Showing posts with label योगिक षट्कर्म. Show all posts
Showing posts with label योगिक षट्कर्म. Show all posts

Monday, January 2

षट्कर्म - कुंजल क्रिया



       


यह क्रिया उन लोगों के लिए है जो धौति क्रिया नहीं कर सकते हैं। इस क्रिया में हल्के गर्म पानी को पीकर उस पानी को अन्दर से बाहर निकाला जाता है। जिससे पेट व आहार नली साफ होती है।
विधि-
        कुंजल  क्रिया को सुबह सूर्योदय से पहले और शौच से आने के बाद करें। शौच के बाद मुंह-हाथ साफ करके 1 लिटर पानी को गर्म करके रखें। पानी जब हल्का गुनगुना रह जाए तो कागासन की स्थिति में बैठकर जितना सम्भव हो पानी पियें। फिर खड़े होकर सामने की ओर झुकें और तीन अंगुलियों तर्जनी, मध्यमा और अनामिका को मिलाकर मुंह के अन्दर जीभ के पिछले हिस्से पर घुमाएं। इससे उल्टी की इच्छा होगी और पानी बाहर निकलने लगेगा। जब पानी निकलने लगे तो अंगुली को बाहर निकाल लें और जब तक पानी बाहर निकलता रहे, अंगुली को बाहर रखें। जब पानी निकलना बन्द होने लगे तो पुन: अंगुली को अन्दर डालकर उल्टी करें। इस क्रिया को तब तक करें। जब तक पेट से सारा पानी बाहर न निकल जाएं। फिर जब पानी खटटा या कड़वा निकलने लगे तो फिर 2 गिलास पानी पीकर पहले की तरह ही अंगुली को जीभ पर घुमाकर उल्टी करें। इस क्रिया में पानी की मात्रा बढ़ाते हुए 2 लिटर तक ले जा सकते हैं।
सावधानी- 

  • इस क्रिया को शौच के बाद और सूर्योदय से पहले करना चाहिए। 
  • कुंजल क्रिया के लिए पानी में नमक या सौंफ आदि कुछ भी न मिलाएं। कुंजल क्रिया हमेशा शौच के बाद करें अन्यथा कब्ज होने की संभावना रहती है। इस क्रिया का अभ्यास हृदय एवं उच्च रक्तचाप के रोगी को नहीं करना चाहिए।
  • कुन्जल करने के 2 घंटे बाद स्नान करें या कुंजल  करने से पहले स्नान करें। 

लाभ-

  1. कुंजल से कपोल दोष, मुंहासे, दांतों के रोग, जीभ के रोग, रक्तविकार, छाती के रोग, कब्ज, वात, पित्त व कफ से होने वाले रोग दूर होते हैं। 
  2. यह रतोंधी, खांसी, दमा, मुंह का सूखना, कण्ठमाला आदि को खत्म करती है। 
  3. यह पेट को साफ करती है, पाचन शक्ति को बढ़ाती है, बदहजमी व गैस विकार आदि रोगों को दूर करती है।  
  4. जिगर को शक्तिशाली बनाती है जिससे जिगर से संबन्धित रोग नहीं होते। 
  5. यह सर्दी, जुकाम, नजला, खांसी, दमा, कफ आदि रोगों में भी लाभकारी है।


loading...

Wednesday, December 28

यौगिक षट्कर्म - त्राटक




By-Dr. Kailash Dwivedi

योगशास्त्र में त्राटक के बारे में कहा गया है कि एकाग्र होकर पलकों को बिना झपकाए किसी सूक्ष्म वस्तु (छोटे वस्तु या बिन्दू) पर आंखो में आंसू आने तक ध्यान केन्द्रित करना और आंसू आने पर आंखों को बंद कर लेना त्राटक कहलाता है।
त्राटक,  ध्यान के अभ्यास की एक साधना है | इस क्रिया में  किसी वस्तु पर एकटक दृष्टि केन्द्रित कर मन को एकाग्र किया जाता है। त्राटक को हठयोग का ही एक अंग माना गया है। इसके अभ्यास से व्यक्ति में एकाग्रता में वृद्धि होती है एवं सम्मोहन शक्ति का जागरण होता है।

 विधि :

    त्राटक के अंतर्गत बिंदु पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए सफेद कागज पर एक रूपये के बराबर  आकर में गोल निशान बना लें। निशान का रंग काला या हरा होना चाहिए। या कमरे में कोई दीपक या मोमबत्ती जलाकर स्वयं से लगभग साढ़े चार हाथ की दूरी पर आंखों की बराबर ऊंचाई पर रखें। दीपक के लिए देशी घी का प्रयोग करें।
       अब नीचे आसन  बिछाकर पद्मासन या वज्रासन में बैठ जाएँ ।  शरीर को स्थिर रखते हुए अपनी दृष्टि को कागज पर बनाए गये निशान परअथवा  मोमबत्ती से निकलने वाली लौ (ज्योति) पर केन्द्रित करें। इस क्रिया में बिना पलक झपकाए तब तक उस पर दृष्टि रखे, जब तक आंखों में आंसू आने की स्थिति न बन जाए। आंखों में आंसू आने से पहले ही आंखों को बंद कर लें और अपनी दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर आंखों के पलकों को सहलाएं। इस तरह इस क्रिया को 15 मिनट तक करने के बाद आपको उस  बिंदु या दीपक की ज्योति  के आस-पास अनेक बिन्दुओं में किरणें नजर आने लगेगी। परंतु अपनी दृष्टि को पहले वाली ज्योति या बिंदु पर ही केन्द्रित रखें | कुछ देर तक एकाग्र होकर प्रकाश को देखते रहने के बाद पहले की तरह ही प्रकाश आ जायेगा। यह क्रिया तब होती है, जब दृष्टि एकाग्र कर जिस दिशा में रखी जाती है उस दिशा में प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देने लेगेगा।

सावधानियां

  • जिन्हें आँखों से सम्बंधित कोई गंभीर रोग हो उन्हें त्राटक नहीं करना चाहिए |
  • त्राटक का अभ्यास ब्रहामुहूर्त अथवा  मध्यरात्रि के समय करना चाहिए। 
  • त्राटक क्रिया को तब तक करें जब तक आंखों में जलन न होने लगे। 
  • इस क्रिया को शुरू-शुरू में एक बार ही करें। 
  • त्राटक के लिए कभी भी कैरोसिन तेल का प्रयोग न करें तथा बल्ब पर भी त्राटक क्रिया को न करें।
  • इस क्रिया को शांत स्थान पर करें और मन को एकाग्र करें। इसमें दीपक के लौ के अलावा किसी दूसरी वस्तु पर भी कर सकते हैं जैसे- आप अपने मन के अनुसार किसी बगीचे में शांत स्थान पर बैठकर फूल पर दृष्टि एकाग्र कर सकते हैं। इसमें सफलता मिलने के बाद चांदनी रात में चन्द्रमा पर अपनी दृष्टि केन्द्रित कर सकते हैं।

चिकित्सकीय लाभ 

  1. त्राटक से आंखों के विकार दूर होकर आंखों की रोशनी बढ़ती है। 
  2. इससे धारणा में लाभ मिलता है और मन स्थिर रहता है। इच्छा शक्ति बढ़ती है और प्राणवायु स्थिर रहती है। 
  3. त्राटक की पूर्ण सिद्धि होने के बाद यदि वह व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति को बढ़ाकर किसी व्यक्ति की आंखों से आंखों को मिलाकर देखें तो व सम्मोहित (हिप्नोटाइज) हो जाता है और जो भी कहता है वह करने को तैयार हो जाता है।

आध्यात्मिक लाभ :

  1.  हठयोग के षट्कर्म से कुण्डलिनी जागरण में सहायता मिलती है। 

loading...

Friday, April 17

षट्कर्म - धौति क्रिया

धौति का अर्थ होता है-धोना, यह  क्रिया हठयोग का एक अंग है। इस क्रिया में पेट को के द्वारा धोया जाता है। इसलिए इसे धौति क्रिया कहते हैं। यह हठयोग के 6 कर्मों में से सबसे अधिक महत्वपूर्ण कर्म है। धौति क्रिया कई प्रकार से की जाती है- वस्त्र धौति, दंत धौति, अग्निसार या वाहनीसर धौति, मूल धौति और जिव्हा शोधन धौति। वस्त्र धौति क्रिया के लिए एक मुलायम कपड़े की आवश्यकता पड़ती है, जिसकी लम्बाई 5 से 6 मीटर हो और चौड़ाई 2 से 3 इंच हो।
वस्त्र धौति क्रिया की विधि-
          इस क्रिया के लिए 5 से 6 मीटर लम्बा और 2 से 3 इंच चौड़ा साफ व स्वच्छ कपड़ा लें। इस कपड़े को अच्छी तरह से धोकर 5 मिनट तक पानी में डालकर उबालें और फिर सुखा लें। सूखने के बाद उस कपड़े की चार तह करके गोल लपेट लें। अब एक साफ बर्तन में उबले हुए नमक मिले पानी को डालें। फिर कागासन की स्थिति में बैठ जाएं और कपड़े को उस पानी में भिगो लें। अब कपड़े के ऊपरी सिरे को मध्यमा व अनामिका अंगुली के बीच में दबाकर मुंह के अन्दर डालकर धीरे-धीरे कपड़े को निगलें और साथ ही गर्म पानी का घूंट पीते रहें। इससे कपड़े को निगलने में आसानी होती है। शुरू-शुरू कपड़े को निगलना कठिन होता है, परन्तु प्रतिदिन अभ्यास से यह आसानी से होने लगता है। पहले दिन में 1 फुट कपड़ा निगलें और फिर धीरे-धीरे इसे बाहर निकाल लें। इस तरह से इस क्रिया में कपड़े को निगलने की लम्बाई बढ़ाते हुए 4 फुट तक कपड़े को निगल लें।
सावधानी-  

  • इस क्रिया का अभ्यास बहुत कठिन है। इसलिए इसका अभ्यास किसी योग शिक्षक की देख-रेख में ही करें। 
  • इस क्रिया में कपड़े को निगलना कठिन होता है। इसलिए इस क्रिया को धीरे-धीरे करें। 
  • कपड़ा निगलते समय सावधानी रखें, क्योंकि निकालते समय कभी-कभी कपड़ा अटक जाता है, परन्तु घबराएं नहीं कपड़े को पुन: अन्दर निगलें और फिर बाहर निकालें।

रोगों में लाभ-

  1.  इसके अभ्यास से शरीर से सभी रोग नष्ट हो जाते हैं तथा शरीर में असीम बल की वृद्धि होती है। 
  2. इस क्रिया के द्वारा शरीर से पित्त व कफ दोनों बाहर निकल जाते हैं। 
  3. इससे कंठमाला, मंदाग्नि थायराईड, मलेरिया, ज्वर आदि रोग ठीक होते हैं। 
  4. यह तोतलापन को दूर कर आवाज को साफ करता है। 
  5. दमे के रोग में भी लाभकारी है। इसके अभ्यास से खांसी, सांस संबन्धी रोग, जुकाम, मुंह के छाले तथा पित्त से उत्पन्न होने वाले सभी रोग ठीक होते हैं। 
  6. इसके अभ्यास से पेट साफ होता है, जिससे कब्ज, बदहजमी, गैस आदि विकार नष्ट होते हैं। 
  7. यह पाचनशक्ति को शक्तिशाली बनाता है। इससे श्वासनली, नाक, कान, आंख, पेट व आंतों की अच्छी सफाई हो जाती है। 
  8. यह मानसिक बीमारियों को खत्म करता है। 
  9. बवासीर, भगंदर आदि रोगों को ठीक करने में भी यह क्रिया  लाभकारी  है। हठयोग के अनुसार इस क्रिया को करने से कास, श्वास, प्लीहा, कुष्ठ तथा 20 प्रकार के कफ से उत्पन्न होने वाले रोग ठीक हो जाते हैं।


षट्कर्म – सूत्र नेति

सूत्र नेति की विधि
सूत्र नेति के लिए डेढ़ फुट लम्बा और सवा इंच चौड़ा मलमल का टुकड़ा लें। इसके बाद इस मलमल के कपड़े को बीच से आधी लम्बाई तक फाड़कर रस्सी की तरह बना लें। फिर एक छोटी कटोरी में मधुमक्खी के छते से बने शुद्ध मोम को पिघलाकर उसमें रस्सी को डाल दें। इसे बाहर निकाल कर हाथों से रगड़कर चिकना बना लें, ताकि रस्सी के किसी भी स्थान पर अधिक या कम मोम जमा न रहें। रस्सी चिकनी हो जाने के बाद उसके एक भाग को अंगुलियों से रगड़कर पतला बना लें जैसे सुई में डालने के लिए धागे की नोक को पतला बनाया जाता है। अब इस नोक वाले भाग को घुमाकर अर्ध चन्द्राकर बनाएं। इसके बाद कागासन में बैठकर पतले किए हुए भाग को नाक के एक छिद्र में धीरे-धीरे डालें और सांस अन्दर की ओर खींचें। इससे धागा मुंह में आ जायेगा। इसे अंगुलियों से पकड़कर धीरे-धीरे बाहर निकाल लें। फिर इसे नाक के दूसरे छिद्र में डालें और मुंह से बाहर निकालें। इस क्रिया को नाक के दोनों छिद्रों से 20 से 40 बार करें।
यदि घर के कपड़े से सही सूत्र तैयार न कर सके तो घर में कच्चे सूत के धागे से इसे बनाएं। इसके लिए कच्चे सूत का मुलायम व बिना गांठ वाला तथा बांटा हुआ डेढ़ से 2 फुट का धागा लें। जिसकी मोटाई इतनी हो जिसे आसानी से नासिका छिद्र (नाक के छेद) में घुसाकर मुंह से बाहर निकाला जा सके। इस धागे को गर्म पानी में डुबोकर बंटे हुए भाग को आगे से अर्धचन्दाकार बना लें। अब कागासन में बैठकर धागे के एक सिरे को पकड़ कर रखें और दूसरे सिरे को अंगुलियों से रगड़कर नुकीला बना लें। इसके बाद उसे श्वास चल रहें छिद्र में डालें और लम्बी सांस खींचें। इससे धागा नासिका छिद्र से होकर मुख में आ जायेगा। फिर अंगुलियों को मुख में डालकर धागे को पकड़कर धीरे-धीरे बाहर खींच लें। फिर धागे को दूसरे नासिका छिद्र से डालें और मुंह से बाहर निकाल लें। इसी प्रकार दोनों नाक से इस क्रिया को 20 से 40 बार करें। आखिरी में धागे को एक छिद्र से डालकर दूसरे छिद्र से निकालें। इस क्रिया को सप्ताह में 2 से 3 बार करें तथा जिसकी आंखें कमजोर है उसे यह क्रिया 2 से 3 महिने में करना चाहिए।
सावधानी

  1. इस क्रिया को करना अधिक कठिन है, इसलिए इस क्रिया के अभ्यास से पहले रबड़ नेति करें जिसमें रबड़ का बना हुआ सूत्र होता है। 
  2. इस क्रिया को प्रारंभ में किसी योग शिक्षक की देख-रेख में करें। इस क्रिया को जल्दबाजी में करने से नासिका को हानि हो सकती है। 
  3. पहली बार सूत्र नेति करने से पहले रात को नाक के दोनों छिद्रों में शुद्ध घी की कुछ बूंदे डालें।

रोगों में लाभ
यह क्रिया नाक की नली को साफ करती है तथा नाक व कंठ के अन्दर की गंदगी को भी दूर करती है। यह कपाल को शुद्ध करती है | सिरदर्द, सायनस,नजला रोग में विशेष लाभदायक  है |

योग चिकित्सा –षट्कर्म

योग साधना की सभी क्रियाओं का अपना-अपना महत्व है। परंतु षट्कर्मो का अपना अलग ही महत्त्व है। योगाभ्यास में सफलता के लिए षट्कर्म के द्वारा शरीर को साफ व शुद्ध करना आवश्यक है। इसके अभ्यास के बिना यदि कोई व्यक्ति योगाभ्यास करता है, तो उसे योग में सफलता प्राप्त करने में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
षट्कर्म क्या है?
  शरीर से विषयुक्त दूषित तत्वों को निकालकर साफ करने की जो विधि योग क्रियाओं में बताई गई है, उसे षट्कर्म कहते हैं। यह निम्नलिखित छः क्रियायें होती हैं –
1. नेति 
2. धौति
3. वस्ति
4. कुंजल 
5. नौलि 
6. त्राटक 

 1-नेति क्रिया 
प्रमुख रूप से नेति दो प्रकार की होती है – जल नेति एवं सूत्र नेति | यहाँ हम जल नेति का वर्णन कर रहे हैं |

जलनेति के लिए एक लम्बी टोटी (नली) लगे लोटे या बर्तन की आवश्यकता होती है। इस तरह का बर्तन आसानी से मिल जाता है।
जलनेति की विधि
जलनेति की क्रिया के लिए नमक मिले पानी को गर्म करके हल्का गुनगुना कर लें। फिर टोटी वाले बर्तन या लोटे में नमक मिले पानी को भर लें। अब नीचे बैठ कर लोटे की टोटी को उस नाक के छिद्र में लगाएं, जिससे सांस चल रही हो और मुंह खोलकर रखें। इसके बाद टोटी लगे छिद्र वाले भाग को हल्का सा ऊपर उठाकर रखें और पानी को नाक में डालें। इससे पानी नाक के दूसरे छिद्र से बाहर निकलने लगेगा। जब लोटे का सारा पानी खत्म हो जाए तो टोंटी को नाक के छिद्र से निकालें और फिर उस लोटे में पानी भरकर इस क्रिया को नाक के दूसरे छिद्र से भी करें। ध्यान रखें कि नाक में पानी डालते समय मुंह को खोलकर रखें और मुंह से ही सांस लें और छोड़ें। इस क्रिया के पूर्ण होने के बाद कपालभांति या भस्त्रिका प्राणायाम करें। (इस क्रिया के लिए पहले सीधे खड़े हो जाएं। फिर दोनों पैरों के बीच डेढ़ से दो फुट की दूरी रखते हुए कमर से शरीर को आगे की ओर झुकाकर रखें और हाथों को पीछे ले जाकर दाएं हाथ से बाएं हाथ की कलाई को पकड़ लें। इसके बाद तेज गति से रेचक व पूरक करें अर्थात सांस लें और छोडे़, साथ ही गर्दन को दाएं-बाएं तथा ऊपर-नीचे करते रहें। इस क्रिया में सांस लेने व छोड़ने की क्रिया को जितना तेज करना सम्भव हो करें। इस क्रिया को 20 से 25 बार करें )
जलनेति करते समय सावधानी रखें और इस क्रिया में पानी को पूर्ण रूप से बाहर निकलने दें क्योंकि पानी अन्दर रहने पर जुकाम या सिर दर्द हो सकता है। इस लिए जलनेति को किसी जानकर की देख-रेख में करें और जलनेति के बाद कपालभांति या भस्त्रिका प्राणायाम जरूर करें।
जलनेति से रोगों में लाभ

  1. इस क्रिया से नाक व गले की गंदगी साफ हो जाती है तथा यह गले व नाक से संबन्धी रोगों को खत्म करता है। 
  2. इससे सर्दी, खांसी, जुकाम, नजला, सिर दर्द आदि रोग दूर होते हैं। यह आंखों की बीमारी, कान का बहना, कम सुनना आदि कान के सभी रोग तथा पागलपन के लिए लाभकारी है। 
  3. इससे अनिद्रा, अतिनिद्रा, बालों का पकना तथा बालों का झड़ना आदि रोग दूर होते हैं। 
  4. इससे मस्तिष्क साफ होता है और तनाव मुक्त रहता है, जिससे मस्तिष्क जागृत होकर बुद्धि व विवेक को विकसित करता है।