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Monday, April 27

स्वर साधना के चमत्कार एवं स्वास्थ्य प्राप्ति

परिचय-
        असल जिंदगी में स्वर की महिमा बहुत ही ज्यादा चमत्कारिक है। इसके कुछ सरल प्रयोग नीचे दिये जा रहे हैं।
जानकारी-
सुबह उठने पर पलंग पर ही आंख खुलते ही जो स्वर चल रहा हो उस ओर के हाथ की हथेली को देखें और उसे चेहरे पर फेरते हुए भगवान का नाम लें। इसके बाद जिस ओर का स्वर चल रहा हो उसी ओर का पैर पहले बिस्तर से नीचे जमीन पर रखें। इस क्रिया को करने से पूरा दिन सुख और चैन से बीतेगा।
अगर किसी व्यक्ति को कोई रोग हो जाए तो उसके लक्षण पता चलते ही जो स्वर चलता हो उसको तुरंत ही बंद कर देना चाहिए और जितनी देर या जितने दिनों तक शरीर स्वस्थ न हो जाए उतनी देर या उतने दिनों तक उस स्वर को बंद कर देना चाहिए। इससे शरीर जल्दी ही स्वस्थ हो जाता है और रोगी को ज्यादा दिनों तक कष्ट नहीं सहना पड़ता।
अगर शरीर में किसी भी तरह की थकावट महसूस हो तो दाहिने करवट सो जाना चाहिए, जिससे `चंद्र´ स्वर चालू हो जाता है और थोड़े ही समय में शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है।
स्नायु रोग के कारण अगर शरीर के किसी भाग में किसी भी तरह का दर्द हो तो दर्द के शुरू होते ही जो स्वर चलता हो, उसे बंद कर देना चाहिए। इस प्रयोग को सिर्फ 2-4 मिनट तक ही करने से रोगी का दर्द चला जाता है।
जब किसी व्यक्ति को दमे का दौरा पड़ता है तो उस समय जो स्वर चलता हो उसे बंद करके दूसरा स्वर चला देना चाहिए। इससे 10-15 मिनट में ही दमे का दौरा शांत हो जाता है। रोजाना इसी तरह से करने से एक महीने में ही दमे के दौरे का रोग कम हो जाता है। दिन में जितनी भी बार यह क्रिया की जाती है, उतनी ही जल्दी दमे का दौरा कम हो जाता है।
जिस व्यक्ति का स्वर दिन में बायां और रात में दायां चलता है, उसके शरीर में किसी भी तरह का दर्द नहीं होता है। इसी क्रम से 10-15 दिन तक स्वरों को चलाने का अभ्यास करने से स्वर खुद ही उपर्युक्त नियम से चलने लगता है।
रात को गर्भाधान के समय स्त्री का बांया स्वर और पुरुष का अगर दायां स्वर चले तो उनके घर में बेटा पैदा होता है तथा स्त्री-पुरुष के उस समय में बराबर स्वर चलते रहने से गर्भ ठहरता नहीं है।
जिस समय दायां स्वर चल रहा हो उस समय भोजन करना लाभकारी होता है। भोजन करने के बाद भी 10 मिनट तक दायां स्वर ही चलना चाहिए। इसलिए भोजन करने के बाद बायीं करवट सोने को कहा जाता है ताकि दायां स्वर चलता रहे। ऐसा करने से भोजन जल्दी पच जाता है और व्यक्ति को कब्ज का रोग भी नहीं होता। अगर कब्ज होता भी है तो वह भी जल्दी दूर हो जाता है।
किसी जगह पर आग लगने पर जिस ओर आग की गति हो उस दिशा में खड़े होकर जो स्वर चलता हो, उससे वायु को खींचकर नाक से पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से या तो आग बुझ जाएगी या उसका बढ़ना रुक जाएगा।

किस स्वर में कौन सा कार्य करें

जिस तरह वायु का बाहरी उपयोग है वैसे ही उसका आंतरिक और सूक्ष्म उपयोग भी है। जिसके विषय में जानकर कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति आध्यात्मिक तथा सांसरिक सुख और आनंद प्राप्त कर सकता है। प्राणायाम की ही तरह स्वर विज्ञान भी वायुतत्व के सूक्ष्म उपयोग का विज्ञान है जिसके द्वारा हम बहुत से रोगों से अपने आपको बचाकर रख सकते हैं और रोगी होने पर स्वर-साधना की मदद से उन रोगों का उन्मूलन भी कर सकते हैं। स्वर साधना या स्वरोदय विज्ञान को योग का ही एक अंग मानना चाहिए। यह मनुष्य को हर समय अच्छा फल देने वाला होता है, लेकिन यह स्वर शास्त्र जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल है इसको सिखाने वाला गुरू मिलना। स्वर साधना का आधार सांस लेने और सांस छोड़ने की गति- स्वरोदय विज्ञान है। हमारी सारी चेष्टाएं तथा तज्जन्य फायदा-नुकसान, सुख-दुख आदि सारे शारीरिक और मानसिक सुख तथा मुश्किलें आश्चर्यमयी सांस लेने और सांस छोड़ने की गति से ही प्रभावित हैं। जिसकी मदद से दुखों को दूर किया जा सकता है और मनोवांक्षित सुख की प्राप्ति हो सकती है।
        प्रकृति का यह नियम है कि हमारे शरीर में दिन-रात तेज गति से सांस लेना और सांस छोड़ना एक ही समय में नाक के दोनों छिद्रों से साधारणत: नहीं चलता। बल्कि वह बारी-बारी से एक निश्चित समय तक अलग-अलग नाक के छिद्रों से चलता है। एक नाक के छिद्र का निश्चित समय पूरा हो जाने पर उससे सांस लेना और सांस छोड़ना बंद हो जाता है और नाक के दूसरे छिद्र से चलना शुरू हो जाता है। सांस का आना जाना जब एक नाक के छिद्र से बंद होता है और दूसरे से शुरू होता है तो उसको `स्वरोदय´ कहा जाता है। हर नथुने में स्वरोदय होने के बाद वह साधारणतया 1 घंटे तक मौजूद रहता है। इसके बाद दूसरे नाक के छिद्र से सांस चलना शुरू होता है और वह भी 1 घंटे तक रहता है। यह क्रम रात और दिन चलता रहता है।
स्वरयोग-
        योग के मुताबिक सांस को ही स्वर कहा गया है। स्वर मुख्यत: 3 प्रकार का होता है- जब नाक को बाएं छिद्र से सांस चलती है तब उसे `इड़ा´ में चलना अथवा `चंद्रस्वर´ का चलना कहा जाता है और दाहिने नाक से सांस चलती है तो उसे `पिंगला´ में चलना अथवा `सूर्य स्वर´ का चलना कहते हैं और नाक के दोनों छिद्रों से जब एक ही समय में बराबर सांस चलती है तब उसको `सुषुम्ना में चलना कहा जाता है।
चंद्रस्वर-
        जब नाक के बाईं तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो तो उसको चंद्रस्वर कहा जाता है। यह शरीर को ठंडक पहुंचाता है। इस स्वर में तरल पदार्थ पीने चाहिए और ज्यादा मेहनत का काम नहीं करना चाहिए।
सूर्यस्वर-
        जब नाक के दाईं तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो तो उसे सूर्य स्वर कहा जाता है। यह स्वर शरीर को गर्मी देता है। इस स्वर में भोजन और ज्यादा मेहनत वाले काम करने चाहिए।
स्वर बदलने की विधि-
नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चल रहा हो तो उसे दबाकर बंद करने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से स्वर चल रहा हो उसी तरफ करवट लेकर लेटने से दूसरा स्वर चलने लगता है।
नाक के जिस तरफ के छिद्र से स्वर चलाना हो उससे दूसरी तरफ के छिद्र को रुई से बंद कर देना चाहिए।
ज्यादा मेहनत करने से, दौड़ने से और प्राणायाम आदि करने से स्वर बदल जाता है। नाड़ी शोधन प्राणायाम करने से स्वर पर काबू हो जाता है। इससे सर्दियों में सर्दी कम लगती है और गर्मियों में गर्मी भी कम लगती है।
स्वर ज्ञान से लाभ-
जो व्यक्ति स्वर को बार-बार बदलना पूरी तरह से सीख जाता है उसे जल्दी बुढ़ापा नहीं आता और वह लंबी          उम्र भी जीता है।
कोई भी रोग होने पर जो स्वर चलता हो उसे बदलने से जल्दी लाभ होता है।
शरीर में थकान होने पर चंद्रस्वर (दाईं करवट) लेटने से थकान दूर हो जाती है।
स्नायु रोग के कारण अगर शरीर में किसी भी तरह का दर्द हो तो स्वर को बदलने से दर्द दूर हो जाता है।
दमे का दौरा पड़ने पर स्वर बदलने से दमे का दौरा कम हो जाता है। जिस व्यक्ति का दिन में बायां और             रात में दायां स्वर चलता है वह हमेशा स्वस्थ रहता है।
गर्भधारण के समय अगर पुरुष का दायां स्वर और स्त्री का बायां स्वर चले तो उस समय में गर्भधारण               करने से निश्चय ही पुत्र पैदा होता है।

स्वर ज्ञान एवं स्वर बदलने की विधि

प्रकृति शरीर की जरूरत के मुताबिक स्वरों को बदलती रहती है। अगर जरूरत हो तो स्वर बदला भी जा सकता है।
वाम स्वर-
        जिस समय व्यक्ति का बाईं तरफ का स्वर चलता हो उस समय स्थिर, सौम्य और शांति वाला काम करने से वह काम पूरा हो जाता है जैसे- दोस्ती करना, भगवान के भजन करना, सजना-संवरना, किसी रोग की चिकित्सा शुरू करना, शादी करना, दान देना, हवन-यज्ञ करना, मकान आदि बनवाना शुरू करना, किसी यात्रा की शुरुआत करना, नई फसल के बीज बोना, पढ़ाई शुरू करना आदि।
दक्षिण स्वर-
        जिस समय व्यक्ति का दाईं तरफ का स्वर चल रहा हो उस समय उसे काफी मुश्किल, गुस्से वाले और रुद्र कामों को करना चाहिए जैसे- किसी चीज की सवारी करना, लड़ाई में जाना, व्यायाम करना, पहाड़ पर चढ़ना, स्नान करना और भोजन करना आदि।
सुषुम्ना स्वर -
         जिस समय नाक के दोनों छिद्रों से बराबर स्वर चलते हो तो इसे सुषुम्ना स्वर कहते हैं। उस समय मुक्त फल देने वाले कामों को करने से सिद्धि जल्दी मिल जाती है जैसे- धर्म वाले काम में भगवान का ध्यान लगाना तथा योग-साधना आदि करने चाहिए।
विशेष-
        जो काम `चंद्र और `सूर्य´ नाड़ी में करने चाहिए उन्हें `सुषुम्ना´ के समय बिल्कुल भी न करें नहीं तो इसका उल्टा असर पड़ता है।
स्वर चलने का ज्ञान-
        अगर कोई व्यक्ति जानना चाहता है कि किस समय कौन सा स्वर चल रहा है तो इसको जानने का तरीका बहुत आसान है। सबसे पहले नाक के एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। फिर इस छिद्र को बंद करके उसी तरह से दूसरे छिद्र से 2-4 बार जोर-जोर से सांस लीजिए। नाक के जिस छिद्र से सांस लेने और छोड़ने में आसानी लग रही हो समझना चाहिए कि उस तरफ का स्वर चल रहा है और जिस तरफ से सांस लेने और छोड़ने में परेशानी हो उसे बंद समझना चाहिए।
 श्वास  की गति बदलना-
यदि  कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से अपनी सांस की चलने की गति को बदलना चाहता है तो इसकी 3 विधियां हैं-
श्वास  की गति बदलने की विधि-
नाक के जिस तरफ के छेद से सांस चल रही हो, उसके दूसरी तरफ के नाक के छिद्र को अंगूठे से दबाकर रखना चाहिए तथा जिस तरफ से सांस चल रही हो वहां से हवा को अंदर खींचना चाहिए। फिर उस तरफ के छिद्र को दबाकर नाक के दूसरे छिद्र से हवा को बाहर निकालना चाहिए। कुछ देर तक इसी तरह से नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से सांस निकालने से सांस की गति जरूर बदल जाती है।
जिस तरफ के नाक के छिद्र से सांस चल रही हो उसी करवट सोकर नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से छोड़ने की क्रिया को करने से सांस की गति जल्दी बदल जाती है।
नाक के जिस तरफ के छिद्र से सांस चल रही हो सिर्फ उसी करवट थोड़ी देर तक लेटने से भी सांस के चलने की गति बदल जाती है।
प्राणवायु को सुषुम्ना में संचारित करने की विधि :-
        प्राणवायु को सुषुम्ना नाड़ी में जमा करने के लिए सबसे पहले नाक के किसी भी एक छिद्र को बंद करके दूसरे छिद्र से सांस लेने की क्रिया करें और फिर तुरंत ही बंद छिद्र को खोलकर दूसरे छिद्र से सांस को बाहर निकाल दीजिए। इसके बाद नाक के जिस तरफ के छिद्र से सांस छोड़ी हो, उसी से सांस लेकर दूसरे छिद्र से सांस को बाहर छोड़िये। इस तरह नाक के एक छिद्र से सांस लेकर दूसरे से सांस निकालने और फिर दूसरे से सांस लेकर पहले से छोड़ने से लगभग 50 बार में प्राणवायु का संचार `सुषुम्ना´ नाड़ी में जरूर हो जाएगा।
स्वर साधना का पांचों तत्वों से सम्बंध-
        हमारे शरीर को बनाने में जो पांच तत्व (आकाश, पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल) होते हैं उनमें से कोई न कोई तत्व हर समय स्वर के साथ मौजूद रहता है। जब तक स्वर नाक के एक छिद्र से चलता रहता है, तब तक पांचों तत्व 1-1 बार उदय होकर अपने-अपने समय तक मौजूद रहने के बाद वापिस चले जाते हैं।
स्वर के साथ तत्वों का ज्ञान-
        स्वर के साथ कौन सा तत्व मौजूद होता है, यह किस तरह कैसे जाना जाए पंचतत्वों का उदय स्वर के उदय के साथ कैसे होता है और उन्हें कैसे जाना जा सकता है। इसके बहुत से उपाय हैं, लेकिन ये तरीके इतने ज्यादा सूक्ष्म और मुश्किल होते हैं कि कोई भी आम व्यक्ति बिना अभ्यास के उन्हें नहीं जान सकता।
जैसे-
नाक के छिद्र से चलती हुई सांस की ऊपर नीचे तिरछे बीच में घूम-घूमकर बदलती हुई गति से किसी खास तत्व की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है।
हर तत्व का अपना एक खास आकार होता है। इसलिए निर्मल दर्पण पर सांस को छोड़ने से जो आकृति बनती है उस आकृति को देखकर उस समय जो तत्व मौजूद होता है, उसका पता चल जाता है।
शरीर में स्थित अलग-अलग चक्रों द्वारा किसी खास तत्व की मौजूदगी का पता लगाया जाता है।
हर तत्व का अपना-अपना एक खास रंग होता है। इससे भी तत्वों के बारे में पता लगाया जा सकता है।
हर तत्व का अपना एक अलग स्वाद होता है। उसके द्वारा भी पता लगाया जा सकता है।
सुबह के समय तत्व के क्रम द्वारा नाक के जिस छिद्र से सांस चलती हो उसमें साधारणत: पहले वायु, फिर अग्नि, फिर पृथ्वी इसके बाद पानी और अंत में आकाश का क्रमश: 8, 12, 20, 16 और 4 मिनट तक उदय होता है।
          तत्वों के परिमाण द्वारा भी किसी तत्व की स्वर के साथ मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है। इसका तरीका यह है कि बारीक हल्की रूई लेकर उसे जिस नाक के छिद्र से सांस चल रही हो, उसके पास धीरे-धीरे ले जाइए। जहां पर पहले-पहले रुई हवा की गति से हिलने लगे वहां पर रुक जाए और उस दूरी को नाप लीजिए। यदि वह दूरी कम से कम 12 अंगुल हो तो पृथ्वी तत्व,16 अंगुल हो तो जल तत्व, 4 अंगुल हो तो अग्नि तत्व, 8 अंगुल हो तो वायु तत्व और 20 अंगुल हो तो आकाश तत्व की मौजूदगी समझनी चाहिए।

वायु तत्व चिकित्सा - वायु सेवन से रोगमुक्ति

आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि पांचों तत्वों में से वायु सबसे जरूरी दूसरा तत्व है। जल जीवन है और वायु प्राणियों का प्राण ही है। अगर हमको 1 मिनट तक भी वायु न मिले तो हमारा दिल घबराने लगता है। अगर काफी देर तक वायु न मिले तो हमारे प्राण भी निकल सकते हैं। इसलिए वायु मनुष्य के जीने के लिए बहुत जरूरी है। एक मनुष्य 1 मिनट में 16 से 18 बार सांस लेता है। एक बार सांस लेने में 25 से 30 घन इंच और 1 दिन में 32 से 36 पौंड तक वायु की जरूरत होती है। सांस लेने की हर क्रिया का सम्बंध शरीर की 100 से ज्यादा मांसपेशियों से होता है। हम रोजाना जितना भोजन करते है और पानी पीते हैं, उससे लगभग 7 गुना वायु लेते हैं। हम सांस द्वारा जो वायु अंदर लेते है वह फेफड़ों में 15 वर्ग फुट से ज्यादा का चक्कर लगाती है। फेफड़ों में लगभग 60 घन इंच वायु हमेशा मौजूद रहती है और 25 से 33 घन इंच वायु सांस को बाहर छोड़ने के रूप में बाहर निकल आती है। पूरी दुनिया का वायुमंडल पृथ्वी के चारों ओर लगभग 300 मील तक फैला हुआ है। यह वायुमंडल कई प्रकार की वायु का मिश्रण है। इसमें जल की भाप का बहुत बड़ा अंश मौजूद है। इसके अलावा इसमें 4 भाग नाइट्रोजन और 1 भाग ऑक्सीजन है। ये दोनों वायव्य हमारे शरीर के लिए बहुत ही जरूरी हैं। इन दोनों के अलावा कार्बन डाईऑक्साइड वायु भी 10 हजार में 4 अंश तक वायुमंडल में मौजूद है। बहुत ही कम मात्राओं में कहीं-कहीं रासायनिक क्रिया से पैदा हुए दूसरे प्रकार के वायव्य भी मिलते हैं। धूल के कण भी वायुमंडल में मौजूद रहते हैं। जो वायु सांस लेने के साथ हमारे शरीर में जाती है, उसमें `नाइट्रोजन´ वायु शरीर के लिए किसी काम की नहीं होती। यह वायु जिस तरह आती है उसी तरह वापिस लौट जाती है। ऑक्सीजन वायु लौटकर दुबारा नहीं आती है। ऑक्सीजन वायु शरीर के अंदर जाते ही फेफड़ों के द्वारा खून में मिल जाती है। ऑक्सीजन गंदे, नीले खून को साफ करके उसे साफ और लाल कर देती है। नीले गंदे खून से कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है जो नाइट्रोजन वायु और भाप आदि के साथ अंदर से बाहर नि जीवन क्या है? शरीर के अवयवों का ऑक्सीजन के साथ मिलकर धीरे-धीरे मोमबती की तरह जलना ही तो है। खून के लाल कण वायु से ऑक्सीजन को लेकर शरीर के हर बारीक कणों के पास पहुंचाते हैं। इसी प्राकृतिक विधि को ऑक्सीकरण कहते हैं, जो जलने का सिर्फ रूपांतर है। इस विधि से गर्मी पैदा होती है जिससे शरीर की गर्मी ठीक-ठाक रहती है और जीवन भी समाप्त नहीं होता।
        शुद्ध वायु के अंदर एक तरह की और बहुत ही उपयोगी वायु मिली हुई होती है जिसको ओजोन कहा जाता है। यह ओजोन सिर्फ जंगल, पहाड़ और समुद्र के किनारों की हवा में पाई जाती है। इसकी खुशबू बहुत ही तेज होती है, जिससे ये पहचानी जाती है। टी.बी के रोगियों को चिकित्सक ज्यादातर पहाड़ी क्षेत्रों में जाने को बोलते हैं वहां पर इसी ओजोन से उनका रोग ठीक हो जाता है। वायु सिर्फ अग्नि क्षेत्र से साफ होती है, इसलिए हमारे बड़े-बूढों ने यज्ञ करने का विधान रखा था
        वायु तत्व ही जीवन होता है। यह एक शक्ति है जो शरीर के हर भाग को चलाती है। वायु दिल की क्रिया खून के बहाव को काबू में रखती है और शारीरिक संतुलन को बनाए रखती है। यह सांस लेने और टट्टी-पेशाब को लाने में मदद करती है। यह आवाज पैदा करती है। वायु दिमागी ताकत और याददाश्त को बढ़ाती है।कलती रहती है।

वायु सेवन की विधि :
`वायु सेवन´ और `पवन सेवन´ होती तो एक ही क्रिया है लेकिन इस क्रिया के नाम दो हैं। `वायु सेवन´ को अंग्रेजी में एअर बाथ या मांर्निग वाक कहते हैं। इसको आम भाषा में हवाखाना या टहलना भी कहा जाता है।
वायु स्नान (ताजी हवा खाना)-
        शरीर को ताजी हवा खिलाना वायु स्नान कहलाता है। त्वचा के रोमकूपों को खुला और सक्रिय बनाए रखने के लिए वायु स्नान बहुत जरूरी है। जो लोग हर मौसम में अपने शरीर को पूरी तरह से कपड़ों में ढककर रखते हैं उन्हें बड़ी जल्दी रोग पकड़ लेते हैं। गर्मी के मौसम में कम कपड़े पहनकर सुबह के समय खुली हवा में वायु स्नान करें या रात को छत पर खुले आसमान के नीचे सोकर भी वायु स्नान किया जा सकता है। बारिश के मौसम में या सर्दियों में बरामदे या कमरे की खिड़की को खोलकर सोने से भी शरीर का वायु स्नान हो जाता है। रात को सोते समय मुंह नहीं ढकना चाहिए और घर की खिड़की खोलकर सोना चाहिए।
        `वायु सेवन´ एक ऐसा स्नान है जिसके जरिये शरीर की अंदर और बाहर दोनों से ही अच्छी तरह सफाई हो जाती है। अगर `वायु सेवन´ को बिना कपड़ों के किया जाए तो यह बहुत लाभकारी होता है। जिस तरह हम हर समय नाक से सांस लेते हैं उसी तरह से हमारे शरीर की त्वचा के अनगिनत छिद्रों द्वारा सांस लेना भी बहुत जरूरी है। जिस तरह से घर को साफ और पवित्र बनाने के लिए घर की खिड़कियां और दरवाजे खोलकर घर के अंदर ताजी हवा का आना जरूरी है, उसी तरह से शरीर में भी त्वचा के छिद्रों से होकर ताजी हवा का जाना जरूरी है। अगर हर समय शरीर पर कपड़े पहनकर रहा जाए तो इससे शरीर पीला सा हो जाता है और त्वचा के रोमछिद्र बंद हो जाते हैं, नतीजतन व्यक्ति को रोजाना कब्ज होना, दिल में दर्द होना और डायबिटीज जैसे भयानक रोग सताने लगते हैं। जब `वायु सेवन´ करने वाला व्यक्ति बिल्कुल शुद्ध वातावरण में नंगे बदन सही तरीके से घूमने लगता है तो वह जैसे सारे संसार के आनंद को अपने अंदर ग्रहण करता है, आकाश से वार्तालाप करता है, फेफड़ों को जो ऑक्सीजन मिलती है जोकि `प्रकृति माता´ के स्तन का अमृत ही है। पूरे साल `वायु सेवन´ का सुखपूर्वक और आनंदपूर्वक लाभ लिया जा सकता है। सर्दी के दिनों में `वायु सेवन´ करने से जो सुख मिलता है उसको बताया नहीं जा सकता। एक बहुत ही प्रसिद्ध विचारक जूलिएट सैनफोर्ड ने कहा था- `वायु सेवन´ करना न केवल जीवन की एक जरूरत है, बल्कि यह एक कला भी है, खुशी है, पौष्टिक तत्व है, प्रकृति का वरदान है तथा यह संसार का सबसे अच्छा व्यायाम है।
        पूरी दुनिया में संसार की बहुत सी पद्धतियां पाई जाती हैं, जिनमें से कुछ सिर्फ शरीर की मांसपेशियों को मजबूत करने वाली होती हैं और कुछ फेफड़ों और उनसे सम्बंधित अवयवों को मजबूत करने वाली होती हैं, लेकिन जितना आसान और स्वाभाविक व्यायाम टहलने का है, उस तरह का व्यायाम किसी दूसरे व्यायाम पद्धति में नहीं है। टहलने से बच्चे, बूढ़े और जवान सभी उम्र के लोग बराबर ही लाभ पा सकते हैं। यह इस व्यायाम की सबसे बड़ी खासियत है। इसके अलावा इसकी दूसरी विशेषता यह हैं कि इससे किसी का जी नहीं भर सकता। जबकि दूसरे व्यायामों को लोग कुछ दिनों तक करने के बाद अक्सर ऊबकर छोड़ दिया करते हैं। जो लोग हरदम नर्म-मुलायम गद्दे-तकियों पर ही बैठे रहते हैं या जिन लोगों को ज्यादा मानसिक और शारीरिक मेहनत नहीं करनी पड़ती, उन लोगों के लिए टहलने से बढ़कर लाभकारी दूसरा कोई व्यायाम नहीं हो सकता। टहलने में अच्छी बात यह है कि इससे टहलने से मन को आराम भी मिलता है और शरीर की कसरत भी हो जाती है। एक व्यक्ति जो बिल्कुल स्वस्थ हो वह पूरी रात अच्छी तरह से सोने के बाद जब सुबह के समय उठकर ताजी हवा खाने के लिए जाता है तो उसका मन दुनिया की सारी दुख-परेशानियों को भूलकर जिस मानसिक सुकून को महसूस करता है उसको तो बताया ही नहीं जा सकता, इसको तो सिर्फ वही व्यक्ति जानता है जिसने इसका आनंद लिया हो। बहुत से लोग जो दूसरे तरह की कसरत नहीं कर सकते, उनके लिए टहलने का कसरत बहुत ही आसान और जरूरी है। इससे सिर से लेकर पैरों तक की कसरत हो जाती है। टहलने पर दिल के धड़कने की गति 1 मिनट में 72 बार से बढ़कर 1 मिनट में 82 बार हो जाती है। टहलते समय हमारी सांस भी बड़ी तेजी से चलने लगती है जिससे ज्यादा ऑक्सीजन खून में पहुंचकर खून को साफ करती है।
विशेष-
        `वायु सेवन´ अर्थात् टहलते समय एक बात बहुत ज्यादा ध्यान देने वाली यह है कि यह `वायु सेवन´ सिर्फ प्राकृतिक ताजी हवा में ही करने से लाभ मिलता है। बिजली आदि के पंखों आदि से यह स्नान बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि `वायु सेवन´ के लिए किसी भी तरह की नकली वायु का सेवन करना हानिकारक होता है। पंखे की हवा घूमती हुई और तेज होती है। ऐसी वायु उदान वायु को खराब कर देती है और व्यान वायु को रोक देती है जिससे व्यक्ति का सिर घूमने लगता है तथा उसके शरीर के जोड़ों में दर्द करने वाला गठिया रोग हो जाता है।
कपड़े के पंखे से हवा करने से पसीना, थकावट और सिर घूमना आदि रोग दूर हो जाते हैं।
ताड़ के पंखे की हवा वात-पित्त और कफ को कुपित करती है।
बांस के पंखे से हवा करने से गर्म हवा आती है और यह रक्तपित्त को कुपित करती है।
अम्बर, खस, मोर के पंखों तथा बेंत के पंखों की हवा ठंडी और दिल को प्रसन्नता देने वाली होती है।
प्रदूषण वाली वायु का सेवन करने से व्यक्ति को खांसी, फेफड़ों में जलन, भोजन का न पचना और कमजोरी जैसे रोग हो जाते हैं।