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Thursday, March 23

स्वस्थ जीवनशैली के लिए कुछ टिप्स



  • प्रातः 1-2 गिलास गुनगुना पानी पियें एवं शौच के बाद कम से कम १२ चक्र सूर्य नमस्कार अवश्य करें |
  • नाश्ते में अंकुरित गेहूं को शामिल करें यह विटामिन ई का अच्छा स्रोत है एवं फाईबर की मात्रा अधिक होने से कब्ज को भी दूर रखता है,साथ में अन्य अंकुरित अन्न भी ले सकते हैं |
  • प्रात:कालीन सैर पर अवश्य जाएँ जाएं लेकिन इस दौरान अपनी साधारण चाल से दोगुना तेज चलें.यह आपकी कैलोरी को जलाएगी और स्वस्थ बने रहने में मदद करेगी।
  • कार्यालय में कुर्सी पर बैठे हुए भी आप कसरत कर सकते हैं.मांसपेशियों को खींचते हुए अपनी जंघाओं को हल्के से उठाएं और उसके बाद वापस नीचे रखें.ऐसा करते समय आपके पैर जमीन से दो इंच ऊपर हों । यह शरीर को तत्काल रिलैक्स करने की क्रिया है |
  • शरीर को क्रियाशील रखने वाले कार्य करने से न चूकें | कोशिश करें लिफ्ट और स्वचालित सीढ़ियों का प्रयोग न करें | सीढ़ियों से चलें, आपका कार्यालय यदि 20वीं मंजिल पर हो तो 18वीं मंजिल के बाद सीढ़ियों से जाएं।
  • आमाशय में भोजन का पाचन लगभग 4 घंटे तक होता रहता है | इस बीच यदि कुछ अन्य खाने से अपच,एसिडिटी आदि पाचन तंत्र से सम्बंधित समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं, अतः खाने के 4 घंटे के बाद पानी के अतिरिक्त अन्य कुछ न खाएं पियें 7. सर्दी में दिनभर में कम से कम डेढ़ से दो  लिटर पानी अवश्य पियें | गुनगुना पानी पीना लाभदायक है, यह शरीर से विष निकालने में मदद करता है |
  • यदि समय से पहले वृद्ध नही होना चाहते हैं तो रात्रि 11 बजे तक अवश्य सो जाएँ एवं प्रातः 5-6 बजे तक बिस्तर छोड़ दें |



Saturday, February 25

कमर दर्द : कारण और घरेलू उपचार



By- Dr. Kailash Dwivedi

कारण :

  1. हमेशा ऊंची एड़ी के जूते या सेंडिल पहनना।
  2. मांसपेशियों पर अत्यधिक तनाव।
  3. गलत तरीके से अधिक वजन।
  4. गलत तरीके से बैठना।

उपचार :

  1. रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन-चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियां काली न हो जायें) गर्म कर लें। ठंडा होने पर इस तेल से कमर की मालिश करें।
  2. नमक मिले गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। इसके बाद पेट के बल लेट जाएं। दर्द के स्थान पर तौलिये से भाप लें। कमर दर्द से राहत पहुंचाने का यह एक अचूक उपाय है।
  3. कढ़ाई में दो-तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। इस नमक को थोड़े मोटे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। कमर पर इस पोटली से सेक करने से भी दर्द से आराम मिलता है।
  4. अजवाइन को तवे के पर थोड़ी धीमी आंच पर सेंक लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चबाते हुए निगल जाएं। इसके नियमित सेवन से कमर दर्द में लाभ मिलता है।
  5. अधिक देर तक एक ही पोजीशन में बैठकर काम न करें। हर चालीस मिनट में अपनी कुर्सी से उठकर थोड़ी देर टहल लें।
  6. नर्म गद्देदार सीटों से परहेज करना चाहिए। कमर दर्द के रोगियों को थोड़ा सख्ते बिस्तर बिछाकर सोना चाहिए।
  7. योग भी कमर दर्द में लाभ पहुंचाता है। भुजंगासन, शलभासन, हलासन, उत्तानपादासन, शवासन आदि कुछ ऐसे योगासन हैं जो की कमर दर्द में काफी लाभ पहुंचाते हैं। कमर दर्द के योगासनों को योगगुरु की देख रेख में ही करने चाहिए।
  8. कैल्शियम की कम मात्रा से भी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, इसलिए कैल्शियमयुक्त चीजों का सेवन करें।
  9. कमर दर्द के लिए व्यायाम भी करना चाहिए। सैर करना, तैरना या साइकिल चलाना सुरक्षित व्यायाम हैं। तैराकी जहां वजन तो कम करती है, वहीं यह कमर के लिए भी लाभकारी है। साइकिल चलाते समय कमर सीधी रखनी चाहिए। व्यायाम करने से मांसपेशियों को ताकत मिलेगी तथा वजन भी नहीं बढ़ेगा।
  10. कमर दर्द में भारी वजन उठाते समय या जमीन से किसी भी चीज को उठाते समय कमर के बल ना झुकें बल्कि पहले घुटने मोड़कर नीचे झुकें और जब हाथ नीचे वस्तु तक पहुंच जाए तो उसे उठाकर घुटने को सीधा करते हुए खड़े हो जाएं।
  11. कार चलाते वक्त सीट सख्त होनी चाहिए, बैठने का पोश्चर भी सही रखें और कार ड्राइव करते समय सीट बेल्ट टाइट कर लें।
  12. ऑफिस में काम करते समय कभी भी पीठ के सहारे न बैठें। अपनी पीठ को कुर्सी पर इस तरह टिकाएं कि यह हमेशा सीधी रहे। गर्दन को सीधा रखने के लिए कुर्सी में पीछे की ओर मोटा तौलिया मोड़ कर लगाया जा सकता है।
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Tuesday, February 21

जानिए, गंजेपन के कारण एवं इससे बचने के उपाय !



By- Dr. Kailash Dwivedi
WHO (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन)  की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 100 वर्षों में गंजापन सबसे तेजी से फैला है |  इसका सबसे बड़ा कारण बालों की सही ढंग से देखभाल न करना है |  फलस्वरूप हेयर फॉल, ड्राय हेयर और डैंड्रफ जैसी समस्यायों का सामना करना पड़ता है। इस आलेख में जानें वे कारण जो मुख्यतः गंजापन का कारण बन रहे हैं |

संतुलित आहार :


गंजापन के प्रमुख कारणों में संतुलित आहार न लेना है | अनाप-शनाप भोजन से से बाल झड़ना, ड्राय एवं बालों का दो मुंहा होने की प्रॉब्लम होने लगती हैं। हरी पत्तेदार सब्ज़ियां एवं मौसम के फल इन समस्यायों को रोकने में मददगार साबित होते हैं | ध्यान रहे कि भोजन में विटामिन B-12 और विटामिन C को आवश्यक रूप से शामिल करें।

बालों में ज्यादा हीट देना :


बालों को सुखाने के लिए आवश्यकता से अधिक हीट देने पर बाल डैमेज होने और झड़ने लगते हैं। इससे बालों का प्राकृतिक रंग भी प्रभावित होता है | इस समस्या से बचने के लिए बालों को स्ट्रेट करने के लिए जिस मशीन का प्रयोग किया जाता है उसे सही तापमान पर सेट करना चाहिए।

बालों में तेल लगाकर सोना :

रात्रि में बालों में तेल लगाकर सोने से बालों के टूटने और डस्ट लगने की समस्या होने लगती है। अतः गंजेपन से बचने के लिए नहाने के एक घंटे पहले ही बालों में तेल लगाना चाहिए। एवं नियमित रूप से बालों की मसाजभी करनी चाहिए |

गीले बालों रगड़ना एवं बांधना  :


गीले बालों की जड़ों में नमी होती है। इसलिए गीले बालों को बाँधने से यह टूटने लगते है | गीले बालों को तौलिया से ज्यादा रगडने से भी यह टूटने लगते हैं। इसलिए पहले बालों को हवा में सुखाएं इसके बाद ही हल्के हाथों से पोछें।

प्रतिदिन शैम्पू करना :


प्रतिदिन बालों में शैम्पू करने से बाल कमजोर होने लगते हैं |फलस्वरूप यह आसानी से टूटने लगते हैं। अतः गंजेपन से बचने के लिए ध्यान रखें कि प्रतिदिन बालों को शैम्पू न करें |


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Wednesday, February 15

मोटापा कम करने के कुछ घरेलू उपाय



वजन कम करना और चर्बी को गला देना दोनों ही अलग अलग बातें हैं। आज कल हम तरह तरह के जंक फूड खाते रहते हैं, जिनमें खाद्य पदार्थ और पोषण के नाम पर कुछ भी नहीं होता, लेकिन हां, इससे फैट खूब मिल जाता है। यही फैट आपके शरीर में जम जाता है जो कई दिनों तक रहने से विष का रूप ले लेता है।

कुछ घरेलू उपायों से आप इस चर्बी तथा टॉक्‍सिन को अपने शरीर से निकाल सकते हैं। जब आप शरीर से इस फैट को निकालेगें तो आपके शरीर की सफाई भी होगी, जिससे पेट साफ रहेगा और त्‍वचा दमकने लगेगी। यह घरेलू उपचार हैं, जिनका कोई साइड इफेक्‍ट नहीं होगा और मोटापा भी अलग से दूर होगा।

आप इन पेय को अपने घर पर ही बना सकते हैं। यह घरेलू पेय अभी से नहीं बल्कि कई दशको से अलग-अलग देशों में प्रयोग किये जाते आ रहे हैं। तो आइये देखते हैं कौन से हैं वे पेय जो शरीर से फैट को गला देते हैं।

नींबू, शहद और गरम पानी :

रोज सुबह खाली पेट इसे पीने से आपको पेट सही रहेगा, स्‍किन साफ रहेगी और मोटापा भी दूर रहेगा।

ग्रीन टी :

ग्रीन टी में एंटीऑक्‍सीडेंट होता है जो कि झुर्रियों को दूर रखती है। अगर आपको अपना मोटापा घटाना है तो ग्रीन टी को बिना चीनी मिलाए पियें।

लौकी जूस :

यह एक पौष्टिक सब्‍जी है। इसे पीने से पेट भर जाता है, इसमें फाइबर होता है और यह पेट को ठंडक पहुंचाती है। लौकी का जूस पीने से घंटो तक पेट भरा रहता है और मोटापा भी कंट्रोल होता है।

धनिया जूस :

इस जूस को पीने से किडनी सही रहती है और मोटापा भी कंट्रोल रहता है। इसे पीने से पेट देर तक भरा रहता है और यह शरीर की शुद्धि करता है।
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Friday, February 10

यदि डिप्रैशन की चपेट में आ रहे हैं तो इसे करें !




By- Dr. Kailash Dwivedi

हमारा मष्तिस्क जो सम्पूर्ण  शरीर का नियंत्रण करता है करोड़ों छोटी-छोटी कोशिकाओं का बना है, उन्हें न्यूरोन्स कहा जाता है |  एक न्यूरोन दूसरे न्यूरोन्स से संपर्क कुछ खास पदार्थों के जरिए करता है, इन पदार्थों को न्यूरोट्रांसमीटर कहा जाता है | दिमाग में कुछ ऐसे न्यूरोट्रांसमीटर हैं जिनकी मात्रा में बदलाव आने से डिप्रैशन हो जाता है |  समय के साथ डिप्रैशन बढ़ने से दिमाग की कोशिकाओं में ऐसे बदलाव आ जाते हैं, जिनसे रोगी के मन में स्वयं को खत्म करने के विचार आने लगते हैं |

डिप्रैशन के लक्षण :

  • यदि आप सो नहीं पाते हैं अथवा ज्यादा सोने लगते हैं
  • किसी भी चीज पर उतना ध्यान नहीं लगा पाते जो कि आप पहले आसानी से कर पाते थे
  • उदास व निराश रहते हैं, प्रयास करने के बाबजूद भी अपने मन से नकारात्मकता को निकाल नहीं पा रहे हैं 
  • भूख नहीं लगती या जरूरत से ज्यादा खाने लगे हैं
  • जरूरत से ज्यादा परेशान, गुस्सैल या चिड़चिड़े रहने लगे हैं |
  • शराब या धूम्रपान करने लगे हैं, या ऐसी किसी गतिविधि में शामिल हो रहे हैं जो कि आप जानते हैं कि वह गलत है
  • मन में यह विचार आते हों कि जीवन जीने का कोई फायदा नहीं है
यदि उपर्युक्त लक्षण उत्पन्न हो रहे हों तो सावधान हो जाएँ | यह डिप्रैशन हो सकता है | डिप्रैशन अधिकतर  25 से 45 वर्ष की उम्र के लोग को प्रभावित करता है | परंतु बच्चों एवं वृद्धावस्था में भी यह बीमारी हो सकती है | पुरुषों की तुलना में महिलाओं में डिप्रैशन 2-3 गुना ज्यादा पाया जाता है | डिप्रैशन समाज के हर वर्ग को प्रभावित करता है | यह सोचना गलत है कि जिन लोगों के पास जिन्दगी के सब ऐशो-आराम हैं उन लोगों को डिप्रैशन नहीं हो सकता |

बच्चों में डिप्रैशन के लक्षण : 

चिड़चिड़ापन, कहना न मानना, पढ़ाई में ध्यान न देना, स्कूल न जाने के बहाने बनाना |

डिप्रैशन की चिकित्सा :

बदलती जीवनशैली, तनावमुक्त वातावरण और प्रदूषित पर्यावरण की वजह से भी अवसाद के मामले निरंतर बढ़ रहे हैं। योग में अवसाद के उपचार के लिए ब्रह्म मुद्रा आसन बहुत कारगर योगासन है। इसके नियमित अभ्यास से आपको न सिर्फ अवसाद से मुक्ति मिलती है बल्कि कई मानसिक व शारीरिक समस्याओं का भी निदान होता है।

आराम की मुद्रा में बैठ जाएँ. सर्वप्रथम श्वांसों को गहराई से छोड़ने का प्रयास करें । केवल सांसों को गहरा-गहरा लें और छोड़ें। इस प्रक्रिया में शरीर की दूषित वायु निष्कासित होती है और तन- मन प्रफुल्लित रहतें हैं ।

ब्रह्म मुद्रा करने की विधि :

  • पद्मासन,वज्रासन,सिद्धासन या पालथी लगाकर बैठ जाएँ 
  • गर्दन को  श्वास भरते हुए धीरे-धीरे दाईं ओर ले जाएं। कुछ देर रुकें फिर श्वास छोड़ते हुए गर्दन को सामान्य स्थिति में ले आयें | पुनः श्वास भरते हुए गर्दन को बाईं ओर ले जाएं एवं श्वास छोड़ते हुए सामान्य स्थिति में लायें | यह एक चक्र हुआ | इस प्रकार कम से कम 5 चक्र करें |
  • सिर को 3-4 बार क्लॉकवाइज (घडी की सुई की दिशा में) और उतनी ही बार एंटी क्लॉकवाइज घुमाएं।

सूर्य अनुलोम-विलोम प्राणायाम

विधि :
पद्मासन अथवा सुखासन में बैठकर बायें नथुने को बंद करें और दायें नथुने से धीरे- धीरे अधिक से अधिक गहरा श्वास भरें। श्वास लेते समय आवाज न हो इसका ख्याल रखें। अब अपनी क्षमता के अनुसार श्वास भीतर ही रोक रखें। (कुंभक की यह अवधि कुछ दिनों के अभ्यास से धीरे धीरे एक डेढ़ मिनट तक बढ़ायी जा सकती है।) जब श्वास न रोक सकें तब दायें नथुने से ही धीरे धीरे बाहर छोड़ें। झटके से न छोड़ें। इस प्रकार 9 से 27 प्राणायाम करें।

घरेलू नुस्खे :

इलायची -  इलायची के पिसे हुए बीज को पानी के साथ उबाल कर या चाय के साथ लिया जा सकता है।
काजू -   विटामिन बी की मात्रा अधिक होने के कारण काजू हमारे स्वाद और तंत्रिका तंत्र को ठीक रखता है।
सेब -  सेब खाने से डिप्रेशन दूर रहता है क्योंकि सेब में विटामिन बी ,फास्फोरस और पोटैशियम होते हैं जिनसे कि ग्लूटामिक एसिड का निर्माण होता है।


अवसाद की स्थिति में यह ध्यान रखें :

  • महत्वपूर्ण निर्णयों को टालें जैसे कि शादी करना या तलाक से संबंधित बातें या नौकरी बदलना |
  • अपने निर्णयों को अपने उन शुभचिंतकों के साथ बाटें, जो आपको भलीभांति जानते हों और आपकी स्थिति का सही आकलन करें |
  • बड़े बड़े कार्यों को छोटे छोटे हिस्सों में बांटे, कुछ काम की प्राथमिकताएं निर्धारित करें और ऐसा कार्य करें, जिसे संपन्न करने की आपमें पूर्ण क्षमता हो |
  • अन्य लोगों के साथ समय बिताएं और किसी भरोसेमंद मित्र या रिश्तेदार के साथ अपनी गुप्त बातों को बताएं |अपने आपको सबसे अलग थलग करने की कोशिश न करें और दूसरों को आपकी मदद करने दें |
  • खुद को हल्के फुल्के कार्यों में या व्यायाम में व्यस्त रखें , ऐसे कार्य करें, जिसमे आपको आनंद मिले | जैसे कि फिल्म देखना, बाल्गेम खेलना |
  •  सामाजिक, धार्मिक या अन्य कार्यकमों में हिस्सा लें |
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Thursday, February 9

इस साधारण से प्रयोग से हिलते दांत हो जायेंगे मजबूत !



यह एक ऐसा प्रयोग है जिसमे किसी औषधि की आवश्यकता नहीं होती है | इसको आप स्वयं बड़ी आसानी से कर सकते हैं | आईये जानते हैं इस प्रयोग की विधि -

जब भी मूत्र त्याग करें तब ऊपर-नीचे के दांतों को आपस में भींचकर रखें | इतने मात्र से ही मसूड़ों में रक्तसंचार बढ़ने लगेगा जिससे दांतों की कमजोरी दूर होने के साथ-साथ कई रोगों में लाभ मिलगा |
  • इससे दांतों का पायरिया,खून या पीप आना, दांतों का हिलना बहुत शीघ्र बन्द हो जाता है। 
  • हिलते दांत आश्चर्यजनक रूप से दृढ़ हो जाते हैं |
  • इस प्रयोग को करने से मुंह का लकवा मारने का डर नहीं रहता। 


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Wednesday, February 8

स्वस्थ्य रहने के लिए इन बातों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें




By- Dr. Kailash Dwivedi
  • प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त (4-6 बजे ) के मध्य अर्थात सूर्योदय से पूर्व बिस्तर छोड़ दें।
  • सुबह दंतधावन एवं शौचादि से पूर्व तांबे के लोटे में रात्रि को रखा पानी पीयें,इससे मल खुलकर आता है तथा कब्ज की शिकायत नहीं होती है।
  • नाश्ता या भोजन हमेशा भूख से थोड़ा कम करें तथा योग्य आहार का ही सेवन करें तथा भोजन के साथ - साथ पानी पीने क़ी प्रवृति से बचें।
  • दिनचर्या में जानबूझकर,अनजाने में या असयंमित होकर किये गए आचरण को प्रज्ञापराध की श्रेणी में रखा जाता है,इससे से बचें क्योंकि यह सभी प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों का कारण है।
  • आहार स्वयं एक औषधि है,अत:ज्ञानेन्द्रिय को वश में करते हुए ही भोजन सहित अन्य आचरण करना स्वस्थ रहने में मददगार होता है।
  • आयुर्वेद के अनुसार शुद्ध जल एवं वायु का सेवन रोगों से मुक्ति का मार्ग है।
  • भोजन में गाय के दूध का सेवन आयुर्वेद में जीवनीय माना गया है तथा यह स्वयं में एक रसायन औषधि है जिसके नित्य सेवन से बुढापा देर से आता है।
  • एक हरड का नित्य सेवन लम्बी आयु देता है,कहा भी गया है की मां कभी नाराज हो सकती है परन्तु हरड़ नहीं।
  • साल में एक बार शरीर रूपी मशीन का शोधन प्राकृतिक चिकित्सक के निर्देश में अवश्य करवाएं, जिससे लम्बी एवं रोगरहित आयु प्राप्त होती है।
  • रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के लिए आंवले का सेवन नित्य करें।
  • घी का नियंत्रित मात्रा में प्रयोग करें।

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Tuesday, February 7

हमारा मन एक श्रेष्ठ चिकित्सक है !


                                    - डॉ.कैलाश द्विवेदी

हमारा शरीर ब्रह्माण्ड में व्याप्त पाँच तत्वों आकाश,वायु,अग्नि,जल एवं पृथ्वी से बना है | कहा गया है - “यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे” अर्थात जो ब्रह्माण्ड में है वह सब इस पिंड (शरीर) में व्याप्त है |
पंच महाभूत प्राकृतिक चिकित्सा के साधन हैं इन पंच्च्तत्वों का मूल आधार महत्तत्व होता है ।  पञ्चतत्वों को रोगनिवारक शक्ति महत्तत्व से ही प्राप्त होती है | प्रत्येक प्राणी के अन्दर आरोग्य प्रदान करने वाली एक शक्ति होती है जो उसे स्वस्थ्य रखती है । प्रकृति के विरुद्ध आचरण के फलस्वरूप जब व्यक्ति के शरीर में विजातीय द्रव्यों की मात्रा बढ़ जाती है तब आंतरिक शक्ति शरीर को स्वच्छ और निरोग बनाने के लिए तीव्र रोगों की उत्पत्ति करती है, तथा उन रोगों को नष्ट भी करती है । इस शक्ति को सभी लोग अलग-अलग नामों जैसे - शक्ति, परमात्मा, अंतरात्मा तथा कोई राम,अल्लाह आदि कहकर पुकारते है । सम्पूर्ण निरोगता के लिए यह आवश्यक है कि रोगी व्यक्ति के मन, आत्मा तथा शरीर तीनो का शुद्धिकरण किया जाये | जिस व्यक्ति का मन, आत्मा तथा शरीर तीनों निरोग होगा वही व्यक्ति निरोगी हो सकेगा। प्राकृतिक चिकित्सा के उपचार में सबसे समर्थ उपचार अपने इष्ट की स्तुति, सदाचार एवं सद्विचार है, यह सभी रोगों को रोकने का सबसे प्रभावी,सरल व सुलभ उपाय है । क्योंकि विचार शक्ति का शरीर पर विचारों के अनुसार अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है, रोगी होने पर व्यक्ति संशयग्रस्त हो जाता है जिससे भले ही वास्तविकता कुछ और ही हो परन्तु मन में रोग की भयानकता प्रगट होने लगती है | मन जब किसी विचार को स्वीकार कर लेता है तब शरीर उसी के अनुसार बनने लगता है इसीलिए निरोग होने के लिए सर्वप्रथम ईश् प्रार्थना पर जोर दिया जाता है, क्योंकि लिस क्षण मनुष्य अपने ईश के प्रति सच्चे मन से प्रार्थना करता है उस क्षण शरीर पर से नकारात्मक विचारों का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है ।

                शब्द, सदाचार, सद्विचार जैसे गुणों को शक्ति तो महत्तत्व से मिलती है परन्तु यह कारक हैं आकाश तत्व के आकाश तत्व पंचतत्वों में सबसे अधिक उपयोगी एवं प्रथम तत्व है जिस प्रकार महत्तत्व निराकार किन्तु सत्य है उसी प्रकार आकाश तत्व निराकार भी है और सत्य भी है महत्तत्व अविनाशी है उसी प्रकार आकाश तत्व का भी कभी नाश नही होता | आकाश विशुद्ध तथा निर्विकार होता है इसीलिए हमें इस तत्व से विशुद्धता एवं निर्मलता की प्राप्ति होती है | जो शक्ति हमें महत्तत्व अथवा आकाशतत्व से मिलती है वह अमोघ होती है एवं आत्मिक मानसिक तथा शारीरिक तीनों प्रकार के स्वास्थ्य को उन्नत बनाने वाली होती है |

पंचतत्वो में अन्य चार तत्व – वायु,अग्नि,जल तथा पृथ्वी को आकाश तत्व से शक्ति मिलती है अन्य चारों तत्व आकाश तत्व के साथ मिलकर शरीर में अपना कार्य करते हैं | शरीर में आकाश तत्व के विशेष स्थान सिर, कण्ठ, हृदय, उदर एवं कटिप्रदेश है | मस्तिष्क में स्थित आकाश वायु का भाग जो प्राण का मुख्य स्थान है | हृदयदेशगत तेज का भाग है जो पित्त का मुख्य स्थान है, इससे अन्य का पाचन होता है | उदर देशगत आकाश जल का भाग है इससे सब प्रकार की मल विसर्जन क्रिया सम्भव होती है | कटि देशगत आकाश पृथ्वी का भाग है यह अधिक स्थूल होता है और गन्ध का आश्रय है | इन सब में जो सर्वोच्च आश्रय है वह है मस्तिष्क में स्थित आकाश तत्व का भाग | इसी के कारण व्यक्ति में सोचने की क्षमता उत्पन्न होती है।

 सम्पूर्ण स्वास्थ्य का अर्थ 

आप- आर्क्सफोर्ड डिक्शनरी में ‘हेल्थ’ के शाब्दिक अर्थ से समझ सकते हैं इसके अनुसार “शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा से पुष्ट होना- ‘हेल्थ’ है। सम्पूर्ण स्वास्थ्य को ठीक बनाये रहने में अनेकों कारण गिनाये जा सकते हैं पर सबसे प्रमुख कारण है- व्यक्ति की मानसिक स्थिति । प्रसन्नचित्त, उत्साही एवं आशावादी लोग अनेक बाधाओं के होते हुए भी निरोग बने रहते हैं। मनोबल के कारण ऐसे व्यक्तियों के नाड़ी संस्थान में एक प्रचण्ड विद्युत प्रवाह का संचार होता रहता है जो शरीर के प्रत्येक अंग को रोगों से लड़ने की सामर्थ्य प्रदान करता रहता है |
        कोई भी शारीरिक रोग प्रकट होने पर व्यक्ति के मन में भी विचारों द्वारा निर्मित अनेक काल्पनिक  रोग उत्पन्न होते रहते है | इनका उतना ही भयंकर प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है जितना कि क्षय,कैंसर जैसे घातक रोगों का ।

       मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सा शास्त्रियों का कहना है वास्तव में रोगियों में ऐसे व्यक्तियों संख्या बहुत कम होती हैं, जो वास्तव में किसी रोग से पीड़ित हों । अधिकांश ऐसे व्यक्ति होते हैं जो किसी न किसी काल्पनिक रोग के शिकार होते हैं । सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति में विचारों का अत्यधिक महत्व है । जो व्यक्ति स्वयं के प्रति रोगी, शक्तिहीन और असमर्थ होने का भाव रखते हैं और सोचते रहते हैं कि उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, उनको कोई रोग नहीं भी होता है तो भी इन नकारात्मक विचारों के फलस्वरूप कोई न कोई रोग उत्पन्न हो जाता है और वे वास्तव में रोगी बन जाते । इसके विपरीत जो स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक विचार रखते हैं, वे रोगी होने पर भी शीघ्र स्वस्थ्य हो जाते हैं।  औषधियों तथा तरह- तरह की जड़ी- बूटियों का उपयोग कोई स्थाई लाभ नहीं करता, उनसे रोग के बाह्य लक्षण दब भर जाते हैं, रोग का मूल कारण नष्ट नहीं होता । सच बात तो यह है कि सम्पूर्ण स्वास्थ्य की  प्राप्ति का प्रभावशाली उपाय आन्तरिक स्थिति का अनुकूल प्रयोग ही है । व्यक्ति की  जीवनी शक्ति उसकी मनोदशाओं के अनुसार बढ़ती- घटती रहती है । यह शक्ति आरोग्य का आधार है, यदि रोगी के लिए ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जाय कि उसे अपने रोग के विषय में नकारात्मक सोचने का मौका ही न मिले, वह अधिक से अधिक प्रसन्न तथा उल्लसित रहने लगे, तो उसकी जीवनी- शक्ति बढ़ जाती फलस्वरूप रोग निवारण प्रारंभ हो जाता है ।

       शरीर पर मस्तिष्क का पूर्ण नियंत्रण होता है एनेस्थीसिया देकर जब मस्तिष्क को संज्ञा शून्य कर दिया जाता है तब शरीर में आंतरिक अवयवों के सक्रिय रहते हुए भी शरीर मुर्दे की तरह हो जाता है | इसी तरह से पागल,नशेड़ी,मानसिक विकारों से ग्रस्त व्यक्तियों को भी देखा जा सकता है, इन सब का शरीर ठीक- ठाक होते हुए भी सिर्फ मस्तिष्क के असंतुलित होने के कारण ही तो उपहास या दया के पात्र बनना पड़ता हैं | इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि भले ही शरीर में श्वसन,रक्तसंचरण,पाचन,आत्मसातीकरण,उत्सर्जन  आदि क्रियायों का महत्व है परन्तु सर्वाधिक महत्व मस्तिष्क की चेतना प्रवाह क्रिया का ही है।

आरोग्यता के लिए मनःशक्ति का प्रयोग :

मन जो विचार करता है ,बुद्धि उसे प्राप्त करने के उपाय तलाशने लग जाती है | विचारों के एक स्थान पर केन्द्रित होते रहने पर उनकी सूक्ष्म चेतनशक्ति घनीभूत होती जाती है जिससे एक प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता है । परिणामस्वरूप विचार के अनुसार ही परिस्थितियां बनने लगती हैं | यह स्थिति मात्र शरीर तक ही सीमित नही है –अन्य क्षेत्रों में भी चाहे वह हमारा आर्थिक क्षेत्र हो सामाजिक या अन्य कोई क्षेत्र , सबमें यही सिद्धांत लागू होता है | मन जैसा विचारता है वैसी ही प्रतिक्रिया वातावरण में होती है। यह स्थिति एक प्रकार से कुएं की प्रतिध्वनि की तरह है कि कुएं में जैसी ध्वनि की, ठीक वैसी ही प्रतिध्वनि वापस आ गयी | बल्कि ध्वनि से भी तेज प्रतिध्वनि बन गयी | मनुष्य जैसा सोचता है उसके आसपास वैसी ही परिस्थितियां बनने लगती हैं । विचार शक्ति अपने समानधर्मी विचारों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। एक ही प्रकार के विचारों के घनीभूत होने पर विचार के अनुसार ही क्रिया प्रारंभ हो जाती है,फलस्वरूप  वैसे ही स्थूल परिणाम प्राप्त  हो जाते हैं । भय, चिन्ता और निराशा में डूबे रहने वाले मनुष्य के सामने ठीक वैसी ही परिस्थितियाँ आ जाती हैं जैसी कि वे सोचते रहते हैं । व्यक्ति जिस प्रकार के विचारों को प्रश्रय देता है उसके अनुसार ही उसका रहन-सहन,मुद्रा आदि बन जाते हैं | यदि स्वास्थ्य की कामना करने वाला व्यक्ति इस प्रकार विचार करे कि - मेरा रोग साधारण है, मेरा उपचार उपयुक्त व पर्याप्त ढंग से हो रहा है, दिन-प्रतिदिन  मेरा रोग घटता जा रहा है एवं मैं अपने अन्दर एक स्फूर्ति, चेतना और आरोग्य की तरंग अनुभव कर रहा हूँ । मेरे आरोग्यता प्राप्ति में अब अधिक समय नही लगेगा। जब इस प्रकार के विचार बार-बार किये जायेंगे तो विचारों के अणु घनीभूत होकर सम्पूर्ण स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त करने लग जायेंगे |

विचारों का शरीर पर प्रभाव :

व्यक्ति जिस प्रकार के विचारों में रहता है उसके चेहरे पर उनका प्रतिबिम्ब स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है | विचारों का यह प्रभाव चेहरे या बाह्य अंगो तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि आंतरिक अवयवों जैसे -पाचन, रक्त संचार एवं वायु प्रवाह उत्पन्न करने वाले अंगों पर भी पड़ता है । आमाशय, आँत, फुफ्फुस, हृदय, यकृत, वृक्क, मूत्राशय, मस्तिष्क, नेत्र, कान, शिश्न, जिह्वा जैसे भीतरी अंगों पर भी उनका असर होता है और उनकी कार्य प्रणाली एवं गतिविधि में मन्दता, तीव्रता, अव्यवस्था तथा व्यतिक्रम आदि पर प्रभाव विचारों के अनुसार ही परिलक्षित  होने लगता है |

 नकारात्मक एवं कुविचारों का प्रभाव शरीर पर अत्यंत घातक रूप में पड़ता है । इनके प्रभाव से शरीर में ऐसी शिथिलता एवं विकृति उत्पन्न हो जाती है कि पाचन रक्त संचार आदि प्रक्रिया में गतिरोध उत्पन्न होने से रोग लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं | यदि यही प्रक्रिया लगातार चलती रहे तो स्वस्थ्य व्यक्ति भी  रोगी हो जाता है । मनःस्थिति अथवा विचारों का शरीर पर कैसा होता है यह इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है - एक माता को एक दिन किसी बात पर बहुत क्रोध हो आ रहा था,स्थिति यह थी कि क्रोध में उसके मुंह से झाग निकल रहा था | आवेश में उसका पूरा शरीर कांप रहा था। उसी आवेश की अवस्था में अपने बच्चे को स्तनपान कराया और एक घण्टे के भीतर ही बच्चे की हालत खराब हो गई एवं अंततः उसकी मृत्यु हो गई। शव परीक्षा के परिणाम से विदित हुआ कि मानसिक क्षोभ के कारण माता का रक्त तीक्ष्ण परमाणुओं से विषैला हो गया और उसके प्रभाव से उसका दूध भी विषाक्त हो गया था, जिसे पी लेने से बच्चे की मृत्यु हो गई।


          मन:स्थिति के सदर्भ में रायल मेडिकल सोसायटी के चिकित्साविज्ञानी डा. ग्लॉस्टन का कहना है कि “शारीरिक रोग उत्पन्न होने से लेकर निरोग होने अथवा कष्टसाध्य बनने में मानसिक स्थिति की बहुत बड़ी भूमिका होती है। मन को सशक्त एवं सकारात्मक बनाकर कठिन से कठिन रोगों पर विजय पाई जा सकती है । विकृत मन:स्थिति मनुष्य को राक्षस या जिंदा लाश बनाकर छोड़ देती है। यह सब हमारी इच्छा-आकांक्षा एवं विचारणा पर निर्भर करता है कि हम स्वास्थ्य-समुन्नत बनें अथवा रूग्ण एवं हेय । रोगोत्पत्ति या रोगों के उतार-चढ़ाव में जितना गहरा संबंध शारीरिक कारणों अथवा परिस्थितियों का माना जाता है उससे कहीं अधिक गहरा प्रभाव मनोदशा का पड़ता है। यदि व्यक्ति मानसिक दृष्टि से सुदृढ़ हो तो फिर रोगों की संभावना बहुत ही कम रह जाती है। आक्रमण करने पर भी रोग बहुत समय तक ठहर नहीं सकेंगे। मन की प्रगति या अवगति ही रूग्णता या निरोगता का मूल है। इस तथ्य को समझना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।“

सकारात्मक भोजन से आरोग्य प्राप्ति :

सम्पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु अपने रोग के प्रति सकारात्मकता तो आवश्यक है ही इसके अतिरिक्त हमारा भोजन जिसे प्राकृतिक चिकित्सा में औषधि की संज्ञा दी गयी है का निर्माण से लेकर एवं ग्रहण करने तक जो मनोभाव रहने चाहिए वे समझना आवश्यक है |
जो भोजन ग्रहण करते हैं,  उसके द्वारा  शरीर का पोषण और नव निर्माण ही नहीं होता, अपितु  भोजन करते समय व्यक्ति की जो मन:स्थिति होती है एवं जिन संस्कारों या वातावरण में भोजन ग्रहण किया जाता हैं,  वे मनोभाव, विचार एवं भावनाएं भी अलक्षित रूप में भोजन और जल के साथ शरीर  ग्रहण कर लेता हैं | भोजन कितना भी प्राकृतिक क्यों न हो यदि उसको बनाते समय रसोइया की मनःस्थिति एवं भोजन करते समय ग्राही की मनःस्थिति सात्विक व सकारात्मक नही है तो वह प्राकृतिक भोजन भी शरीर में विष का कार्य करता है | इसलिए सम्पूर्ण स्वास्थ्य पाने के लिए भोजन के सन्दर्भ में इन बिन्दुओं को धयान रखना आवश्यक है –

भोजन बनाने वाले का व्यक्तित्व


  • भोजन को बनाते समय रसोईये की प्रवृत्ति,मनःस्थिति एवं शारीरिक स्थिति का अच्छा या बुरा प्रभाव भोजन पर पड़ता है | अतृप्त, भूखा, लालची, क्रोधी, हिंसावृत्ति युक्त, गंदा रसोइया अपने सम्पर्क से ही भोजन को दूषित कर देता है। एक तो वह शरीर या वस्त्रों से स्वच्छ नहीं होता दूसरे उसकी उपर्युक्त मन:स्थिति भोजन को दूषित कर देती है । यह  भोजन  विष के समान हो जाता है । बाजार में भी बिकने वाले  भोजन, मिठाइयां, नमकीन, दूध इत्यादि असंख्य अतृप्त भूखे व्यक्तियों की लुब्ध दृष्टियां पड़कर उन्हें दूषित बना देती हैं। अत: वे ऐसे विचार अणुओं से इतना अधिक दूषित हो जाते हैं कि शरीर के लिए अस्वास्थ्यकर हो जाते हैं | अतः सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्तियों को ऐसे खाद्यों से बचना ही हितकर है |इस तथ्य का हमेशा ध्यान रखें कि भोजन बनाने वाले की वृत्ति सात्विक हो , वह रोगी न हो, भूखा न हो | वह प्रेमपूर्ण भाव से भोजन तैयार करने वाला हो |

  • भोजन ग्रहण करते समय मन:स्थिति की आन्तरिक स्वच्छता आवश्यक है,अर्थात भोजन के समय जैसे बाह्य स्वच्छ्ता आवश्यक है उसी प्रकार हमारे विचारों की सात्विकता भी आवश्यक है। जैसे अच्छे –बुरे विचार होंगे वैसा ही प्रभाव भोजन पर पड़ेगा फलस्वरूप भोजन से मिलने वाले पोषण में भी विचारों के अनुरूप अधिकता या न्यूनता आ जाएगी |  यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि उत्तम से उत्तम भोजन दूषित मन:स्थिति से विकारयुक्त अथवा विषमय हो जाता है। 
  • चिन्ता, आवेश, क्रोध, जल्दबाज़ी, चिड़चिड़ापन, आदि उद्वेगों की स्थिति में किया गया भोजन विषैला हो जाता है। यह शरीर को पोषित करने के स्थान पर हानि पहुंचाता और पाचन-क्रिया को विकारमय कर देता है। 
  • क्रोध की स्थिति में किये गए भोजन का ढंग से पाचन नही हो पाता |
  • चिंतित मन:स्थिति में किया गया भोजन आमाशय में अल्सर जैसा घातक रोग उत्पन्न कर सकता है । 

इसके विपरीत आनंद एवं सकारात्मक विचारों के साथ किया गया भोजन स्वास्थ्य पर जादू-जैसा गुणकारी प्रभाव डालता है। अन्त:करण की शान्त-सुखद वृत्ति में किये हुए भोजन के साथ-साथ हम प्रसन्नता, सुख-शान्ति और उत्साह की स्वस्थ भावनाएं भी ग्रहण करते हैं फलस्वरूप इसका स्वास्थ्यप्रद प्रभाव शरीर पर पड़ता है। अतः
    भोजन स्वच्छ स्थान पर शान्तिपूर्वक प्रसन्न मुद्रा से ग्रहण करें । जो कुछ रूखा-सूखा प्राप्त हुआ है, उसे भगवान् का प्रसाद मानकर ग्रहण करें । भोजन जब सामने आये, तब नेत्र बंदकर ईश्वर का चिन्तन करते हुए करें | पुनः स्मरण रखें - मन में जैसी विचारधाराएं उठती हैं शरीर उनका उसी के अनुरूप प्रभाव पड़ता है।

विचार के विषय में महापुरुषों का चिंतन :

स्वामी रामतीर्थ जी के अनुसार - 
‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही उसका जीवन बनता है |"

 स्वामी विवेकानन्द जी के अनुसार -
 ‘‘स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, इनका निवास हमारे विचारों में ही है।"

 भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था- 
‘‘भिक्षुओ! वर्तमान में हम जो कुछ हैं अपने विचारों के ही कारण और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह भी अपने विचारों के कारण।"

 शेक्सपीयर ने लिखा है- 
‘‘कोई वस्तु अच्छी या बुरी नहीं है। अच्छाई- बुराई का आधार हमारे विचार ही हैं।"

 ईसामसीह ने कहा था- 
‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वह बन जाता है।"

 प्रसिद्ध रोमन दार्शनिक मार्क्स आरीलियस ने कहा है- 
‘‘हमारा जीवन जो कुछ भी है, हमारे अपने ही विचारों के फलस्वरूप है।"

 प्रसिद्ध अमरीकी लेखक डेल कार्नेगी ने अपने अनुभवों पर आधारित तथ्य प्रकट करते हुए लिखा है- ‘‘जीवन में मैंने सबसे महत्त्वपूर्ण कोई बात सीखी है तो वह है विचारों की अपूर्व शक्ति और महत्ता, विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है।"


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Wednesday, January 25

इन उपायों से कमर दर्द हो जायेगा गायब !


By- Dr. Kailash Dwivedi

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कारण :

  1. हमेशा ऊंची एड़ी के जूते या सेंडिल पहनना
  2. मांसपेशियों पर अत्यधिक तनाव
  3. गलत तरीके से अधिक वजन उठाना 
  4. गलत तरीके से बैठना

उपचार :


  • रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन-चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियां काली न हो जायें) गर्म कर लें। ठंडा होने पर इस तेल से कमर की मालिश करें।
  • नमक मिले गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। इसके बाद पेट के बल लेट जाएं। दर्द के स्थान पर तौलिये से भाप लें। कमर दर्द से राहत पहुंचाने का यह एक अचूक उपाय है।
  • कढ़ाई में दो-तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। इस नमक को थोड़े मोटे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। कमर पर इस पोटली से सेक करने से भी दर्द से आराम मिलता है।
  • अजवाइन को तवे के पर थोड़ी धीमी आंच पर सेंक लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चबाते हुए निगल जाएं। इसके नियमित सेवन से कमर दर्द में लाभ मिलता है।
  • अधिक देर तक एक ही पोजीशन में बैठकर काम न करें। हर चालीस मिनट में अपनी कुर्सी से उठकर थोड़ी देर टहल लें।
  • नर्म गद्देदार सीटों से परहेज करना चाहिए। कमर दर्द के रोगियों को थोड़ा सख्ते बिस्तर बिछाकर सोना चाहिए।
  • योग भी कमर दर्द में लाभ पहुंचाता है। भुजंगासन, शलभासन, हलासन, उत्तानपादासन, श्वसन आदि कुछ ऐसे योगासन हैं जो की कमर दर्द में काफी लाभ पहुंचाते हैं। कमर दर्द के योगासनों को योगगुरु की देख रेख में ही करने चाहिए।
  • कैल्शियम की कम मात्रा से भी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, इसलिए कैल्शियमयुक्त चीजों का सेवन करें।
  • कमर दर्द के लिए व्यायाम भी करना चाहिए। सैर करना, तैरना या साइकिल चलाना सुरक्षित व्यायाम हैं। तैराकी जहां वजन तो कम करती है, वहीं यह कमर के लिए भी लाभकारी है। साइकिल चलाते समय कमर सीधी रखनी चाहिए। व्यायाम करने से मांसपेशियों को ताकत मिलेगी तथा वजन भी नहीं बढ़ेगा।
  • कमर दर्द में भारी वजन उठाते समय या जमीन से किसी भी चीज को उठाते समय कमर के बल ना झुकें बल्कि पहले घुटने मोड़कर नीचे झुकें और जब हाथ नीचे वस्तु तक पहुंच जाए तो उसे उठाकर घुटने को सीधा करते हुए खड़े हो जाएं।
  • कार चलाते वक्त सीट सख्त होनी चाहिए, बैठने का पोश्चर भी सही रखें और कार ड्राइव करते समय सीट बेल्ट टाइट कर लें।
  • ऑफिस में काम करते समय कभी भी पीठ के सहारे न बैठें। अपनी पीठ को कुर्सी पर इस तरह टिकाएं कि यह हमेशा सीधी रहे। गर्दन को सीधा रखने के लिए कुर्सी में पीछे की ओर मोटा तौलिया मोड़ कर लगाया जा सकता है।
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Tuesday, January 3

जानिए - जैविक घड़ी के अनुसार आपकी दिनचर्या क्या हो !




  • प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से फेफड़ो में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहनेवालो का जीवन निस्तेज हो जाता है ।
  • प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।
  • प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार ) घूँट-घूँट पिये।
  • प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है। दोपहर 12 बजे के आसपास मध्याह्न संध्या (आराम ) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसीलिए भोजन वर्जित है । इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।
  • दोपहर 1 से 3 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है |
  • दोपहर 3 से 5 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।
  • शाम 5 से 7 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।
  • रात्रि 7 से 9 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।
  • रात्रि 9 से 11 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।
  • रात्रि 11 से 1 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।
  • रात्रि 1 से 3 - इस समय जीवनीशक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।



शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को लाइट  बंद करके सोयें। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और लाइट  चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। 
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अच्छे स्वास्थ्य के लिए विश्राम को न भूलें :








विश्राम शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक है विश्राम के बिना कोई व्यक्ति लम्बे समय तक कार्य नहीं कर सकता। थकान दूर करने व मन की शांति के लिए विश्राम आवश्यक है। पूर्ण विश्राम न ले पाने के कारण मानसिक व शारीरिक कार्य करने की क्षमता कम होने लगती है। इसके अतिरिक्त थकावट, मानसिक परेशानी, बेचैनी और घबराहट उत्पन्न होने लगती है।

विश्राम न करने के दुष्परिणाम :


  • विश्राम न करने से शरीर में विभिन्न रोग उत्पन्न होने लगते है जैसे- पेट के रोग, हृदय रोग तथा अन्य आंतरिक गड़बड़ियां।
  • विश्राम के अभाव में सिर दर्द, सिर में भारीपन, एकाग्रता की कमी जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
  • विश्राम न करने के फलस्वरूप चेहरे की सुन्दरता नष्ट होने लगती है, त्वचा पर काले धब्बे पड़ने लगते हैं, इससे शरीर जल्दी थक जाता है,एवं क्रोध,चिड़चिड़ापन आलस्य जैसे लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं।

विश्राम को दिनचर्या में इस प्रकार शामिल करें :


  1. देर रात तक कार्य न करें, हर हालत में रात्रि 11 बजे तक सो जाएँ |
  2. अच्छी नींद के लिए सोने से 2 घंटे पहले भोजन कर लें |
  3. हमेशा शाकाहारी एवं संतुलित भोजन करें |
  4. नशीले पदार्थ जैसे – शराब,तम्बाखू,गुटखा,सिगरेट,चाय,काफी,का सेवन न करें |
  5. सोने से पहले हिंसक या उत्तेजक फिल्में आदि न देखें ।
  6. विश्राम में शारीरिक अवस्था का विशेष महत्व है, शरीर को स्वच्छ रखें। दिन में कम से कम एक बार ताज़े पानी से अवश्य नहाए। सोने से पहले हाथ-पैरों को स्वच्छ पानी से धोकर ही बिस्तर पर जाएं तथा सोने से पूर्व ईश्वर का ध्यान अवश्य करें।
  7. सोने से पूर्व अपने दिन भर की सभी मानसिक परेशानियों को भूल जाएं।
  8. सोने से 10 से 15 मिनट पहले बिस्तर पर बैठकर अपने कल करने वाले कार्यों को एक कागज पर लिख लें और फिर उसे बार-बार पढ़ें। साथ ही कल किये जाने वाले कार्यों की योजना अपने मन में बनाएं।
  9. विश्राम के लिए अपने प्रत्येक कार्य का समय निश्चित करें, जैसे – निश्चित समय पर सोना और उठना, निश्चित समय पर भोजन करना इत्यादि |
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इन खाद्यों से हो सकता है माईग्रेन अटैक



माईग्रेन एक प्रकार की बीमारी होती है जिससे सिर में भयानक दर्द होता है और मरीज को बहुत ही असहजता महसूस होती है। कई प्रकार के फूड के सेवन से भी माईग्रेन की समस्‍या हो सकती है।
कई बार हारमोन्‍स के प्रभाव, तनाव, साईकोलॉजी फैक्‍टर और कुछ प्रकार की दवाईयों का सेवन करने से भी माईग्रेन की समस्‍या हो सकती है। साथ ही बेकार लाइफ स्‍टाइल भी इस बीमारी की वजह बन सकता है। जो लोग देर तक भूखे रहते हैं उन्‍हें भी यह समस्‍या हो सकती है।

सोडियम नाईट्रेड :


यह उन खाद्य पदार्थो में पड़ा होता है जिन्‍हें प्रीजर्व किया जाता है जैसे कि हॉट डॉग, बेकन या मीट आदि। इससे सेवन से माईग्रेन का अटैक आ सकता है। साथ ही प्रीर्जेवेटिव, बेनजोइक भी माईग्रेन का कारण बन सकता है। इसलिए कोशिश करें कि आप इनका सेवन न करें।

एमएसजी, मोनोसोडियम ग्‍लूटामेट :


यह एक प्रकार का फ्लेवर इन्‍हेंसर होता है जिसे कई फूड में इस्‍तेमाल किया जाता है। इसकी वजह से कई बार माईग्रेन अटैक पड़ सकता है। सभी प्रकार के प्रोसेस्‍ड फूड में यह पाया जाता है।

चीज़ :


यदि आपको चीज बहुत ज्‍यादा पसंद है तो आपको माईग्रेन का दर्द झेलना पड़ सकता है क्‍योंकि रखे हुए चीज़ में सैचुरेटेड टायरामाइन होता है तो कि प्रोटीन के ब्रेकडाउन होने से बन जाता है। इससे कई लोगों को माईग्रेन अटैक पड़ने की शिकायत होती है।

कैफीन :


कैफीन को सामान्‍य से ज्‍यादा मात्रा में सेवन करने पर सिरदर्द यानि माईग्रेन की समस्‍या हो सकती है। चॉकलेट में फिनाइलेथाइमाइन पाया जाता है जिससे माईग्रेन की समस्‍या हो सकती है। रेड वाइन और एस्‍पार्टमे में भी यह पाया जाता है।
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भोजन के बाद यह आदतें बना सकती हैं बीमार !




चाय  :  

भोजन के तुरंत बाद चाय नही पीना चाहिए इससे हाई एसिड बनता है.जो प्रोटिन के साथ मिल कर शरीर की पाचन क्षमता को कम करता है |

तुरंत न टहलें :  

आम धारणा है की खाने के बाद सौ कदम चलना चाहिए .लेकिन रिसर्च से ये साबित हुआ है कि इस क्रिया से हमें भोजन से मिलने वाला पोषण प्राप्त होने में अवरोध पैदा होता है |

धूम्रपान न करें : 

रिसर्च  से ये साबित हुआ है की भोजन करने  के तुरंत बाद सिगरेट या अन्य धुम्रपान करने से शरीर को हानि होती है |

बेल्ट ढीली ना करें : 

खाने के तुरंत बाद बेल्ट ढीला करने से इन्टेस्टाइन में मरोड आ जाती है और वो अवरूद्व
हो जाता है |

तुरंत फल ना खायें : 

भोजन के बाद फल तत्काल फल खाने से आमाशय  में हवा भर जाती है.जो उसे ब्लाक भी कर सकती है | अतः इससे बचें |

स्नान से बचें :  

भोजन के बाद स्नान करने से रक्त प्रवाह में बृद्धि हो जाती है.जिसके कारण हमारे हाथ पैर में रक्त का संचार अवरूद्व हो जाता है.फलस्वरूप  हमारा पाचन संस्थान कमजोर हो जाता है |

सोना मना है : 

भोजन के तुरंत बाद सोना हमारे शरीर के लिए हानिकारक होता है .जिससे की एसिडिटी और गैस्टीक होने से पाचन गंथि में संक्रमण का खतरा बढ जाता है|


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Wednesday, December 28

कब्ज की प्राकृतिक चिकित्सा



ऐसा कहा जाता है कि कब्ज समस्त रोगों की जड़ है | अप्राकृतिक आहार,विहार और विचार के चलते कब्ज उत्पन्न होती है | जब शरीर में मल की अधिकता हो जाती है तब मल निष्कासक अंग इसे पूरी तरह से बाहर नही निकाल पाते फलस्वरूप यह शरीर में एकत्र होकर रक्त के साथ मिलकर अन्य अनेक रोग उत्पन्न कर देता है |

कब्ज से सम्बंधित वीडियो देखें -



कारण :

  • अप्राकृतिक जीवन शैली
  • कम रेशायुक्त भोजन का सेवन करना
  • शरीर में पानी का कम होना
  • कम चलना या काम करना
  • कुछ खास दवाओं का सेवन करना
  • बड़ी आंत में घाव या चोट के कारण यानि बड़ी आंत में कैंसर
  • थायरॉयड हार्मोन का कम बनना
  • कैल्सियम और पोटैशियम की कम मात्रा
  • मधुमेह के रोगियों में पाचन संबंधी समस्या
  • कंपवाद (पार्किंसन बीमारी)

लक्षण :
कब्ज, पाचन तंत्र की उस स्थिति को कहते हैं जिसमें कोई व्यक्ति (या जानवर) का मल बहुत कडा हो जाता है तथा मलत्याग में कठिनाई होती है। कब्ज अमाशय की स्वाभाविक परिवर्तन की वह अवस्था है, जिसमें मल निष्कासन की मात्रा कम हो जाती है, मल कड़ा हो जाता है, उसकी आवृति घट जाती है या मल निष्कासन के समय अत्यधिक बल का प्रयोग करना पड़ता है। कब्ज के रोगी को सिर में भारीपन या दर्द बना रहता है | गैस,एसिडिटी,अजीर्ण आदि लक्षण भी प्रगटहोने लगते हैं |

उपचार :
प्रातः खाली पेट : पेट पर 10 मिनट गर्म सेंक देने के बाद 45 मिनट के लिए पेट पर मिटटी की पट्टी लगायें उसके बाद गुनगुने पानी का एनिमा दें |
यह क्रम लगातार एक सप्ताह तक दोहराएँ |

आहार चिकित्सा :
प्रातः – उषापान
नाश्ते में – गेहूं का दलिया या कोई मौसमी फल |
दोपहर भोजन – हरी सब्जी (बिना मिर्च-मसाले की) + सलाद + चोकर समेत बनी आंटे की रोटी |
4:00 बजे- सब्जियों का सूप 250 मिली.|
रात्रि भोजन – मिक्स वेजिटेबल दलिया या कोई हरी सब्जी + चोकर सहित आंटे की रोटी |

अन्य उपाय :

  • रेशायुक्त भोजन का अत्यधित सेवन करना, जैसे साबूत अनाज
  • ताजा फल और सब्जियों का अत्यधिक सेवन करना
  • पर्याप्त मात्रा में पानी पीना
  • वसा युक्त भोजन का सेवेन कम करे
  • नमक ,छोटी हरड और काला नमक समान मात्रा में मि‍लाकर पीस लें। नि‍त्‍य रात को इसकी दो चाय की चम्‍मच गर्म पानी से लेने से दस्‍त साफ आता हैं।
  • ईसबगोल – दो चाय चम्‍मच ईसबगोल 6 घण्‍टे पानी में भि‍गोकर इतनी ही मि‍श्री मि‍लाकर जल से लेने से दस्‍त साफ आता हैं। केवल मि‍श्री और ईसबगोल मि‍ला कर बि‍ना भि‍गोये भी ले सकते हैं।
  • चना – कब्‍ज वालों के लि‍ए चना उपकारी है। इसे भि‍गो कर खाना श्रेष्‍ठ है। यदि‍ भीगा हुआ चना न पचे तो चने उबालकर नमक अदरक मि‍लाकर खाना चाहि‍ए। चेने के आटे की रोटी खाने से कब्‍ज दूर होती है। यह पौष्‍ि‍टक भी है। केवल चने के आटे की रोटी अच्‍छी नहीं लगे तो गेहूं और चने मि‍लाकर रोटी बनाकर खाना भी लाभदायक हैं। एक या दो मुटठी चने रात को भि‍गो दें। प्रात: जीरा और सौंठ पीसकर चनों पर डालकर खायें। घण्‍टे भर बाद चने भि‍गोये गये पानी को भी पी लें। इससे कब्‍ज दूर होगी।
  • बेल – पका हुआ बेल का गूदा पानी में मसल कर मि‍लाकर शर्बत बनाकर पीना कब्‍ज के लि‍ए बहुत लाभदायक हैं। यह आँतों का सारा मल बाहर नि‍काल देता है।
  • नीबू – नींबू का रस गर्म पानी के साथ रात्रि‍ में लेने से दस्‍त खुलकर आता हैं। नीम्‍बू का रस और शक्‍कर प्रत्‍येक 12 ग्राम एक गि‍लास पानी में मि‍लाकर रात को पीने से कुछ ही दि‍नों में पुरानी से पुरानी कब्‍ज दूर हो जाती है।
  • नारंगी – सुबह नाश्‍ते में नारंगी का रस कई दि‍न तक पीते रहने से मल प्राकृति‍क रूप से आने लगता है। यह पाचन शक्‍ति‍ बढ़ाती हैं।
  • मैथी – के पत्‍तों की सब्‍जी खाने से कब्‍ज दूर हो जाती है।
  • गेहूं के पौधों (गेहूँ के जवारे) का रस लेने से कब्‍ज नहीं रहती है।
  • धनि‍याँ – सोते समय आधा चम्‍मच पि‍सी हुई सौंफ की फंकी गर्म पानी से लेने से कब्‍ज दूर होती है।
  • दालचीनी – सोंठ, इलायची जरा सी मि‍ला कर खाते रहने से लाभ होता है।
  • टमाटर कब्‍ज दूर करने के लि‍ए अचूक दवा का काम करता है। अमाशय, आँतों में जमा मल पदार्थ नि‍कालने में और अंगों को चेतनता प्रदान करने में बडी मदद करता है। शरीर के अन्‍दरूनी अवयवों को स्‍फूर्ति‍ देता है।
  •  कब्ज का प्रमुख कारण शरीर मे तरल की कमी होना है। पानी की कमी से आंतों में मल सूख जाता है और मल निष्कासन में जोर लगाना पडता है। अत: कब्ज से परेशान रोगी को दिन मे २४ घंटे मे मौसम के मुताबिक ३ से ५ लिटर पानी पीने की आदत डालना चाहिये। इससे कब्ज रोग निवारण मे बहुत मदद मिलती है।
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Saturday, December 24

मोटापे से छुटकारा पाने के कुछ सरल उपाय



  • मोटापे से पीड़ित व्यक्ति को प्रातःकाल उठकर टहलना चाहिए तथा आसान व प्राणायाम का अभ्यास नियमित रूप से करना चाहये | ऐसा करने से वजन बहुत तेज़ी से घटता है |
  • २५ मिलीलीटर में नींबू के रस में २५ ग्राम शहद मिलाकर १०० मिलीलीटर गुनगुने पानी के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम पीने से मोटापा दूर होता है |
  • सूखा धनिया,मिश्री और मोटी सौंफ को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें | इस चूर्ण को एक चम्मच सुबह पानी के साथ लेने से अधिक चर्बी कम होकर मोटापा दूर होता है | मधुमेह के रोगी यह प्रयोग न करें |
  • तुलसी के पत्तों का रस १० बूँद और शहद २ चम्मच को एक गिलास पानी में मिलाकर प्रतिदिन पीने से मोटापा कम होता है |
  • टमाटर और प्याज में थोड़ा सा सेंधा नमक और थोड़ी सी पीसी हुई काली मिर्च डालकर भोजन से पहले सलाद के रूप में खाने से भूख कम लगती है और मोटापा कम होता है |
  • रात को सोने से पहले १५ ग्राम त्रिफला चूर्ण को हल्के गर्म पानी में भिगोकर रख दें और सुबह इस पानी को छानकर एक चम्मच शहद मिलकर पी लें | इससे मोटापा जल्दी दूर होता है |

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Thursday, December 22

इन संकेतो से जानें कहीं आपको थायराइड तो नहीं !





भारत में करीब 4.2 करोड़ लोग थॉयरायड से पीड़ित हैं । पुरुषों की तुलना में महिलाओं में थॉयरायड विकार होने की संभावना 80 प्रतिशत ज्यादा होती है, जिसकी वजह से शरीर में होने वाले बहुत सारे हार्मोन के बदलाव हैं। महिलाओं में आयोडीन की कमी होने की संभावना ज्यादा होती है, जिस वजह से उनमें थॉयरायड के विकार हो सकता है।

थॉयरायड ग्रंथी शरीर में पाचन क्रिया को संतुलित बनाने में अहम भूमिका निभाती है। इससे निकलने वाले हार्मोन शरीर का तापमान संतुलित रखने, दिमाग को सेहतमंद रखने, दिल की उचित ताल के साथ पंप करने और सभी अंगों में एकसुरता बनाए रखने में मदद करता है। जब हमें थॉयरायड विकार हो जाता है तो या तो यह ग्रंथि ज्यादा काम करने लगती है- जिससे हायपरथॉयरायडिज्म या फिर कम काम करने से हाईपोथॉयरायडिज्म हो जाता है। हाईपोथॉयरायडिज्म आम तौर ज्यादा होता है और कोलेस्ट्रोल और दिल के विकार बढ़ने का कारण बन सकता है।

थॉयरायड विकार का जल्दी पता लगने से रोकथाम के कदम उठाने में मदद मिलती है, चाहे वो दवाओं के जरिए हो या जीवनशैली में बदलाव के जरिए । इसके लक्षण बहुत ही छोटे होते हैं और इनकी निशानदेही करना मुश्किल होता है। सबसे भरोसेमंद तरीका है रक्त के जरिए TSH स्तर की जांच करना।

कुछ लोगों में थॉयरायड रोग की संभावना ज्यादा होती है। जिनमें डायबिटीज, रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकार, परिवार में पहले से किसी को थॉयरायड होना, हार्मोन में बदलाव- गर्भावस्था या मासिक धर्म बंद होना और बढ़ती उम्र जैसे कारण शामिल हैं।

यह जरूरी है कि मासिक धर्म बंद होने के करीब वाली महिलाएं अपने थॉयरायड की जांच जरूर करवाएं।

हाईपोथॉयरायडिजम के लक्षण 


  • बहुत ज्यादा कमजोरी और थकान 
  • वजन बढ़ना 
  • ठंड बर्दाश्त न होना 
  • सूखे और कमजोर बाल 
  • याददाश्त की समस्या 
  • चिड़चिड़ापन और अवसाद 
  • ज्यादा कोलेस्ट्रोल 
  • दिल की धड़कन कम होना 
  • कब्ज 

हायपरथॉयरायडिज्म के संकेत 


  • वजन कम होना 
  • गर्मी बर्दाश्त न होना 
  • पेट में बार-बार गड़बड़ी 
  • कंपकंपी घबराहट और चिड़चिड़ापन 
  • थॉयरायड ग्रंथि का बढ़ जाना 
  • नींद में गड़बड़ी 
  • थकान

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Tuesday, December 20

सावधान ! सर्दियों में पानी कम पिया तो हो सकती हैं यह समस्याएं





सर्दी के मौसम में शरीर में अक्सर पानी की मात्रा कम हो जाती है | हम जो भी खाना खाते हैं, उसे पचाने के लिए पर्याप्त पानी की जरूरत होती है | इसके अलावा शरीर के मेटाबॉलिज्म, पाचन शक्ति और एब्जरप्शन के लिए पानी बहुत जरूरी है | कुछ लोगों को तो सर्दियों में प्यास ही नहीं लगती या बहुत कम लगती है, यदि यह शिकायत आपकी भी है तो सावधान हो जायें। सर्दियों में डिहाइड्रेशन की स्थिति कई रोगों को जन्म दे सकती है |

सर्दियों में क्यों होता है डिहाइड्रेशन ?

सर्दियों में शरीर में पानी की कमी के निम्न कारण हो सकते हैं -
  • बाहर के मौसम के अनुरूप शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने के लिये शरीर को अधिक परिश्रम करना पड़ता है, जिससे शरीर में पानी की कमी होने लगती है।
  • कम मात्रा में पानी पीना और अधिक मात्रा में चाय और काॅफी का सेवन करना डिहाइड्रेशन की आशंका को बढ़ा देता है।
  • अधिक देर तक रूम हीटर में बैठे रहना भी शरीर की नमी को कम करता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों के मौसम में सांस लेने पर काफी मात्रा में रेसपिरेटरी फ्लुइड का नुकसान होता है।

डिहाइड्रेशन के लक्षण :

  1. मुह सूखना
  2. त्वचा का मुरझाना
  3. होंठ फटना
  4. थकावट महसूस होना
  5. पेशाब कम व पीला आना
  6. चक्कर आना

शरीर में पानी क्यों आवश्यक है ?

हमारे शरीर में दो-तिहाई पानी होता है, अगर इसमें 1.5 प्रतिशत की कमी आ जाती है तो इसे माइल्ड डिहाइड्रेशन कहते हैं। पानी के स्तर में 3-8 प्रतिशत की कमी आने पर शरीर की कार्यप्रणाली और दूसरे अंगों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है।

डिहाइड्रेशन से शरीर को होने वाले नुकसान :

कब्ज :

शरीर को पर्याप्त पानी नहीं मिलने से शरीर पानी की उस कमी को मल से पूरा करता है। जिससे मल कड़ा हो जाता है फलस्वरूप कब्ज उत्पन्न हो जाती है ।

हृदय रोग :

शरीर में पानी की कमी होने पर रक्त गाढ़ा होने लगता है। जिससे शरीर में रक्तसंचार प्रभावित होने लगता है एवं रक्त व आॅक्सीजन के शरीर के सभी अंगों में आपूर्ति हेतु ह्रदय को अधिक श्रम करना पड़ता है फलस्वरूप रक्तचाप बढ़ने लगता है। इससे कोलेस्ट्राॅल का स्तर बढ़ जाता है। यह स्थिति कृत्रिम हार्ट वाल्व लगवा चुके या एंजियोप्लास्टी करवाने वाले जिन लोगों में धातु निर्मित स्टेंट लगा होता है, उनके लिए ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है | पानी की कमी होने पर गाढ़ा रक्त हृदय स्नायुओं से चिपकने लगता है, जिससे स्टेंट अवरूद्ध हो सकता है। यह अवस्था हार्ट अटैक का कारण बन सकती है।

मंसपेशियों में ऐंठन :

सर्दियों में पर्याप्त पानी नहीं पीने से शरीर नाजुक अंगों की सुरक्षा के लिये जरूरी फ्लुइड का इस्तेमाल करने लगता है। इससे मांसपेशियों की ओर रक्त संचार कम होता है और उनमें ऐंठन होने लगती है। इससे कमर व पीठ दर्द, मांसपेशियों में खिंचाव जैसी समस्या हो सकती है।

अधिक मीठा खाने की इच्छा होना :

जब शरीर में पानी का स्तर कम होता है तब हम भूख का अनुभव अधिक करते हैं। जिससे मीठा या कार्बोहाइड्रेट युक्त चीजें खाने की इच्छा अधिक होने लगती है। यह स्थिति मोटापा जैसे रोग को जन्म दे सकती है |

त्वचा का रूखापन :

शरीर में पानी की कमी त्वचा एवं बालों को रूखा व बेजान बना देती है।

मुंह से दुर्गंध आनाः

लार में बैक्टीरिया नष्ट करने की क्षमता होती है, जब शरीर में पानी की कमी होती है तो मुंह में लार की मात्रा कम हो जाती है | जिससे बैक्टिीरिया पनपने लगते हैं और मुंह से दुर्गन्ध आने लगती है।

एकाग्रता की कमी :

पानी की कमी से मानसिेक क्रियाशीलता भी प्रभावित होती है। जिससे उत्पन्न बेचैनी एकाग्रता को नष्ट करती है।

सिरदर्द :

पानी की कमी के कारण शरीर के सभी अंगों तक पर्याप्त आॅक्सीजन नहीं पहुँच पाती जिससे सिरदर्द और चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो जाता है।

शरीर में पानी की कमी से बचने के उपाय :

  1. यदि आपको सादा पानी पीना कम पसंद है तो नीबू पानी, नारियल पानी, छाछ या सूप अधिक मात्रा में लें।
  2. तले-भुने व परिशोधित खाद्य पदार्थों में पानी की मात्रा कम होती है। अतः ऐसे खाद्यों से बचें |
  3. भोजन में फल, दही, लस्सी जैसे खाद्यों को भी शामिल करें ।
  4. चाय, काॅफी, कोल्ड ड्रिंक्स जैसे पेय पदार्थों से बचें | यह शरीर में पानी की आपूर्ति नहीं करते बल्कि शरीर में पानी की जरुरत को और अधिक बढ़ा देते हैं।
  5. भोजन में टमाटर, शिमला मिर्च, फूलगोभी, पालक, लौकी, तोरई, स्ट्राबेरीज, अंगूर, ब्रोकली, तरबूज, संतरा व सेव जैसे फल व सब्जियों को शामिल करें |
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Sunday, December 4

लंबे समय तक बैठना सेहत के लिए जानलेवा, हार्ट अटैक का खतरा


लंबे समय तक बैठे रहना हृदय के लिए ठीक नहीं होता। यह कहना है शोधकर्ताओं का, जिनमें एक भारतीय मूल के भी हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि गतिहीनता से दिल की धमनियों में कैल्शियम का संग्रहण बढ़ जाता है, जिससे दिल के दौरे का खतरा बढ़ जाता है। 

टेक्सास विश्वविद्यालय के साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर के एसोसिएट प्रोफेसर और शोधदल के वरिष्ठ सदस्य अमित खेरा ने बताया, यह पहला अध्ययन है जो दिखाता है कि देर तक बैठने और दिल में एथेरोस्केलोसिस के निर्माण में संबंध है। रोजाना सामान्य से एक घंटा अतिरिक्त बैठने से कोरोनरी ऑर्टी केल्शिफिकेशन का खतरा बढ़ जाता है। यह शोध जर्नल ऑफ अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि रोजाना बैठने के समय में एक से दो घंटा की कमी करने से कार्डियोवैस्कूलर स्वास्थ्य पर प्रभावी सकारात्मक असर होता है। कई लोगों की नौकरी डेस्क पर बैठकर काम करने की होती है, कहीं-कहीं तो आठ घंटे लगातार बैठे रहना पड़ता है। ऐसे लोगों को सलाह दी गई है कि काम में बार-बार ब्रेक लेते रहें। थोड़ी-थोड़ी देर पर उठकर टहल लिया करें। इस शोध में शोधकर्ताओं ने लगभग 2,000 प्रतिभागियों को शामिल किया और उन्हें पहनने के लिए एक डिवाइस दिया गया, ताकि उनकी सप्ताह भर की गतिविधियों का आंकड़ा मिलता रहे। प्रतिभागियों ने औसतन रोजाना 5.1 घंटे बैठकर बिताए और रोजाना की शारीरिक गतिविधि औसतन मात्र 29 मिनट रही।