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Thursday, February 23

क्या आपको ग्रीन टी का सही प्रयोग पता है ?


By- Dr. Kailash Dwivedi

आजकल ग्रीन टी का प्रयोग तेज़ी से बढ़ रहा है | इसे पारंपरिक चाय के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है | ऐसा इसके स्वास्थ्यवर्धक गुणों के चलते हो रहा है | लेकिन क्या आपको ग्रीन टी बनाने एवं इसके प्रयोग की सही विधि पता है, यदि नहीं तो पढ़ें यह आलेख -

ग्रीन टी एक प्रकार की चाय है, जो कैमेलिया साइनेन्सिस नामक पौधे की पत्तियों से बनायी जाती है। इसके बनाने की प्रक्रिया में ऑक्सीकरण न्यूनतम होता है। इसके सेवन के अनेकों लाभ होते हैं। ग्रीन टी हृदय रोग होने की संभावनाओं को कम करने, कोलेस्ट्राल को कम करने के साथ ही शरीर के वजन को भी नियंत्रित करने में सहायक सिद्ध होती है।

ग्रीन टी में चीनी एवं दूध न मिलाएं :


चीनी को सफ़ेद जहर की संज्ञा दी गयी है | ग्रीन टी में चीनी मिलाने से उसमें कैलोरीज़ बहुत बढ़ जाती हैं।फलस्वरूप वजन नियंत्रित करने के लिए ग्रीन टी पीने का उद्देश्य पूरी तरह समाप्त हो जाता है। अत: इसे बिना चीनी के पीना अधिक लाभदायक है | चीनी के स्थान पर स्वाद के लिए आप शहद मिला सकते हैं।
ग्रीन टी में दूध मिलाने से भी यह प्रभावकारी नहीं होती। क्योंकि दूध में उपस्थित पोषक तत्वों के कारण वज़न कम करने में बाधा आती है।

बची हुयी ग्रीन टी को दोबारा गर्म न करें: 

ग्रीन टी को पुन: गर्म करने से उसमें उपस्थित प्राकृतिक गुण समाप्त हो जाते हैं। अच्छा होगा कि आप ताज़ी बनी हुई चाय ही पियें |

ग्रीन टी पीने का समय एवं मात्रा निश्चित करें :

ग्रीन टी पीने का एक सही समय भी तय होना चाहिए, वरना ये नुकसानदेह भी हो सकता है. ग्रीन टी में कैफीन और टेनिन्स पाए जाते हैं, जो गैस्ट्रिक जूस को डाइल्यूट करके पेट को नुकसान पहुंचा सकते हैं |  इसके अधि‍क इस्तेमाल से चक्कर आने, उल्टी आने और गैस होने जैसी प्रॉब्लम हो सकती हैं | ग्रीन टी कभी भी पी लेना ठीक नहीं है | पूर्ण लाभ के लिए  इसके सेवन का एक समय निश्चित करना उचित होगा | कभी भी भोजन के तुरंत बाद इसका सेवन न करें | बिलकुल खाली पेट भी ग्रीन टी न पिएं | एक दिन में दो या तीन कप ये ज्यादा ग्रीन टी पीना खतरनाक हो सकता है |

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Tuesday, February 21

जानिए, गंजेपन के कारण एवं इससे बचने के उपाय !



By- Dr. Kailash Dwivedi
WHO (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन)  की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 100 वर्षों में गंजापन सबसे तेजी से फैला है |  इसका सबसे बड़ा कारण बालों की सही ढंग से देखभाल न करना है |  फलस्वरूप हेयर फॉल, ड्राय हेयर और डैंड्रफ जैसी समस्यायों का सामना करना पड़ता है। इस आलेख में जानें वे कारण जो मुख्यतः गंजापन का कारण बन रहे हैं |

संतुलित आहार :


गंजापन के प्रमुख कारणों में संतुलित आहार न लेना है | अनाप-शनाप भोजन से से बाल झड़ना, ड्राय एवं बालों का दो मुंहा होने की प्रॉब्लम होने लगती हैं। हरी पत्तेदार सब्ज़ियां एवं मौसम के फल इन समस्यायों को रोकने में मददगार साबित होते हैं | ध्यान रहे कि भोजन में विटामिन B-12 और विटामिन C को आवश्यक रूप से शामिल करें।

बालों में ज्यादा हीट देना :


बालों को सुखाने के लिए आवश्यकता से अधिक हीट देने पर बाल डैमेज होने और झड़ने लगते हैं। इससे बालों का प्राकृतिक रंग भी प्रभावित होता है | इस समस्या से बचने के लिए बालों को स्ट्रेट करने के लिए जिस मशीन का प्रयोग किया जाता है उसे सही तापमान पर सेट करना चाहिए।

बालों में तेल लगाकर सोना :

रात्रि में बालों में तेल लगाकर सोने से बालों के टूटने और डस्ट लगने की समस्या होने लगती है। अतः गंजेपन से बचने के लिए नहाने के एक घंटे पहले ही बालों में तेल लगाना चाहिए। एवं नियमित रूप से बालों की मसाजभी करनी चाहिए |

गीले बालों रगड़ना एवं बांधना  :


गीले बालों की जड़ों में नमी होती है। इसलिए गीले बालों को बाँधने से यह टूटने लगते है | गीले बालों को तौलिया से ज्यादा रगडने से भी यह टूटने लगते हैं। इसलिए पहले बालों को हवा में सुखाएं इसके बाद ही हल्के हाथों से पोछें।

प्रतिदिन शैम्पू करना :


प्रतिदिन बालों में शैम्पू करने से बाल कमजोर होने लगते हैं |फलस्वरूप यह आसानी से टूटने लगते हैं। अतः गंजेपन से बचने के लिए ध्यान रखें कि प्रतिदिन बालों को शैम्पू न करें |


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Thursday, February 16

जानिए, दुनिया के सबसे बड़े 11 डॉक्टर




  1. प्रातःकाल १५ मिनिट सूर्य किरणों का सेवन
  2. रोज़ाना ६-८ घंटे की नींद
  3. शुद्ध शाकाहारी भोजन
  4. हर सुबह ४५ मिनिट व्यायाम्
  5. अपने आप पर पूर्ण आस्था एवं विश्वास
  6. हर दिन ३-५ लि० पानी सेवन
  7. नकारात्मक परिस्थितियों में भी पूर्ण रूप से सकारात्मक विचार
  8. परिपूर्ण ४५-६० मिनिट मनोरंजन
  9. मानसिक तनाव रहित दिनचर्या
  10. ग्रंथों या फिर अतिश्रेष्ठ प्रवचनों द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान वृद्धि
  11. बहुत ही अच्छे, परिपूर्ण व बुद्धिमान मित्र


इन ग्यारह/११ नियमों का, आज और अभी से, पूर्ण दृढ़ता एवं विश्वास के साथ, अपनी दैनंदिनी में पालन करना शुरू कीजिये और आजीवन निरोगी जीवन व्यतीत कीजिये...यही मेरा भी दृढ़ विश्वास है...और इसीलिये मैं भी निरोगी जीवन जी रहा हूँ...यानी २१वीं सदी में १९वीं सदी का जीवन...!!!

किसी भी प्रकार की कठिनाई, असमंजस या फिर असमर्थन होने पर, मुझसे यहां पर, यानी मेल द्वारा भी, सलाह लीजियेगा...

onemanarmyindia@ymail.com
कुमार गोयल गुरूजी-पुणे"
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Sunday, February 12

जानिए साबुत अनाज के फायदे !



दुनिया आज जिन्हें होल ग्रेन्स कह कर उन्हें खाने पर जोर दे रही है, वो हमारे पूर्वजों के भोजन का अहम हिस्सा रहे हैं। साबुत अनाज कहे जाने वाले होल ग्रेन्स को आज भी गांवों में खूब खाया जाता है, पर शहरों से ये गायब हो रहे हैं। आप इन्हें कैसे खा सकते हैं,इस पर आरती मिश्रा का आलेख - आपको याद होगा कि दादी-नानी के घर में अकसर बाजरे की रोटी, चोकर वाला गेहूं का आटा, मकई, भुना काला चना आदि खाया-खिलाया जाता था। पर पिछली एक पीढ़ी से शहरों में मिल में पिसा सफेद आटा, चिकने-फिसलते से चावल, मैदे से बना पिज्जा खाने का ट्रेंड हो गया है। यही वजह है कि होल ग्रेन्स के फायदों से नई पीढ़ी अनजान है। पश्चिमी देशों की बात करें तो वहां पहले से ही पिज्जा-बर्गर संस्कृति रही है, ऐसे में उन्हें अब डॉक्टर होल ग्रेन्स से बने पिज्जा, बर्गर, पॉपकार्न खाने की सलाह दे रहे हैं। हम तो इन्हें कई तरह से खा सकते हैं और इनका लाभ उठा सकते हैं।

होल ग्रेन्स हैं क्या :


होल ग्रेन्स में किसी भी अनाज का चोकर, बीज और अंतरबीज तीनों चीजें होती हैं। यह फसल का मूल रूप होता है। इसका किसी भी तरह से संशोधन नहीं किया गया होता, जबकि संशोधित अनाज में चोकर एवं बीज को अलग कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में इसके भीतर के पोषक तत्व कम हो जाते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि संशोधन के बाद अनाज से करीब 25 प्रतिशत प्रोटीन कम हो जाता है। साथ ही इसमें 17 पोषक तत्व तो तकरीबन पूरी तरह से गायब हो जाते हैं। इसके बाद संशोधन करने वाले इसमें कुछ विटामिन और पोषक तत्व मिक्स करते हैं।

फाइबर का अच्छा स्रोत :


डॉक्टरों के अनुसार, एक वयस्क व्यक्ति के शरीर को प्रतिदिन 25 से 35 ग्राम फाइबर की आवश्यकता होती है। होल ग्रेन्स में दो तरह के फाइबर होते हैं- घुलनशील व अघुलनशील। ये दोनों ही स्वास्थ्य के लिए लाभदायी हैं। होल ग्रेन्स से बनी ब्रेड के दो पीस खाने से ही आपको करीब 5 ग्राम फाइबर मिल जाता है, जबकि व्हाइट ब्रेड खाने से केवल 1.9 ग्राम फाइबर मिल पाता है। इसी तरह आपको आधा कप ब्राउन राइस में 5.5 ग्राम फाइबर मिलता है, जबकि इतनी ही मात्रा में सफेद चावल से 2 ग्राम मिलता है। यह धीरे-धीरे पचता है, इसलिए आप लंबे समय तक स्फूर्तिवान भी महसूस करते हैं। फाइबर लेने से ब्लड शुगर कंट्रोल में रहती है, बैड कोलेस्ट्रॉल कम होता है और यह कोलोन कैंसर होने के खतरे को भी कम करता है।

पाचन में सहायक :


इसमें काफी सारा फाइबर होता है, इसलिए पाचन क्रिया निरंतर चलती रहती है। इसके अलावा होल ग्रेन्स में लेक्टिक एसिड होता है, जो अच्छे किस्म के बैक्टीरिया को हमारी बड़ी आंत तक पहुंचाता है। इससे पाचन क्रिया तेज होती है, पोषक तत्वों को शरीर सोखता है और शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है। कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक होल ग्रेन्स शरीर द्वारा बैड कोलेस्ट्रॉल को सोखने से रोकने और ट्रिगलीसेरिड्स को कम करने में सहायक हैं। ये दोनों ही हृदय संबंधी बीमारियों को उत्पन्न करते हैं। कुछ समय पहले हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि ऐसी महिलाएं, जो प्रतिदिन 2 से 3 बार होल ग्रेन उत्पादों का सेवन करती हैं, वे दूसरी महिलाओं की तुलना में हृदय रोगों से 30 फीसदी कम पीडि़त होती हैं।

उच्च रक्तचाप कन्ट्रोल करने में सहायक :


उच्च रक्तचाप से पीडि़त लोगों के लिए होल ग्रेन्स काफी फायदेमंद हैं। एक अध्ययन में पता चला है कि नाश्ते में होल ग्रेन्स लेने वाले लोगों में दूसरों की तुलना में 19 प्रतिशत तक रक्तचाप पर नियंत्रण पाया गया।


वजन को करता है नियंत्रित :


इस फूड का एक बड़ा फायदा यह है कि इसे भूख से अधिक खाने पर भी वजन नहीं बढ़ता। चूंकि इसमें फाइबर अधिक होता है, इसलिए पचने में भी आसानी होती है। इस तरह से यह मोटापे को भी नियंत्रित कर सकता है। कई शोधों से यह बात भी सामने आई है कि यह शरीर की किसी जगह पर अतिरिक्त फैट को कम करता है। शरीर एक समान तरीके से बढ़ता है। पेट की चर्बी को कम करने में यह लाभदायक है। यह रक्त में शुगर की मात्रा को नियंत्रित रखता है, जिससे डायबिटीज होने का खतरा कम हो जाता है।

अस्थमा का खतरा हो जाता है कम :


अगर बच्चों को होल ग्रेन्स खाने की आदत डलवाई जाए तो उन्हें इससे कई फायदे हो सकते हैं। एक शोध में सामने आया है कि जो बच्चे ओट्स खाते हैं, पांच साल की उम्र में पहुंचने तक उनमें एलर्जी की समस्या होने का खतरा कम होता जाता है। एक डच स्टडी में भी इस तरह के परिणाम सामने आए थे। कैंसर का खतरा होता है कम कई शोधों में इस बात का खुलासा हुआ है कि होल ग्रेन्स खाने से कोलोरेक्टल, ब्रेस्ट और पेनक्रियेटिक कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है।

हमारे होल ग्रेन अनाज :


गेहूं, ब्राउन राइस, ओट्स, मक्का, ज्वार, रागी, बाजरा, काला चना, दलिया, छिलके वाले अन्य अनाज इसमें शामिल होते हैं। दूसरे अनाज से किस तरह बेहतर संशोधित अनाजों की तुलना में होल ग्रेन्स के भीतर प्रति यूनिट अधिक पोषक तत्व होते हैं। इनमें फाइबर भी अधिक होता है, इसलिए ये पेट के लिए अच्छे होते हैं।

आहार में कैसे करें शामिल :


कई सारे अनाजों को पिसवा कर आटा तैयार कर सकते हैं। फिर इसकी रोटी बना कर भोजन में शामिल करें। आटे के लिए गेहूं, बाजरा, ज्वार और रागी को मिलाएं। इसके अलावा आप होल व्हीट वाली ब्रेड, ओट्स, कॉर्न फ्लेक्स ले सकते हैं। ब्राउन राइस और रागी को उबाल कर इडली भी बना सकते हैं। ओट्स और होल व्हीट को मिला कर केक, पेस्ट्री आदि बना सकते हैं। बच्चों को होल व्हीट पास्ता दे सकते हैं। मक्के की रोटी बना सकते हैं। ज्वार जहां वजन कम करने में सहायक है वहीं फाइबर का अच्छा स्रोत है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स भी खूब होते हैं। इसकी रोटी बना कर खा सकते हैं। बाजरा एनीमिया दूर करने में सहायक होता है। ग्रेन्स को अगर स्प्राउट्स के रूप में खाया जाए तो भी फायदेमंद है।

कितना खाना चाहिए :


अमेरिका की डाइटरी गाइडलाइंस के मुताबिक, सभी वयस्कों को कुल भोजन में से आधी मात्रा होल ग्रेन्स की खानी चाहिए। बच्चों को दिन में 2 से 3 बार होल ग्रेन पदार्थ देने चाहिए।  (साभार - livehindustan.com)                                                                                                                                                                    
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Wednesday, January 25

इन उपायों से कमर दर्द हो जायेगा गायब !


By- Dr. Kailash Dwivedi

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कारण :

  1. हमेशा ऊंची एड़ी के जूते या सेंडिल पहनना
  2. मांसपेशियों पर अत्यधिक तनाव
  3. गलत तरीके से अधिक वजन उठाना 
  4. गलत तरीके से बैठना

उपचार :


  • रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन-चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियां काली न हो जायें) गर्म कर लें। ठंडा होने पर इस तेल से कमर की मालिश करें।
  • नमक मिले गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। इसके बाद पेट के बल लेट जाएं। दर्द के स्थान पर तौलिये से भाप लें। कमर दर्द से राहत पहुंचाने का यह एक अचूक उपाय है।
  • कढ़ाई में दो-तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। इस नमक को थोड़े मोटे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। कमर पर इस पोटली से सेक करने से भी दर्द से आराम मिलता है।
  • अजवाइन को तवे के पर थोड़ी धीमी आंच पर सेंक लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चबाते हुए निगल जाएं। इसके नियमित सेवन से कमर दर्द में लाभ मिलता है।
  • अधिक देर तक एक ही पोजीशन में बैठकर काम न करें। हर चालीस मिनट में अपनी कुर्सी से उठकर थोड़ी देर टहल लें।
  • नर्म गद्देदार सीटों से परहेज करना चाहिए। कमर दर्द के रोगियों को थोड़ा सख्ते बिस्तर बिछाकर सोना चाहिए।
  • योग भी कमर दर्द में लाभ पहुंचाता है। भुजंगासन, शलभासन, हलासन, उत्तानपादासन, श्वसन आदि कुछ ऐसे योगासन हैं जो की कमर दर्द में काफी लाभ पहुंचाते हैं। कमर दर्द के योगासनों को योगगुरु की देख रेख में ही करने चाहिए।
  • कैल्शियम की कम मात्रा से भी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, इसलिए कैल्शियमयुक्त चीजों का सेवन करें।
  • कमर दर्द के लिए व्यायाम भी करना चाहिए। सैर करना, तैरना या साइकिल चलाना सुरक्षित व्यायाम हैं। तैराकी जहां वजन तो कम करती है, वहीं यह कमर के लिए भी लाभकारी है। साइकिल चलाते समय कमर सीधी रखनी चाहिए। व्यायाम करने से मांसपेशियों को ताकत मिलेगी तथा वजन भी नहीं बढ़ेगा।
  • कमर दर्द में भारी वजन उठाते समय या जमीन से किसी भी चीज को उठाते समय कमर के बल ना झुकें बल्कि पहले घुटने मोड़कर नीचे झुकें और जब हाथ नीचे वस्तु तक पहुंच जाए तो उसे उठाकर घुटने को सीधा करते हुए खड़े हो जाएं।
  • कार चलाते वक्त सीट सख्त होनी चाहिए, बैठने का पोश्चर भी सही रखें और कार ड्राइव करते समय सीट बेल्ट टाइट कर लें।
  • ऑफिस में काम करते समय कभी भी पीठ के सहारे न बैठें। अपनी पीठ को कुर्सी पर इस तरह टिकाएं कि यह हमेशा सीधी रहे। गर्दन को सीधा रखने के लिए कुर्सी में पीछे की ओर मोटा तौलिया मोड़ कर लगाया जा सकता है।
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Thursday, January 5

क्या आप जानते हैं पसीना बहाने के यह फायदे ?







वर्तमान में हमारी जीवनशैली ऐसी हो गयी है कि शरीर का पसीना बाहर नही निकल पाता, यही कारण है कि शरीर का प्राकृतिक रूप से शोधन नहीं हो पाता फलस्वरूप शरीर के मल निष्कासक अंग क्रियाहीन होते जा रहे हैं | स्वस्थ्य रहने के लिए शरीर के मल निष्कासक अंगों (त्वचा, फेफड़े, गुर्दे, आंतें) का सक्रिय रहना आवश्यक है | इसी क्रम में आईये जानते हैं शरीर से पसीना निकलने के फायदे |

रक्त संचार तेज करे :

बहुत अधिक पसीने की वजह से त्वचा को रक्त की ज्यादा जरूरत पड़ती है जिससे सभी अंगों में रक्त का संचार तेजी से होता है। अर्थात रक्त संचार ठीक रखने के लिए थोड़ा पसीना बहाना लाभदायक है।


तनाव से दिलाये राहत :

तनाव से राहत पाने के लिए भी पसीना निकलना आवश्यक है। यही वजह है कि तनाव के दौरान कसरत व शारीरिक श्रम पर जोर दिया जाता है जिससे शरीर से पसीना निकले और शरीर का ताप कम हो। इससे तनाव दूर होता है।

शरीर का केमिकल बैलेंस करे :

पसीने के साथ शरीर से अतिरिक्त सोडियम व पोटैशियम भी बाहर निकलता है जिससे शरीर में इनका बैलेंस बना रहता है। इससे हृदय से लेकर हड्डियों के रोगों से बचाव होता है।


वजन घटाने में सहायक :

पसीने के साथ-साथ शरीर की अतिरिक्त कैलोरी भी बर्न होती हैं। इसीलिए कसरत, स्टीम बाथ आदि उपायों को वेट लॉस प्रोग्राम का हिस्सा बनाया जाता है। कसरत के बाद जितना अधिक पसीना बहेगा उतनी अधिक कैलोरी घटेगी।


शरीर का शोधन करे :

शरीर में एकत्र हुए विषैले तत्व पसीने के साथ बाहर निकल जाते हैं। इससे किडनी, लिवर और आंतों की सफाई होती रहती है जिससे इनसे संबंधित रोगों से बचाव होता है।
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Saturday, December 31

जानिए ! चाय में पाए जाने वाले 10 प्रकार के विष



चाय में मांस से आठ गुना अधिक अम्ल होता है, एवं दस प्रकार के विष होते हैं | आईये जाने वे विष कौन-कौन से हैं एवं शरीर पर उनका क्या दुष्प्रभाव होता है -

चाय में पाए जाने वाले विष :

टेनिन :

टेनिन नाम का विष पेट में छाले तथा पैदा करता है | यह कब्ज करने वाला पदार्थ है और पाचन शक्ति को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। शरीर पर इस विष का प्रभाव शराब से बिल्कुल मिलता-जुलता है। शुरू में ताजगी अनुभव होती है परन्तु थोड़ी देर में नशा उतर जाने पर खुश्की और थकान पैदा होती है, जिसके कारण ज्यादा चाय पीने का मन करता है।

थिन :

थिन नामक विष से शरीर में खुश्की बढती है तथा यह फेफड़ों और सिर में भारीपन पैदा करता है | चाय पीने से एक हल्का सा आनन्द मिलता है, जो इसी थिन नामक विष का प्रभाव होता है। यह हमारे ज्ञान तंतुओं पर बहुत विषैला प्रभाव डालता है।

कैफीन :

कैफीन नामक विष शरीर में एसिड बनाता है तथा गुर्दों को कमजोर करता है। यह एक बहुत ही भयंकर विष है। इसका प्रभाव शराब या तम्बाकू में पाए जाने वाले विष ‘निकोटीन’ के समान होता है। इससे शरीर बहुत जल्दी निर्बल और खोखला हो जाता है। यह दिल की धड़कन को बढ़ाता है और इसके सेवन से कभी-कभी तो व्यक्ति की धड़कन एकदम बंद हो जाती है और व्यक्ति मौत का शिकार हो जाता है। ‘कैफीन’ विष का ही प्रभाव है कि नशे के वशीभूत होकर व्यक्ति इसका आदी हो जाता है। कैफीन विष के कारण मूत्र की मात्रा में लगभग तीन गुना वृध्दि हो जाती है परन्तु उसके द्वारा शरीर का दूषित मल, जिसका शरीर की शुध्दि के लिए मूत्र द्वारा बाहर निकलना आवश्यक है, वह शरीर के अंदर ही जमा रहता है।फलस्वरूप ऐसे व्यक्तियों को गठिया, गुर्दे और हृदय संबंधी रोगों का शिकार होना पड़ता है।

वॉलाटाइल :

वॉलाटाइल नामक विष आँतों के ऊपर हानिकारक प्रभाव डालता है।

कार्बोनिक अम्ल :

कार्बोनिक अम्ल चाय में पाया जाने वाला कार्बोनिक अम्ल से एसिडिटी होती है।

पैमिन :

पैमिन से पाचनतंत्र कमजोर हो जाता है।

एरोमोलीक :

एरोमोलीक नामक विष भी आँतों के ऊपर हानिकारक प्रभाव डालता है।

साइनोजन :

साइनोजन विष अनिद्रा तथा लकवा जैसी भयंकर रोगों के लिए जिम्मेदार होता है।

ऑक्सेलिक अम्ल :

ऑक्सेलिक अम्ल शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है।

स्टिनॉयल :

स्टिनॉयल रक्तविकार तथा नपुंसकता पैदा करता है।

शरीर पर पड़ने वाले चाय के अन्य दुष्प्रभाव :

  • चाय का प्रभाव अत्यधिक उत्तेजना पैदा करने वाला है। यह शरीर एवं मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है।
    विशेषज्ञों के मतानुसार चाय का नशा अंदर ही अंदर अपना कार्य करता रहता है और धीरे-धीरे कुछ ही दिनों में शरीर को घुन की तरह खा जाता है।
  • आज हृदय तथा रक्त वाहिनियों के रोगों से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृध्दि हो रही है और इसका मुख्य कारण चाय का दिनोंदिन बढ़ता चलन ही है।
  • बादी, पेट फूलना, पेट दर्द, कब्ज, बदहजमी, हृदय गति अनियमित रूप से चलना और नींद का न आना आदि समस्याएं चाय पीने वाले लोगों में अक्सर पाई जाती है।
  • अधिक चाय पीने से दांतों एवं नेत्रों के विभिन्न रोग भी पैदा होने लगते हैं तथा चेहरे की कांति भी नष्ट होती जाती है।
  • चाय के सेवन करने से शरीर में उपलब्ध विटामिन्स नष्ट होते हैं। इसके सेवन से स्मरण शक्ति में दुर्बलता आती है। - चाय का सेवन लिवर पर बुरा प्रभाव डालता है।
  • जो लोग चाय बहुत पीते है उनकी आंतें जवाब दे जाती है | कब्ज घर कर जाती है और मल निष्कासन में कठिनाई आती है।
  • चाय में उपलब्ध यूरिक एसिड से मूत्राशय या मूत्र नलिकायें निर्बल हो जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप चाय का सेवन करने वाले व्यक्ति को बार-बार मूत्र आने की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
  • अक्सर लोग चाय के साथ नमकीन, नमकीन  बिस्कुट, पकौड़ी आदि लेते है | यह विरुद्ध आहार है, इससे त्वचा रोग होते है।
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चाय पीने के शौक़ीन लोग इसे अवश्य पढ़ें !



चाय में मांस से आठ गुना अधिक अम्ल होता है, एवं दस प्रकार के विष होते हैं | आईये जाने वे विष कौन-कौन से हैं एवं शरीर पर उनका क्या दुष्प्रभाव होता है -

चाय में पाए जाने वाले विष :


टेनिन :


टेनिन नाम का विष पेट में छाले तथा पैदा करता है | यह कब्ज करने वाला पदार्थ है और पाचन शक्ति को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। शरीर पर इस विष का प्रभाव शराब से बिल्कुल मिलता-जुलता है। शुरू में ताजगी अनुभव होती है परन्तु थोड़ी देर में नशा उतर जाने पर खुश्की और थकान पैदा होती है, जिसके कारण ज्यादा चाय पीने का मन करता है।

थिन :


थिन नामक विष से शरीर में खुश्की बढती है तथा यह फेफड़ों और सिर में भारीपन पैदा करता है | चाय पीने से एक हल्का सा आनन्द मिलता है, जो इसी थिन नामक विष का प्रभाव होता है। यह हमारे ज्ञान तंतुओं पर बहुत विषैला प्रभाव डालता है।

कैफीन :


कैफीन नामक विष शरीर में एसिड बनाता है तथा गुर्दों को कमजोर करता है। यह एक बहुत ही भयंकर विष है। इसका प्रभाव शराब या तम्बाकू में पाए जाने वाले विष ‘निकोटीन’ के समान होता है। इससे शरीर बहुत जल्दी निर्बल और खोखला हो जाता है। यह दिल की धड़कन को बढ़ाता है और इसके सेवन से कभी-कभी तो व्यक्ति की धड़कन एकदम बंद हो जाती है और व्यक्ति मौत का शिकार हो जाता है। ‘कैफीन’ विष का ही प्रभाव है कि नशे के वशीभूत होकर व्यक्ति इसका आदी हो जाता है। कैफीन विष के कारण मूत्र की मात्रा में लगभग तीन गुना वृध्दि हो जाती है परन्तु उसके द्वारा शरीर का दूषित मल, जिसका शरीर की शुध्दि के लिए मूत्र द्वारा बाहर निकलना आवश्यक है, वह शरीर के अंदर ही जमा रहता है।फलस्वरूप ऐसे व्यक्तियों को गठिया, गुर्दे और हृदय संबंधी रोगों का शिकार होना पड़ता है।

वॉलाटाइल :


वॉलाटाइल नामक विष आँतों के ऊपर हानिकारक प्रभाव डालता है।

कार्बोनिक अम्ल :


कार्बोनिक अम्ल चाय में पाया जाने वाला कार्बोनिक अम्ल से एसिडिटी होती है।

पैमिन :


पैमिन से पाचनतंत्र कमजोर हो जाता है।

एरोमोलीक :


एरोमोलीक नामक विष भी आँतों के ऊपर हानिकारक प्रभाव डालता है।

साइनोजन :


साइनोजन विष अनिद्रा तथा लकवा जैसी भयंकर रोगों के लिए जिम्मेदार होता है।

ऑक्सेलिक अम्ल :


ऑक्सेलिक अम्ल शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है।

स्टिनॉयल :


स्टिनॉयल रक्तविकार तथा नपुंसकता पैदा करता है।

शरीर पर पड़ने वाले चाय के अन्य दुष्प्रभाव :



  • चाय का प्रभाव अत्यधिक उत्तेजना पैदा करने वाला है। यह शरीर एवं मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है।
    विशेषज्ञों के मतानुसार चाय का नशा अंदर ही अंदर अपना कार्य करता रहता है और धीरे-धीरे कुछ ही दिनों में शरीर को घुन की तरह खा जाता है।

  • आज हृदय तथा रक्त वाहिनियों के रोगों से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृध्दि हो रही है और इसका मुख्य कारण चाय का दिनोंदिन बढ़ता चलन ही है।

  • बादी, पेट फूलना, पेट दर्द, कब्ज, बदहजमी, हृदय गति अनियमित रूप से चलना और नींद का न आना आदि समस्याएं चाय पीने वाले लोगों में अक्सर पाई जाती है।

  • अधिक चाय पीने से दांतों एवं नेत्रों के विभिन्न रोग भी पैदा होने लगते हैं तथा चेहरे की कांति भी नष्ट होती जाती है।

  • चाय के सेवन करने से शरीर में उपलब्ध विटामिन्स नष्ट होते हैं। इसके सेवन से स्मरण शक्ति में दुर्बलता आती है। - चाय का सेवन लिवर पर बुरा प्रभाव डालता है।

  • जो लोग चाय बहुत पीते है उनकी आंतें जवाब दे जाती है | कब्ज घर कर जाती है और मल निष्कासन में कठिनाई आती है।

  • चाय में उपलब्ध यूरिक एसिड से मूत्राशय या मूत्र नलिकायें निर्बल हो जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप चाय का सेवन करने वाले व्यक्ति को बार-बार मूत्र आने की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

  • अक्सर लोग चाय के साथ नमकीन, नमकीन  बिस्कुट, पकौड़ी आदि लेते है | यह विरुद्ध आहार है, इससे त्वचा रोग होते है।
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Wednesday, September 28

जानिए , हमारे देश की पुरानी मान्यतायें जिनसे लोग अनुमान लगाते हैं कि होनेवाला बच्चा लड़का है या लड़की !

यूँ तो भ्रूण का लिंग परीक्षण हमारे देश में क़ानूनी अपराध है लेकिन फिर भी प्रेगनेंसी के दौरान माता-पिता के साथ घरवालों और रिश्तेदारों में भी काफी उत्सुकता देखी जाती है।और इस बात को सभी जानना चाहते हैं कि आनेवाला बच्चा लड़की है या लड़का। हमारे देश की ऐसी कई मान्यतायें हैं जिनसे लोग अनुमान लगाते हैं कि होनेवाला बच्चा लड़का है या लड़की |

अस्वीकरण - इस लेख का उद्देश्य केवल पुरानी मान्यताओं से अवगत कराना है, इसलिए इसे पढ़कर कोई भी गैर क़ानूनी कदम न उठाया जाये, ऐसी पाठकों से अपेक्षा है | यदि कोई ऐसा करता है तो इसके लिए लेखक या nihsarg.com जिम्मेदार नहीं होगा |

आईये जानते हैं कौन सी हैं वे मान्यताएं | इन पुराने तरीकों को इस्तेमाल करने से किसी का नुकसान नहीं होता। साथ ही ध्यान रहे कि इन तरीकों पर पूरी तरह से भरोसा करना भी अच्छा नहीं हैं । हर प्रेगनेंसी अलग है और उसके लक्षण भी। हर प्रेगनेंसी में मां को अलग-अलग लक्षण महसूस होते हैं और अगर आप वे लक्षण महसूस कर रही हैं जो गर्भ में एक लड़की के होने पर होते हैं। लेकिन आपको बेटा पैदा होता है तो दुखी न हों। आखिरकार बच्चा तो खुशियों की पोटली और आशिर्वाद है तो भला उसके लड़के या लड़की होने से क्या फर्क पड़ता है।

पेट का आकार :


जी हां, हमारे देश में एक पुरानी मान्यता है कि मां के पेट के आकार से आसानी से पता लगाया जा सकता है कि होने वाला बच्चा लड़का है या लड़की। अगर आपका पेट आगे की तरफ निकला हुआ है तो हो सकता है कि आपके पेट में बेटा हो। जबकि दूसरी तरफ अगर आपका पेट गोल सुदृढ़ और बड़ा दिखायी पड़ता है तो हो सकता है कि आपके घर एक नन्हीं राजकुमारी आने वाली है।

बच्चे का लात मारना :


बच्चे पेट में लात मारते ही हैं। लेकिन बच्चा कितनी बार और कहां लात मारता है इससे पता लगाया जा सकता है कि बच्चा लड़की है या लड़का। जी हां, ऐसा कहा जाता है कि पेट में रहते हुए बच्चा अगर पसली के पास लात मारे तो वह लड़की है। जबकि पेट के निचले हिस्से में लात मारे तो ऐसा माना जाएगा कि होनेवाला बच्चा लड़का है।

मूड स्विंग :


जर्नल साइकोलॉजी एंड बिहेवियर में छपी एक स्टडी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वो महिलाएं जिन्हें प्रेगनेंसी के पहले ट्राइमेस्टर (पहली तिमाही) के दौरान किसी विशेष बात और दूसरी-तीसरी तिमाही में हर बात पर दुख या पछतावा महसूस हो, तो ऐसा कहा जाता है कि होनेवाला बच्चा लड़का होगा। जबकि पेट में लड़की होने पर मां मिली-जुली भावनाएं महसूस करती हैं। वैसे इससे एक बात का तो अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि पुरुष हर बात के लिए बेचैन क्यों रहते हैं। आपको जानकर होगी हैरानी कि आप बच्चे के साथ एक्सरसाइज भी कर सकती हैं।

खाने से नफरत :


क्या आपने कभी सोचा है जहां प्रेगनेंसी के दौरान बहुत-सी महिलाएं बहुत ज़्यादा खाना खाती हैं वहीं कुछ को खाने से नफरत क्यों होने लगती है! दरअसल यह बदलाव बच्चे के जेंडर पर भी निर्भर करता है। जी हां, एक स्टडी के अनुसार जिन मांओं को खाने से नफरत या खाना खाने के बाद उल्टी की शिकायत बहुत अधिक होती है उनका होनेवाला बच्चा लड़का होता है। एक स्टडी के अनुसार मां के शरीर को एक नर भ्रूण को अधिक सुरक्षा प्रदान करनी पड़ती है क्योंकि नर भ्रूण मादा भ्रूण से अधिक असुरक्षित है।

चुनिंदा चीजें खाना :


क्या आपको दिनभर मिठाई और आईसक्रीम खाने का मन करता है? तो तय है कि आप एक लड़की को जन्म देनेवाली हैं। दरअसल लड़कियां अच्छी और मीठी चीजों से बनती हैं। लेकिन अगर आपको मसालेदार चीजें खाने का मन हो तो समझ जाइए कि आपके घर में एक छोटे नवाब आने वाले हैं।

ब्रेस्ट साइज में बदलाव :


प्रेगनेंसी के दौरान आपके ब्रेस्ट्स में भी कई बदलाव होते हैं। अगर आपके ब्रेस्ट अपने आकार से भारी, मज़बूत और बड़े महसूस हों तो आपको एक बेटी होनेवाली है और अगर आपके ब्रेस्ट्स में कोई विशेष बदलाव नहीं होता तो हो सकता है कि आपको एक बेटा होनेवाला है।

फेस रीडिंग :


आप प्रेगनेंसी के दौरान कैसी दिखती हैं? क्या आपके बाल बेजान हो गए हैं और क्या आपको पिम्पल भी हो रहे हैं? तो अगर बड़े-बुज़ुर्गों की बात माने तो आपके गर्भ में एक बेटी है। लेकिन अगर आप बहुत सुंदर दिखने लगी हैं, आपके बाल सुंदर और नाखून चमकीले हो गए हैं तो आपको बेटा होनेवाला है। वैसे बहुत से लोग इन बातों को पूरी तरह से उल्टा भी कहते हैं।

वेडिंग रिंग टेस्ट :


क्या आप जानते हैं कि यह टेस्ट दुनियाभर में ट्राई किया जानेवाला तरीका है? जी हां, इस टेस्ट में लोग शादी या सगाई की अंगूठी को एक धागे से बांधकर मां के पेट पर बांधते हैं। अगर यह अंगूठी आगे-पीछे जाती है तो होनेवाली संतान लड़का होती है और अगर यह गोल-गोल घूमती है तो पेट में लड़की है। इसी तरह पेन्डलम मेथड भी अपनाया जाता है। जहां एक सुई को किसी धागे से बांधा जाता है। मां को बिस्तर पर पीठ के बल लिटाकर इसे मां के पेट के सामने लटकाया जाता है। अगर सुई गोल-गोल (घड़ी की दिशा में) घूमती है तो आनेवाला बच्चा लड़की है और अगर नहीं तो वह लड़का है।

भ्रूण की धड़कन :


यह तरीका थोड़ा विश्वसनीय और वैज्ञानिक प्रतीत होता है। हालांकि इसका कोई सबूत नहीं है। ऐसा माना जाता है कि अगर भ्रूण की धड़कन या हार्ट रेट140 बीएमपी से कम है को वह एक लड़का है और यह रेट ज्यादा है तो आप एक बेटी का स्वागत करने के लिए तैयार हो जाइए।

Tuesday, September 20

जानिए, चिकनगुनिया रोग की सम्पूर्ण जानकारी !

इस समय पूरा देश चिकनगुनिया की चपेट में है। तेज बुखार आना (लगभग 102 डिग्री), जोड़ों में दर्द होना चिकनगुनिया के प्रमुख शुरूआती लक्षण है लेकिन इसकी सही जानकारी कई तरह के ब्लड टेस्ट करवाने के बाद ही पता चलती है।

चिकनगुनिया टेस्ट:


इस समय बुखार से पीड़ित रहने पर जब भी डॉक्टर के पास जायेंगे तो वे आपको कई तरह के ब्लड टेस्ट करवाने की सलाह देते हैं। इस ब्लड टेस्ट में आपके खून में चिकनगुनिया वायरस या एंटी बॉडीज की मौजूदगी का पता लगाया जाता है। ब्लड टेस्ट की मदद से खून में चिकनगुनिया वायरस, वायरल न्यूक्लिक एसिड या वायरस स्पेसिफिक इम्यूनोग्लोबुलिन की मौजूदगी का पता चल जाता है।

डॉक्टर के पास कब जायें:


जब भी आपको चिकनगुनिया से मिलते जुलते कोई भी लक्षण दिखे तो तुरंत ही डॉक्टर के पास अपना चेकअप कराने के लिए जायें। जैसा कि हम सब जानते हैं कि ये रोग मच्छर के काटने से फैलता है इसलिए मानसून के सीजन में इसके शिकार होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। शुरुआत के आठ दिनों के बुखार में ही आप अगर चेकअप करवा लेते हैं तो आसानी से इस वायरस का पता चल जाता है। 7-8 दिनों के बाद यह वायरस शरीर में एंटी-बॉडीज बनाने लगता है जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है। इसलिए सबसे बेहतर है कि बुखार होने के पहले हफ्ते में ही इसकी जांच करवाएं। चिकनगुनिया को डेंगू या मलेरिया समझने की गलती न करें। चिकनगुनिया, डेंगू और मलेरिया में अंतर को पहले ठीक से पहचान लें।

ब्लड टेस्ट की कीमत :


दिल्ली में चिकनगुनिया में किये जाने वाले ELISA (enzyme-linked immunosorbent assays) टेस्ट की कीमत लगभग 600 रूपए और आर.टी.पी.सी.आर (RTPCR) टेस्ट की कीमत लगभग 1500 रूपए है। एंटी-बॉडीज और सी.बी.सी. (CBC)  की रिपोर्ट तो उसी दिन मिल जाती है लेकिन आरएनए की रिपोर्ट आने में लगभग 2 दिन का समय लगता है।

चिकनगुनिया टेस्ट की रिपोर्ट को कैसे समझें :


ब्लड रिपोर्ट में लिम्फोसाइट की घटी मात्रा, प्लेटलेट्स की मात्रा, क्रीटोनिन की बढ़ी मात्रा और एसजीपीटी की बढ़ी मात्रा को चेक करना होता है।

कैसे इलाज कराएं :


चिकनगुनिया वायरस इन्फेक्शन से बचने के लिए वैसे तो कोई ख़ास एंटीवायरल थेरेपी नहीं है। इसका उपचार लक्षणों के आधार पर ही किया जाता है। मरीज को अधिक से अधिक आराम करने को बोला जाता है और ज्यादा से ज्यादा पानी पीने की सलाह दी जाती है। इसमें डॉक्टर बुखार और दर्द की दवा देते हैं हालांकि एक बार इसका शिकार होने पर कई हफ़्तों तक जोड़ों में दर्द रहता है। ऐसे मरीजों को खासतौर पर ऐसे माहौल में रहने की सलाह दी जाती है जिससे वे मच्छर के संपर्क में बिल्कुल भी न आ सके।

क्या आपको चिकनगुनिया बुखार और डेंगू बुखार के बीच अंतर पता है? क्या आप चिकनगुनिया के लक्षण जानते हैं? आपको बता दें कि अगर लक्षण मलेरिया या डेंगू के नहीं हैं, तो चिकनगुनिया के हो सकते हैं। आईये जानते हैं कि चिकनगुनिया किस तरह डेंगू से अलग है।
चिकनगुनिया मच्छर की उसी प्रजाति के कारण होता है जिससे डेंगू होता है। चिकनगुनिया और डेंगू के लक्षण भी लगभग एक जैसे होते हैं। चिकनगुनिया में तेज बुखार, शरीर में दर्द विशेषकर मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होता है। ऐसा दर्द गठिया के रोगियों में देखा जाता है। रोगी को जोड़ों के दर्द के साथ-साथ जोड़ों में अकड़न भी महसूस हो सकती है, जोकि पेनकिलर लेने के बाद भी ठीक नहीं होती है। कई मामलों में जोड़ों के दर्द और अकड़न के कारण रोगी स्थिर हो सकता है। चिकनगुनिया एक महामारी की बीमारी है, जिसका अर्थ है कि यह एक बड़ी आबादी को प्रभावित कर सकती है। अगर संक्रमित मच्छर किसी एक व्यक्ति को काट ले, तो पूरे समुदाय को बीमारी का खतरा हो सकता है। इसलिए निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है।
इन दोनों रोगों के अलग होने की पहचान लक्षणों की अवधि के आधार पर भी की जा सकती है। डेंगू के विपरीत चिकनगुनिया में जोड़ों का दर्द तीन महीने तक हो सकता है और अगर हालत ज्यादा गंभीर है, तो छह महीने तक हो सकता है। कई मामलों में रोगी को एक साल तक जोड़ों में दर्द हो सकता है। उदहारण के लिए चिकनगुनिया के 100 मामलों में 90 फीसदी तीन से चार महीनों में ठीक हो जाते हैं जबकि 10 फीसदी लोगों को छह महीनों तक कई जोड़ों में दर्द का अनुभव रहता है।
चिकनगुनिया और डेंगू वायरस के कारण होता है मलेरिया परजीवी संक्रमण (parasitic infection)। मलेरिया के मामले में यह लीवर और रेड ब्लड सेल्स पर भी हमला कर सकता है। हालांकि चिकनगुनिया और डेंगू के मामले में वायरस एन्डोथीलीअल सेल्स (endothelial cells) को प्रभावित करता है। इसका मतलब यह हुआ कि चिकनगुनिया के मामले में साइनोविअल मेम्ब्रेन (synovial membrane) यानि जोड़ों में मौजूद झिल्ली प्रभावित होती है।

चिकनगुनिया के लक्षण :


चिकनगुनिया मच्छरों के काटने के कारण होता है। शायद आपको ये नहीं पता कि जिन मच्छरों के जाति के कारण डेंगू या जीका का संक्रमण होता है उसी जाति के मच्छर से ही ये बीमारी होती है। मच्छर का काटने के 3-7 दिन के बाद इसके लक्षण नजर आने लगते हैं।

लिम्फ नॉड में सूजन :


ज्यादातर लोगों को ये पता नहीं कि इसके संक्रमण के कारण लिम्फ नॉड में सूजन आ जाता है। लिम्फ नॉड कान के पीछे, जबड़े के भीतर, गर्दन के आस-पास के जगहों में होता है। इन जगहों पर सूजन होने पर नजरअंदाज न करें।

अत्यधिक थकान :


चिकनगुनिया के कारण अत्यधिक थकान महसूस होता है, क्योंकि फीवर और दर्द के कारण आपको थकान महसूस होना आम होता है। इसलिए नजरअंदाज न करके तुरन्त डॉक्टर से सलाह लें।

हाई फीवर :


अगर तीन दिनों तक आपको 102 – 104 डिग्री तक बुखार हो रहा है तो डॉक्टर के पास जाने में देर न करें। ये फीवर एक हफ़्ते तक रह सकता है।

सिर दर्द :


चिकनगुनिया के लक्षणों में सरदर्द भी एक आम लक्षण है जो संक्रमण होने के कुछ दिनों के बाद होना शुरू हो जाता है। अगर आपको फीवर, सिर दर्द के साथ ज्वाइंट पेन है तो दो दिनों तक ये लक्षण ठीक नहीं हो रहा है तो तुरन्त डॉक्टर के पास जायें।

जोड़ों और मसल्स में दर्द :


अक्सर मसल्स में या जोड़ो में दर्द होने के कारण इसके लक्षणों को समझ पाना मुश्किल हो जाता है। इस बीमारी के कारण हाथ और पैरों में सूजन होने के साथ दर्द होता है। यहां तक कि दर्द कई हफ़्तों के अलावा एक साल तक रह जाता है।

स्किन रैशेज़ :


अक्सर इस बीमारी में हाई फीवर के साथ स्किन रैशेज़ निकलने लगते हैं। लाल-लाल दाग हथेली, फेस और टोरसो में विशेषकर होता है। ऐसे लक्षण दिखते ही डॉक्टर से इस बारे में सलाह लें।

उल्टी :


इस इंफेक्शन के कारण उल्टी के लक्षण के साथ अत्यधिक कमजोरी महसूस होती है। अगर आपके आस-पास मच्छरों का बसेरा है तो ऐसे लक्षण महसूस होने पर तुरन्त डॉक्टर के पास जायें।

Monday, September 12

वर्षा ऋतू में होने वाले रोग और उनका उपचार

हम सभी को बरसात का मौसम अच्छा लगता है | पसीने से तर-बतर कर देने वाली गर्मी के बाद, राहत भरी मानसून की बारिश आती है । काले बादलों के इस मौसम में ठंडी  हवा, बारिश की बूंदों के साथ गर्म चाय और पकौड़ों का स्वाद भला किसे अच्छा नहीं लगता | लेकिन दुर्भाग्य से इस नम और उमस भरे  मौसम के साथ यह कई त्वचा और बालों की समस्यायें भी उत्पन्न होने लगती है। कवक, जीवाणु और परजीवी के संक्रमण बरसात के मौसम में आम हैं। सुस्त, तैलीय त्वचा और बालों का झड़ना इस मौसम की अन्य आम शिकायतें हैं। इस लेख में प्रस्तुत हैं वर्षा ऋतू में होने वाले प्रमुख त्वचा रोग एवं उनका प्राकृतिक उपचार |

घमौरियां :


घमौरियां त्वचा में उत्पन्न होने वाले लाल फुंसीदार दाने हैं । यह दाने लाल तीव्र खुजली और चुभन उत्पन्न करते हैं | यह पसीना से उत्पन्न होती हैं | शरीर के वे अंग जहाँ हवा मुश्किल से लग पाती है वहाँ नमी के कारण फंगल इंफेक्शन हो जाता है। त्वचा का रंग बदरंग लाल सा हो जाता है। । शरीर की सफाई का ध्यान ना रखने पर फोड़े फुंसी हो जाते है।

उपचार :



  • इन दिनों में सूती एवं ढीले पहनने से इस समस्या से बहुत कुछ हद तक बचा जा सकता है।

  • कैलामिन लोशन खुजली कम करने में मदद कर सकता है।


नाखूनों का संक्रमण :


मानसून के मौसम के दौरान नाखूनों में फंगल संक्रमण का खतरा रहता है। संक्रमित होने पर नाख़ून बेरंग एवं भुरभुरे पड़ने लगते हैं |

उपचार :



  • बरसात के मौसम में नाखून लंबे न रखें, क्योंकि इनमे गंदगी भरने से नमी मिलते ही फंगल संक्रमण होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

  • एंटी फंगल क्रीम या पाउडर का इस्तेमाल करें |


सोरायसिस :


इस रोग में त्वचा पर लाल चकत्ते उत्पन्न हो जाते हैं।

उपचार :



  • इस समस्या से छुटकारा पाने में एलोवेरा बहुत फायदेमंद होता है। इसे बरसात के अन्य अन्य त्वचा रोगों में भी प्रयोग किया जा सकता है |

  • बेसन, गुलाब जल एवं दूध का एक मिश्रण बनाकर चकत्तों पर लगाने से भी लाभ होता है।

  • एंटी बैक्टीरियल साबुन, टेलकम पाउडर एवं फेश वाश भी प्रयोग करें |


 पैर के तलवे या उँगलियों में संक्रमण (Athlete’s foot) :


यह पैरों का एक दर्दनाक फंगल इन्फेक्शन है जोकि बिना फिटिंग एवं गिले जूते पहनने से होता है | इस संक्रमण में पैर ले उंगलियों की जड़ों एवं तलवे में फंगल संक्रमण उत्पन्न हो जाता है |

उपचार :



  • प्लास्टिक, चमड़े या कैनवास के जूते न पहनें | इनके स्थान पर चप्पल एवं खुले सैंडल का प्रयोग करें |

  • साफ सूती मोजे पहनें एवं पैरों को साफ व सूखा रखें।


 खुजली :


बरसात में प्राय: त्वचा में खुजली होने लगती है। आमतौर पर हाथ, कलाई, कांख, पेट, कमर और नितंबों पर लाल चकत्तों के रूप में तीव्र खुजली होती है। यह स्थिति बेहद संक्रामक होती है और यदि ठीक से इलाज नहीं किया गया तो निरपवाद रूप से परिवार के अन्य सदस्यों में भी फाइट सकती है ।

उपचार :


नीम की पत्तियों को उबालकर, ठंडाकर इसके पानी से स्नान करना चाहिए अथवा डिटॉल डालकर स्नान करें । वस्त्रों को प्रतिदिन बदलें। नारियल के तेल में कपूर डालकर त्वचा पर लगाएं।

दाद :


वर्षा ऋतू में प्राय: गीले कपड़े पहने रहने से त्वचा पर दाद  हो जाती है। यह खुजलीयुक्त लाल या भूरे चकत्ते के रूप में हो सकती है |

उपचार :



  • 60 ग्राम नारियल का तेल में 10 ग्राम भाग गंधक को घोंटकर मलहम बना लें | दाद्युक्त स्थान पर इसे लगायें।

  • नीम की पत्तियां उबालकर, छानकर लें फिर इसके गुनगुने पानी से दाद वाले स्थान को साफ करे।

  • चक्रमर्द के बीजों को गंधक के साथ मक्खन में मिलाकर दाद पर लगाने से लाभ मिलता है |


शीत-पित्त :


बरसात में शरीर पर गोल-गोल उभरे हुए चकत्ते या रेशे पड़ना एवं इनमें खुजली होना शीतपित्त का लक्षण है।

उपचार :



  • इन चकत्तों पर शुद्ध सरसों का तेल लगाने से लाभ होता है।

  • हल्दी और दूब घास एक साथ पीसकर लगाने से भी लाभ होता है।

  • घी में शुद्ध गेरू पीसकर इसका मलहम लगाने शीतपित्त में आराम मिलता है।


त्वचा का तैलीय होना :


बरसात में नमी के कारण वसामय ग्रंथियों में अधिक तेल स्रावित होने लगता है जिससे चेहरे की त्वचा तैलीय होकर चिपचिपी हो जाती है जिससे मुंहासे आदि की समस्या हो जाती है |

उपचार :



  • वर्षा ऋतू में बाहर जाते समय छाता और रेनकोट का प्रयोग करें |

  • इस मौसम में त्वचा की देखभाल इस प्रकार करे कि त्वचा पर चिपचिपाहट या तैलीय अंश न रहे। इसके लिए दिन में दो-तीन बार किसी माइल्ड साबुन से मुँह धोएं।

  • इस मौसम में कृत्रिम मेक-अप से बचें।

  • तैलीय त्वचा पर मुल्तानी मिट्टी का लेप 'फेस मास्क' के रूप में कर सकते है।


यह भी करें :



  • नहाने के पानी में नींबू के रस  की कुछ बूंदें डालकर नहाएं।

  • नीम की पत्ती को पानी में उबालकर इस पानी को नहाने के पानी में मिलाकर नहाएं।

  • त्वचा पर जहां संक्रमण होने की सम्भवना हो वहां टेलकम पाउडर लगा कर वो जगह सूखी रखनी चाहिए।

  • संतुलित आहार लें | भोजन में फल और सब्जियों की मात्रा भरपूर रखें |

  • त्वचा की चमक चिरस्थायी बनाए रखने के लिए प्रतिदिन 8-10 गिलास पानी पियें ।

  • बारिश में न भींगे |

  • भीगे कपड़े पहनकर न रखें |

  • रात्रि-जागरण, दिन में शयन एवं खुले में शयन न करें |

  • अति परिश्रम एवं अति व्यायाम न करें |

  • नदी में तैरना, धूप में बैठना, खुले बदन घूमना त्याज्य है।

  • बाहर से घर में वर्षा से भीगकर लौटने पर स्वच्छ जल से स्नान अवश्य करें।

  • स्नान के तुरन्त बाद गीले शरीर पंखे की हवा में नहीं जाएँ।


वर्षा ऋतु में सेवन योग्य आहार :


इस ऋतु में जठराग्नि प्रदीप्त करनेवाला वात-पित्तशामक आहार लेना चाहिए | इसके लिए पुदीना, हरा धनिया, सोंठ, अजवायन, मेथी, जीरा, हींग, काली मिर्च का प्रयोग करें |

  • खीरा, लौकी, पेठा, तोरई, आम, जामुन, पपीता सेवनीय हैं |

  • ताजी छाछ में काली मिर्च, सेंधा, जीरा, धनिया, पुदीना डालकर ले सकते हैं |

  • गरम दूध, साठी के चावल, पुराना अनाज, गेहूँ, चावल, जौ, मूंग खट्टे एवं खारे पदार्थ, दलिया, गाय का घी, तिल एवं सरसों का तेल का सेवन लाभदायी है।

  • उपवास और लघु भोजन हितकारी है | रात को देर से भोजन न करे |

  • 500 ग्राम हरड़ चूर्ण और 50 ग्राम सेंधा नमक का मिश्रण बनाकर प्रतिदिन 5-6 ग्राम लेना चाहिए।

  • वर्षा ऋतु में शहद का सेवन अत्यन्त हितकर है। अदरक, लहसुन,प्याज व नींबू का सेवन वर्षा ऋतु में विशेष लाभदायी है।

  • इस ऋतु में फलों में आम,सेब तथा जामुन सर्वोत्तम माने गए हैं।

  • वर्षा ऋतु में चूसकर खाया हुआ आम पचने में हल्का, वायु तथा पित्तविकारों का शमन करने वाला होता है।

Friday, July 8

वर्षा ऋतु में रोगों से बचने के लिए इसे अपनाएं !

वभिन्न ऋतुओं में मौसम की दशाएं एक खास प्रकार की होती हैं। यह अवधि एक वर्ष को कई भागों में विभाजित करती है जिनके दौरान पृथ्वी के सूर्य की परिक्रमा के परिणामस्वरूप दिन की अवधि, तापमान, वर्षा, आर्द्रता इत्यादि मौसमी दशाएँ एक चक्रीय रूप में बदलती हैं। भारत में परंपरागत रूप से मुख्यतः छः ऋतुएं परिभाषित की गयी हैं।






































ऋतुहिन्दू मासग्रेगरियन मास
वसन्त (Spring)चैत्र से वैशाखमार्च से अप्रैल
ग्रीष्म (Summer)ज्येष्ठ से आषाढमई से जून
वर्षा (Rainy)श्रावन से भाद्रपदजुलाई से सितम्बर
शरद् (Autumn)आश्विन से कार्तिकअक्टूबर से नवम्बर
हेमन्त (pre-winter)मार्गशीर्ष से पौषदिसम्बर से 15 जनवरी
शिशिर (Winter)माघ से फाल्गुन16 जनवरी से फरवरी

इस आलेख में हम चर्चा करेंगे वर्षा ऋतु के विषय में -

वर्षा ऋतु में होने वाले रोग :



  • मंदाग्नि

  • अजीर्ण

  • बुखार

  • वायुदोष का प्रकोप

  • सर्दी, खाँसी

  • पेट के रोग

  • कब्जियत

  • प्रवाहिका

  • शारीरिक कमजोरी

  • रक्तविकार

  • जोड़ों का दर्द

  • सूजन

  • दाद कृमिरोग

  • ज्वर

  • मलेरिया


वर्षा ऋतु में सेवन योग्य आहार :



  • इस ऋतु में जठराग्नि प्रदीप्त करनेवाला वात-पित्तशामक आहार लेना चाहिए | इसके लिए पुदीना, हरा धनिया, सोंठ, अजवायन, मेथी, जीरा, हींग, काली मिर्च का प्रयोग करें |

  • खीरा, लौकी, पेठा, तोरई, आम, जामुन, पपीता सेवनीय हैं |

  • ताजी छाछ में काली मिर्च, सेंधा, जीरा, धनिया, पुदीना डालकर ले सकते हैं |

  • गरम दूध, साठी के चावल, पुराना अनाज, गेहूँ, चावल, जौ, मूंग खट्टे एवं खारे पदार्थ, दलिया, गाय का घी, तिल एवं सरसों का तेल का सेवन लाभदायी है।

  • उपवास और लघु भोजन हितकारी है | रात को देर से भोजन न करे |

  • 500 ग्राम हरड़ चूर्ण और 50 ग्राम सेंधा नमक का मिश्रण बनाकर प्रतिदिन 5-6 ग्राम लेना चाहिए।

  • वर्षा ऋतु में शहद का सेवन अत्यन्त हितकर है। अदरक, लहसुन,प्याज व नींबू का सेवन वर्षा ऋतु में विशेष लाभदायी है।

  • इस ऋतु में फलों में आम,सेब तथा जामुन सर्वोत्तम माने गए हैं।

  • वर्षा ऋतु में चूसकर खाया हुआ आम पचने में हल्का, वायु तथा पित्तविकारों का शमन करने वाला होता है।


क्या न खाएं :



  • देर से पचनेवाले, भारी, तले, तीखे पदार्थ न लें |

  • बिस्कुट, डबलरोटी, जलेबी आदि मैदे की चीजे, अंकुरित अनाज, ठंडे पेय पदार्थ व आइसक्रीम के सेवन से बचे |

  • वर्षा ऋतु में दही पूर्णतः निषिध्द हैं |

  • वर्षा ऋतु में उड़द, अरहर, चौला आदि दालें नहीं खाना चाहिए |

  • नदी, तालाब एवं कुएँ का बिना उबाला हुआ पानी, नहीं पीना चाहिए |

  • सब्जियों में पत्तेदार,आलू, गोभी, ग्वारफली, भिंडी त्याज्य हैं |

  • इस ऋतु में सूखा मेवा, मिठाई त्याज्य हैं।


क्या करें :



  • वातावरण में नमी और आर्द्रता के कारण उत्पन्न कीटाणुओं से सुरक्षा हेतु धूप, हवन से घर के वातावरण को शुद्ध करें |

  • फिनायल या गोमूत्र से घर को साफ करें |

  • तुलसी के पोंधे लगायें |

  • उबटन से स्नान, तेल की मालिश , हल्का व्यायाम, स्वच्छ व हलके वस्त्र पहनना हितकारी हैं |

  • मच्छरों से सुरक्षा के लिए घर में गेंदे के पौधों के गमले अथवा गेंदे के फुल रखे और नीम के पत्ते, गोबर के कंड़े व गूगल आदि का धुआँ करे | घर के आसपास पानी इकठ्ठा न होने दे |


क्या न करें :



  • बारिश में न भींगे |

  • भीगे कपड़े पहनकर न रखें |

  • रात्रि-जागरण, दिन में शयन एवं खुले में शयन न करें |

  • अति परिश्रम एवं अति व्यायाम न करें |

  • नदी में तैरना, धूप में बैठना, खुले बदन घूमना त्याज्य है।

  • बाहर से घर में वर्षा से भीगकर लौटने पर स्वच्छ जल से स्नान अवश्य करें।

  • स्नान के तुरन्त बाद गीले शरीर पंखे की हवा में नहीं जाएँ।

Saturday, June 4

रक्तदान का महत्व एवं इससे जुड़ी भ्रांतियां

रक्तदान को लेकर अक्सर लोगों के मन में दुविधा बनी रहती है। रक्तदान करना क्यों जरूरी है और जरूरत पड़ने पर क्या करें, आईये जाने इस लेख में -

रक्तदान क्यों आवश्यक है :



  • रक्त का किसी भी प्रकार से उत्पादन नहीं किया जा सकता और न ही इसका कोई विकल्प है।

  • देश में हर साल लगभग 250 सीसी की 4 करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत पड़ती है। जबकि सिर्फ 5,00,000 यूनिट रक्त ही उपलब्ध हो पाता है।

  • आंकड़ों के मुताबिक 25 प्रतिशत से अधिक लोगों को अपने जीवन में खून की जरूरत पड़ती है।

  • रक्तदान कर किसी जरूरतमंद का जीवन बचाया जा सकता है।


हमारे शरीर में कुल वजन का 7% हिस्सा खून होता है।

रक्तदान करने के लाभ :



  1. चिकित्सकों का मानना है कि रक्तदान से खून पतला होता है, जिससे हार्ट अटैक की आशंका कम हो जाती है।

  2. एक नई रिसर्च के मुताबिक नियमित ब्लड डोनेट करने से शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ बाहर निकलते रहते है जिससे कैंसर व दूसरी बीमारियों के होने का खतरा भी कम हो जाता है |

  3. रक्तदान करने के बाद बोनमैरो नए रेड सेल्स बनाता है। इससे शरीर को नए ब्लड सेल्स मिलने के अतिरिक्त तंदुरुस्ती भी मिलती है।

  4. रक्तदान में जितना खून लिया जाता है, वह 21 दिन में शरीर फिर से बना लेता है। ब्लड का वॉल्यूम तो शरीर 24 से 72 घंटे में ही पूरा बन जाता है।

  5. रक्तदान करने के बाद आप पहले की तरह ही कामकाज कर सकते हैं। इससे शरीर में किसी भी तरह की कमी नहीं होती।


रक्तदान से पूर्व :


रक्तदान से पहले मिनी ब्लड टेस्ट होता है, जिसमें हीमोग्लोबिन टेस्ट, ब्लड प्रेशर व वजन लिया जाता है। रक्तदान करने के बाद इसमें हेपेटाइटिस B व C, HIV, सिफलिस व मलेरिया आदि की जांच की जाती है। इन बीमारियों के लक्षण पाए जाने पर डोनर का ब्लड न लेकर उसे तुरंत सूचित किया जाता है।

कौन कर सकता है रक्तदान :


18 साल से अधिक उम्र के स्त्री-पुरुष, जिनका वजन 50 किलोग्राम या अधिक हो, वर्ष में तीन-चार बार रक्तदान कर सकते हैं।

रक्तदान करने के पहले एवं बाद में सावधानी :


ब्लड डोनेट करने से पहले व कुछ घंटे बाद तक धूम्रपान से परहेज करना चाहिए।

ब्लड डोनेट करने वाले शख्स को रक्तदान के 24 से 48 घंटे पहले शराब नहीं पीनी चाहिए।

Wednesday, February 17

क्षय रोग जानकारी और उपचार





 BY- डॉ. विकास रुहल


क्षय रोग को हिन्दी में राज्यक्ष्मा और टी.बी. कहते हैं तथा एलोपैथी में इसे ट्यूबरक्लोसिस कहा जाता है। इस रोग के हो जाने पर रोगी व्यक्ति का शरीर कमजोर हो जाता है। क्षय रोग के हो जाने पर शरीर की धातुओं यानी रस, रक्त आदि का नाश होता है। जब किसी व्यक्ति को क्षय रोग हो जाता है तो उसके फेफड़ों, हडि्डयों, ग्रंथियों तथा आंतों में कहीं इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।

लक्षण :


जब किसी स्त्री तथा पुरुष को क्षय रोग हो जाता है तो उसका वजन धीरे-धीरे घटने लगता है तथा थकान महसूस होने लगती है। इसके साथ-साथ रोगी को खांसी तथा बुखार भी हो जाता है। रोगी व्यक्ति को भूख लगना कम हो जाता है तथा उसके मुंह से कफ के साथ खून भी आने लगता है। इस रोग में किसी-किसी रोगी के शरीर पर फोड़े तथा फुंसियां होने लगती हैं।

क्षय रोग के प्रकार :



  1. फुफ्सीय क्षय

  2. पेट का क्षय

  3. अस्थि क्षय


फुफ्सीय क्षय :


इस प्रकार का फुफ्फसीय क्षय रोग जल्दी पहचान में नहीं आता है। यह रोग शरीर के अन्दर बहुत दिनों तक बना रहता है। जब यह रोग बहुत ज्यादा गंभीर हो जाता है तब इस रोग की पहचान होती है। क्षय (टी.बी.) रोग किसी भी उम्र की आयु के स्त्री-पुरुषों को हो सकता है लेकिन अलग-अलग रोगियों में इसकी अलग-अलग पहचान होती है।

फुफ्फसीय क्षय रोग की पहचान :


क्षय रोग से पीड़ित रोगी को सिर में दर्द होता रहता है तथा रोगी व्यक्ति को सांस लेने में परेशानी होती है। पीड़ित रोगी की पाचनशक्ति खराब हो जाती है।फुफ्फसीय क्षय रोग से पीड़ित रोगी की हडि्डयां गलने लगती हैं तथा रोगी व्यक्ति के शरीर में आंख-कान की कोई बीमारी खड़ी होकर असली रोग पर पर्दा डाले रहती है।फुफ्फसीय क्षय रोग से पीड़ित रोगी की नाड़ी तेजी से चलने लगती है।फुफ्फसीय क्षय रोग से पीड़ित रोगी की जीभ लाल रंग की हो जाती है और रोगी व्यक्ति के शरीर का तापमान बढ़ जाता है।क्षय रोग से पीड़ित रोगी को नींद नहीं आती है तथा जब वह चलता है या सोता है तो उसका मुंह खुला रहता है।फुफ्फसीय क्षय रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है तथा रोगी व्यक्ति का चेहरा पीला पड़ जाता है तथा रोगी व्यक्ति के चेहरे की चमक खो जाती है।रोगी व्यक्ति के शरीर से पसीना आता रहता है तथा उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।फुफ्फसीय क्षय रोग से पीड़ित रोगी को कभी-कभी थूक के साथ खून भी आने लगता है। इसलिए रोगी व्यक्ति को अपने थूक का परीक्षण (जांच) समय-समय पर करवाते रहना चाहिए।क्षय रोग से पीड़ित रोगी को तेज रोशनी अच्छी नहीं लगती है तथा वह कुछ न कुछ बड़बड़ाता रहता हैं और उसके दांत किटकिटाते रहते हैं।फुफ्फसीय क्षय रोग से पीड़ित रोगी को भूख नहीं लगती है, भोजन का स्वाद अच्छा नहीं लगता है तथा उसके शरीर का वजन दिन-प्रतिदिन कम होता जाता है।फुफ्फसीय क्षय रोग से पीड़ित रोगी जब सुबह के समय में उठता है तो भोजन करने के बाद उसको खांसी आती है और उसके सीने में तेज दर्द होने लगता है।

पेट का क्षय :


इस क्षय रोग की पहचान भी बड़ी मुश्किल से होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी के पेट के अन्दर गांठे पड़ जाती है।

पेट का क्षय रोग के लक्षण :



  • पेट के क्षय (टी.बी.) रोग से पीड़ित रोगी को बार-बार दस्त आने लगते हैं।

  • रोगी व्यक्ति के शरीर में अधिक कमजोरी हो जाती है और उसके शरीर का वजन दिन-प्रतिदिन घटता रहता है।

  • इस रोग से पीड़ित रोगी के पेट में कभी-कभी दर्द भी होता है।


अस्थि क्षय :


इस रोग के कारण रोगी की हड्डी बहुत अधिक प्रभावित होती है तथा हड्डी के आस-पास की मांसपेशियां भी प्रभावित होती हैं।

अस्थि क्षय लक्षण :


इस रोग से पीड़ित रोगी के शरीर पर फोड़े-फुंसियां तथा जख्म हो जाते हैं और ये जख्म किसी भी तरह से ठीक नहीं होते हैं।

क्षय रोग (टी.बी.) के कारण :



  • क्षय रोग उन व्यक्तियों को अधिक होता है जिनके खान-पान तथा रहन-सहन का तरीका गलत होता है।

  • इन खराब आदतों के कारण शरीर में विजातीय द्रव्य (दूषित द्रव्य) जमा हो जाते हैं और शरीर में धीरे-धीरे रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

  • क्षय रोग ट्यूबरकल नामक कीटाणुओं के कारण होता है। यह कीटाणु ट्यूबरकल नामक कीटाणु फेफड़ों आदि में उत्पन्न होकर उसे खाकर नष्ट कर देते हैं।

  • यह कीटाणु फेफड़ों, त्वचा, जोड़ों, मेरूदण्ड, कण्ठ, हडि्डयों, अंतड़ियों आदि शरीर के अंग को नष्ट कर देते हैं।

  • क्षय रोग का शरीर में होने का सबसे प्रमुख कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति का कम हो जाना है तथा शरीर में विजातीय द्रव्यों (दूषित द्रव्य) का अधिक हो जाना है।

  • क्षय रोग व्यक्ति को तब हो जाता है जब रोगी अपने कार्य करने की शक्ति से अधिक कार्य करता है।

  • शौच तथा पेशाब करने के वेग को रोकने के कारण भी क्षय रोग हो जाता है।

  • किसी अनुचित सैक्स संबन्धी कार्य करके वीर्य नष्ट करने के कारण भी क्षय रोग हो सकता है।

  • अधिक गीले स्थान पर रहने तथा धूल भरे वातावरण में रहने के कारण भी क्षय रोग हो जाता है।

  • प्रकाश तथा धूप की कमी के कारण तथा भोजन सम्बंधी खान-पान में अनुचित ढंग का प्रयोग करने के कारण भी क्षय रोग हो सकता है।

  • अधिक विषैली दवाइयों का सेवन करने के कारण भी क्षय रोग हो सकता है।


क्षय रोग की अवस्था 3 प्रकार की होती हैं :



  • प्रथम अवस्था :
    क्षय रोग की अवस्था के रोगियों का उपचार हो सकता है।

  • इस अवस्था के रोगियों को खांसी उठती है तथा खांसी के साथ कभी-कभी कफ भी आता है, तो कभी नहीं भी आता है तो कभी-कभी कफ में रक्त के छींटे दिखाई देते हैं।

  • रोगी व्यक्ति का वजन घटने लगता है।

  • इस अवस्था का रोगी जब थोड़ा सा भी कार्य करता है तो उसे थकावट महसूस होने लगती है और उसके शरीर से पसीना निकलने लगता है।

  • पीड़ित रोगी को रात के समय में अधिक पसीना आता है और दोपहर के समय में बुखार हो जाता है तथा सुबह के समय में बुखार ठीक हो जाता है।


दूसरी अवस्था :

  • क्षय रोग की दूसरी अवस्था से पीड़ित रोगी के शरीर में जीवाणु उसके फेफड़े में अपना जगह बना लेते हैं जिस कारण शरीर का रक्त और मांस नष्ट होने लगता है।

  • इस रोग से पीड़ित रोगी को दोपहर के बाद बुखार होने लगता है तथा उनके जबड़े फूल जाते हैं और उसके मुंह का रंग लाल हो जाता है।

  • रोगी व्यक्ति को रात के समय में अधिक पसीना आता है।

  • क्षय रोग की इस अवस्था से पीड़ित रोगी के पेट की बीमारी बढ़ जाती है तथा उसे सूखी खांसी होने लगती है।

  • इस अवस्था के क्षय रोग से पीड़ित रोगी के कफ का रंग सफेद से बदलकर नीला हो जाता है और उसके कफ के साथ रक्त भी गिरना शुरू हो जाता है।

  • रोगी व्यक्ति को उल्टियां भी होने लगती हैं तथा उसके शरीर का वजन कम हो जाता है।

  • इस रोग से पीड़ित रोगी का मुंह चपटा हो जाता है तथा कफ बढ़ जाता है।

  • रोगी के मुंह में सूजन हो जाती है। रोगी के बगलों में कभी-कभी सुइयां सी चुभती प्रतीत होती हैं।


तीसरी अवस्था :

  • इस अवस्था के रोग से पीड़ित रोगी के दोनों फेफड़े खराब हो जाते हैं तथा रोगी का कण्ठ भी रोगग्रस्त हो जाता है।

  • रोगी व्यक्ति को दस्त लग जाते हैं। रोगी की नाक पतली हो जाती है तथा उसके नाखूनों के भीतर का भाग काला पड़ जाता है।

  • रोगी की कनपटियां अन्दर धंस जाती हैं। उसे अपने घुटने के निचले भाग में दर्द महसूस होता रहता है।

  • पैरों की एड़ियों का ऊपरी भाग सूज जाता है तथा रोगी को खून की उल्टियां होने लगती हैं।

  • इस अवस्था के क्षय रोग से पीड़ित रोगी की भूख खुल जाती है।

  • इस अवस्था से पीड़ित रोगी सोचता है कि उसका रोग ठीक हो गया है। लेकिन इस अवस्था से पीड़ित रोगी बहुत कम ही बच पाते हैं।


क्षय रोग के लिए एक विशेष सावधानी :


क्षय रोग (टी.बी.) एक प्रकार का छूत का रोग होता है। इसलिए इस रोग से पीड़ित रोगी के कपड़े, बर्तन तथा रोगी के द्वारा प्रयोग की जाने वाली चीजों को अलग रखना चाहिए, ताकि कोई अन्य उसे उपयोग में न ला सके क्योंकि यदि कोई व्यक्ति रोगी के कपड़े या उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली चीजों का उपयोग करता है तो उसे भी क्षय रोग होने का डर रहता है।

क्षय रोग (टी.बी.) का विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों से उपचार :


आहार चिकित्सा 

  • क्षय रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन बकरी का दूध पीने के लिए देना चाहिए क्योंकि बकरी के दूध में क्षय रोग के कीटाणुओं को नष्ट करने की शक्ति होती है।

  • मीठे आम के रस में एक चम्मच शहद मिलाकर रोगी को कम से कम 25 दिनों तक सेवन कराने से क्षय रोग में विशेष लाभ होता है ।

  • लहसुन तथा प्याज की 8 से 10 बूंदों में 1 चम्मच शहद मिलाकर प्रतिदिन चाटने से बहुत अधिक लाभ मिलता है

  • प्रतिदिन 2 किशमिश तथा 2 अखरोट खाने से क्षय रोग में लाभ होता है।

  • क्षय रोग (टी.बी.) से पीड़ित रोगी को खाने के साथ पानी नहीं पीना चाहिए बल्कि खाना खाने के लगभग 10 मिनट बाद पानी पीना चाहिए।

  • इस रोग से पीड़ित रोगी को अरबी, चावल, बेसन तथा मैदा की बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

  • क्षय रोग (टी.बी.) से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 1 बार कालीमिर्च, तुलसी, मुलहठी, लौंग तथा थोड़ी-सी अजवाइन को पानी में उबालकर पानी पीने को दें। इस काढ़े को हल्का गुनगुना सा पीने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

  • क्षय रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन तुलसी की 5 पत्तियां खाने को देनी चाहिए जिसके फलस्वरूप इस रोग का प्रभाव कम हो जाता है।

  • क्षय रोग (टी.बी.) से पीड़ित रोगी को नारियल का पानी और सफेद पेठे का रस प्रतिदिन पीना चाहिए।

  • पालक की ताजी पत्ती तथा 2 चम्मच मेथी दाने का काढ़ा 20 ग्राम शहद के साथ मिलाकर प्रतिदिन दिन में 3 बार सेवन करना चाहिए।

  • क्षय रोग (टी.बी.) से पीड़ित रोगी को अधिक से अधिक फलों तथा सलाद का सेवन करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।

  • क्षय रोग में अंगूर, अनार, अमरूद, हरी सब्जियों का सूप, खजूर, बादाम, मुनक्का, खरबूजे की गिरियां, सफेद तिलों का दूध, नींबू पानी, लहसुन, प्याज आदि का सेवन करना चाहिए ।

  • कुछ दिनों तक शहद के साथ आंवले के रस का सेवन करने से क्षय रोग में अत्यधिक लाभ मिलता है।

  • क्षय रोग से पीड़ित रोगी को नीम या पीपल के पेड़ की छाया में आराम करना चाहिए तथा लम्बी गहरी सांस लेनी चाहिए |


प्राकृतिक चिकित्सा :



  • क्षय रोग (टी.बी.) को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को नीम के पानी का एनिमा लेकर अपने पेट को साफ करना चाहिए।

  • रोगी व्यक्ति को नहाने से पहले प्रतिदिन अपने पूरे शरीर पर घर्षण स्नान करना चाहिए तथा स्पंज बाथ रगड़-रगड़ कर करना चाहिए।
    रोगी को नहाने से पहले अपने पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी से 10 मिनट लेप करना चाहिए और इसके बाद अपने पूरे शरीर पर मालिश करनी चाहिए।

  • क्षय रोग (टी.बी.) से पीड़ित रोगी को अधिक पसीना आ रहा हो तो थोड़ी देर के लिए उसे रजाई ओढ़ा देनी चाहिए ताकि पसीना निकले और फिर 10 मिनट बाद ताजे स्वच्छ जल से उसे स्नान करना चाहिए।

  • रोगी व्यक्ति को छाती पर मिट्टी की गीली पट्टी करनी चाहिए और सुबह के समय में सूर्य के प्रकाश में शरीर की सिंकाई करनी चाहिए ।


यौगिक चिकित्सा :



  • क्षय रोग (टी.बी.) में गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तानपादासन, मण्डूकासन, कटिचक्रासन, ताड़ासन, नौकासन, धनुरासन तथा मकरासन जैसे योग आसन से भी लाभ मिलता है।

  • रोगी को कुंजल क्रिया करनी चाहिए।


सूर्य किरण चिकित्सा :



  • क्षय रोग (टी.बी.) से पीड़ित रोगी को शुद्ध और खुली वायु में रहना चाहिए और सुबह के समय में धूप की रोशनी को अपने शरीर पर पड़ने देना चाहिए क्योंकि सूर्य की रोशनी से क्षय रोग के कीटाणु नष्ट हो जाते है।

  • क्षय रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में नाश्ता करने से पहले गहरी नीली बोतल का सूर्यतप्त जल 50 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन कम से कम 2-3 बार पीना चाहिए ।

  • क्षय रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में सूर्य के सामने पीठ के बल लेटकर अपनी छाती के सामने एक नीले रंग का शीशा रखकर उस प्रकाश को छाती पर पड़ने देना चाहिए। रोगी व्यक्ति को इस तरीके से लेटना चाहिए कि उसका सिर छाया में हो और छाती वाला भाग सूर्य की किरण के सामने हो। इसके बाद नीले शीशे को रोगी की छाती से थोड़ी ऊंचाई पर इस प्रकार रखना चाहिए कि सूर्य की किरणें नीले शीशे में से होती हुई रोगी की छाती पर पड़ें।









Thursday, February 11

अब ब्लड शुगर की जांच के लिए शरीर में सुई नहीं चुभोनी पड़ेगी

ब्‍लड में शुगर की जांच के लिए अब शरीर में न सुई चुभोनी पड़ेगी और न ही दर्द होगा. गूगल ने एक ऐसी घड़ी बनाई है, जो अपने आप ही शुगर की मात्रा बताएगी. मरीज घड़ीनुमा इस उपकरण को हाथ में बांध सकेंगे.




हमारे पास पहले से ही ऐसी तकनीक है जो हर्ट रेट , व्यायाम का तरीका व तनाव के स्तर के डेटा इकट्ठा करता हैं. लेकिन गूगल एक ऐसी पहनने वाली घड़ी ला रहा है जिससे अब हमारे स्वास्थ्य के विकास को अगले स्तर तक पहुँचने में मदद मिलेगी.




विश्व के सबसे बड़े सर्च इंजन कंपनी गूगल द्वारा बनाई गई ये घड़ी जल्द ही अस्पताल में सुइयो यानि की निडिल की जगह ले लेगी. गुगल के अधिकारियों की माने तो यह डिवाइस मधुमेह रोगियों के लिए वरदान साबित होगी. साथ ही बताया कि इस डिवाइस को जल्द ही बाजार में उप्लब्ध कराया जाएगा.




गूगल जल्द ही इसे बाजार मे उतारेगा जिसके लिए कम्पनी ने पेटेट के लिए अप्लाई कर दिया है. यह डिवाइस देखने में मोटोरोला मोटो 360 के आकार का हैं. आपको बता दें यह अपने सेंसर के जरीए आपके रक्त की जांच के साथ आपकी धड़कनो की रीडिंग पर भी नज़र रखेगा.


साभार :hindi.indiasamvad.co.in

Thursday, February 4

महिलाओं की दिल की धड़कन अनियमित होने पर पुरुषों की अपेक्षा अधिक खतरा !

यदि किसी महिला के दिल की धड़कन सामान्य नहीं है तो उसे दिल की बीमारी होने का ख़तरा पुरुषों से ज़्यादा है | ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय की कॉनर एमडिन और उनके सहयोगी डाक्टरों की टीम ने इस पर काफ़ी शोध किया है |अध्ययन में देखा गया कि जिन महिलाओं को एट्रियल फ़ाइब्रिलेशन (AF) की बीमारी थी, उनमें पुरुषों की तुलना में दिल का दौरा पड़ने या दूसरे बीमारी की आशंका दोगुनी थी | यह भी पाया गया कि एट्रियल फ़ाइब्रिलेशन की दवा देने पर महिलाओं को ठीक होने में पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा समय लगा |
कॉनर ने बीबीसी को बताया, "एक संभावना तो यह भी है कि एएफ़ बीमारी से ग्रस्त महिलाएं उन पुरुषों की रिश्तेदार हैं, जिनका इलाज नहीं हुआ है |"
ब्रिटेन में दस लाख से ज़्यादा लोगों को एट्रियल फ़ाइब्रिलेशन का रोग है | आप को तो यह बीमारी नहीं, इसकी जांच आप महज़ 30 सेकंड में कर सकती हैं | कभी-कभी दिल की धड़कन थोड़ा कम या ज़्यादा होना ख़ास चिंता की बात नहीं है, ऐसा हो सकता है |पर यदि आपके दिल की धड़कन बार बार अनियमित हो जाती है और वह भी बग़ैर किसी निश्चित पैटर्न के, तो चिंता की बात है | ऐसे में आपको डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए |
यह भी हो सकता है कि आप के दिल की धड़कन काफ़ी तेज़ हो जाए, मसलन, एक मिनट में सौ से अधिक | ऐसा होने पर आपको चक्कर आ सकता है या दम फूल सकता है | AF में होता यह है कि दिल का ऊपरी चैंबर यानी एट्रिया (अलिंद) अनियमत रुप से सिकुड़ता है | कभी-कभी तो वह इतनी तेज़ी से सिकुड़ता है कि दिल की मांसपेशियां उसके हिसाब से नहीं सिकुड़ पाती हैं और उनकी क्षमता कम हो जाती है |

स्रोत : बीबीसी.कॉम

Tuesday, December 1

आज विश्व एड्स दिवस है - कुछ तथ्य एड्स के विषय में !

विश्व एड्स दिवस, 1988 के बाद से 1 दिसंबर को हर साल मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य HIV  (ह्यूमन इम्यूनो डेफिशियेंसी वायरस) संक्रमण के प्रसार की वजह से एड्स (एक्वायर्ड इम्युनो डेफिशियेंसी सिंड्रोम) महामारी के प्रति जागरूकता बढाना है। सरकार, स्वास्थ्य अधिकारी, ग़ैर सरकारी संगठन एवं दुनिया भर में लोग आज के दिन एड्स की रोकथाम और नियंत्रण विषयक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं |

एच.आई.वी./ एड्स क्‍या है?



एड्स- एच.आई.वी. नामक विषाणु से होता है। संक्रमण के लगभग 12 सप्‍ताह के बाद ही रक्‍त की जॉंच से ज्ञात होता है कि यह विषाणु शरीर में प्रवेश कर चुका है, ऐसे व्‍यक्ति को एच.आई.वी. पोजिटिव कहते हैं। एच.आई.वी. पोजिटिव व्‍यक्ति कई वर्षो (6 से 10 वर्ष) तक सामान्‍य प्रतीत होता है और सामान्‍य जीवन व्‍यतीत कर सकता है, लेकिन दूसरो को बीमारी फैलाने में सक्षम होता है।

यह विषाणु मुख्‍यतः शरीर को बाहरी रोगों से सुरक्षा प्रदान करने वाले रक्‍त में मौजूद टी कोशिकाओं (सेल्‍स) व मस्ति‍ष्‍क की कोशिकाओं को प्रभावित करता है और धीरे-धीरे उन्‍हे नष्‍ट करता रहता है कुछ वर्षो बाद (6 से 10 वर्ष) यह स्थिति हो जाती है कि शरीर आम रोगों के कीटाणुओं से अपना बचाव नहीं कर पाता और तरह-तरह का संक्रमण (इन्‍फेक्‍शन) से ग्रसित होने लगता है इस अवस्‍था को एड्स कहते हैं।

एड्स का खतरा किसके लिए :


  • एक से अधिक लोगों से यौन संबंध रखने वाला व्‍यक्ति

  • वेश्‍यावृति करने वालों से यौन सम्‍पर्क रखने वाला व्‍यक्ति

  • नशीली दवाईयां इन्‍जेकशन के द्वारा लेने वाला व्‍यक्ति

  • यौन रोगों से पीडित व्‍यक्ति

  • पिता/माता के एच.आई.वी. संक्रमण के पश्‍चात पैदा होने वाले बच्‍चें

  • बिना जांच किया हुआ रक्‍त ग्रहण करने वाला व्‍यक्ति



एड्स रोग कैसे फैलता है :


  • एच.आई.वी. संक्रमित व्‍यक्ति के साथ यौन सम्‍पर्क से।

  • एच.आई.वी. संक्रमित सिरिंज व सूई का दूसरो के द्वारा प्रयोग करने सें।

  • एच.आई.वी. संक्रमित मां से शिशु को जन्‍म से पूर्व, प्रसव के समय, या प्रसव के शीघ्र बाद।

  • एच.आई.वी. संक्रमित अंग प्रत्‍यारोपण से।



एड्स से बचाव :


  1. जीवन-साथी के अलावा किसी अन्‍य से यौन संबंध नही रखे

  2. यौन सम्‍पर्क के समय निरोध(कण्‍डोम) का प्रयोग करें

  3. मादक औषधियों के आदी व्‍यक्ति के द्वारा उपयोग में ली गई सिरिंज व सूई का प्रयोग न करें

  4. एड्स पीडित महिलाएं गर्भधारण न करें, क्‍योंकि उनसे पैदा होने वाले‍ शिशु को यह रोग लग सकता है

  5. रक्‍त की आवश्‍यकता होने पर अनजान व्‍यक्ति का रक्‍त न लें, और सुरक्षित रक्‍त के लिए एच.आई.वी. जांच किया रक्‍त ही ग्रहण करें

  6. डिस्‍पोजेबल सिरिन्‍ज एवं सूई तथा अन्‍य चिकित्‍सीय उपकरणों का 20 मिनट पानी में उबालकर जीवाणुरहित करके ही उपयोग में लें,

  7. दूसरे व्‍यक्ति का प्रयोग में लिया हुआ ब्‍लेड/पत्‍ती काम में ना लें



एच.आई.वी. संक्रमण पश्‍चात लक्षण :

एच.आई.वी. पोजिटिव व्‍यक्ति में 7 से 10 साल बाद विभिन्‍न बीमारिंयों के लक्षण पैदा हो जाते हैं जिनमें ये लक्षण प्रमुख रूप से दिखाई पडते है -


  • गले या बगल में सूजन भरी गिल्टियों का हो जाना।

  • लगातार कई-कई हफ्ते अतिसार घटते जाना।

  • लगातार कई-कई हफ्ते बुखार रहना।

  • हफ्ते खांसी रहना।

  • अकारण वजन घटते जाना।

  • मूंह में घाव हो जाना।

  • त्‍वचा पर दर्द भरे और खुजली वाले ददोरे/चकते हो जाना।

  • उपरोक्‍त सभी लक्षण अन्‍य सामान्‍य रोगों, जिनका इलाज हो सकता है, के भी हो सकते हैं

  • किसी व्‍यक्ति को देखने से एच.आई.वी. संक्रमण का पता नहीं लग सकता- जब तक कि रक्‍त की जांच ना की जावे



एड्स निम्‍न तरीकों से नहीं फैलता है :

एच.आई.वी. संक्रमित व्‍यक्ति के साथ सामान्‍य संबंधो से, जैसे हाथ मिलाने, एक साथ भोजन करने, एक ही घडे का पानी पीने, एक ही बिस्‍तर और कपडो के प्रयोग, एक ही कमरे अथवा घर में रहने, एक ही शौचालय, स्‍नानघर प्रयोग में लेने से, बच्‍चों के साथ खेलने से यह रोग नहीं फैलता है मच्‍छरों /खटमलों के काटने से यह रोग नहीं फैलता है।

प्रमुख सन्‍देश :


  1. एड्स का कोई उपचार बचाव का टीका नहीं हैं।

  2. सु‍रक्षित यौन संबंध के लिए निरोध का उपयोग करें।

  3. हमेशा जीवाणुरहित अथवा डिस्‍पोजेबल सिरिंज व सूई ही उपयोग में लेवें।

  4. एच.वाई.वी. संक्रमित महिला गर्भधारण न करें।



स्रोत : चिकित्सा,स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग - राजस्थान सरकार

Monday, November 23

What Is Breast Cancer?

Cancer is a disease in which cells in the body grow out of control. When cancer starts in the breast, it is called breast cancer. Except for skin cancer, breast cancer is the most common cancer in American women.

A breast is made up of three main parts: glands, ducts, and connective tissue. The glands produce milk. The ducts are passages that carry milk to the nipple. The connective tissue (which consists of fibrous and fatty tissue) connects and holds everything together.

Lumps in the Breast



Many conditions can cause lumps in the breast, including cancer. But most breast lumps are caused by other medical conditions. The two most common causes of breast lumps are fibrocystic breast condition and cysts. Fibrocystic condition causes noncancerous changes in the breast that can make them lumpy, tender, and sore. Cysts are small fluid-filled sacs that can develop in the breast.

What Is a Normal Breast?



No breast is typical. What is normal for you may not be normal for another woman. Most women say their breasts feel lumpy or uneven. The way your breasts look and feel can be affected by getting your period, having children, losing or gaining weight, and taking certain medications. Breasts also tend to change as you age. For more information, see the National Cancer Insititute’s Understanding Breast Changes: A Health Guide for Women.

Frequently Asked Questions





http://www.cdc.gov/cancer/breast/basic_info/what-is-breast-cancer.htm

Urinary Tract Infection

What Is a Urinary Tract Infection?



A urinary tract infection (UTI) occurs when one or more parts of the urinary system (kidneys, ureters, bladder, or urethra) become infected with a pathogen (most frequently, bacteria). UTIs most commonly occur in females; about 50% of all females get a UTI during their lifetime. Many UTIs are not serious but if infection reaches the kidneys, serious illness, and even death, can occur.

2UTI Symptoms: Bladder Infection 



Bladder infections are the most common type of UTI. Some individuals may have few or no symptoms; however, the usual symptoms include dysuria (pain or burning during urination), low abdominal pain, and/or urine that is cloudy or smells bad or unusual.

3UTI Symptoms: Kidney Infection



Some bladder infections do not resolve and get worse with the pathogens moving up (retrograde) the ureters to the kidneys. Symptoms may include those listed for bladder infections on the pervious slide, but often include other symptoms such as pain in the lower back (flank pain on one or both sides), fever, chills, and nausea and/or vomiting.

When to Visit Your Doctor :



4Although a bladder infection is not a medical emergency, the following individuals have a higher risk for UTI complications such as infection spread to the kidneys or elsewhere in the body:
Pregnant women
People who have diabetes
Individuals with kidney problems
Elderly individuals

5UTI or Something Else?



UTI symptoms described in previous slides may also be symptoms of other fairly common types of infections, sexually transmitted diseases (STDs).These diseases include gonorrhea (and sometimes syphilis along with gonorrhea), chlamydia, and trichomoniasis. Lab tests are readily available to diagnose and differentiate a UTI from an STD. Discharge of pus or fluid from the penis or vagina is a symptom often present in STDs but not usually present in UTIs.

6Honeymoon Cystitis



Honeymoon cystitis is the term for a UTI that often occurs after sexual activity. A few women get a UTI frequently after sexual activity (honeymoon or not). Sexual activity can push infecting bacteria into the urethra resulting in an infection. Women with a diaphragm placed for birth control are at a higher risk for UTIs.

Sunday, November 22

HIV / AIDS

HIV is a virus spread through body fluids that affects specific cells of the immune system, called CD4 cells, or T cells. Over time, HIV can destroy so many of these cells that the body can’t fight off infections and disease. When this happens, HIV infection leads to AIDS. Learn more about the stages of HIV and how to tell whether you’re infected.

What is HIV?



HIV stands for human immunodeficiency virus. It is the virus that can lead to acquired immunodeficiency syndrome, or AIDS. Unlike some other viruses, the human body cannot get rid of HIV. That means that once you have HIV, you have it for life.

No safe and effective cure currently exists, but scientists are working hard to find one, and remain hopeful. Meanwhile, with proper medical care, HIV can be controlled. Treatment for HIV is often called antiretroviral therapy or ART. It can dramatically prolong the lives of many people infected with HIV and lower their chance of infecting others. Before the introduction of ART in the mid-1990s, people with HIV could progress to AIDS in just a few years. Today, someone diagnosed with HIV and treated before the disease is far advanced can have a nearly normal life expectancy.

HIV affects specific cells of the immune system, called CD4 cells, or T cells. Over time, HIV can destroy so many of these cells that the body can’t fight off infections and disease. When this happens, HIV infection leads to AIDS.

Where did HIV come from?



Scientists identified a type of chimpanzee in West Africa as the source of HIV infection in humans. They believe that the chimpanzee version of the immunodeficiency virus (called simian immunodeficiency virus, or SIV) most likely was transmitted to humans and mutated into HIV when humans hunted these chimpanzees for meat and came into contact with their infected blood. Studies show that HIV may have jumped from apes to humans as far back as the late 1800s. Over decades, the virus slowly spread across Africa and later into other parts of the world. We know that the virus has existed in the United States since at least the mid- to late 1970s.

What are the stages of HIV?



HIV disease has a well-documented progression. Untreated, HIV is almost universally fatal because it eventually overwhelms the immune system—resulting in acquired immunodeficiency syndrome (AIDS). HIV treatment helps people at all stages of the disease, and treatment can slow or prevent progression from one stage to the next.

A person can transmit HIV to others during any of these stages:

Acute infection: Within 2 to 4 weeks after infection with HIV, you may feel sick with flu-like symptoms. This is called acute retroviral syndrome (ARS) or primary HIV infection, and it’s the body’s natural response to the HIV infection. (Not everyone develops ARS, however—and some people may have no symptoms.)

During this period of infection, large amounts of HIV are being produced in your body. The virus uses important immune system cells called CD4 cells to make copies of itself and destroys these cells in the process. Because of this, the CD4 count can fall quickly.

Your ability to spread HIV is highest during this stage because the amount of virus in the blood is very high.

Eventually, your immune response will begin to bring the amount of virus in your body back down to a stable level. At this point, your CD4 count will then begin to increase, but it may not return to pre-infection levels.

Clinical latency (inactivity or dormancy): This period is sometimes called asymptomatic HIV infection or chronic HIV infection. During this phase, HIV is still active, but reproduces at very low levels. You may not have any symptoms or get sick during this time. People who are on antiretroviral therapy (ART) may live with clinical latency for several decades. For people who are not on ART, this period can last up to a decade, but some may progress through this phase faster. It is important to remember that you are still able to transmit HIV to others during this phase even if you are treated with ART, although ART greatly reduces the risk. Toward the middle and end of this period, your viral load begins to rise and your CD4 cell count begins to drop. As this happens, you may begin to have symptoms of HIV infection as your immune system becomes too weak to protect you .

AIDS (acquired immunodeficiency syndrome): This is the stage of infection that occurs when your immune system is badly damaged and you become vulnerable to infections and infection-related cancers called opportunistic illnesses. When the number of your CD4 cells falls below 200 cells per cubic millimeter of blood (200 cells/mm3), you are considered to have progressed to AIDS. (Normal CD4 counts are between 500 and 1,600 cells/mm3.) You can also be diagnosed with AIDS if you develop one or more opportunistic illnesses, regardless of your CD4 count. Without treatment, people who are diagnosed with AIDS typically survive about 3 years. Once someone has a dangerous opportunistic illness, life expectancy without treatment falls to about 1 year. People with AIDS need medical treatment to prevent death.

How can I tell if I’m infected with HIV?



The only way to know if you are infected with HIV is to be tested. You cannot rely on symptoms to know whether you have HIV. Many people who are infected with HIV do not have any symptoms at all for 10 years or more. Some people who are infected with HIV report having flu-like symptoms (often described as “the worst flu ever”) 2 to 4 weeks after exposure. Symptoms can include:

Fever
Enlarged lymph nodes
Sore throat
Rash
These symptoms can last anywhere from a few days to several weeks. During this time, HIV infection may not show up on an HIV test, but people who have it are highly infectious and can spread the infection to others.

However, you should not assume you have HIV if you have any of these symptoms. Each of these symptoms can be caused by other illnesses. Again, the only way to determine whether you are infected is to be tested for HIV infection. For information on where to find an HIV testing site,

Visit National HIV and STD Testing Resources and enter your ZIP code.
Text your ZIP code to KNOWIT (566948), and you will receive a text back with a testing site near you.
Call 800-CDC-INFO (800-232-4636) to ask for free testing sites in your area.
These resources are confidential. You can also ask your health care provider to give you an HIV test.

Two types of home testing kits are available in most drugstores or pharmacies: one involves pricking your finger for a blood sample, sending the sample to a laboratory, then phoning in for results. The other involves getting a swab of fluid from your mouth, using the kit to test it, and reading the results in 20 minutes. Confidential counseling and referrals for treatment are available with both kinds of home tests.

If you test positive for HIV, you should see your doctor as soon as possible to begin treatment.

Is there a cure for HIV?



For most people, the answer is no. Most reports of a cure involve HIV-infected people who needed treatment for a cancer that would have killed them otherwise. But these treatments are very risky, even life-threatening, and are used only when the HIV-infected people would have died without them. Antiretroviral therapy (ART), however, can dramatically prolong the lives of many people infected with HIV and lower their chance of infecting others. It is important that people get tested for HIV and know that they are infected early so that medical care and treatment have the greatest effect. (http://www.cdc.gov/)

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