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Friday, February 10

मिर्गी रोग में रामबाण है यह मुफ्त का इलाज !


By- Dr. Kailash Dwivedi

इस मुद्रा में हाथ की आकृति मृग के सिर के समान हो जाती है इसीलिए इसे मृगी मुद्रा  कहा जाता है।

विधि  :

हाथ की अनामिका और मध्यमा अंगुली (बीच की दोनों अंगुली)  को अंगूठे के आगे के भाग से स्पर्श कराएँ |बाकी बची दोनों अंगुलियाँ कनिष्ठा एवं तर्जनी अंगुली को सीधा रखें।

लाभ  :


  • मृगी मुद्रा मिर्गी के रोगियों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
  • इसके नियमित अभ्यास से सिरदर्द और दिमागी परेशानी में लाभ मिलता है।
  • मृगी मुद्रा से दन्त रोग एवं सायिनस रोग में भी लाभ मिलता है।


मुद्रा करने का समय व अवधि  :

मृगी मुद्रा को प्रातः,दोपहर एवं सायं 16-16 मिनट करना उपयुक्त है।

घरेलू चिकित्सा  :




  1. अंगूर का रस मिर्गी रोगी के लिये अत्यंत लाभदायक माना गया है। 250-300 ग्राम अंगूर का रस निकालकर प्रात:काल खाली पेट लेना चाहिये। यह उपचार करीब ६ माह करने से आश्चर्यकारी सुखद परिणाम मिलते हैं।
  2. मिर्गी के रोगी के पैरों तलवों में आक की आठ-दस बूंदे प्रतिदिन  शाम के समय मलें। ऐसा 2 महीनों तक रोजाना करें। इससे काफी लाभ मिलेगा।
  3. मिर्गी के रोगी के लिए शहतूत एवं सेब का रस लाभदायक होता है।  
  4. तुलसी की पत्तियों के साथ कपूर सुंघाने से मिर्गी के रोगी को होश आ जाता है।
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Wednesday, January 11

यह प्रयोग मात्र 2 दिन में चालू करे रुका हुआ मासिक धर्म - एक बार अवश्य आजमायें !





By- Dr.Kailash Dwivedi

हस्त मुद्राओं के अंतर्गत अंगुलियों से बनने वाली मुद्राओं में विभिन्न रोगों को दूर करने की शक्ति छिपी है। हमारा शरीर पंचतत्वों (पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश) से निर्मित है हाथ की अंगुलियों में यह पाचों तत्व मौजूद होते हैं। पांचों अंगुलियाँ पंचतत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं। जिससे अलग-अलग विद्युत धारा बहती है। इसलिए मुद्रा विज्ञान में जब अंगुलियों का आपस में स्पर्श कराते हैं, तब विद्युत धारा शरीर में समाहित होकर रोगनिवारक शक्ति को जगाती है फलस्वरूप हमारा शरीर निरोगी होने लगता है।


विधि :

कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) को मोड़कर इसी अंगुली की जड़ में लगाने से रजमुद्रा बनती है।

लाभ :


  1. यह मुद्रा स्त्रियों में मासिकधर्म की अनियमितता को दूर करती है |

  2. अधिक या कम मासिक स्राव का होना ,जैसे लक्षणों को दूर करती है |

  3. मासिक स्राव के समय रजमुद्रा करने से सिर में भारीपन, छाती, पेट, पीठ, कमर का दर्द आदि रोगों मे लाभ मिलता है |

  4. यह एक चमत्कारिक मुद्रा है मासिक धर्म सम्बन्धी रोगों से पीड़ित महिलायें इसे अवश्य करें और लाभ उठायें |

  5. मासिक धर्म के अतिरिक्त स्त्रियों के प्रजनन अंगों के अन्य रोगों को भी यह मुद्रा जड़ से दूर कर देती है।

  6. बालिकाओं के प्रथम मासिक स्राव के समय यदि वह रजमुद्रा का अभ्यास प्रारंभ कर दे तो जीवन में कभी भी मासिकधर्म से संबंधित कोई भी रोग उसे नहीं होगा ।


किस समय एवं कितनी देर तक करें :


  • यह मुद्रा प्रातः, दोपहर एवं सायं 15-15 मिनट तक करनी चाहिए |


सावधानियां :


  • भोजन के तुरंत पहले या बाद में यह मुद्रा न करें | 1 घंटा पहले एवं 1 घंटा बाद कर सकते हैं |
    चलते – फिरते हुए रजमुद्रा न करें | स्थिर बैठकर या लेटकर करें |


पुरुषों के लिए भी लाभकारी है रजमुद्रा :

रजमुद्रा करने से सिर्फ स्त्रियों को ही लाभ नही होता बल्कि अगर पुरुष भी इस मुद्रा को करता है तो उनके वीर्य संबंधी समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं।


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Friday, December 30

वजन कम करने का आसान तरीका – सूर्य मुद्रा





By- Dr.Kailash Dwivedi
लाभ :

  1. प्रसव के बाद जिन स्त्रियों के शरीर में मोटापा बढ़ जाता है वे यदि इस मुद्रा का नियमित अभ्यास करें तो उनका शरीर बिल्कुल पहले जैसा हो जाता है।
  2. इस मुद्रा के अभ्यास से वजन कम होता है एवं  शरीर संतुलित रहता है।
  3. सूर्य मुद्रा को करने से शरीर में ताकत पैदा होती है।
  4. सूर्य मुद्रा को रोजाना करने से पूरे शरीर में ऊर्जा बढ़ती है और गर्मी पैदा होती है।

विधि :
अपने हाथ की अनामिका उंगली को अंगूठे की जड़ में लगा लें तथा बाकी बची हुई उंगलियों को सीधी रहने दें। 

कितने समय तक करें  :
  • गर्मियों में सूर्य मुद्रा को लगभग 8 मिनट तक करना चाहिए इसको ज्यादा देर तक करने से शरीर में गर्मी बढ़ जाती है।
  • सर्दियों में सूर्य मुद्रा को अधिकतम  24 मिनट तक किया जा सकता है।

सावधानी  : 
कमजोर शरीर वाले व्यक्तियों को यह मुद्रा नहीं करनी चाहिए।
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चेहरे की सुंदरता के लिये रक्तशोधिनी हरिमुद्रा





By- Dr.Kailash Dwivedi

लाभ :
  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा शरीर और चेहरे को सुंदर बनाती है।
  • इस मुद्रा को करने से चेहरे की लाली बढ़ती है।
  • इस मुद्रा को करने से रक्त शुद्ध होता है एवं शरीर में लाल रक्त के कणों की वृद्धि होती है।
  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा के अभ्यास से दिमागी शक्ति भी तेज होती है।
  • रक्त विकार जैसे - खाज, खुजली, छाजन, फोड़े-फुंसी आदि सारे त्वचा के रोगों को यह मुद्रा समाप्त कर देती है।

विशेष :

  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा स्त्रियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है , इसके नियमित अभ्यास से खूबसूरती में आश्चर्यजनक रूप से  वृद्धि होती है ।

विधि :


  1. जमीन पर आसन बिछाकर बैठ जाएँ 
  2. दोनों हाथों की अंगुलियों एवं अंगूठे के अग्रभाग को जमीन पर टिका दें | 
इसे रक्तशोधिनी हरिमुद्रा कहते है, इस स्थिति में अंगुलिया एवं अंगूठा सीधा रहना चाहिए एवं इनके अग्रभाग जमीन पर अच्छे से टिके रहने चाहिए |

कितने समय तक और कब करें :

प्रातः सूर्योदय के समय तथा सांयकाल सूर्यास्त से पहले इस मुद्रा को किया जा सकता है |
प्रारंभ में पांच मिनट से शुरू करके 15 मिनट तक कर सकते हैं |

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प्राणमुद्रा - लकवा एवं ह्रदय रोग में रामबाण





By-Dr.kailash Dwivedi

विधि :
  • पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ | रीढ़ की हड्डी सीधी रखें |
  • अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रख लें,हथेलियाँ ऊपर की तरफ रहें |
  • हाथ की सबसे छोटी अंगुली (कनिष्ठा) एवं इसके बगल वाली अंगुली (अनामिका) के पोर को अंगूठे के पोर से लगा दें |

सावधानियां :
प्राणमुद्रा से प्राणशक्ति बढती है यह शक्ति इन्द्रिय, मन और भावों के उचित उपयोग से धार्मिक बनती है। परन्तु यदि इसका सही उपयोग न किया जाए तो यही शक्ति इन्द्रियों को आसक्ति, मन को अशांति और भावों को बुरी तरफ भी ले जा सकती है। इसलिए प्राणमुद्रा से बढ़ने वाली प्राणशक्ति का संतुलन बनाकर रखना चाहिए।

मुद्रा करने का समय व अवधि :
प्राणमुद्रा को एक दिन में अधिकतम  48 मिनट तक किया जा सकता है। यदि एक बार में 48 मिनट तक करना संभव न हो तो प्रातः,दोपहर एवं सायं 16-16 मिनट कर सकते है।

चिकित्सकीय लाभ :

  • प्राणमुद्रा ह्रदय रोग में रामबाण है एवं नेत्रज्योति बढाने में यह मुद्रा बहुत सहायक है।
  • इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से प्राण शक्ति की कमी दूर होकर व्यक्ति तेजस्वी बनता है।
  • प्राणमुद्रा से लकवा रोग के कारण आई कमजोरी दूर होकर शरीर शक्तिशाली बनता है |
  • इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से  मन की बैचेनी और कठोरता को दूर होती है एवं एकाग्रता बढ़ती है।

आध्यात्मिक लाभ :

  •  प्राणमुद्रा को पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर करने से शक्ति जागृत होकर ऊर्ध्वमुखी हो जाती है, जिससे चक्र जाग्रत होते हैं एवं साधक अलौकिक शक्तियों से युक्त हो जाता है ।
  • प्राणमुद्रा में  जल,पृथ्वी एवं अग्नि तत्व एक साथ मिलने से शरीर में रासायनिक परिवर्तन होता है जिससे व्यक्तित्व का विकास होता है। 


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Thursday, December 29

अपान मुद्रा : गुर्दे तथा आंतों के रोग नष्ट करने की चमत्कारिक विधि



By-Dr.Kailash Dwivedi


विधि :
  • सुखासन या अन्य किसी आसान में बैठ जाएँ, दोनों हाथ घुटनों पर, हथेलियाँ  उपर की तरफ एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रखें |
  • मध्यमा (बीच की अंगुली)एवं अनामिका (RING FINGER) अंगुली के उपरी पोर को अंगूठे के उपरी पोर से स्पर्श कराके हल्का सा दबाएं | तर्जनी अंगुली एवं कनिष्ठा (सबसे छोटी) अंगुली सीधी रहे |


सावधानियाँ :

  • अपान मुद्रा के अभ्यास काल में मूत्र अधिक मात्रा में आता है, क्योंकि इस मुद्रा के प्रभाव से शरीर के अधिकाधिक मात्रा में विष बाहर निकालने के प्रयास स्वरुप मूत्र ज्यादा आता है,इससे घबड़ाए नहीं |
  • अपान मुद्रा को दोनों हाथों से करना अधिक लाभदायक है,अतः यथासंभव इस मुद्रा को दोनों हाथों से करना चाहिए ।

मुद्रा करने का समय व अवधि : 

अपान मुद्रा को प्रातः,दोपहर,सायं 16-16 मिनट करना सर्वोत्तम है |

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. अपान मुद्रा के नियमित अभ्यास से कब्ज,गैस,गुर्दे तथा आंतों से सम्बंधित समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं |
  2. अपान मुद्रा बबासीर रोग के लिए अत्यंत लाभकारी है | इसके प्रयोग से बबासीर समूल नष्ट हो जाती है |
  3. यह मुद्रा मधुमेह के लिए लाभकारी है, इसके निरंतर प्रयोग से रक्त में शर्करा का स्तर सन्तुलित होता है |
  4. अपान मुद्रा शरीर के मल निष्कासक अंगों – त्वचा,गुर्दे एवं आंतों को सक्रिय करती है जिससे शरीर का बहुत सारा विष पसीना,मूत्र व मल के रूप में बाहर निकल जाता है फलस्वरूप शरीर शुद्ध एवं निरोग हो जाता है |

आध्यात्मिक लाभ : 

  • अपान मुद्रा से प्राण एवं अपान वायु सन्तुलित होती है | इस मुद्रा में इन दोनों वायु के संयोग के फलस्वरूप साधक का मन एकाग्र होता है एवं वह समाधि को प्राप्त हो जाता है |
  • अपान मुद्रा के अभ्यास से स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र जाग्रत होते है |


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अपान वायु मुद्रा (ह्रदय मुद्रा) : APAN VAYU MUDRA



                                                                                                                 
Dr.Kailash Dwivedi

विधि : 

  • सुखासन या अन्य किसी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएँ | दोनों हाथ घुटनों पर रखें, हथेलियाँ उपर की तरफ रहें एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रहे |
  • हाथ की तर्जनी (प्रथम) अंगुली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगा दें तथा मध्यमा (बीच वाली अंगुली) व अनामिका (तीसरी अंगुली) अंगुली के प्रथम पोर को अंगूठे के प्रथम पोर से स्पर्श कर हल्का दबाएँ |
  • कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) अंगुली सीधी रहे ।



सावधानी : 

अपान वायु मुद्रा एक शक्तिशाली मुद्रा है इसमें एक साथ तीन तत्वों का मिलन अग्नि तत्व से होता है,इसलिए इसे निश्चित समय से अधिक नही करना चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि :  

अपान वायु मुद्रा करने का सर्वोत्तम समय प्रातः,दोपहर एवं सायंकाल है | इस मुद्रा को दिन में कुल 48 मिनट तक कर सकते हैं | दिन में तीन बार  16-16 मिनट भी कर सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. अपान वायु मुद्रा ह्रदय रोग के लिए रामवाण है इसी लिए इसे ह्रदय मुद्रा भी कहा जाता है |
  2. दिल का दौरा पड़ने पर यदि रोगी यह मुद्रा करने की स्थिति में हो तो तुरंत अपान वायु मुद्रा कर लेनी चाहिए | इससे तुरंत लाभ होता है एवं हार्ट अटैक का खतरा टल जाता है | 
  3. इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से रक्तचाप एवं अन्य ह्रदय सम्बन्धी रोग नष्ट हो जाते हैं |
  4. अपान वायु मुद्रा करने से आधे सिर का दर्द तत्काल रूप से कम हो जाता है एवं इसके नियमित अभ्यास से यह रोग समूल नष्ट हो जाता है |
  5. यह मुद्रा उदर विकार को समाप्त करती है अपच,गैस,एसिडिटी,कब्ज जैसे रोगों में अत्यंत लाभकारी है |
  6. अपान वायु मुद्रा करने से गठिया एवं आर्थराइटिस रोग में लाभ होता है |

आध्यात्मिक लाभ : 

अपान वायु मुद्रा अग्नि,वायु,आकाश एवं पृथ्वी तत्व के मिलन से बनती है | इस मुद्रा के प्रभाव से साधक में सहनशीलता,स्थिरता,व्यापकता और तेज का संचार होता है |


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Thursday, April 23

लिंग मुद्रा :(सर्दी से ठिठुरता व्यक्ति यदि कुछ समय तक लिंग मुद्रा कर ले तो आश्चर्यजनक रूप से उसकी ठिठुरन दूर हो जाती है)






विधि : 
किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएँ |
दोनों हाथों की अँगुलियों को परस्पर एक-दूसरे में फसायें (ग्रिप बनायें)  |
किसी भी एक अंगूठे को सीधा रखें तथा दूसरे अंगूठे से सीधे अंगूठे के पीछे से           लाकर घेरा बना दें |

सावधानियाँ : 

  • लिंग मुद्रा से शरीर मे गर्मी उत्पन्न होती है,इसलिए इस मुद्रा को करने के पश्चात् यदि गर्मी महसूस हो तो तुरंत पानी पी लेना चाहिए |
  • लिंग मुद्रा को नियत समय से अधिक नही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि संभव है |
  • गर्मी के मौसम में इस मुद्रा को अधिक समय तक नहीं करना चाहिए |
  • पित्त प्रकृति वाले व्यक्तियों को लिंग मुद्रा नही करनी चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि :
लिंग मुद्रा को प्रातः-सायं 16-16 मिनट तक करना चाहिए |

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. सर्दी से ठिठुरता व्यक्ति यदि कुछ समय तक लिंग मुद्रा कर ले तो आश्चर्यजनक रूप से उसकी ठिठुरन दूर हो जाती है |
  2. लिंग मुद्रा के अभ्यास से जीर्ण नजला,जुकाम, साइनुसाइटिस,अस्थमा व निमन् रक्तचाप का रोग नष्ट हो जाता है | इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से कफयुक्त खांसी एवं छाती की जलन नष्ट हो जाती है |
  3. यदि सर्दी लगकर बुखार आ रहा हो तो लिंग मुद्रा तुरंत असरकारक सिद्ध होती है |
  4. लिंग मुद्रा के नियमित अभ्यास से अतिरिक्त कैलोरी बर्न होती हैं परिणाम स्वरुप मोटापा रोग समाप्त हो जाता है |
  5. लिंग मुद्रा पुरूषों के समस्त यौन रोगों में अचूक है । इस मुद्रा के प्रयोग से स्त्रियों के मासिक स्त्राव सम्बंधित अनियमितता ठीक होती हैं |
  6. लिंग मुद्रा के अभ्यास से टली हुई नाभि पुनः अपने स्थान पर आ जाती हैं |

आध्यात्मिक लाभ : 
यह मुद्रा पुरुषत्व का प्रतीक है इसीलिए इसे लिंग मुद्रा कहा जाता है। लिंग मुद्रा के अभ्यास से साधक में स्फूर्ति एवं उत्साह का संचार होता है | यह मुद्रा ब्रह्मचर्य की रक्षा करती है , व्यक्तित्व  को शांत व आकर्षक बनाती  है जिससे व्यक्ति आन्तरिक स्तर पर प्रसन्न रहता है ।
                                                                                                                      -डॉ.कैलाश द्विवेदी 

सूर्य मुद्रा SURYA MUDRA



By- Dr.Kailash Dwivedi

विधि :
सिद्धासन,पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ |
दोनों हाँथ घुटनों पर रख लें हथेलियाँ उपर की तरफ रहें |
अनामिका अंगुली  (रिंग फिंगर) को मोडकर अंगूठे की जड़ में लगा लें एवं         उपर से अंगूठे से दबा लें |
बाकि की तीनों अंगुली सीधी रखें |


सावधानियां :

  • अधिक कमजोरी की अवस्था में सूर्य मुद्रा नही करनी चाहिए |
  • सूर्य मुद्रा करने से शरीर में गर्मी बढ़ती है अतः गर्मियों में मुद्रा करने से पहले एक गिलास पानी पी लेना चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि : 

  1. प्रातः सूर्योदय के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर इस मुद्रा को करना अधिक लाभदायक होता है | सांयकाल सूर्यास्त से पूर्व कर सकते हैं |
  2. सूर्य मुद्रा को प्रारंभ में 8 मिनट से प्रारंभ करके 24 मिनट तक किया जा सकता है |

चिकित्सकीय लाभ : 

  • सूर्य मुद्रा को दिन में दो बार 16-16 मिनट करने से कोलेस्ट्राल घटता है |
  • अनामिका अंगुली पृथ्वी एवं अंगूठा अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है , इन तत्वों के मिलन से शरीर में तुरंत उर्जा उत्पन्न हो जाती है |
  • सूर्य मुद्रा के अभ्यास से मोटापा दूर होता है | शरीर की सूजन दूर करने में भी यह मुद्रा लाभकारी है |
  • सूर्य मुद्रा करने से  पेट के रोग नष्ट हो जाते हैं |
  • इस मुद्रा के अभ्यास से मानसिक तनाव दूर हो जाता है |
  • प्रसव के बाद जिन स्त्रियों का मोटापा बढ़ जाता है उनके लिए सूर्य मुद्रा अत्यंत उपयोगी है | इसके अभ्यास से प्रसव उपरांत का मोटापा नष्ट होकर शरीर पहले जैसा बन जाता है |

आध्यात्मिक लाभ : 
सूर्य मुद्रा के अभ्यास से व्यक्ति में अंतर्ज्ञान जाग्रत होता है |

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शून्य मुद्रा - कान एवं गले के रोगों में लाभकारी






विधि : 
मध्यमा अँगुली (बीच की अंगुली) को हथेलियों की ओर मोड़ते हुए अँगूठे से उसके प्रथम पोर को दबाते हुए बाकी की अँगुलियों को सीधा रखने से शून्य मुद्रा बनती हैं।

मुद्रा करने का समय व अवधि :  
शून्य मुद्रा को प्रतिदिन तीन बार प्रातः,दोपहर,सायं 15-15 मिनट के लिए करना चाहिए | एक बार में भी 45 मिनट तक कर सकते हैं |

सावधानियां :




  • भोजन करने के तुरंत पहले या बाद में शून्य मुद्रा न करें |
  • किसी आसन में बैठकर एकाग्रचित्त होकर शून्य मुद्रा करने से अधिक लाभ होता है |

चिकित्सकीय लाभ :

  1. शून्य मुद्रा के निरंतर अभ्यास से कान के रोग जैसे कान में दर्द, बहरापन, कान का बहना, कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें आना आदि समाप्त हो जाते हैं। कान दर्द होने पर शून्य मुद्रा को मात्र 5 मिनट तक करने से दर्द में चमत्कारिक प्रभाव होता है।
  2. शून्य मुद्रा गले के लगभग सभी रोगों में लाभकारी है |
  3. यह मुद्रा थायराइड ग्रंथि के रोग दूर करती है। 
  4. शून्य मुद्रा शरीर के आलस्य को कम कर स्फूर्ति जगाती है। 
  5. इस मुद्रा को करने से मानसिक तनाव भी समाप्त हो जाता है |

आध्यात्मिक लाभ :

  • शून्य मुद्रा  के निरंतर अभ्यास से स्वाभाव में उन्मुक्तता आती है |
  • इस मुद्रा से एकाग्रचित्तता बढती है |
  • शून्य मुद्रा इच्छा शक्ति मजबूत बनाती है |


वायु मुद्रा : (VAYU MUDRA) - जोड़ों के दर्द में लाभकारी







By- Dr.Kailash Dwivedi

विधि :

  • वज्रासन या सुखासन में बैठ जाएँ, रीढ़ की हड्डी सीधी एवं दोनों हाथ घुटनों पर रखें | हथेलियाँ उपर की ओर रखें |
  • अंगूठे के बगल वाली (तर्जनी) अंगुली को हथेली की तरफ मोडकर अंगूठे की जड़ में लगा दें |


सावधानियां : 
  • वायु मुद्रा करने से शरीर का दर्द तुरंत बंद हो जाता है,अतः इसे अधिक लाभ की लालसा में अनावश्यक रूप से  अधिक समय तक नही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है |
  • वायु मुद्रा करने के बाद कुछ देर तक अनुलोम-विलोम व दूसरे प्राणायाम करने से अधिक लाभ होता है |
  • इस मुद्रा को यथासंभव वज्रासन में बैठकर करें, वज्रासन में न बैठ पाने की स्थिति में अन्य आसन या कुर्सी पर बैठकर भी कर सकते हैं |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

वायु मुद्रा का अभ्यास प्रातः,दोपहर एवं सायंकाल 8-8 मिनट के लिए किया जा सकता है |

चिकित्सकीय लाभ :
  1. अपच व गैस होने पर भोजन के तुरंत वाद वज्रासन में बैठकर 5 मिनट तक वायु मुद्रा करने से यह रोग नष्ट हो जाता है |
  2. वायु मुद्रा के नियमित अभ्यास से लकवा,गठिया, साइटिका,गैस का दर्द,जोड़ों का दर्द,कमर व गर्दन तथा रीढ़ के अन्य भागों में होने वाला दर्द में चमत्कारिक लाभ होता है | 
  3. वायु मुद्रा के अभ्यास से शरीर में वायु के असंतुलन से होने वाले समस्त रोग नष्ट हो जाते है।
  4. इस मुद्रा को करने से कम्पवात,रेंगने वाला दर्द, दस्त ,कब्ज,एसिडिटी एवं पेट सम्बन्धी अन्य विकार समाप्त हो जाते हैं |

आध्यात्मिक लाभ :

वायु मुद्रा के अभ्यास से ध्यान की अवस्था में मन की चंचलता समाप्त होकर मन एकाग्र होता है एवं सुषुम्ना नाड़ी में प्राण वायु का संचार होने लगता है जिससे चक्रों का जागरण होता है |

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वरुण मुद्रा : VARUN MUDRA - शरीर के यौवन को बरकरार रखे




By- Dr.Kailash Dwivedi

विधि : 


  • पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ | रीढ़ की हड्डी सीधी रहे एवं दोनों हाथ घुटनों पर रखें |
  • सबसे छोटी अँगुली (कनिष्ठा)के उपर वाले पोर को अँगूठे के उपरी पोर से स्पर्श करते हुए हल्का सा दबाएँ। बाकी की तीनों अँगुलियों को सीधा करके रखें।



सावधानियां :

  • जिन व्यक्तियों की कफ प्रवृत्ति है एवं हमेशा सर्दी,जुकाम बना रहता हो उन्हें वरुण मुद्रा का अभ्यास अधिक  समय तक नहीं करना चाहिए।
  • सामान्य व्यक्तियों को भी सर्दी के मौसम में वरुण मुद्रा का अभ्यास अधिक समय तक नही करना चाहिए | गर्मी व अन्य मौसम में इस मुद्रा को प्रातः – सायं 24-24 मिनट तक किया जा सकता है।

मुद्रा करने का समय व अवधि :

वरुण मुद्रा का अभ्यास प्रातः-सायं अधिकतम 24-24  मिनट तक करना उत्तम है, वैसे  इस मुद्रा को किसी भी समय किया जा सकता हैं।

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. वरुण मुद्रा शरीर के जल तत्व सन्तुलित कर जल की कमी से होने वाले समस्त रोगों को नष्ट करती है।
  2. वरुण मुद्रा स्नायुओं के दर्द, आंतों की सूजन में लाभकारी है |
  3. इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर से अत्यधिक पसीना आना समाप्त हो जाता है |
  4. वरुण मुद्रा के नियमित अभ्यास से रक्त शुद्ध होता है एवं त्वचा रोग व शरीर का रूखापन नष्ट होता है।
  5. यह मुद्रा शरीर के यौवन को बनाये रखती है | शरीर को लचीला बनाने में भी यह लाभप्रद है । 
  6. वरुण मुद्रा करने से अत्यधिक प्यास शांत होती है।

आध्यात्मिक लाभ : 

जल तत्व (कनिष्ठा)   और अग्नि तत्व (अंगूठे) को एकसाथ मिलाने से शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन  होता है ।   इससे साधक के कार्यों में निरंतरता का संचार होता है |

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आंख, कान, नाक और गले के समस्त रोग दूर करे -पृथ्वी मुद्रा : PRITHAVI MUDRA





By- Dr.Kailash Dwivedi

विधि :
  1. वज्रासन की स्थिति में दोनों पैरों के घुटनों को मोड़कर बैठ जाएं,रीढ़ की हड्डी सीधी रहे एवं  दोनों पैर अंगूठे के आगे से मिले रहने चाहिए। एड़िया सटी रहें। नितम्ब का भाग एड़ियों पर टिकाना लाभकारी होता है। यदि वज्रासन में न बैठ सकें तो पदमासन या सुखासन में बैठ सकते हैं |
  2. दोनों हांथों को घुटनों पर रखें , हथेलियाँ ऊपर की तरफ रहें |
  3. अपने हाथ की अनामिका अंगुली (सबसे छोटी अंगुली के पास वाली अंगुली) के अगले पोर को अंगूठे के ऊपर के पोर से स्पर्श कराएँ |
  4. हाथ की बाकी सारी अंगुलिया  बिल्कुल सीधी रहें ।

  सावधानियां : 

  • वैसे तो पृथ्वी मुद्रा को किसी भी आसन में किया जा सकता है, परन्तु इसे वज्रासन में करना अधिक लाभकारी है, अतः यथासंभव इस मुद्रा को वज्रासन में बैठकर करना चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

  • पृथ्वी मुद्रा को प्रातः – सायं 24-24 मिनट करना चाहिए | वैसे  किसी भी समय एवं कहीं भी इस मुद्रा को कर सकते हैं।

चिकित्सकीय लाभ :

  • जिन लोगों को भोजन न पचने का या गैस का रोग हो उनको भोजन करने के बाद 5 मिनट तक वज्रासन में बैठकर पृथ्वी मुद्रा करने से अत्यधिक लाभ होता है ।
  • पृथ्वी मुद्रा के अभ्यास से आंख, कान, नाक और गले के समस्त रोग दूर हो जाते हैं।
  • पृथ्वी मुद्रा करने से कंठ सुरीला हो जाता है | 
  • इस मुद्रा को करने से गले में बार-बार खराश होना, गले में दर्द रहना जैसे रोगों में बहुत लाभ होता है।
  • पृथ्वी मुद्रा से मन में हल्कापन महसूस होता है एवं शरीर ताकतवर और मजबूत बनता है।
  • पृथ्वी मुद्रा को प्रतिदिन करने से महिलाओं की खूबसूरती बढ़ती है, चेहरा सुंदर हो जाता है एवं पूरे शरीर में चमक पैदा हो जाती है।
  • पृथ्वी मुद्रा के अभ्यास से स्मृति शक्ति बढ़ती है एवं मस्तिष्क में ऊर्जा बढ़ती है। 
  • पृथ्वी मुद्रा करने से दुबले-पतले लोगों का वजन बढ़ता है। शरीर में ठोस तत्व और तेल की मात्रा बढ़ाने के लिए पृथ्वी मुद्रा सर्वोत्तम है।



आध्यात्मिक लाभ : 

हस्त मुद्राओं में पृथ्वी मुद्रा का बहुत महत्व है,यह हमारे भीतर के पृथ्वी तत्व को जागृत करती है।
पृथ्वी मुद्रा के अभ्यास से मन में वैराग्य भाव उत्पन्न होता है |
जिस प्रकार से पृथ्वी माँ प्रत्येक स्थिति जैसे-सर्दी,गर्मी,वर्षा आदि को सहन करती है एवं प्राणियों द्वारा मल-मूत्र आदि से स्वयं गन्दा होने के वाबजूद उन्हें क्षमा कर देती है | पृथ्वी माँ आकार में ही नही वरन ह्रदय से भी विशाल है | पृथ्वी मुद्रा के अभ्यास से इसी प्रकार के गुण साधक में भी विकसित होने लगते हैं | यह मुद्रा विचार शक्ति को उनन्त बनाने में मदद करती है।

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Wednesday, April 1

गठिया,कब्ज,अनियमित मासिक स्राव के लिए - वायु जोड़ मुद्रा



 लाभ :
  • इस मुद्रा को करने से हाथ-पैरों तथा शरीर के दर्द में अत्यंत लाभ होता है।
  • वायु जोड़ मुद्रा के निरंतर अभ्यास से  गठिया, वात, गैस, कमजोरी, आंतों के रोग, कब्ज दूर होती है |
  • इसके अभ्यास से महिलाओं का मासिकधर्म समय पर न आना या ज्यादा मासिकस्राव का आना जैसे रोग समाप्त हो जाते हैं। 

वायु जोड़ मुद्रा की विधिः

  1. दोनों हाथों की तर्जनी उंगलियों के अग्रभाग को आपस में मिलाने से वायु जोड़ मुद्रा बन जाती है। (हाथ की पांच उंगलियों में अंगूठे व मध्यमा के बीच की उंगली तर्जनी कहलाती है।)

कब और कितने समय तक करें :
वायु जोड़ मुद्रा को प्रातः-सायं 5 से 15 मिनट तक करना चाहिए |

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Monday, March 9

विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी - ज्ञान मुद्रा (चिन्मय मुद्रा) GYANA MUDRA




By- Dr.Kailash Dwivedi

अंगूठे एवं तर्जनी अंगुली के स्पर्श से जो मुद्रा बनती है उसे ज्ञान मुद्रा कहते हैं |

विधि :

1. पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ |
2. अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रख लें तथा अंगूठे के पास वाली अंगुली (तर्जनी) के उपर के पोर को अंगूठे के ऊपर वाले पोर से स्पर्श कराएँ |
3. हाँथ की बाकि अंगुलिया सीधी व एक साथ मिलाकर रखें |


सावधानियां :

• ज्ञान मुद्रा से सम्पूर्ण लाभ पाने के लिए साधक को चाहिए कि वह सादा प्राकृतिक भोजन करे |
• मांस मछली, अंडा,शराब,धुम्रपान,तम्बाकू,चाय,काफ़ी कोल्ड ड्रिंक आदि का सेवन न करें |
• उर्जा का अपव्यय जैसे- अनर्गल वार्तालाप,बात करते हुए या सामान्य स्थिति में भी अपने पैरों या अन्य अंगों को हिलाना, ईर्ष्या, अहंकार आदि उर्जा के अपव्यय का कारण होते हैं, इनसे बचें |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

• प्रतिदिन प्रातः, दोपहर एवं सांयकाल इस मुद्रा को किया जा सकता है |
• प्रतिदिन 48 मिनट या अपनी सुविधानुसार इससे अधिक समय तक ज्ञान मुद्रा को किया जा सकता है | यदि एक बार में 48 मिनट करना संभव न हो तो तीनों समय 16-16 मिनट तक कर सकते हैं |
• पूर्ण लाभ के लिए प्रतिदिन कम से कम 48 मिनट ज्ञान मुद्रा को करना चाहिए |

चिकित्सकीय लाभ :

• ज्ञान मुद्रा विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी मुद्रा है, इसके अभ्यास से बुद्धि का विकास होता है,स्मृति शक्ति व एकाग्रता बढती है एवं पढ़ाई में मन लगने लगता है |
• ज्ञान मुद्रा के अभ्यास से अनिद्रा,सिरदर्द, क्रोध, चिड़चिड़ापन, तनाव,बेसब्री, एवं चिंता नष्ट हो जाती है |
• ज्ञान मुद्रा करने से हिस्टीरिया रोग समाप्त हो जाता है |
• नियमित रूप से ज्ञान मुद्रा करने से मानसिक विकारों एवं नशा करने की लत से छुटकारा मिल जाता है |
• इस मुद्रा के अभ्यास से आमाशयिक शक्ति बढ़ती है जिससे पाचन सम्बन्धी रोगों में लाभ मिलता है |
• ज्ञान मुद्रा के अभ्यास से स्नायु मंडल मजबूत होता है |

आध्यात्मिक लाभ :

• ज्ञान मुद्रा में ध्यान का अभ्यास करने से एकाग्रता बढ़ती है जिससे ध्यान परिपक्व होकर व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति करता है |
• ज्ञान मुद्रा के अभ्यास से साधक में दया,निडरता,मैत्री,शान्ति जैसे भाव जाग्रत होते हैं |
• इस मुद्रा को करने से संकल्प शक्ति में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती है |
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Monday, October 20

जुकाम में छींकें (Sneezing) आ रही हों तो करे - अदिति मुद्रा



लाभ :
इस मुद्रा को करने से हर समय
उबासी आना, ज्यादा छींक आना जैसे रोगों को दूर किया जा सकता है।

विधि -
अंगूठे के आगे के भाग
को अनामिका (छोटी उंगली के साथ
वाली उंगली) उंगली की जड़ में
टेढ़ा लगाने से अदिती मुद्रा बन
जाती है।

कितने समय तक करें :

अदिती मुद्रा को दिन में 3-4 बार
15-15 मिनटों के लिए कर सकते
हैं।

- डॉ.कैलाश द्विवेदी (Dr.Kailash Dwivedi)  +91 9760897937

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