कि उपरोक्त विधियां प्राकृतिक चिकित्सा पर आधारित हैं, जो दुष्प्रभावरहित एवं सहज हैं लेकिन इसके लिए यह भी आवश्यक है कि हमारी जीवनचर्या एवं खान-पान भी अनुशासित एवं मर्यादित होने चाहिए। हृदय रोग की स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाए तो अस्पताल में ले जाना बेहतर है, क्योंकि हृदय रोग में आधुनिक चिकित्सा प्रक्रियाओं एवं बाईपास आपरेशन इत्यादि की भी आवश्यकता पड़ती है जो प्राकृतिक चिकित्सा में संभव नहीं है। हृदय रोग से संबंधित मरीज एक शिक्षित चिकित्सक विशेषकर हृदय रोग विशेषज्ञ के संपर्क में रहकर ही कोई भी प्रक्रिया अपनायें ताकि बेहतर मार्गदर्शन मिल सके।


(लेखक दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य एवं शिक्षा मंत्री रहे हैं। स्रोत: पाञ्चजन्य तारीख: 11/12/2011 3:48:02 PM)
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Sunday, February 26

आईये प्रकृति की ओर चलें !


प्राचीन काल से ही पंच महाभूतों -पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु एवं आकाश तत्व की महत्ता को स्वीकारा है। हमारा शरीर इन्ही पंचतत्वों से निर्मित है, प्रकृति के नियमों की अवहेलना एवं अप्राकृतिक खान-पान से हमारा शरीर रोगग्रस्त हो रहा । प्रकृति का नियम है कि 'प्रकृति ने जो वस्तु जिस रुप में दी है उसे उसका रुप बिगाडे बिना प्रयोग किया जाय ।'  परन्तु आज के इस आपाधापी के युग में ऐसा सम्भव नही हो पाता परिणामस्वरुप व्यक्ति रोगी हो जाता है।
            
प्राकृतिक चिकित्सा एक चिकित्सा पद्धति ही नही बल्कि जीवन जीने की कला भी है जो हमें आहार,निद्रा,सूर्य का प्रकाश, स्वच्छ पेयजल,विशुद्ध हवा, सकारात्मकता एवं योगविज्ञान का समुचित ज्ञान कराती है।

प्राकृतिक चिकित्सा मानती है कि सभी रोग एक हैं,सबके कारण एक हैं और उनकी चिकित्सा भी एक है रोगों का कारण है -अप्राकृतिक खान-पान,अनियमित दिनचर्या एवं दूषित वातावरण ; इन सब के चलते शरीर में विजातीय द्रव्य ( विष की मात्रा ) बढ़ जाती है।जब यह विष किसी अंग विशेष या पूरे शरीर पर ही अपना प्रभुत्व जमा लेता है तब रोग लक्षण प्रगट होते हैं इन रोग लक्षणों को औषधियों से दबाना कदापि उचित नहीं हैं बल्कि प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा विकसित वैज्ञानिक उपचारों के सहयोग से शरीर के प्रमुख मल निष्कासक अंग -त्वचा,बड़ी आंत,फेफडे एवं गुर्दों के माध्यम से विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालना उचित है तभी हम सम्पूर्ण निरोगता की ओर अग्रसर हो सकेंगे। तो आईये प्रकृति की ओर चलें ..........

प्राकृतिक चिकित्सा रोग को दबाती नही बल्कि यह समस्त आधि-व्याधियों एवं साघ्य असाघ्य रोगों को जड़ मूल से मिटा सकती है। अन्य चिकित्सा विधियों से तो सिर्फ रोगो की आक्रामकता को कुछ समय के लिए रोका/दबाया जा सकता है, परन्तु समस्त रोगों का उपचार तो प्रकृति ही करती है।
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Monday, February 13

प्राकृतिक जीवनशैली से दूर कर सकते हैं - हाई ब्लडप्रेशर !

By- Dr. Kailash Dwivedi
वर्तमान में पूरी दुनिया में लगभग 20 प्रतिशत युवा हाई ब्लडप्रेशर रोग से ग्रस्त हैं | हाई ब्लडप्रेशर रोग को साइलेंट किलर की संज्ञा दी गयी है क्योंकि प्रारंभ में इस रोग के लक्षण प्रायः दिखाई नहीं देने के कारण अधिकांश रोगी इस रोग की उपस्थिति से अनभिज्ञ रहते हैं | रक्तवाहिनियों के अन्दर की दीवाल पर किसी एक भाग के प्रति प्रयोग किये गए बल को रक्तचाप या ब्लड प्रेशर कहते हैं | ब्लडप्रेशर को मापने की इकाई पारा मिलीमीटर (mmHg) होती है | एक वयस्क व्यक्ति का सामान्य ब्लडप्रेशर 100/60 से 130/80 mmHg के बीच होता है | यदि यह दबाब लगातार 140/90 से अधिक बना रहे तो इस स्थिति को हाई ब्लडप्रेशर की स्थिति मानना चाहिए |

हाई ब्लडप्रेशर के कारण : 

परिवर्तनीय कारक  
मानसिक दबाव एवं तनाव, व्यायाम की कमी, धुम्रपान, मधुमेह
अपरिवर्तनीय कारक  
अनुवांशिक, आयु
जटिल कारक

हाई ब्लडप्रेशर दूर करने वाले योग :

षट्कर्म
जलनेति एवं सूत्रनेति
योग आसन
ताड़ासन, कटिचक्रासन, उर्ध्वहस्तोतानासन, भुजंगासन, शलभासन, पवनमुक्तासन एवं शिथिलीकरण
प्राणायाम
नाड़ीशोधन, चंद्रानुलोम विलोम, चन्द्र भेदन प्राणायाम, शीतली, सीत्कारी, भ्रामरी एवं उद्गीत

हाई ब्लडप्रेशर की प्राकृतिक चिकित्सा :


रोगी को नियमित सादा शाकाहारी भोजन, कभी-कभी उपवास, माथे एवं रीढ़ पर बर्फ की मालिश, न्यूट्रल पूर्ण टब स्नान, ठंडी रीढ़ फुहार, मिटटी स्नान, ह्रदय के विपरीत दिशा में मालिश करनी चाहिए |

हाई ब्लडप्रेशर के रोगी की दिनचर्या :

प्रातः 5.00 से 6.00 बजे
उषापान (खाली पेट 2 गिलास पानी) तत्पश्चात नित्यकर्म से निवृत्त होकर बताये गए आसन, प्राणायाम, शिथिलीकरण एवं ध्यान
प्रातः 8.00 बजे – नाश्ता
मौसमी फल जैसे सेब, नाशपाती, चीकू, अमरुद, केला, पालक का सूप, रागी का दलिया, चुकंदर का रस/ जौ का रस/ केले के तने का रस/ अंगूर का रस
प्रातः 9.00 बजे
एनिमा, सिर व गर्दन पर बर्फ की मालिश, न्यूट्रल वाटर एफ्युजन
मध्याहन 11.00 – 12.00 बजे भोजन
चोकर सहित आटे की रोटी/ बाजरे की रोटी/ कन वाला चावल + आंवला व धनिया की चटनी + उबली हुई सब्जी (कम तेल मसाले की) + मूंग की दाल
सायं 3.00 से 4.00 बजे
प्रातः की भांति मौसमी फल/ प्राकृतिक चाय
सायं 6.00 से 7.00 बजे  भोजन
चोकर वाले आटे/ रागी/ बाजरे की रोटी + उबली हुई सब्जी (कम तेल मसाले की) + गेहूं का दलिया + हरी सब्जियों का सूप
कम करें
नमक, तले हुए पदार्थ, दालें, कार्बोहाइड्रेटस, चाय
परहेज
मैदा, आलू, हाइड्रोजनीकृत तेल, ठंडे पेय, आइसक्रीम, चीनी, मिठाई, मलाई वाला दूध, कॉफ़ी, धुम्रपान, तम्बाकू, शराब
विशेष सलाह
पूरे दिन में प्रति दो घंटे पर लगभग 300-400 मिली. पानी अवश्य पियें
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Sunday, February 12

जानिये कौन है - आरोग्य सम्राट !



डॉ. कैलाश द्विवेदी (नेचुरोपैथ)

आकाश तत्व पंचतत्वों में प्रथम तत्व है, शेष चारों तत्वों का आधार भी आकाश तत्व होता है | इस तत्व को `शून्य´ भी कहा जाता है। जिस तरह से ईश्वर निराकार होते हुए भी सत्य है,उसी प्रकार आकाश तत्व भी निराकार लेकिन सच है। आकाश तत्व अविनाशी. विशुद्ध तथा निर्विकार होता है। इसलिए उससे हमें विशुद्धता और निर्मलता की प्राप्ति होती है। आकाश में देवताओं का वास माना जाता है जो अमर होते हैं। हम भी आकाश तत्व का भरपूर और सही मात्रा में सेवन करके निरोगी और दीर्घायु हो सकते हैं।



 प्राकृतिक चिकित्सा में आकाश तत्व को प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन उपवास है। महात्मा गांधी ने आकाश तत्व को ‘आरोग्य सम्राट’ की संज्ञा दी है। उनके मुताबिक आकाश का रहस्य जानना भगवान का रहस्य जानने के समान है। ऐसे महान तत्व का जितना ही अभ्यास और इस्तेमाल किया जाएगा, उतना ही ज्यादा आरोग्य मिलेगा। जिस तरह से आकाश हमारे आसपास, ऊपर और नीचे है इसी तरह से वह हमारे अन्दर भी है। त्वचा के छिद्रों में तथा दो छिद्रों के बीच में जो रिक्त स्थान है वह आकाश तत्व होता है। इस आकाश तत्व की खाली जगह को हमें भरने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यदि हम शरीर को जितने भोजन की आवश्यकता है उतना ही लें और ज्यादा न खाएं तो शरीर में खाली जगह रहेगी। यदि सप्ताह में एक बार उपवास कर लिया जाए तो शरीर में आकाश तत्व की पूर्ति होती रहती है। यदि पूरे दिन उपवास करना सम्भव न हो तो दिन में एक बार का भोजन न करने से भी लाभ होता है।

उपवास :


उपवास से रोगी एवं स्वस्थ व्यक्ति दोनों को लाभ मिलता है। उपवास हमारी जीवन पद्धति का महत्वपूर्ण अंग है। रोगों को दूर करने की शक्ति हमारे शरीर में निहित है, उपवास की स्थिति में पाचन संस्थान को पूर्ण विश्राम मिलता है। इस स्थिति में शरीर की शक्ति रोगों एवं शरीर स्थित मल को निष्काषित करने में संलग्न हो जाती है |
उपवास रखने के दौरान शरीर की सफाई होने लगती है। हमारे शरीर में जो जहरीले जीवाणु पैदा हो जाते हैं वे जीवाणु हमारे करने वाले भोजन से ही अपना भोजन लेना शुरू कर देते हैं और इन जीवाणुओं में से ज्यादातर जीवाणु ऐसे होते हैं जिनको अगर भोजन न मिले तो वे ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रह सकते। इसलिए अगर उपवास रखा जाए तो ये जीवाणु भोजन के अभाव में समाप्त होने लगते हैं। इसी तरह पेट के रोगों से भी छुटकारा मिल जाता है।

उपवास के दौरान पालन योग्य नियम :


  • उपवास रखने के दौरान किसी भी प्रकार का भोजन नही करना चाहिए।

  • उपवास में प्रतिदिन लगभग 2 लीटर पानी में 2-3 नींबू का रस डालकर पूरे दिन में कई बार पीना चाहिए, या फल या सब्जी का जूस भी पी सकते हैं।

  • जिस व्यक्ति को शुरुआत में पूरे दिन का उपवास रखने में परेशानी आए, वह पूरे दिन में एक समय फल खा सकता है।

  • उपवास चाहे तो एक दिन का भी कर सकते हैं या काफी दिनों तक भी कर सकते हैं। हर व्यक्ति को पूरे हफ्ते में कम से कम 1 दिन तो उपवास जरूर करना चाहिए।

  • उपवास को तोड़ते समय कभी भी ठोस आहार का सहारा नहीं लेना चाहिए। उपवास तोड़ने के लिए सबसे अच्छा आहार पके हुए संतरे, मौसमी, अंगूर का रस या फल-सब्जी का रस होता है।

  • अगर उपवास एक दिन का रखा है तो उसे फलों को खाकर तोड़ा जा सकता है। बहुत से लोग उपवास को भारी पकवानों से तोड़ते हैं जिससे उनके शरीर को लाभ की बजाय नुकसान ही होता है।

  • पूरे दिन के उपवास के बाद शाम को गुनगुने पानी में एक नींबू का रस मिलाकर एनिमा अवश्य लेना चाहिए |

उपवास कब नही करना चाहिए :


  • गर्भकाल में - गर्भवती स्त्री के बच्चे को पोषण की बहुत ज्यादा जरूरत होती है इसलिए इस समय स्त्री को उपवास नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे हल्का और प्रोटीन वाला भोजन खाना चाहिए।

  • मधुमेह में - डायबटीज के रोगी को समय पर भोजन नहीं मिलता तो उसके शरीर में चीनी की मात्रा कम हो जाती है जिससे परेशानी हो सकती है अतः मधुमेह (डायबटीज) रोगी को उपवास नहीं करना चाहिए।

  • रिकेट्स और रतौंधी में -जिन लोगों को आंखों के रोग होते हैं जैसे कम दिखाई देना या रात को न दिखाई देना उन्हें उपवास नहीं रखना चाहिए। जिन रोगियों को रिकेट्स का रोग होता है उन्हे भी उपवास नही रखना चाहिए। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ऐसे रोगियों के शरीर में लोहे (आयरन) की कमी होती है।
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Wednesday, February 8

स्वस्थ्य रहने के लिए इन बातों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें




By- Dr. Kailash Dwivedi
  • प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त (4-6 बजे ) के मध्य अर्थात सूर्योदय से पूर्व बिस्तर छोड़ दें।
  • सुबह दंतधावन एवं शौचादि से पूर्व तांबे के लोटे में रात्रि को रखा पानी पीयें,इससे मल खुलकर आता है तथा कब्ज की शिकायत नहीं होती है।
  • नाश्ता या भोजन हमेशा भूख से थोड़ा कम करें तथा योग्य आहार का ही सेवन करें तथा भोजन के साथ - साथ पानी पीने क़ी प्रवृति से बचें।
  • दिनचर्या में जानबूझकर,अनजाने में या असयंमित होकर किये गए आचरण को प्रज्ञापराध की श्रेणी में रखा जाता है,इससे से बचें क्योंकि यह सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों का कारण है।
  • आहार स्वयं एक औषधि है,अत:ज्ञानेन्द्रिय को वश में करते हुए ही भोजन सहित अन्य आचरण करना स्वस्थ रहने में मददगार होता है।
  • आयुर्वेद के अनुसार शुद्ध जल एवं वायु का सेवन रोगों से मुक्ति का मार्ग है।
  • भोजन में गाय के दूध का सेवन आयुर्वेद में जीवनीय माना गया है तथा यह स्वयं में एक रसायन औषधि है जिसके नित्य सेवन से बुढापा देर से आता है।
  • एक हरड का नित्य सेवन लम्बी आयु देता है,कहा भी गया है की मां कभी नाराज हो सकती है परन्तु हरड़ नहीं।
  • साल में एक बार शरीर रूपी मशीन का शोधन प्राकृतिक चिकित्सक के निर्देश में अवश्य करवाएं, जिससे लम्बी एवं रोगरहित आयु प्राप्त होती है।
  • रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के लिए आंवले का सेवन नित्य करें।
  • घी का नियंत्रित मात्रा में प्रयोग करें।

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Tuesday, February 7

हमारा मन एक श्रेष्ठ चिकित्सक है !


                                    - डॉ.कैलाश द्विवेदी

हमारा शरीर ब्रह्माण्ड में व्याप्त पाँच तत्वों आकाश,वायु,अग्नि,जल एवं पृथ्वी से बना है | कहा गया है - “यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे” अर्थात जो ब्रह्माण्ड में है वह सब इस पिंड (शरीर) में व्याप्त है |
पंच महाभूत प्राकृतिक चिकित्सा के साधन हैं इन पंच्च्तत्वों का मूल आधार महत्तत्व होता है ।  पञ्चतत्वों को रोगनिवारक शक्ति महत्तत्व से ही प्राप्त होती है | प्रत्येक प्राणी के अन्दर आरोग्य प्रदान करने वाली एक शक्ति होती है जो उसे स्वस्थ्य रखती है । प्रकृति के विरुद्ध आचरण के फलस्वरूप जब व्यक्ति के शरीर में विजातीय द्रव्यों की मात्रा बढ़ जाती है तब आंतरिक शक्ति शरीर को स्वच्छ और निरोग बनाने के लिए तीव्र रोगों की उत्पत्ति करती है, तथा उन रोगों को नष्ट भी करती है । इस शक्ति को सभी लोग अलग-अलग नामों जैसे - शक्ति, परमात्मा, अंतरात्मा तथा कोई राम,अल्लाह आदि कहकर पुकारते है । सम्पूर्ण निरोगता के लिए यह आवश्यक है कि रोगी व्यक्ति के मन, आत्मा तथा शरीर तीनो का शुद्धिकरण किया जाये | जिस व्यक्ति का मन, आत्मा तथा शरीर तीनों निरोग होगा वही व्यक्ति निरोगी हो सकेगा। प्राकृतिक चिकित्सा के उपचार में सबसे समर्थ उपचार अपने इष्ट की स्तुति, सदाचार एवं सद्विचार है, यह सभी रोगों को रोकने का सबसे प्रभावी,सरल व सुलभ उपाय है । क्योंकि विचार शक्ति का शरीर पर विचारों के अनुसार अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है, रोगी होने पर व्यक्ति संशयग्रस्त हो जाता है जिससे भले ही वास्तविकता कुछ और ही हो परन्तु मन में रोग की भयानकता प्रगट होने लगती है | मन जब किसी विचार को स्वीकार कर लेता है तब शरीर उसी के अनुसार बनने लगता है इसीलिए निरोग होने के लिए सर्वप्रथम ईश् प्रार्थना पर जोर दिया जाता है, क्योंकि लिस क्षण मनुष्य अपने ईश के प्रति सच्चे मन से प्रार्थना करता है उस क्षण शरीर पर से नकारात्मक विचारों का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है ।

                शब्द, सदाचार, सद्विचार जैसे गुणों को शक्ति तो महत्तत्व से मिलती है परन्तु यह कारक हैं आकाश तत्व के आकाश तत्व पंचतत्वों में सबसे अधिक उपयोगी एवं प्रथम तत्व है जिस प्रकार महत्तत्व निराकार किन्तु सत्य है उसी प्रकार आकाश तत्व निराकार भी है और सत्य भी है महत्तत्व अविनाशी है उसी प्रकार आकाश तत्व का भी कभी नाश नही होता | आकाश विशुद्ध तथा निर्विकार होता है इसीलिए हमें इस तत्व से विशुद्धता एवं निर्मलता की प्राप्ति होती है | जो शक्ति हमें महत्तत्व अथवा आकाशतत्व से मिलती है वह अमोघ होती है एवं आत्मिक मानसिक तथा शारीरिक तीनों प्रकार के स्वास्थ्य को उन्नत बनाने वाली होती है |

पंचतत्वो में अन्य चार तत्व – वायु,अग्नि,जल तथा पृथ्वी को आकाश तत्व से शक्ति मिलती है अन्य चारों तत्व आकाश तत्व के साथ मिलकर शरीर में अपना कार्य करते हैं | शरीर में आकाश तत्व के विशेष स्थान सिर, कण्ठ, हृदय, उदर एवं कटिप्रदेश है | मस्तिष्क में स्थित आकाश वायु का भाग जो प्राण का मुख्य स्थान है | हृदयदेशगत तेज का भाग है जो पित्त का मुख्य स्थान है, इससे अन्य का पाचन होता है | उदर देशगत आकाश जल का भाग है इससे सब प्रकार की मल विसर्जन क्रिया सम्भव होती है | कटि देशगत आकाश पृथ्वी का भाग है यह अधिक स्थूल होता है और गन्ध का आश्रय है | इन सब में जो सर्वोच्च आश्रय है वह है मस्तिष्क में स्थित आकाश तत्व का भाग | इसी के कारण व्यक्ति में सोचने की क्षमता उत्पन्न होती है।

 सम्पूर्ण स्वास्थ्य का अर्थ 

आप- आर्क्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘हेल्थ’ के शाब्दिक अर्थ से समझ सकते हैं इसके अनुसार “शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा से पुष्ट होना- ‘हेल्थ’ है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य को ठीक बनाये रहने में अनेकों कारण गिनाये जा सकते हैं पर सबसे प्रमुख कारण है- व्यक्ति की मानसिक स्थिति । प्रसन्नचित्त, उत्साही एवं आशावादी लोग अनेक बाधाओं के होते हुए भी निरोग बने रहते हैं। मनोबल के कारण ऐसे व्यक्तियों के नाड़ी संस्थान में एक प्रचण्ड विद्युत प्रवाह का संचार होता रहता है जो शरीर के प्रत्येक अंग को रोगों से लड़ने की सामर्थ्य प्रदान करता रहता है |
        कोई भी शारीरिक रोग प्रकट होने पर व्यक्ति के मन में भी विचारों द्वारा निर्मित अनेक काल्पनिक  रोग उत्पन्न होते रहते है | इनका उतना ही भयंकर प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है जितना कि क्षय,कैंसर जैसे घातक रोगों का ।

       मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सा शास्त्रियों का कहना है वास्तव में रोगियों में ऐसे व्यक्तियों संख्या बहुत कम होती हैं, जो वास्तव में किसी रोग से पीड़ित हों । अधिकांश ऐसे व्यक्ति होते हैं जो किसी न किसी काल्पनिक रोग के शिकार होते हैं । सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति में विचारों का अत्यधिक महत्व है । जो व्यक्ति स्वयं के प्रति रोगी, शक्तिहीन और असमर्थ होने का भाव रखते हैं और सोचते रहते हैं कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, उनको कोई रोग नहीं भी होता है तो भी इन नकारात्मक विचारों के फलस्वरूप कोई न कोई रोग उत्पन्न हो जाता है और वे वास्तव में रोगी बन जाते । इसके विपरीत जो स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक विचार रखते हैं, वे रोगी होने पर भी शीघ्र स्वस्थ्य हो जाते हैं।  औषधियों तथा तरह- तरह की जड़ी- बूटियों का उपयोग कोई स्थाई लाभ नहीं करता, उनसे रोग के बाह्य लक्षण दब भर जाते हैं, रोग का मूल कारण नष्ट नहीं होता । सच बात तो यह है कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य की  प्राप्ति का प्रभावशाली उपाय आन्तरिक स्थिति का अनुकूल प्रयोग ही है । व्यक्ति की  जीवनी शक्ति उसकी मनोदशाओं के अनुसार बढ़ती- घटती रहती है । यह शक्ति आरोग्य का आधार है, यदि रोगी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाय कि उसे अपने रोग के विषय में नकारात्मक सोचने का मौका ही न मिले, वह अधिक से अधिक प्रसन्न तथा उल्लसित रहने लगे, तो उसकी जीवनी- शक्ति बढ़ जाती फलस्वरूप रोग निवारण प्रारंभ हो जाता है ।

       शरीर पर मस्तिष्क का पूर्ण नियंत्रण होता है एनेस्थीसिया देकर जब मस्तिष्क को संज्ञा शून्य कर दिया जाता है तब शरीर में आंतरिक अवयवों के सक्रिय रहते हुए भी शरीर मुर्दे की तरह हो जाता है | इसी तरह से पागल,नशेड़ी,मानसिक विकारों से ग्रस्त व्यक्तियों को भी देखा जा सकता है, इन सब का शरीर ठीक- ठाक होते हुए भी सिर्फ मस्तिष्क के असंतुलित होने के कारण ही तो उपहास या दया के पात्र बनना पड़ता हैं | इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही शरीर में श्वसन,रक्तसंचरण,पाचन,आत्मसातीकरण,उत्सर्जन  आदि क्रियायों का महत्व है परन्तु सर्वाधिक महत्व मस्तिष्क की चेतना प्रवाह क्रिया का ही है।

आरोग्यता के लिए मनःशक्ति का प्रयोग :

मन जो विचार करता है ,बुद्धि उसे प्राप्त करने के उपाय तलाशने लग जाती है | विचारों के एक स्थान पर केन्द्रित होते रहने पर उनकी सूक्ष्म चेतनशक्ति घनीभूत होती जाती है जिससे एक प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता है । परिणामस्वरूप विचार के अनुसार ही परिस्थितियां बनने लगती हैं | यह स्थिति मात्र शरीर तक ही सीमित नही है –अन्य क्षेत्रों में भी चाहे वह हमारा आर्थिक क्षेत्र हो सामाजिक या अन्य कोई क्षेत्र , सबमें यही सिद्धांत लागू होता है | मन जैसा विचारता है वैसी ही प्रतिक्रिया वातावरण में होती है। यह स्थिति एक प्रकार से कुएं की प्रतिध्वनि की तरह है कि कुएं में जैसी ध्वनि की, ठीक वैसी ही प्रतिध्वनि वापस आ गयी | बल्कि ध्वनि से भी तेज प्रतिध्वनि बन गयी | मनुष्य जैसा सोचता है उसके आसपास वैसी ही परिस्थितियां बनने लगती हैं । विचार शक्ति अपने समानधर्मी विचारों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। एक ही प्रकार के विचारों के घनीभूत होने पर विचार के अनुसार ही क्रिया प्रारंभ हो जाती है,फलस्वरूप  वैसे ही स्थूल परिणाम प्राप्त  हो जाते हैं । भय, चिन्ता और निराशा में डूबे रहने वाले मनुष्य के सामने ठीक वैसी ही परिस्थितियाँ आ जाती हैं जैसी कि वे सोचते रहते हैं । व्यक्ति जिस प्रकार के विचारों को प्रश्रय देता है उसके अनुसार ही उसका रहन-सहन,मुद्रा आदि बन जाते हैं | यदि स्वास्थ्य की कामना करने वाला व्यक्ति इस प्रकार विचार करे कि - मेरा रोग साधारण है, मेरा उपचार उपयुक्त व पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन-प्रतिदिन  मेरा रोग घटता जा रहा है एवं मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव कर रहा हूँ । मेरे आरोग्यता प्राप्ति में अब अधिक समय नही लगेगा। जब इस प्रकार के विचार बार-बार किये जायेंगे तो विचारों के अणु घनीभूत होकर सम्पूर्ण स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त करने लग जायेंगे |

विचारों का शरीर पर प्रभाव :

व्यक्ति जिस प्रकार के विचारों में रहता है उसके चेहरे पर उनका प्रतिबिम्ब स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है | विचारों का यह प्रभाव चेहरे या बाह्य अंगो तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि आंतरिक अवयवों जैसे -पाचन, रक्त संचार एवं वायु प्रवाह उत्पन्न करने वाले अंगों पर भी पड़ता है । आमाशय, आँत, फुफ्फुस, हृदय, यकृत, वृक्क, मूत्राशय, मस्तिष्क, नेत्र, कान, शिश्न, जिह्वा जैसे भीतरी अंगों पर भी उनका असर होता है और उनकी कार्य प्रणाली एवं गतिविधि में मन्दता, तीव्रता, अव्यवस्था तथा व्यतिक्रम आदि पर प्रभाव विचारों के अनुसार ही परिलक्षित  होने लगता है |

 नकारात्मक एवं कुविचारों का प्रभाव शरीर पर अत्यंत घातक रूप में पड़ता है । इनके प्रभाव से शरीर में ऐसी शिथिलता एवं विकृति उत्पन्न हो जाती है कि पाचन रक्त संचार आदि प्रक्रिया में गतिरोध उत्पन्न होने से रोग लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं | यदि यही प्रक्रिया लगातार चलती रहे तो स्वस्थ्य व्यक्ति भी  रोगी हो जाता है । मनःस्थिति अथवा विचारों का शरीर पर कैसा होता है यह इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है - एक माता को एक दिन किसी बात पर बहुत क्रोध हो आ रहा था,स्थिति यह थी कि क्रोध में उसके मुंह से झाग निकल रहा था | आवेश में उसका पूरा शरीर कांप रहा था। उसी आवेश की अवस्था में अपने बच्चे को स्तनपान कराया और एक घण्टे के भीतर ही बच्चे की हालत खराब हो गई एवं अंततः उसकी मृत्यु हो गई। शव परीक्षा के परिणाम से विदित हुआ कि मानसिक क्षोभ के कारण माता का रक्त तीक्ष्ण परमाणुओं से विषैला हो गया और उसके प्रभाव से उसका दूध भी विषाक्त हो गया था, जिसे पी लेने से बच्चे की मृत्यु हो गई।


          मन:स्थिति के सदर्भ में रायल मेडिकल सोसायटी के चिकित्साविज्ञानी डा. ग्लॉस्टन का कहना है कि “शारीरिक रोग उत्पन्न होने से लेकर निरोग होने अथवा कष्टसाध्य बनने में मानसिक स्थिति की बहुत बड़ी भूमिका होती है। मन को सशक्त एवं सकारात्मक बनाकर कठिन से कठिन रोगों पर विजय पाई जा सकती है । विकृत मन:स्थिति मनुष्य को राक्षस या जिंदा लाश बनाकर छोड़ देती है। यह सब हमारी इच्छा-आकांक्षा एवं विचारणा पर निर्भर करता है कि हम स्वास्थ्य-समुन्नत बनें अथवा रूग्ण एवं हेय । रोगोत्पत्ति या रोगों के उतार-चढ़ाव में जितना गहरा संबंध शारीरिक कारणों अथवा परिस्थितियों का माना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा प्रभाव मनोदशा का पड़ता है। यदि व्यक्ति मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ हो तो फिर रोगों की संभावना बहुत ही कम रह जाती है। आक्रमण करने पर भी रोग बहुत समय तक ठहर नहीं सकेंगे। मन की प्रगति या अवगति ही रूग्णता या निरोगता का मूल है। इस तथ्य को समझना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।“

सकारात्मक भोजन से आरोग्य प्राप्ति :

सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु अपने रोग के प्रति सकारात्मकता तो आवश्यक है ही इसके अतिरिक्त हमारा भोजन जिसे प्राकृतिक चिकित्सा में औषधि की संज्ञा दी गयी है का निर्माण से लेकर एवं ग्रहण करने तक जो मनोभाव रहने चाहिए वे समझना आवश्यक है |
जो भोजन ग्रहण करते हैं,  उसके द्वारा  शरीर का पोषण और नव निर्माण ही नहीं होता, अपितु  भोजन करते समय व्यक्ति की जो मन:स्थिति होती है एवं जिन संस्कारों या वातावरण में भोजन ग्रहण किया जाता हैं,  वे मनोभाव, विचार एवं भावनाएं भी अलक्षित रूप में भोजन और जल के साथ शरीर  ग्रहण कर लेता हैं | भोजन कितना भी प्राकृतिक क्यों न हो यदि उसको बनाते समय रसोइया की मनःस्थिति एवं भोजन करते समय ग्राही की मनःस्थिति सात्विक व सकारात्मक नही है तो वह प्राकृतिक भोजन भी शरीर में विष का कार्य करता है | इसलिए सम्पूर्ण स्वास्थ्य पाने के लिए भोजन के सन्दर्भ में इन बिन्दुओं को धयान रखना आवश्यक है –

भोजन बनाने वाले का व्यक्तित्व


  • भोजन को बनाते समय रसोईये की प्रवृत्ति,मनःस्थिति एवं शारीरिक स्थिति का अच्छा या बुरा प्रभाव भोजन पर पड़ता है | अतृप्त, भूखा, लालची, क्रोधी, हिंसावृत्ति युक्त, गंदा रसोइया अपने सम्पर्क से ही भोजन को दूषित कर देता है। एक तो वह शरीर या वस्त्रों से स्वच्छ नहीं होता दूसरे उसकी उपर्युक्त मन:स्थिति भोजन को दूषित कर देती है । यह  भोजन  विष के समान हो जाता है । बाजार में भी बिकने वाले  भोजन, मिठाइयां, नमकीन, दूध इत्यादि असंख्य अतृप्त भूखे व्यक्तियों की लुब्ध दृष्टियां पड़कर उन्हें दूषित बना देती हैं। अत: वे ऐसे विचार अणुओं से इतना अधिक दूषित हो जाते हैं कि शरीर के लिए अस्वास्थ्यकर हो जाते हैं | अतः सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को ऐसे खाद्यों से बचना ही हितकर है |इस तथ्य का हमेशा ध्यान रखें कि भोजन बनाने वाले की वृत्ति सात्विक हो , वह रोगी न हो, भूखा न हो | वह प्रेमपूर्ण भाव से भोजन तैयार करने वाला हो |

  • भोजन ग्रहण करते समय मन:स्थिति की आन्तरिक स्वच्छता आवश्यक है,अर्थात भोजन के समय जैसे बाह्य स्वच्छ्ता आवश्यक है उसी प्रकार हमारे विचारों की सात्विकता भी आवश्यक है। जैसे अच्छे –बुरे विचार होंगे वैसा ही प्रभाव भोजन पर पड़ेगा फलस्वरूप भोजन से मिलने वाले पोषण में भी विचारों के अनुरूप अधिकता या न्यूनता आ जाएगी |  यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उत्तम से उत्तम भोजन दूषित मन:स्थिति से विकारयुक्त अथवा विषमय हो जाता है। 
  • चिन्ता, आवेश, क्रोध, जल्दबाज़ी, चिड़चिड़ापन, आदि उद्वेगों की स्थिति में किया गया भोजन विषैला हो जाता है। यह शरीर को पोषित करने के स्थान पर हानि पहुंचाता और पाचन-क्रिया को विकारमय कर देता है। 
  • क्रोध की स्थिति में किये गए भोजन का ढंग से पाचन नही हो पाता |
  • चिंतित मन:स्थिति में किया गया भोजन आमाशय में अल्सर जैसा घातक रोग उत्पन्न कर सकता है । 

इसके विपरीत आनंद एवं सकारात्मक विचारों के साथ किया गया भोजन स्वास्थ्य पर जादू-जैसा गुणकारी प्रभाव डालता है। अन्त:करण की शान्त-सुखद वृत्ति में किये हुए भोजन के साथ-साथ हम प्रसन्नता, सुख-शान्ति और उत्साह की स्वस्थ भावनाएं भी ग्रहण करते हैं फलस्वरूप इसका स्वास्थ्यप्रद प्रभाव शरीर पर पड़ता है। अतः
    भोजन स्वच्छ स्थान पर शान्तिपूर्वक प्रसन्न मुद्रा से ग्रहण करें । जो कुछ रूखा-सूखा प्राप्त हुआ है, उसे भगवान् का प्रसाद मानकर ग्रहण करें । भोजन जब सामने आये, तब नेत्र बंदकर ईश्वर का चिन्तन करते हुए करें | पुनः स्मरण रखें - मन में जैसी विचारधाराएं उठती हैं शरीर उनका उसी के अनुरूप प्रभाव पड़ता है।

विचार के विषय में महापुरुषों का चिंतन :

स्वामी रामतीर्थ जी के अनुसार - 
‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही उसका जीवन बनता है |"

 स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार -
 ‘‘स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, इनका निवास हमारे विचारों में ही है।"

 भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था- 
‘‘भिक्षुओ! वर्तमान में हम जो कुछ हैं अपने विचारों के ही कारण और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह भी अपने विचारों के कारण।"

 शेक्सपीयर ने लिखा है- 
‘‘कोई वस्तु अच्छी या बुरी नहीं है। अच्छाई- बुराई का आधार हमारे विचार ही हैं।"

 ईसामसीह ने कहा था- 
‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वह बन जाता है।"

 प्रसिद्ध रोमन दार्शनिक मार्क्स आरीलियस ने कहा है- 
‘‘हमारा जीवन जो कुछ भी है, हमारे अपने ही विचारों के फलस्वरूप है।"

 प्रसिद्ध अमरीकी लेखक डेल कार्नेगी ने अपने अनुभवों पर आधारित तथ्य प्रकट करते हुए लिखा है- ‘‘जीवन में मैंने सबसे महत्त्वपूर्ण कोई बात सीखी है तो वह है विचारों की अपूर्व शक्ति और महत्ता, विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है।"


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गुर्दा रोग की प्राकृतिक चिकित्सा


गुर्दा शरीर का महत्वपूर्ण अंग है इसे अंग्रेजी में किडनी कहा जाता है। गुर्दे का वजन लगभग 150 ग्राम होता है इसका आकार सेम के बीज या काजू की भांति होता है। यह शरीर में पीछे कमर की ओर रीढ़ के ढांचे के ठीक नीचे के दोनों सिरों पर स्थित होते हैं। शरीर में दो गुर्दे होते हैं। गुर्दे लाखों छलनियों तथा लगभग 140 मील लंबी नलिकाओं से बने होते हैं। गुर्दों में उपस्थित नलिकाएं छने हुए द्रव्य में से जरूरी चीजों जैसे सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम आदि को दोबारा सोख लेती हैं और बाकी अनावश्यक पदार्थों को मूत्र के रूप में बाहर निकाल देती हैं। किसी ख़राबी की वजह से यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर देता है तो उस स्थिति में दूसरा गुर्दा पूरा कार्य संभाल सकता है।
गुर्दे शरीर को विषाक्‍त होने से बचाते हैं और स्वस्थ रखते हैं। गुर्दों का विशेष संबंध हृदय, फेफड़ों, यकृत और प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी प्रभावित हो सकते हैं। जब गुर्दे ख़राब होते हैं तो रोगी का रक्‍तचाप बढ़ जाता है और वह धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है।

गुर्दे का कार्य :


  • गुर्दा रक्त में से जल और बेकार पदार्थो को अलग करता है।

  • शरीर में रसायन पदार्थों का संतुलन, हॉर्मोन्स छोड़ना, रक्तचाप नियंत्रित करने में सहायता प्रदान करता है।

  • यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है।

  • इसका एक और कार्य है विटामिन-डी का निर्माण करना, जो मनुष्य की हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है।गुर्दे रक्‍त में मौजूद विकारों को छान कर साफ़ करते हैं और शरीर को स्वच्छ रखते हैं।

  • रक्‍त को साफ कर मूत्र बनाने का कार्य भी गुर्दों के द्वारा ही पूरा होता है।

  • गुर्दे रक्‍त में उपस्थित अनावश्यक कचरे को मूत्रमार्ग से शरीर से बाहर निकाल देते हैं।

  • गुर्दों के सही से काम न करने पर शरीर रोग ग्रस्त हो जाता है।

गुर्दे के रोग के कारण : 


  • लगातार दूषित पदार्थ खाने, दूषित जल पीने और नेफ्रॉन्स के टूटने से गुर्दे के रोग उत्पन्न होते हैं।

  • किडनी के लिए मधुमेह, पथरी और हाईपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) बडे़ जोखिम कारक हैं।

  • गंदा मांस, मछली, अंडा, फल और भोजन और गंदे पानी का सेवन गुर्दे की बीमारी का कारण बन सकते हैं।

  • भोजन और पेय पदार्थों में भी कीटाणुनाशकों, रासायनिक खादों, डिटरजेंट, साबुन, औद्योगिक रसायनों के अंश पाएं जाते हैं। ऐसे में फेफड़े और जिगर के साथ ही गुर्दे भी सुरक्षित नहीं हैं।

  • शरीर में नमक की मात्रा अधिक होने के कारण गुर्दे शरीर से व्यर्थ पदार्थो को निकालने में अक्षम हो जाते हैं |

  • गुर्दे के रोग का बहुत समय तक पता नहीं चलता, लेकिन जब भी कमर के पीछे दर्द उत्पन्न हो तो इसकी जांच करा लेनी चाहिए।

गुर्दे के रोग :


गुर्दे के गंभीर रोगों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-

1. एक्यूट रीनल फेल्योर :

इसमें गुर्दे आंशिक अथवा पूर्ण रूप से काम करना बंद कर देते हैं परंतु लगातार उपचार द्वारा यह धीरे-धीरे पुन: कार्यशील हो जाते हैं।

2. क्रोनिक रीनल फेल्योर :

यह तब होती है जब किडनी ख़राब हो या तीन माह या इससे अधिक समय से काम नहीं कर रही हो। इसका यदि ठीक प्रकार से इलाज न हो तो क्रोनिक किडनी समस्या बढ़ती जाती है। वृक्क (गुर्दा) रोग में क्रोनिक किडनी रोग के पांच चरण होते हैं। किडनी समस्या के अंतिम चरण में गुर्दे केवल पंद्रह प्रतिशत ही कार्य कर पाते हैं। इसमें नेफ्रॉन्स की अत्यधिक मात्रा में क्षति हो जाती है जिसके कारण गुर्दो की कार्यक्षमता लगातार कम होती चली जाती है।

गुर्दे की जांच :


उपर्युक्त दोनों तरह के रोगों के निदान के लिए सबसे पहले रक्त यूरिया, नाइट्रोजन तथा किरेटिनाइन का रक्त परीक्षण करवाना चाहिए।
मूत्र जांच भी करा लेना चाहिए क्योंकि इससे यह पता चलता है कि गुर्दो की कार्यशीलता और कर्यक्षमता कैसी है।

लक्षण :


  • जब गुर्दा किसी रोग से रोगग्रस्त हो जाता है तो मूत्र सम्बन्धी तकलीफ शुरू हो सकती है।

  • आंखों के ‍नीचे सूजन या पैरों के पंजों में सूजन हो सकती है।

  • पाचन क्रिया भी कमजोर पड़ जाती है।

प्राकृतिक चिकित्सा :


1- किडनी पैक :

प्राकृतिक चिकित्सा में साधारण सी दिखने वाली क्रियाएं शरीर पर अपना रोगनिवारक प्रभाव छोडती हैं | किसी सूती या खादी के कपडे की पट्टी को सामान्य ठन्डे जल में भिगोकर , निचोड़कर अंग विशेष पर लपेटने के पश्चात् उसके ऊपर से ऊनी कपडे की [सूखी] पट्टी इस तरह लपेटी जाती है कि अन्दर वाली सूती/खादी पट्टी पूर्ण रूप से ढक जाये |

किडनी पैक के लाभ :

गुर्दों के अतिरिक्त पेट के समस्त रोगों,पुरानी पेचिस, कोलायिटिस,पेट की नयी-पुरानी सूजन,अनिद्रा,बुखार एवं स्त्रियों के गुप्त रोगों की रामबाण चिकित्सा है | इसे रात्रि भोजन के दो घंटे बाद पूरी रात तक लपेटा जा सकता है |

किडनी पैक के लिए आवश्यक साधन :

  1. खद्दर या सूती कपडे की पट्टी इतनी चौड़ी जो पेडू सहित नाभि के तीन-चार अंगुल ऊपर तक आ जाये एवं इतनी लम्बी कि पेट के तीन-चार लपेट लग सकें |

  2. सूती कपडे से दो इंच चौड़ी एवं इतनी ही लम्बी ऊनी पट्टी |

विधि :

खद्दर या सूती पट्टी को ठन्डे पानी में भिगोकर अच्छी तरह से निचोड़ लेंतत्पश्चात पेडू से नाभि के तीन – चार अंगुल ऊपर तक लपेट दें ,इसके ऊपर से ऊनी पट्टी इस तरह से लपेट दें कि नीचे वाली गीली पट्टी पूरी तरह से ढक जाये |एक से दो घंटा या सारी रात इसे लपेट कर रखें |

2- कमर (पीठ पर) की गर्म – ठंडी सेंक :


प्रातः कमर पर गर्म-ठंडी सेंक गुर्दों के लिए अत्यंत लाभदायक है | गर्म-ठंडी सेंक के लिए एक रबड़ की थैली में गर्म पानी भरें | एक बर्तन में खूब ठंडा पानी रख लें | गर्म सेंक रबड़ की थैली से एवं ठंडी सेंक पानी में एक छोटा तौलिया भिगोकर निम्नलिखित क्रम से करें -


  • गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट

  • गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट

  • गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट

  • गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 3 मिनट

यदि गर्म सेंक के लिए रबड़ की थैली उपलब्ध न हो तो ठंडी सेंक की तरह गर्म पानी में छोटा तौलिया भिगोकर, हल्का निचोड़कर सेंक की जा सकती है | सेंक के दौरान तौलिया प्रति मिनट पुनः पानी में भिगोकर बदलते रहें |

आहार चिकित्सा :

नियंत्रित आहार से खराब किडनी को ठीक किया जा सकता है।

  • नियमित नींबू, आलू का रस और हमेशा शुद्ध जल का अधिक से अधिक सेवन करें।

  • गुर्दे की सूजन से पीड़ित रोगी को भोजन करने के तुरंत बाद मूत्र त्याग करना चाहिए। इससे न सिर्फ गुर्दे की बीमारी से बचे रहेंगे बल्कि कमर दर्द, लिवर के रोग, गठिया, पौरुष ग्रंथि की वृद्धि आदि अनेक बीमारियों से भी बचाव होगा।

  • गुर्दे के रोग में बथुआ फायदेमन्द होता है। पेशाब कतरा-कतरा सा आता हो या पेशाब रुक-रुककर आता हो तो इसका रस पीने से पेशाब खुलकर आने लगता है।

  • गुर्दे के रोगी को आलू खाना चाहिए। इसमें सोडियम की मात्रा बहुत पायी जाती है और पोटेशियम की मात्रा कम होती है।

  • मकोय का रस 10-15 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करने से पेशाब की रुकावट दूर होती है। इससे गुर्दे और मूत्राशय की सूजन व पीड़ा दूर होती है।

  • गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब बनना बन्द हो गया हो तो मूली का रस 20-40 मिलीलीटर दिन में 2 से 3 बार पीना चाहिए।

  • पुनर्नवा के 10 से 20 मिलीलीटर पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) का काढ़ा सेवन करने से गुर्दे के रोगों में बेहद लाभकारी होता है।

  • गाजर और ककड़ी या गाजर और शलजम का रस पीने से गुर्दे की सूजन, दर्द व अन्य रोग ठीक होते हैं। यह मूत्र रोग के लिए भी लाभकारी होता है।

परहेज :


  • ज्यादा मात्रा में दूध, दही, पनीर व दूध से बनी कोई भी वस्तु न खाएं।

  • इस रोग से पीड़ित रोगी को मांस, मछली, मुर्गा, चॉकलेट, काफी, दूध, चूर्ण, बीयर, वाइन आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।

  • गुर्दा रोग में सूखे फल(ड्राई फ्रूट), केक, पेस्ट्री, नमकीन, मक्खन नहीं खाना चाहिए।

  • भोजन में मसालेदार भोज्यपदार्थ का सदा के लिए त्याग कर दें।

  • नमक का प्रयोग कम-से-कम करें |

  • तनाव और प्रदूषण से दूर रहें।

योग चिकित्सा :


1. खड़े होकर किए जाने वाले आसन :
वृक्षासन, ताड़ासन,अंर्धचंद्रासन, त्रिकोणासन और पश्चिमोत्तनासन।

2. बैठकर किए जाने वाले आसन :
उष्ट्रासन और योगमुद्रा ।

3. लेटकर किए जाने वाले आसन :
सर्पासन, धनुरासन और हलासन।

यदि उपरोक्त आसन न कर सकें तो सूर्यनमस्कार और खड़े रहकर किए जाने वाले अंग संचालन को नियमित करें। अंगसंचालन (सूक्ष्म व्यायाम) जिसमें कमर का अधिक व्यायाम होता हो वह ‍करें। जल्दी लाभ के लिए किसी योग चिकित्सक से योग के सभी बंधों (मूल बंध,उड्डीयान बंध, जालंधर बंध) को सीख लें। तीनों बंध और अर्थमत्येंद्रासन का नियमित अभ्यास करें।
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Monday, January 30

नीम के औषधीय प्रयोग




By- Dr.Kailash Dwivedi

नीम भारतीय मूल का एक सदाबहार वृक्ष है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे तो अनेक और बहुत प्रभावशाली है।नीम के चिकित्सीय गुणों को पाठकों के हितार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ |

उपयोग :

  • नीम की छाल का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों और घावों के निवारण में सहायक है।
  • नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।
  • नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है। 
  • नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं, और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
  • नींबोली (नीम का छोटा सा फल) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।
  • नीम के द्वारा बनाया गया लेप वालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
  • नीम की पत्तियों के रस और शहद को 2 : 1  के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है, और इसको कान में डालने कान के विकारों में भी फायदा होता है।
  • नीम के तेल की 5 : 10  बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फायदा होता है।
  • नीम के बीजों के चूर्ण को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।
                                   

विभिन्न रोगों में नीम का उपयोग :

घाव, फोड़े-फुंसी, बदगांठ, घमौरी तथा नासूर  :

घाव एवं चर्मरोग बैक्टेरियाजनित रोग हैं और नीम का हर अंग अपने बैक्टेरियारोधी गुणों के कारण इस रोग के लिए सदियों से रामवाण औषधि के रूप में मान्यता प्राप्त है। घाव एवं चर्मरोग में नीम के समान आज भी विश्व के किसी भी चिकित्सा-पद्धति में दूसरी कोई प्रभावकारी औषधि नहीं है। इसे आज दुनियाँ के चिकित्सा वैज्ञानिक भी एकमत से स्वीकारने लगे हैं।

  • दुष्ट व न भरने वाले घाव को नीम पत्ते के उबले जल से धोने और उस पर नीम का तेल लगाने से वह जल्दी भर जाता है। नीम की पत्तियाँ भी पीसकर लगाने से लाभ होता है।
  • गर्मी के दिनों में घमौरियाँ निकलने पर नीम पत्ते के उबले जल से नहाने पर लाभ होता है।
  • नीम की पत्तियों का रस, सरसों का तेल और पानी, इनको पकाकर लगाने से विषैले घाव भी ठीक हो जाते हैं।
  • हमेशा बहते रहने वाले फोड़े पर नीम की छाल का भस्म लगाने से लाभ होता है।
  • छाँव में सूखी नीम की पत्ती और बुझे हुए चूने को नीम के हरे पत्ते के रस में घोटकर नासूर में भर देने से वह ठीक हो जाता है। 
  • जिस घाव में नासूर पड़ गया हो तथा उससे बराबर मवाद आता हो, तो उसमें नीम की पत्तियों का पुल्टिस बांधने से लाभ होता है।

चर्मरोग  :

रक्त की अशुद्धि तथा परोपजीवी कीटाणुओं के प्रवेश से उकवत, खुजली, दाद-जैसे चर्मरोग होते हैं। इसमें नीम का अधिकांश भाग उपयोगी है।

  • मजिष्ठादि क्वाथ + नीम की छाल +पीपल की छाल एवं गिलोय का क्वाथ बराबर मात्रा में मिलाकर प्रतिदिन एक महीने तक लगाने से एक्जिमा नष्ट होता है।
  • एक्जिमा में नीम का रस नियमित कुछ दिन तक लगाने और एक चम्मच रोज पीने से भी १०० प्रतिशत लाभ होता है। 
  • नीम के पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लगाने से  दाद मिट जाता है।
  • वसंत ऋतु में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती तथा गोलमीर्च पीसकर खाली पेट पीने से साल भर तक कोई चर्मरोग नहीं होता, रक्त शुद्ध रहता है।

जले-कटे में नीम  :

  • आग से जले स्थान पर नीम का तेल लगाने अथवा नीम तेल में नीम पत्तों को पीस कर लेप करने  से शान्ति मिलती है।
  • नीम की पत्ती को पानी में उबाल कर ठंडा होने पर उसमें जले हुए अंग को डुबोने से भी शीघ्र राहत मिलती है।
  • कटे स्थान पर नीम का तेल लगाने से टिटनेस का भय नहीं होता।

कुष्ठरोग :

यह रोग एक छड़नुमा ‘माइक्रोबैक्टेरिया लेबी’ से होता है। चमड़ी एवं तंत्रिकाओं में इसका असर होता है। यह दो तरह का होता है-पेप्सी बेसीलरी, जो चमड़ी पर धब्बे के रूप में होता है, स्थान सुन्न हो जाता है। दूसरा मल्टीबेसीलरी, इसमें मुँह लाल, उंगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी तथा नाक चिपटी हो जाती है। नाक से खून आता है। दूसरा संक्रामक किस्म का रोग है।
प्राचीन आयुर्वेद का मत है कि कुष्ठरोगी को बारहों महीने नीम वृक्ष के नीचे रहने, नीम के खाट पर सोने, नीम का दातुन करने, प्रात:काल नित्य 50 ग्राम नीम की पत्तियों को पीस कर पीने, पूरे शरीर में नित्य नीम तेल की मालिश करने, भोजन के वक्त नित्य पाँच तोला नीम का रस  पीने, शैय्या पर नीम की ताजी पत्तियाँ बिछाने, नीम पत्तियों का रस जल में मिलाकर स्नान करने तथा नीम तेल में नीम की पत्तियों की राख मिलाकर घाव पर लगाने से पुराना से पुराना कोढ़ भी नष्ट हो जाता है।

सफ़ेद दाग (ल्यूकोडर्मा ) :

शरीर के विभिन्न भागों में चकते के रूप में चमड़ी का सफेद हो जाना, फिर पूरे शरीर की चमड़ी का रंग बदल जाना,ल्यूकोडर्मा रोग है। नीम की ताजी पत्ती के साथ बाकुची का बीज तथा चना पीसकर लगाने से इस रोग में अत्यंत लाभ होता है।

बवासीर  :

  • प्रतिदिन नीम की 21 पत्तियों को मूंग की भिगोई और धोयी हुई दाल मे पीसकर बिना कोई मसाला डाले पकौड़ी बनाकर 21 दिन तक खाने से हर तरह का बवासीर निर्बल होकर गिर जाता है। पथ्य में सिर्फ ताजा मट्ठा, भात एवं सेंघा नमक लिया जाना चाहिए।

मसूड़ों से खून आने और पायरिया होने पर नीम का उपयोग  :

  • नीम  के तने की भीतरी छाल या पत्तों को पानी में औंटकर कुल्ला करने से लाभ होता है। इससे मसूड़े और दाँत मजबूत होते हैं। नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर पीने से भी इसमें लाभ होता है।
  • नीम का दातुन नित्य करने से दाँतों के अन्दर पाये जाने वाले कीटाणु नष्ट होते हैं। दाँत चमकीला एवं मसूड़े मजबूत व निरोग होते हैं।

बालों के जुंए, भूरापन तथा कील-मुहांसा :

  • नीम के तने का भीतरी छाल घिसकर चेहरे पर लगाने से , त्वचा कोमल तथा कील-मुहांसों से मुक्त हो जाती है |
  • बालों में नीम का तेल लगाने से जुएं तथा रूसी नष्ट होते हैं।
  • नीम तेल नियमित सिर में लगाने से गंजापन या बाल का तेजी से झड़ना रूक जाता है। यह बालों को भूरा होने से भी बचाता है।

पेट-कृमि :

  • आंत में पड़ने वाली सफेद कृमि या केचुए को जड़ से नष्ट करने में संभवत: नीम जैसी गुणकारी कोई अन्य औषधि नहीं है। नीम की पत्ती 20 नग तथा काली मिर्च 10 नग थोड़े से नमक के साथ पीसकर एक गिलास जल में घोलकर खाली पेट 3-4 दिन तक पी लेने से इन कृमियों से कम से कम 2-3 वर्ष तक के लिए मुक्ति मिल जाती है।

मलेरिया :

नीम वृक्ष मलेरिया-रोधी के रूप में प्रसिद्ध है। इसकी छाया में रहने और इसकी हवा लेने वालों पर मलेरिया का प्रकोप नहीं होता। मलेरिया मुख्यत: मच्छरों के काटने से होता है। सर्दी, कंपकपाहट, तेज बुखार, बेहोशी, बुखार उतरने पर पसीना छूटना, इसके प्रमुख लक्षण हैं।
इस रोग में नीम के तने की छाल का काढ़ा दिन में तीन बार पिलाने अथवा नीम के जड़ की अन्तर छाल 50 ग्राम,  600 मिली. पानी में 20 मिनट तक उबालकर और छानकर ज्वर चढ़ने से पहले २-३ बार पिलाना चाहिए। इससे ज्वर उतर जाता है।  नीम तेल में नारियल या सरसो का तेल मिलाकर शरीर पर मालिश करने से भी मच्छरों के कारण उत्पन्न मलेरिया ज्वर उतर जाता है।

सामान्य एवं विषम ज्वर :

  • नीम के अन्तर छाल का चूर्ण, सोंठ तथा मीर्च का काढ़ा विषम ज्वर में देने से लाभ होता है। इसमें नीम के तेल की मालिश करने भी लाभ होता है। ये औषधियाँ रोगी को कुछ खिलाने से पहले दी जानी चाहिए।
  • तेज सिहरनयुक्त ज्वर के साथ उल्टी होने पर नीम की पत्ती के रस शहद एवं गुड़ के साथ देने से लाभ होता है। नीम का पंचांग (पता, जड़ फूल, फल और छाल) को एक साथ कूटकर घी के साथ मिलाकर देने से भी लाभ होता है।

चेचक :

इसकी भयंकरता के कारण इस रोग को दैवी प्रकोप माना जाता रहा है। यह जब उग्र रूप धारण करता है तब बड़े-बड़े चिकित्सकों की भी कुछ नहीं सुनता। आयुर्वेद में चेचक के रोकथाम के जो निदान बातये गये हैं उनमें नीम का उपयोग ही सर्वाधिक वर्णित है। इसके सेवन से या तो चेचक निकलता ही नहीं अथवा निकलता भी है तो उग्र नहीं होता, क्रमश: शान्त हो जाता है। नीम में चूंकि दाहकता शान्त करने के शीतल गुण हैं, इसलिए यह लोक जीवन में शीतला देवी के रूप में भी पूजित है।

चेचक कभी निकले ही नहीं, इसके लिए आयुर्वेद में उपाय है कि चैत्र में दस दिन तक प्रात:काल नीम की कोमल पत्तियाँ गोल मिर्च के साथ पीस कर पीना चाहिए। नीम का बीज, बहेड़े का बीज और हल्दी समान भाग में लेकर पीस-छानकर कुछ दिन पीने से भी शीतला/चेचक का डर नहीं रह जाता।

चेचक निकलने पर रोगी को स्वच्छ घर में नीम के पत्तों पर लिटाना, घर में नीम की ताजा पत्तियों की टहनी का बन्दनवार लटकाना तथा नीम का चंवर बनाकर रोगी को हवा देना चाहिए। बिस्तर की पत्तियाँ नित्य बदल देनी चाहिए। रोगी को यदि अधिक जलन महसूस हो तो नीम की पत्तियों को पीसकर पानी में घोलकर तथा मथानी से मथकर उसका फेन चेचक के दानों पर सावधानी पूर्वक लगाना चाहिए। इससे भी राहत नहीं मिलने पर नीम की कोमल पत्तियाँ पीसकर चेचक के दानों पर हल्का लेप चढ़ाना चाहिए। नीम के बीज की गिरी को पीसकर भी लेप करने से दाहकता शीघ्र कम होती है। रोगी को प्यास लगने पर नीम के छाल को जलाकर उसके अंगारों को पानी में बुझाकर उस पानी को छान कर पिलाना चाहिए। नीम की पत्तियों को पानी में औंटकर पिलाने से भी दाहकता शान्त होती है। इससे चेचक का विष एवं ज्वर भी कम होता है, चेचक के दाने शीघ्र सूखते हैं। चेचक के दाने ठीक से न निकलने पर भी बेचैनी होती है। अत: नीम की पत्तियाँ पीस कर दिन में तीन बार पिलाने से वह शीघ्र निकल आते हैं। जब दाने सूख जाएँ तब नीम का पत्ता जल में उबालकर रोगी को कुछ दिन नियमित स्नान और नीम तेल की मालिश करनी चाहिए। इससे चेचक के दाग भी मिट जाते हैं। नीम बीज की गिरी पानी में गाढ़ा पीस कर दाग पर लगाना भी फायदेमंद होता है। चेचक होने पर कई रोगियों के कुछ बाल भी झड़ जाते हैं। इसमें नीम तेल माथे पर लगाने से बाल पुन: उग आते हैं।

प्लेग :

वायरस कीटाणुओं से होने वाला यह एक संक्रामक बीमारी है। मिट्टी, जल और वायु के प्रदूषण से इसके कीटाणु (पिप्सू) संक्रमित होते हैं, जो पहले चूहों में लगते हैं, फिर चूहों से मिट्टी, खाद्य पदार्थ, जल एवं वायु के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। तेज बुखार, साँस लेने में कठिनाई, खून की उल्टियाँ, आँत में दर्द, बगल तथा गले में सूजन अथवा गांठे पड़ जाना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। आयुर्वेद में इसे ग्रन्थिक या वातलिकार ज्वर कहा जाता है। यह बहुत तेजी से फैलता है। इसके वायरस शरीर की कोशिकाओं को नष्ट कर व्यक्ति को अपनी चपेट में तुरन्त ले लेते हैं।
प्लेग के शिकार रोगी को नीम का पंचाग (बीज, छाल, पत्ता, फूल, गोद) कूटकर पानी मे छानकर दस-दस तोले की मात्रा हर पन्द्रह मिनट पर देनी चाहिए। तत्काल नीम के पांचों अंग न मिले तो जो भी मिले उसी को देना चाहिए। शरीर के जोड़ों पर नीम की पत्तियों की पुल्टिस बांधने तथा आस-पास नीम की लकड़ी-पत्तों की घूनी करने से भी प्लेग का शमन होता है।
प्लेग फैलते ही स्वस्थ लोगों को नीम के पत्ते पीस कर नित्य पीते रहना चाहिए, इससे प्लेग का उनपर असर नही होता।

हैजा :

यह अशुद्ध/दूषित जल के उपयोग से फैलने वाला संक्रामक रोग है। इसके जीवाणु पहले आंत में प्रतिक्रिया करते हैं। तत्काल उपाय न होने पर देखते-देखते रोगी मर जाता है। ग्लूकोज या नमक चीनी का घोल तुरन्त दिया जाना लाभदायक होता है। इसके फैलने पर व्यक्ति को पानी उबालकर पीना चाहिए, मांस-मंछली वर्जित करना चाहिए, खुले स्थान के मल को मिट्टी से ढक देना या लैट्रिन की विधिवत सफाई होती रहनी चाहिए।
हैजा ‘विब्रियो कैलेरा’ नामक जीवाणु से संक्रमित होता है। कूड़े-कचड़ों के सड़न में इनका निवास अधिक होता है। इस बैक्टेरिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने मल द्वारा हैजे के करोड़ों जीवाणु वातावरण में छोड़ता है, उससे जल, मिट्टी, खाद्य पदार्थ तथा वायु संक्रमित होते हैं। मक्खियाँ भी इसके संवाहक बनती हैं। उल्टी-दस्त, हाथ-पांव में ऐठन और तेज प्यास इसके प्रमुख लक्षण हैं।
नीम के पत्तों को पीसकर, गोला बनाकर तथा कपड़े में बांधकर ऊपर सनी हुई मिट्टी का मोटा लेप चढ़ाकर उसे आग के धूमल (भभूत) में पकाना चाहिए, जब वह लाल हो जाय तब थोड़ी-थोड़ी देर पर उस पके हुए गोले को अर्क गुलाब के साथ रोगी को देने से दस्त, वमन एवं प्यास रूकता है। नीम तेल की मालिश से शरीर का ऐंठन कम होता है। हैजे में नीम तेल पानी के साथ पीने से भी लाभ होता है। नीम छाल का काढ़ा पतले दस्त में भी लाभकारी होता है।

पीलिया :

नीम का रस  या छाल का क्वाथ(काढ़ा)  शहद में मिलाकर नित्य सुबह लेने से पीलिया में लाभ होता है।

मधुमेह/डायबिटीज :

नीम के तने की भीतरी छाल तथा मेथी के चूर्ण का काढ़ा बनाकर कुछ दिनों तक नियमित पीने से मधुमेह की हर स्थिति में लाभ मिलता है।

गठिया, वातरोग, साइटिका, जोड़ों में दर्द (अर्थराइटीस) :

इन रोगों में नीम तेल की मालिश, नीम की पत्तियों को पीसकर एवं गर्म कर जोड़ों पर लेप करने , नीम का रस  पीने, नीम के सूखे बीज का चूर्ण हर तीसरे दिन महीने भर खाने से काफी लाभ मिलता है। नीम के छाल को पानी के साथ पीस कर जोड़ों के दर्द वाले स्थान पर गाढ़ा लेप करने से भी दर्द दूर होता है।

सूजन, लकवा, चोट-मोच :

नीम के छाल का अर्क २ से ४ तोले तक नित्य पीने और इसके सेवन के २ घंटे बाद तत्काल बनी रोटी घी के साथ खाने से लकवा अर्द्धांश में लाभ होता है। पक्षाघात वाले अंगों पर नीम तेल की मालिश करने की भी सलाह दी जाती है।
चोट लगने के कारण आयी मोच और गिल्टियों के सूजन पर नीम की पत्तियों की वाष्प  देने से लाभ होता है।

कफ, पित्त  :

  • नीम तथा वक के छाल का काढ़ा कफ में लाभदायक होता है।
  • नीम का फूल, इमली तथा शहद के साथ खाने से कफ एवं पित्त दोनों का शमन होता है।

दमा  :

नीम का शुद्ध तेल ३० से ६० बूंद तक पान में रखकर खाने से दमा से छुटकारा मिलता है। नीम के २० ग्राम पत्ते को आधा लीटर पानी में उबालकर जब एक कप रह जाय, कुछ दिन पीते रहने से भी दमा जड़ से नष्ट होता है।

पथरी  :

नीम की पत्तियों की राख २ ग्राम,  जल के साथ नियमित कुछ दिन तक खाते रहने से पथरी गलकर नष्ट हो जाती है।

मन्दाग्नि, वायुरोग  :

  • नीम की पकी निबोली अथवा नीम का फूल कुछ दिन नित्य खाने से मंदाग्नि में काफी लाभ होता है।
  • नीम तेल ३० बूंद पान के साथ खाने से वायु विकार तथा पेट का मरोड़ दूर होता है।

वमन, विरेचन तथा नशा एवं विष उतारने के लिए  :

  • नीम बीज जल के साथ खिलाने पर वमन होता है। यह मृदु विरेचक है।
  • कई वर्षों तक लगातार हर साल १०-१५ दिन तक नीम की पत्तियों का सेवन किये हुए व्यक्ति को सर्प, बिच्छू आदि के विष का असर नहीं होता।
  • बिच्छू तथा मधुमक्खी के काटने पर नीम की पत्तियों को पीसकर लेपनी  चाहिए। 
  • इसको पीने से संखिया का विष भी उतर जाता है। 
  • नीम पत्तों का तेज अर्क अफीम के विष का नाशक है। 
  • कच्ची या पक्की निबोली गर्म पानी से पिलाने पर उल्टी होती है, इससे विष का असर नष्ट होता है।
  • नीम बीज का चूर्ण गर्म पानी के साथ पीने से भी विष उतरता है।

शुद्धिकरण में नीम  :

  • पुराने देशी घी या तेल को शुद्ध करने के लिए गर्म करते समय नीम की पत्तियाँ डाली जाती हैं।
  • अधिक नीम के सेवन से उत्पन्न हुए विकार दूध या सेंधा नमक खाने से दूर होते हैं।
  • नीम की पत्तियों से उबला जल या नीम तेल पानी में मिलाकर फर्श धोने से वातावरण शुद्ध होता है।
  • शवदाह के बाद लौटने या कोई घृणित चीज देखने से उत्पन्न हुए चित्त विकार नीम की पत्तियाँ/टूसे चबाने से दूर होते हैं।

कोलेस्ट्रोल नियंत्रण :

कोलेस्ट्रोल रक्त में पाया जाने वाला पीले रंग का एक मोमी पदार्थ है। जब रक्त में यह अधिक हो जाता है, तब रक्त-वाहिनी धमनियों के अन्दर यह जमने लगता है, थक्का बनाकर रक्त-प्रवाह को अवरुद्ध करता है।
कोलेस्ट्रोल दो तरह के होते हैं- एच.डी.एल. और एल.डी.एल.। इसमें पहला स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, दूसरा बुरा। बुरा कोलेस्ट्रोल अधिक वसायुक्त पदार्थ (तेल, घी, डालडा), माँस, सिगरेट तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से पैदा होता है। बुरा कैलेस्ट्रोल की वृद्धि से रक्त दूषित होता है, उसका प्रवाह रुकता है और दिल का  दौरा पड़ता है।

नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कोलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है। नीम का महीने में १० दिन तक सेवन करते रहने से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है।

मासिक धर्म एवं सुजाक  :

  • आयुर्वेद मत में नीम की कोमल छाल 5 ग्राम  तथा पुराना गुड २ तोला, डेढ़ पाव पानी में औटाकर जब आधा पाव रह जाय तब छानकर स्त्रियों को पिलाने से रुका हुआ मासिक धर्म पुन: शुरू हो जाता है।
  • नीम छाल २ तोला सोंठ, ५ ग्राम  एवं गुड़ २ तोला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर देने से मासिक धर्म की गड़बड़ी ठीक होती है।
  • स्त्री योनि में सुजाक (फुंसी, चकते) होने पर नीम के पत्तों के उबले गुनगुने जल से धोने से लाभ होता है
  • नीम पत्ती के उबले पर्याप्त जल में जो सुसुम हो, कटि स्नान से सुजाक का शमन होता है और शान्ति मिलती है। पुरूष लिंग में भी सुजाक होने पर यही उपचार करना चाहिए |इससे सूजन भी उतर जाती  है और पेशाब ठीक होने लगता है।

प्रदर रोग :

प्रदर रोग मुख्यत: दो तरह के होते हैं-श्वेत एवं रक्त। जब योनि से सड़ी मछली के समान गन्ध जैसा, कच्चे अंडे की सफेदी के समान गाढ़ा पीला एवं चिपचिपा पदार्थ निकलता है, तब उसे श्वेत प्रदर कहा जाता है। यह रोग प्रजनन अंगों की नियमित सफाई न होने, संतुलित भोजन के अभाव, बेमेल विवाह, मानसिक तनाव, हारमोन की गड़बड़ी, शरीर से श्रम न करने, मधुमेह, रक्तदोष या चर्मरोग इत्यादि से होता है। इस रोग की अवस्था में जांघ के आस-पास जलन महसूस होता है, शौच नियमित नहीं होता, सिर भारी रहता है और कभी-कभी चक्कर भी आता है।
  • श्वेत प्रदर में नीम की पत्तियों के क्वाथ से योनिद्वार को धोना और नीम छाल को जलाकर उसका धुआं लगाना लाभदायक माना गया है। इससे दुर्गन्ध तथा चिपचिपापन दूर होने के साथ योनिद्वार शुद्ध एवं संकुचित होती  है। यह आयुर्वेद ग्रंथ ‘गण-निग्रह’ का अभिमत है।
रक्त प्रदर भी  एक गंभीर रोग है। योनि मार्ग से अधिक मात्रा में रक्त का बहना इसका मुख्य लक्षण है। यह मासिक धर्म के साथ या बाद में भी होता है। इस रोग में हाथ-पैर में जलन, प्यास ज्यादा लगना, कमजोरी, मूर्च्छा तथा अधिक नींद आने की शिकायतें होती हैं।
  • रक्त प्रदर में नीम के तने की भीतरी छाल का रस तथा जीरे का चूर्ण मिलाकर पीने से रक्तस्राव बन्द होता है तथा इस रोग की अन्य शिकायतें भी दूर होती हैं।

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Friday, January 27

प्रोस्टेट का बढ़ना - प्राकृतिक उपचार





By- Dr. Kailash Dwivedi

प्रोस्टेट ग्लैंड बढ़ने की समस्या 40 वर्ष की आयु के बाद सामने आती है | लगभग 70-80 प्रतिशत व्यक्ति इस बीमारी से ग्रस्त होते हैं। प्रोस्टेट की अनदेखी करने पर अन्य समस्यायों के साथ गुर्दा फेल होने की संभावना भी बढ़ जाती है। 
मेडिकल साइंस के आकड़ों के अनुसार, यदि व्यक्ति 60 वर्ष से अधिक उम्र का है तो उसकी बीमारी ठीक होने की सम्भावना 60 प्रतिशत दवाओं से और 40 प्रतिशत ऑपरेशन से रहती है।
सामान्य रूप से प्रोस्टेट का साइज 18 से 20 ग्राम होता है। हर साल इसके आकार में 2-3 ग्राम की बढ़ोतरी होती है। यदि प्रोस्टेट की बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति की प्रोस्टेट का आकार 100 ग्राम से अधिक बढ़ जाए तो यह गुर्दों के लिए घातक होता है। इसकी अनदेखी करने पर पीड़ित व्यक्ति की किडनी फेल होने की संभावना बढ़ जाती है। प्राकृतिक चिकित्सा से इस रोग में लाभ प्राप्त किया जा सकता है | जहाँ तक संभव हो सर्जरी से बचना चाहिए | सर्जरी के बाद निम्न समस्याएं आ सकती हैं -

प्रोस्टेट की सर्जरी के बाद आ सकती है यह समस्या :

प्रोस्टेट ग्लैंड मूत्राशय की ग्रीवा तथा मूत्रमार्ग के ऊपरी भाग को चारों तरफ से घेरकर रखती है। इस ग्लैंड से सफेद, लिसलिसा तथा गाढ़ा स्राव निकलता है। जब पुरुष उत्तेजित होता है तो उस समय शुक्राणु प्रोस्टेट में पहुंच जाते हैं। यह लिसलिसा पदार्थ इन शुक्राणुओं को जीवित रखने और बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब यह ग्रंथि अधिक बढ़ जाती है तो मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग की क्रियाओं में बाधा उत्पन्न होती है। ऑपरेशन के बाद 100 में से 100 लोगों का सेक्स के दौरान वीर्य नहीं निकलता है, बल्की पेशाब की थैली में चला जाता है। दो प्रतिशत लोगों में नपुंसकता के चांचेज भी बढ़ जाते हैं। इसके आलाव ऑपरेशन के बाद यदि इंटरनल स्पींटर कट गया तो यूरिन रुकने की समस्या पैदा हो जाती है।



प्रोस्टेट बढ़ने के लक्षण :

  • बार-बार पेशाब का आना, रात में चार से पांच बार यूरिन परित्याग करने के लिए जाना
  • पेशाब का देर से उतरना 
  • शौच करते समय पेशाब का बूँद-बूँद कर टपकना
  • यूरिन करने के बाद भी पुनः यूरिन की शंका होना, ऐसा महसूस होता है कि तेज पेशाब लगी है लेकिन करने पर बूंद-बूंद कर होती है 
  • पेशाब में खून का आना
  • मूत्राशय में पथरी का बनना
  • गुर्दे का फे ल होना
  • सिर में दर्द, घबराहट, थकान, चिड़चिड़ापन होना 
  • लिंग का ढीला हो जाना तथा अधिक कमजोरी महसूस होना एवं वीर्य निकलने पर दर्द होता है
  • पेशाब में जलन होना  
  • मूत्र पर नियंत्रण नहीं होना एवं मूत्र त्याग कर चुकाने के बाद भी मूत्र की बूंदे टपकना  

प्रोस्टेट ग्लैंड बढ़ने के कारण :

  1. लगातार लम्बे समय तक बैठने का कार्य करना 
  2. अप्राकृतिक खान-पान 
  3. मानसिक तनाव, चिंता एवं अधिक क्रोध 
  4. नशीले पदार्थों का अधिक सेवन 
  5. कब्ज 
  6. मूत्र तथा शौच का वेग रोकना 

प्राकृतिक उपचार :

गर्म-ठंडा कटि स्नान :

गर्म - ठंडा कटि स्नान करने के लिए कपड़े निकालकर टब में पैरों को बाहर करके आधे लेटने की स्थिति में इस प्रकार बैठना चाहिए कि नाभि के ऊपर तक का भाग एवं आधी जंघाएँ पानी के अन्दर आ जाएँ | 
इस स्नान को करने के लिए निम्न साधनों की आवश्यकता होगी -

साधन :
कटि स्नान के टब - 2,  गरम एवं ठंडा पानी |

विधि :
कटि स्नान के एक टब में ठंडा एवं दूसरे टब में गर्म पानी भरकर इसमे निम्न क्रम में बैठना चाहिए -
  • 3 मिनट गर्म 
  • 1 मिनट ठंडा  

  • 3 मिनट गर्म 
  • 1 मिनट ठंडा 
  • 3 मिनट गर्म 
  • 1 मिनट ठंडा 
  • 3 मिनट गर्म 
  • 3 मिनट ठंडा 
इस प्रकार कुल 18 मिनट तक इस उपचार को करना चाहिए |

प्रोस्टेट में आहार चिकित्सा :

कद्दू  के बीज प्रोस्टेट की समस्या से बचाव करने में अत्यंत सहायक  इन बीजों में मौजूद केमिकल शरीर में जाकर टेस्टोस्टेरोन को डिहाइड्रोटेस्टोस्टेरोन में बदलने से बचाता है जिससे प्रोस्टेट कोशिकाएं  नहीं बन पातीं है |
इसके बीज जिंक के बेहतरीन स्रोतों में से एक माने जाते हैं |प्रतिदिन 60 मिलीग्राम जिंक का सेवन प्रोस्टेट के रोगियों को अत्यंत लाभ पहुंचाता है और उनके स्वास्थ्य में भी सुधार करता है | कद्दू के बीज कच्चे या भून कर अथवा  दूसरे बीजों के साथ मिलाकर खाए जा सकते हैं |

  • उपचार से सम्बंधित यदि कोई प्रश्न पूछना हो तो कृपया कमेन्ट बॉक्स में अपना प्रश्न लिखें -

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