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Saturday, October 5

इन नौ औषधियों में वास है नवदुर्गा का



By- Dr.Kailash Dwivedi
मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां,जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया। चिकित्सा प्रणाली का यह रहस्य वास्तव में ब्रह्माजी ने दिया था जिसे बारे में दुर्गाकवच में संदर्भ मिल जाता है। ये औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली हैं।

 शरीर की रक्षा के लिए कवच समान कार्य करती हैं। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जी सकता है। आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है।

प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़
 नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है।

पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान
हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता)- शिवा यानी कल्याण करने वाली।

द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी 
ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वालीऔर स्वर को मधुर करने वाली है।

इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है। यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी कीआराधना करना चाहिए।

तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर
नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है।

यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।

चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा 
नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं।

इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ितव्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए।



पंचम स्कंदमाता यानि अलसी
नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है।

"अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।"
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए।


षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया 
नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है।
इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करनी चाहिए।








सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन
दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है।

 यह नागदौन औषधि केरूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है। इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

अष्टम महागौरी यानि तुलसी 
नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र।
ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।

"तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि:
तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।"
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।

नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी
नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी याशतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है।

 सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
सर्व मंगलम मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्रयम्ब्के गौरी नारायणी नमो स्तुते।।

Thursday, March 2

रोगो को समूल नष्ट करने में सहायक - पंचकर्म थेरेपी



आयुर्वेद संहिताओं में रोगोपचार की दो विधियॉ बताई गई हैः

  1. शोधन

  2. शमन

शोधन चिकित्सा :


इसमें शारीरिक व्याधियों के कारक दूषित दोषों को शरीर से बाहर निकाल फेंकने से अधिकांश व्याधियां स्वतः ठीक हो जाती है। उसके बाद किया गया उपचार अधिक प्रभावी होता है। पंचकर्म इसी शोधन विधि का तकनीकी नाम है। इसकी क्रम बद्धता निम्न प्रकार है-

पूर्वकर्म :


  • स्नेहन

  • स्वेदन

प्रधानकर्म :


  • वमन

  • विरेचन

  • आस्थापन बस्ति

  • अनुवासन-बस्ति

  • शि‍रो-विरेचन

आयुर्वेदीय चिकित्सा पद्धति में प्रायः अधिकांश रोगो में रोगानुसार किसी एक कर्म के द्धारा शोधन कराने के बाद ही औषध के आभ्यंतर प्रयोग का विधान है। इससे कोई भी रोग पूर्ण एवं समूल दूर किया जाता है। बिना पंचकर्म के औषध सेवन से रोगो का शमन हो सकता है किन्तु समूल नाश नही हो सकता। अतः रोगो को समूल नष्ट करने एवं शोधन के बाद रसायन सेवन से कायाकल्प करने में 'पंचकर्म' पद्धति आवश्‍यक है।
पंचकर्म के विभिन्न कर्मो का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है -

पूर्वकर्म :


स्नेहन
इस विधि में शरीर के विकृत दोषो को बढाकर बाहर निकालने के लिए द्घृतपान, तेलपान एवं अभ्यंग का प्रयोग किया जाता है।
स्वेदन
इस विधि की अनेक उपविधियॉ है जिनके द्धारा शरीर से पसीना निकाल कर अनेक रोगो का उपचार किया जाता है।
उक्त दोनों कर्म नियमानुसार प्रत्येक कर्म के पहले करना आवश्‍यक है।

प्रधानकर्म :

वमन
इस कर्म के द्वारा कफ जन्य जटिल रोगों का उपचार किया जाता है जैसे-कास-श्‍वास-अजीर्ण-ज्वर इत्यादि । इसमें औषधीय क्वाथ को पिलाकर उल्टी (वमन) कराई जाती है, जिससे विकृत कफ एवं पित्त बाहर आ जाने से रोग शांत होता है।
विरेचन
पैत्तिक रोगों के लिए उक्त कर्म लाभदायक है। साथ ही उदर रोगों में इससे लाभ प्राप्त होता है, जैसेः- अजीर्ण-अम्लपित्त, शि‍रःशूल, दाह, उदरशूल, विवधं गुल्म इत्यादि। इसके लिए भी विभिन्न चरणों मे भिन्न-भिन्न औषध देने का प्रावधान है।
आस्थापन बस्ति
इसका दूसरा नाम मेडिसिनल एनिमा देना भी है। आयुर्वेद के अनुसार इस प्रक्रियां में खुश्‍क द्रव्यों के क्वाथ की बस्ति गुदा मार्ग से देकर दोषो का शोधन किया जाता है। इससे पेट एवं बडी आंत के वायु संबधी सभी रोगों में लाभ मिलता है।
अनुवासन बस्ति
इस प्रक्रिया में स्निग्ध (चिकने) पदार्थो जैसे दूध, धी, तेल आदि के औषधीय मिश्रण का एनिमा लगाया जाता है। इससे भी पेट एवं बडी आंत के रोगों में काफी लाभ मिलता है, जैसेः- विबंध, अर्श-भगन्दर, गुल्प, उदरशूल, आध्मान (आफरा) इत्यादि ।
उपरोक्त दोनों प्रक्रियाओं को आयुर्वेद में अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है। इन प्रक्रियाओं से समस्त प्रकार के वातरोगों एवं अन्य रोगों में स्थाई लाभ मिलता है।
शि‍रोविरेचन
इस विधि में नासा-मार्ग द्धारा औषध पूर्ण एवं विभिन्न तेलों का नस्य (SNUFF) दिया जाता है तथा सिर के चारों तरफ पट्ट बन्धन करके तैल धारा का प्रयोग किया जाता है। इन प्रयोगों से सिर के अन्दर की खुश्‍की दूर होती है। तथा पुरानाजमा बलगम छींक आदि के माध्यम से बाहर आ जाता है और रोगी को स्थाई लाभ मिल जाता है। उर्ध्वजत्रुगत (ई.एन.टी) रोगों, सभी तरह के शि‍रोरोगों एवं नेत्र रोगो हेतु उक्त प्रक्रिया काफी लाभदायक है। इससे पुराने एवं कठिन शि‍रःशूल, अर्धावभेदक, अनिद्रा, मानसिक तनाव (टेंशन) स्पोन्डलाइटिस इत्यादि रोगों मे काफी फायदा होता है।
वर्तमान में पंचकर्म चिकित्सा पद्धति काफी लोकप्रिय हो रही है। लेकिन शास्त्र सम्मत तरीके से न करने पर इसके विपरीत प्रभाव भी होते है, जो बाद मे अधिक जटिलता उत्पन्न कर देते है।
स्रोत : आयुर्वेद विभाग (राजस्थान सरकार)
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Saturday, February 25

इससे गुर्दे की पथरी हो जाएगी गायब !



By- Dr.Kailash Dwivedi 
गुर्दे की पथरी (वृक्कीय कैल्कली, नेफरोलिथियासिस) मूत्रतंत्र की एक ऐसी स्थिति है जिसमें गुर्दे के अन्दर छोटे-छोटे पत्थर जैसे कठोर पदार्थों का निर्माण होता है। गुर्दें में एक समय में एक या अधिक पथरी हो सकती है। सामान्यत: ये पथरियाँ बिना किसी तकलीफ मूत्रमार्ग से शरीर से बाहर निकाल दी जाती हैं, किन्तु यदि ये पर्याप्त रूप से बड़ी हो जाएं (२-३ मिमी आकार के) तो ये मूत्रवाहिनी में अवरोध उत्पन्न कर सकती हैं। इस स्थिति में मूत्रांगो के आसपास असहनीय पीड़ा होती है। 

पथरी के लक्षण :

  • पीठ के निचले हिस्से में अथवा पेट के निचले भाग में अचानक तेज दर्द होना
  • गुर्दे की पथरी का दर्द अधिकांश रोगी की पीठ से पेट की तरफ आता हैं।
  • पेशाब के साथ-साथ दर्द होना
  • बार बार और एकदम से पेशाब आना
  • रुक रुक कर पेशाब आना
  • रात में अधिक पेशाब आना
  • मूत्र में रक्त भी आ सकता है
  • पेशाब का रंग असामान्य होना
  • कब्ज या दस्त का लगातार बने रहना
  • उल्टी जैसा होना
  • बैचेनी, थकान, तेज पेट दर्द कुछ मिनटो या घंटो तक बने रहना
  • मूत्र संबंधी संक्रमण साथ ही बुखार, कपकपी, पसीना आना

पथरी से ऐसे बचें :

  1. अत्यधिक मात्रा में सोयाबीन, मूंगफली, पालक आदि का सेवन न करें
  2. पानी अधिक पिएं
  3. भोजन में प्रोटीन, नाइट्रोजन व सोडियम की मात्रा कम लें 
  4. विटामिन-सी की भारी मात्रा न लें
  5. नारंगी आदि का रस (जूस) लेने से पथरी का खतरा कम होता है
  6. सप्ताह में एक बार प्रातः खाली पेट एक चम्मच अजवाइन पानी के साथ निगलें

पथरी के घरेलू उपचार :

  1. 250 ग्राम कुल्थी रात्रि में तीन लिटर पानी में भिगो दें। प्रातः भीगी हुई कुल्थी उसी पानी सहित धीमी आग पर चार घंटे तक पकाएं। जब एक लिटर पानी रह जाए तब नीचे उतार लें। तत्पश्चात इस पानी में 30 ग्राम से 50 ग्राम देशी घी का छोंक लगाएं। छोंक में थोड़ा-सा सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा, हल्दी डाल सकते हैं। दोपहर के भोजन के स्थान पर यह सारा सूप पी जाएं। 250 ग्राम पानी अवश्य पिएं। प्रतिदिन एक-दो सप्ताह इस प्रयोग से गुर्दे तथा मूत्राशय की पथरी गल कर बिना ऑपरेशन के बाहर आ जाती है |
  2. भोजन में करेले की सब्जी का प्रयोग करें | करेले का जूस भी लाभकारी है।
  3. मिश्री की चाशनी में एक चम्मच जीरा मिलाकर शहद के साथ लेने पर पथरी घुलकर पेशाब के साथ बाहर निकल जाती है।
  4. एक मूली को खोखला करके उसमे 20 ग्राम गाजर व 20 ग्राम शलगम के बीज भर दें। उसके बाद मूली को भून लें, मूली से बीज निकाल कर पीस लें। प्रतिदिन प्रातः पांच ग्राम पाउडर पानी के साथ एक माह तक पियें |
  5. गुर्दे की पथरी में प्रतिदिन चुकंदर का रस पीने से पथरी बाहर निकल जाती है। चुकंदर के सूप का सेवन करने से भी पथरी समाप्त हो जाती है।
  6. प्रतिदिन प्रातः 4 छुहारों का सेवन करने से भी पथरी का रोगी ठीक हो सकता है।
  7. प्रतिदिन नियमित रूप से छाछ का सेवन करते रहने से भी पथरी छोटी होकर बाहर निकल जाती है।

विशेष :

  • पालक, टमाटर, बैंगन, चावल, उड़द, लेसदार पदार्थ, सूखे मेवे, चॉकलेट, चाय, मद्यपान, मांसाहार आदि का सेवन न करें
  • मूत्र को रोकना नहीं चाहिए
  • लगातार एक घंटे से अधिक एक आसन पर न बैठें।
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Monday, February 13

अनगिनत रोगों की औषधि है पीपल का वृक्ष - जानिए उपयोग




  • स्कन्द पुराण के अनुसार - अश्वत्थ (पीपल) के मूल में भगवान विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं। पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप है।
  • भगवान कृष्ण कहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ। स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है।
  • शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।
  • प्रसिद्ध ग्रन्थ व्रतराज के अनुसार -  अश्वत्थोपासना में पीपल वृक्ष की महिमा का उल्लेख है। अश्वत्थोपनयनव्रत में महर्षि शौनक द्वारा इसके महत्त्व का वर्णन किया गया है।
  • अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेद के अनुसार -  पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र, जप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया है।
  • श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए।
पीपल के बीज राई के दाने के आधे आकार में होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों वर्षो तक खड़ा रहता है। पीपल के वृक्ष के पत्ते मार्च के महीने में झड़ जाते हैं और गर्मी के मौसम में इसमें फल की बहार आती है, जो बारिश के मौसम में पकते हैं। पुराने पीपल के पेड़ से लाक्षा (लाख, चपड़ा) भी प्राप्त होती है।
पीपल के पेड़ के अनेक अलौकिक स्वास्थ्यकर गुणों के कारण इसे हिन्दू धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना गया है |पीपल पाचनशक्तिवर्द्धक, वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला), मधुर-रसायन, वातकफनाशक, हल्की, दस्तावर, श्वास (दमा), खांसी, बुखार, कोढ़, प्रमेह (वीर्य विकार), बवासीर, प्लीहा शूल तथा आमवात आदि रोगों में लाभकारी है। यह पेशाब और मासिक-धर्म के बहने को जारी करती है, गर्भ को गिरने नहीं देती है। हृदय (दिल) की बीमारियों को हटाती है। कृमि (कीड़े) रोगों का नाश करती है। पीपल की छाल का लेप सूजन को मिटाता है, नासूर के लिए लाभकारी है तथा घावों को भरता है।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

हिंदी       :  पीपरि, पीपल।
संस्कृत    :  अश्वत्थ, पिप्पल, चलपत्र, गजाशन, बौधिद्रु।
बंगाली     :  पिपुल, अश्वत्थ।
मराठी      :  पिम्पली, पीपल।
कर्नाटकी   :  अरलीमारा।
तैलगू       :  रावीचेट्टु।
तमिल     :  आराकमरं, अष्वत्थम।
कन्नड़     :  अश्वत्थ।
गुजराती   :  लिंडी पीपर, पीपलों।
मलयलम :  अरायल।
फारसी    :  फिल-फिल दराज, दरख्तलरजा।
अंग्रेजी    :  डारफिल, सेक्रेड फिग, पोपलरलिब्ड फिग ट्री।
लैटिन    :  पाइपर लांगम, फाइकरिलिजियोजा।
  • रंग : इसका रंग भूरा और हरा होता है।
  • स्वाद : पीपल खाने में चरपरा होता है। कच्चा पीपल बाखट और पका पीपल फीका और मीठा होता है।
  • स्वरूप : यह एक प्रकार की गुल्म जातीय लता है। इसमें ही फल लगा करते हैं। पीपल के पत्ते पान की तरह छोटे, गोल तथा बड़ी नोक वाले नुकीले होते हैं। पीपल के फल पत्तों की जड़ में छोटे-छोटे गोल-गोल झड़बेरी के समान लगते हैं, पीपल के फल आधा व्यास के पकने पर बैंगनी या काले हो जाते हैं। इसकी डाली में लाख भी पैदा होती है।
  • स्वभाव : पीपल की तासीर गर्म होती है। पीपल का पत्ता और छाल ठंडी और रूखी होती है। बाकी भाग गर्म होता है।

रोगों में सेवन योग्य मात्रा :

  • पीपल की छाल और फलों का चूर्ण :  1 से 3 ग्राम।
  • लाक्षा (गोंद का) चूर्ण :  1 से 2 ग्राम।
  • छाल, पत्तों का काढ़ा :  50 से 100 मिलीलीटर।
  • पत्तों का रस :  10 से 20 मिलीलीटर |

विभिन्न रोंगों का पीपल से उपचार :

 मुंह के छाले :

पीपल की छाल के काढ़े से सुबह-शाम गरारे करने और छाल के चूर्ण को शहद में मिलाकर छालों पर लगाने से छालों में आराम मिलता है।

अफीम का नशा उतारने हेतु :

पीपल की छाल का काढ़ा रोगी को पिलाने से अफीम का जहर उतर जाता है |

हिचकी का रोग:

  • 1 ग्राम की मात्रा में पीपल का चूर्ण शहद या शर्करा के साथ चाटने से हिचकी आना बंद हो जाती है।
    पीपल के पेड़ की छाल पानी में घोलकर कुछ देर छोड़ दें। फिर इसके पानी को निथारकर पीने से हिचकी ठीक हो जाती है।
  • 1 ग्राम पीपल की लाख का चूर्ण शहद में मिलाकर रोगी को चटाने से हिचकी का रोग दूर हो जाता है।

खूनी दस्त :

पीपल की कोमल टहनियां, धनिये के बीज तथा मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर 3-4 ग्राम रोजाना सुबह-शाम सेवन कराने से खूनी दस्त के रोग में लाभ होता है।

उपदंश (सिफलिस):

पीपल के तने की 50 ग्राम सूखी छाल की राख, उपदंश पर छिड़कने से उपदंश के घाव ठीक हो जाते हैं।

पेट में दर्द:

पीपल के मुलायम 3 पत्तों को बारीक पीसकर गुड़ को मिलाकर छोटी-छोटी गोली बना लें। इन गोलियों को सुबह-शाम 1-1 गोली खुराक के रूप में खाने से पेट के दर्द में लाभ हो जाता है।

रक्त शुद्धि हेतु :

1-2 ग्राम पीपल के बीजों के चूर्ण को शहद के साथ सुबह-शाम चाटने से खून साफ हो जाता है।

प्रदर:

40 ग्राम पीपल के गोंद को कूट-पीसकर इसे 5 ग्राम गाय के कच्चे दूध के साथ प्रातः सेवन करने से प्रदर रोग मिट जाता है।
• पीपल के सूखे गोंद को आटे में मिलाकर गाय के दूध में हलवा बनाकर खाने से प्रदर में लाभ मिलता है।

श्वास (दमा) :

पीपल की लाख का चूर्ण घी और शक्कर के साथ मिलाकर खाने से दमा के रोग में आराम आता है।

कब्ज:

  • पीपल के 5-10 फल को प्रतिदिन खाने से कब्ज समाप्त हो जाती है ।
  • पीपल के पत्ते और कोमल कोपलों का 40 मिलीलीटर काढ़ा पीने से पेट साफ होता है।
घाव :
• पिसी हुई पीपल की छाल का काढ़ा बनाकर उससे घाव को धोने से घाव जल्दी भर जाता है।
• पीपल की छाल का बारीक चूर्ण घाव पर लगाने से रक्तस्राव (खून का बहना) बंद होकर घाव जल्दी भर जाता है।
• पीपल की छाल का बारीक चूर्ण लगाने से सड़े हुए तथा न भरने वाले घाव जल्दी ठीक होकर भर जाते हैं। भगंदर और कंठमाला के रोग में भी इससे लाभ होता है।
• पीपल की सूखी छाल को पीसकर जले हुए स्थान पर बुरकने से आग से जला हुआ घाव ठीक हो जाता है।

पुरानी खांसी में कफ के साथ खून आना :

  • लगभग आधा ग्राम पीपल की लाख, 1 चम्मच शहद, 2 चम्मच घी और थोड़ी सी मिश्री को मिलाकर दिन में 5-6 बार रोगी को देने से खून की खांसी बंद हो जाती है।
  • पीपल की लाख का चूर्ण घी और शक्कर के साथ खाने से सूखी खांसी में आराम आता है।

बुखार:

  • पीपल के पेड़ की टहनी तोड़कर उसे चबाकर रस को चूसे और लकड़ी थूक दें। इससे मलेरिया व हर प्रकार का बुखार उतर जायेगा।
  • हल्का बुखार, सूखी खांसी और कमजोरी के रोग में घी, शहद और चीनी के साथ पीपल की लाख देनी चाहिए।

बच्चों का शारीरिक दर्द एवं अनिद्रा :

एक चुटकी पीपल की लाख को थोड़े से दूध में मिलाकर बच्चों को पिलाने से बच्चों के दर्द और नींद न आना दूर होता है।

दांतों के रोग :

पीपल की ताजी टहनी को दांतों से चबाकर दातुन करने से और इसकी छाल के काढ़े से गरारे करने से मुंह की दुर्गंध मिटती है, दांतों का दर्द, पायरिया एवं मसूढ़ों की सूजन में भी लाभ होता है ।

चर्म रोग:

  • पीपल के पत्तों को पानी में उबालकर उसके काढ़े से नहाने से त्वचा के अनेक रोग दूर हो जाते हैं।
  • पीपल की कोमल कोपलें खाने से खुजली और त्वचा पर फैलने वाले चर्मरोग दूर हो जाते हैं। इसका 40 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर पीने से भी यही लाभ होता है।
  • 6 ग्राम पीपल के पेड़ की जड़ के चूर्ण को 5 कालीमिर्च के साथ बारीक पीसकर और छानकर पीने से और इसी लेप बनाकर श्वेत कुष्ठ (कोढ़) में लगाने से श्वेत कुष्ठ दूर होता है।

गर्भ का न ठहरना :

  • 250 ग्राम पीपल के पेड़ की सूखी पिसी हुई जड़ों में 250 ग्राम बूरा मिलाकर रख लें। जिस दिन से पत्नी का मासिक-धर्म आरम्भ हो, उस दिन से इसे पति व पत्नी दोनों 4-4 चम्मच गर्म दूध के साथ 11 दिनों तक फंकी लें। जिस दिन यह मिश्रण समाप्त हो, उसी रात से 12 बजे के बाद प्रतिदिन संभोग (स्त्री प्रंसग) करने से बांझपन की स्थिति में भी गर्भधारण की संम्भावना बढ़ जाती है।
  • पीपल के सूखे फलों के 1-2 ग्राम चूर्ण कच्चे दूध के साथ मासिक-धर्म के शुद्ध होने के बाद 14 दिनों तक देने से बांझपन में लाभ होता है।

हकलाहट :

आधा चम्मच पीपल के पके फलों का चूर्ण शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से हकलाहट में लाभ होता है।

नपुंसकता :

आधा चम्मच पीपल के फल का चूर्ण दिन में 3 बार दूध के साथ सेवन करते रहने से नपुंसकता (नामर्दी) दूर होकर, बल, वीर्य तथा पौरुष बढ़ता है।

वीर्यवर्धक :

  • पीपल की जड़ की छाल का प्रयोग करने से वीर्य अधिक गाढ़ा होता है |
  • छाया में सुखाये गए पीपल के फल को पीसकर छान लें। इस चौथाई चम्मच चूर्ण को 250 मिलीलीटर गर्म दूध में मिलाकर प्रतिदिन पीने से वीर्य बढ़ जाता है। नपुंसकता दूर होती है। इससे मासिक-धर्म के रोग, श्वेतप्रदर एवं कब्ज में भी अत्यंत लाभ होता है।

पीलिया :

पीपल के 3-4 पत्तों को मिश्री के साथ खरल में खूब घोंटकर बारीक पीस लें इसमें 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर छान लें। 3- 5 दिनों तक प्रतिदिन यह पेय पीने से लाभ होता है |

अपच :

  • पीपल का 1 पत्ता + 4 कलियां शीशम की + थोड़ा-सा हरा धनिया आपस में मिलाकर 1 कप पानी में तब तक उबालें जब तक पानी आधा कप न बच जाए, फिर इसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर पीने से आराम होगा।
  • पीपल के पेड़ की कोपलों को मिट्टी के बर्तन में बंद करके जलाकर उसकी राख बना लें। इस राख को खाने से मंदाग्नि एवं  अजीर्ण में लाभ होता है।
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Tuesday, January 3

जानिए हींग (ASAFOETIDA) के औषधीय गुणों को





हींग से सभी परिचित हैं, भारत की शायद ही कोई रसोई होगी जहाँ हींग न मिले | इसका उपयोग आमतौर पर दाल-सब्जी में डालने के लिए किया जाता है इसलिए इसे `बघारनी´ के नाम से भी जाना जाता है।

हींग का पौधा 60 से 90 सेमी तक ऊंचा होता है। ये पौधे-ईरान, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान, ब्लूचिस्तान, काबुल और खुरासन के पहाड़ी इलाकों में अधिक होते हैं। हींग इस पौधे का चिकना रस है।

हींग कैसे बनती है :


हींग के पत्तों और तना से निकलने वाला दूध पेड़ पर सूखकर गोंद बन जाता है उसे निकालकर पत्तों में भरकर सुखा लिया जाता है। सूखने के बाद वह हींग के नाम से जाना जाता है।

वैज्ञानिक नाम : फेरूला फोइटिस

रंग : हींग का रंग सफेद, हल्का गुलाबी और पीला, व सुरखी मायल जैसा होता है।

स्वाद : इसका स्वाद खाने में कडुवा और गन्ध से भरा होता है।

स्वभाव : हींग गर्म और खुश्क होती है।



गुण : हींग मिर्गी जैसे स्नायु तन्त्र के रोगों में बेहद लाभकारी है | यह पाचन सम्बन्धी रोगों जैसे - अपच, गैस, भूख की कमी आदि को भी दूर करती है | इसके अतिरिक्त कान के रोग, आँखों के रोग, वात एवं कफ के रोग, स्त्रियों के रोग एवं पुरुषों के यौन विकारों को भी नष्ट करती है |

हींग के औषधीय उपयोग :


पेट के रोगों में हींग के प्रयोग :


अजीर्ण :

हींग की चने के आकार की  गोली बनाकर घी के साथ निगलने से अजीर्ण और पेट के दर्द में लाभ होता है।

भूख की कमी :

भोजन करने से पहले घी में भुनी हुई चने के बराबर हींग एवं अदरक का एक छोटा टुकड़ा, मक्खन के साथ लें। इस प्रयोग से भूख खुलेगी |

अपच :

हींग + छोटी हरड़ + सेंधानमक + अजवाइन  सभी को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। एक चम्मच की मात्रा प्रातः-दोपहर-सायं, गर्म पानी के साथ लें। इससे पाचन शक्ति प्रबल होती है।

पेट की गैस :

गैस के रोग में हींग, काला नमक और अजवाइन को पीसकर चूर्ण बनाकर सेवन करने से लाभ होता है।

पीलिया:

चने के बराबर हींग को गूलर के सूखे फलों के साथ खाने से पीलिया में लाभ होता है।

हिचकी :
  • थोड़ी-सी हींग 10 ग्राम गुड़ में मिलाकर खाने से हिचकियां आना बंद हो जाती हैं।

  • 2 ग्राम हींग, 4 पीस बादाम की गिरी दोनों को एक साथ पीसकर पीने से हिचकी बंद हो जाती है।

  • थोड़ी-सी हींग पानी में घोलकर पीने से हिचकी में लाभ होता है।

डकार आना :

भुनी हुई हींग + काला नमक + अजवायन को समभाग लेकर देशी घी साथ प्रातः-सांय सेवन करने से डकार, गैस अपच में लाभ मिलता है।

एसिडिटी :

2 ग्राम हींग को भूनकर उसमें थोड़ा-सा कालानमक मिलाकर एक गिलास पानी में उबालकर ठण्डा करके पीने से लाभ होता है।

उल्टी :
  • हींग को पानी में पीसकर पेट पर लेप करने से उल्टी बंद होती है।

  • 1 ग्राम हींग, 5 ग्राम बहेड़ा का छिलका और 4 लौंग को एक साथ पीसकर 1 कप पानी में मिलाकर पीने से उल्टी आना रुक जाती है।

दस्त के आंव का आना :


5 ग्राम हींग + 10 ग्राम कपूर + 10 ग्राम कत्था +  नीम के कोमल पत्ते 3 ग्राम लेकर तुलसी के रस में पीसकर चने जैसी गोली बना लें। यह गोली दिन में 3-4 बार जामुन के पेड़ की छाल के रस में देने से आमातिसार में लाभ होता है। इसी गोली को गुलाब के रस के साथ देने से हैजे में लाभ होता है |

दर्द में हींग के प्रयोग :

पेट दर्द :

  • हींग को गर्म पानी में मिलाकर लेप बनाकर नाभि के आस-पास गाढ़ा लेप लगाने से पेट दर्द शान्त होता है।

  • शुद्ध हींग को घी में मिलाकर चाटने से पेट की बीमारी में लाभ मिलता है।

  • सेंकी हुई हींग और जीरा, सोंठ, सेंधानमक मिलाकर चौथाई चम्मच भर गर्म पानी से सेवन करना फायदेमंद होता है।

पसली का दर्द:

हींग को गर्म पानी में मिलाकर पसलियों पर मालिश करें। इससे दर्द में लाभ मिलता है।

कमर दर्द :

1 ग्राम सेंकी हुई हींग थोड़े से गर्म पानी में मिलाकर धीरे-धीरे पीने से कमर के दर्द में लाभ होता है।

वातशूल :

हीग को 20 ग्राम पानी में उबालें। जब आधा पानी बच जाए तो तब इसको पीने से वातशूल में लाभ होता है।

दांत दर्द :

  • हींग को पानी में उबालकर इस पानी से कुल्ले करने से दांतों का दर्द दूर हो जाता है।

  • हींग को चम्मच भर पानी में गर्म करके रूई भिगोकर दर्द वाले दांत के नीचे रखें। इससे दांतों का दर्द ठीक होता है एवं दांतों में लगे हुए कीड़े भी मर जाते हैं

कान दर्द :

हींग को तिल के तेल में पकाकर इसकी कुछ बूंदें कान में डालने से कान का दर्द दूर होता है।

सिर का दर्द :

  • सर्दी से सिरदर्द हो रहा हो तो हींग के गर्म  लेप को माथे पर मलें। इससे सिर का दर्द में लाभ मिलेगा।

  • आधासीसी के कारण होने वाले दर्द के लिए पानी में हींग को घोलकर उसकी कुछ बूंदें नाक में डालने से आराम मिलता है।

जोड़ों का दर्द :

जोड़ों के दर्द को दूर करने के लिये  हींग को घी में पीस लें। फिर इससे जोड़ों पर मालिश करें। इससे गठिया का रोग दूर हो जाता है।

कील, कांटा चुभना :

कांटा चुभने पर हींग को घोलकर उस स्थान पर लेप करने से शरीर के अंग के अन्दर घुसा हुआ कांटा या कील बाहर निकल आता है।

मासिक धर्म एवं गर्भ सम्बन्धी समस्या :

अनियमित या कम मासिकस्राव :

मासिकस्राव (माहवारी) कम आती हो तो भोजन में हींग डालकर सेवन करना चाहिए। इससे मासिकस्राव नियमित रूप से आना प्रारम्भ हो जाती है।

मासिक-धर्म का कष्ट के साथ आना :

माहवारी चालू होने के दिन से प्रातः तीन दिनों तक आधा ग्राम भुनी हींग पानी के साथ लेना चाहिए। इससे मासिक-धर्म की पीड़ा नष्ट होती है।

गर्भपात होने से रोकना :

बार-बार होने वाले गर्भपात को रोकने के लिए हींग बहुत ही उपयोगी होता है। गर्भ के ठहरने के लक्षण प्रतीत होते ही 6 ग्राम हींग की 60 गोलियां बना लेनी चाहिए तथा सुबह-शाम एक-एक गोली का सेवन करना चाहिए। धीरे-धीरे इसकी मात्रा 10 गोली तक प्रतिदिन कर देनी चाहिए। बाद में प्रसव के समय तक इसकी मात्रा धीरे-धीरे कम करते जाएं और पहले की तरह ही एक गोली सुबह और शाम को सेवन करें। इससे गर्भपात होने की आशंका बिल्कुल समाप्त हो जाती है।

प्रसव पीड़ा :

एक चुटकी हींग + 10 ग्राम गुड़ में मिलाकर खायें तत्पश्चात आधा कप पानी या गाय का दूध पीने से प्रसव के समय होने वाली पीड़ा नष्ट हो जाती है।

पुरुषों के रोग में हींग के प्रयोग :


लिंगवृद्धि हेतु :

लिंग को बढ़ाने के लिए हींग को पीसकर शहद में मिलाकर रात को सोते समय लिंग पर लगाने से लिंग की मोटाई बढ़ जाती है।

नपुंसकता :

  • गाय के मक्खन से आधी मात्रा में हींग मिलाकर कांसे की थाली में अच्छी तरह मिलाकर मरहम बना लें। पुरुष की इन्द्रिय पर सुपारी को छोड़कर उस पर इस मरहम का लेप करने से शिश्न की शिथिलता दूर होती है और नपुंसकता मिटती है।

  • हींग को शहद के साथ पीसकर शिश्न पर लेप करें इससे वीर्य ज्यादा देर तक रुकता है और संभोग करने में आनन्द मिलता है।

हींग के अन्य प्रयोग :


  • हींग को घी में मिलाकर मालिश करना पित्ती में लाभकारी होता है।

  • पागल कुत्ते के काटने पर हींग को पानी में पीसकर काटे हुए स्थान पर लगायें। इससे पागल कुत्ते के काटने का विष समाप्त हो जाता है।

  • हींग को सौंफ के रस के साथ सेवन करने से पेशाब खुलकर आता है।

  • घी में सेंकी हुई हींग को घी के साथ खाने से गर्भावस्था के दौरान आने वाले चक्कर और दर्द खत्म हो जाते हैं।

  • हींग और नीम के पत्ते पीसकर उसका लेप करने से व्रण (घाव) में पड़े हुए कीडे़ मर जाते हैं।

  • 2 ग्राम हींग को 2 ग्राम गुड़ में मिलाकर सुबह और शाम दें। इससे मलेरिया का बुखार नष्ट हो जाता है।

  • स्त्री के दूध के साथ असली हींग को पीसकर कान में डालने से बहरेपन का रोग ठीक हो जाता है।

  • पिसी हुई हींग को गर्म पानी में मिलाकर नाक में डालने से नाक का जख्म दूर हो जाता है और यदि कीड़े पड़ गए हैं तो वह भी समाप्त हो जाते हैं।

  • हिस्टीरिया में हींग सुंघाने से बेहाश रोगी होश में आ जाता है।

  • 250 मिलीलीटर मट्ठा में भुनी हुई हींग और जीरे का छौंक लगाकर सेवन करें। इससे निम्न रक्तचाप (लो ब्लड प्रेशर) के रोगी बहुत लाभ होता है।

  • 10 ग्राम असली हींग कपड़े में बांधकर गले में डाले रहने से मिरगी के दौरे दूर हो जाते हैं।

  • दाद को खुजालकर उस पर हींग का लेप करने से दाद ठीक हो जाता है।
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Sunday, December 18

यदि आप गर्दन,कमर,घुटनों के दर्द से परेशान हैं तो - एक बार इसे अवश्य आजमायें



आयुर्वेद चिकित्सा में एक क्रिया होती है जिसे वस्ति कहते हैं | वस्ति हड्डियों के जोड़ों की सूजन एवं दर्द के लिए अत्यंत लाभदायक है | विभिन्न अंगों पर प्रयोग के आधार पर इस क्रिया को अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे – यदि कमर दर्द जैसे रोग में इस क्रिया को करते हैं तो इसे कटिवस्ति, सर्वाइकल पेन में इस क्रिया के प्रयोग को ग्रीवावस्ति, घुटनों के दर्द में जब इसे घुटने में करते हैं तो जानुवस्ति एवं ह्रदय रोगों में ह्रदय पर यह क्रिया करने पर ह्रदयवस्ति कहलाती है |
मेरा स्वयं का अनुभव है कि उक्त रोगों में प्राकृतिक चिकित्सा के अन्य उपचारों के साथ यदि इस क्रिया को किया जाये तो परिणाम 95 प्रतिशत तक पहुँच जाता है | ऐसे रोगी जो सर्वाइकल पेन (रीढ़ की हड्डी में गर्दन की कशेरुकाओं का दर्द), कमर दर्द या घुटनों के दर्द से पीड़ित हों उन्हें इस क्रिया को अवश्य करना चाहिए |

वस्ति क्रिया के लिए आवश्यक सामग्री :

  1. बिना छिलके वाली उड़द की दाल का महीन पिसा हुआ आटा – 250 ग्राम |

  2. महानारायण या महाविषगर्भ तेल – 100 मिली.

  3. दो कटोरी (जिसमे इस तेल को गर्म किया जा सके)

  4. एक छोटा चम्मच

  5. गैस स्टोव या हीटर

  6. रुई या फोम का टुकड़ा

  7. रेक्सीन का टुकड़ा

  8. एक छोटा तौलिया

  9. रोगी को लिटाने के लिए एक टेवल

विधि :

  • सर्वप्रथम उड़द की दाल के आटे में पानी मिलाकर गूथ लें तत्पश्चात उसे चित्र के अनुसार रिंग का आकार देकर रोग्रस्त अंग पर इस प्रकार लगायें कि वह त्वचा से भलीभांति चिपक जाये | यह रिंग रोगग्रस्त अंग की त्वचा से इस प्रकार चिपकानी चाहिए कि इसके अन्दर तेल भरने पर तेल बाहर न निकले | इसके लिए रिंग के अन्दर एवं बाहर के किनारे-किनारे अंगुली से दबाकर आटे को अच्छी तरह से चिपका देना चाहिए |

  • रिंग बन जाने के बाद दोनों कटोरियों में आधा-आधा तेल डाल दें एवं एक कटोरी के तेल को हल्का सा गर्म करे |

  • गर्म तेल में दूसरी कटोरी से (जो गर्म नही किया गया था) से चम्मच से तेल मिलाकर तेल के तापमान को ऐसा बना लें कि रोगी उस तापमान को सह ले | इसके लिए अपने हाथ की ऊँगली तेल में डुबोकर तेल के तापमान को जांच लें |

  • अब इस तेल को चिपकाई गयी रिंग में भर दें |

  • रिंग वाला तेल ठंडा हो जाने पर इस तेल को चम्मच से निकाल ले एवं इसमें 2-3 चम्मच अन्य गर्म तेल मिलाकर पहले जितना तापमान हो जाने पर पुनः रिंग में भर दें | प्रत्येक 3-4 मिनट में इस प्रकार तेल के तापमान को व्यवस्थित करते रहें |

  • 30 मिनट तक इस प्रकार गर्म तेल से यह क्रिया करने के बाद सारा तेल चम्मच से बाहर निकाले एवं आटे की रिंग को हटा लें |

  • जिस अंग पर वस्ति क्रिया की गयी थी उसे 15-20 मिनट तक कपडे से ढक दें |
    प्रयोग किये गये आंटे को यदि इसी रोगी कई बार प्रयोग कर सकते हैं इसके लिए इस आंटे से तेल को टिशु पेपर से सुखाकर आंटे को फ्रिज में रख दें | पुनः प्रयोग करने के 30 मिनट पहले आंटे को फ्रिज से बाहर निकाल लेना चाहिए |

सावधानियां :

  1. तेल के तापमान का विशेष ध्यान रखें | उँगलियों की अपेक्षा गर्दन,कमर या घुटने की त्वचा अधिक संवेदनशील होती है अतः ऊँगली में तेल का जो तापमान सुहाता - सा महसूस हो वह तापमान इन अंगो के लिए पर्याप्त होगा |

  2. तेल के तापमान को व्यवस्थित करने के लिए सीधे रिंग के अंदर गर्म तेल न डालें बल्कि रिंग वाला तेल बाहर निकाल कर उसमे गर्म तेल मिलाकर पुनः उसे रिंग में भरें |

  3. रिंग वाले अंग के नीचे रेक्सीन का टुकड़ा बिछा दें ताकि कभी यदि तेल रिंग से बाहर निकलने लगे तो नीचे बिछे वस्त्र ख़राब न हों और आप उसे रुई या फोम से सोखाकर पुनः उपयोग में ले सकें |

  4. जहाँ पर वस्ति दी जा रही हो वहां पर हवा के झोंके ना आ रहे हों | पंखा आदि भी बंद करके रखें |

  5. वस्ति करने के बाद 15-20 मिनट तक वस्ति वाला अंग किसी तौलिया से ढक दें एवं रोगी को उसी स्थान पर लिटाकर रखें |

विशेष :
यद्दपि यह क्रिया पूर्णतया हानिरहित है फिर भी इसे किसी आयुवेद चिकित्सक की देखरेख में कराना अधिक उचित होगा | क्रिया करने के पूर्व आपने चिकित्सक की सलाह अवश्य ले लें |

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Saturday, December 17

वीर्य विकार ; घरेलू उपचार





  1. अनार के छिलके, कत्था और मिश्री को 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर और पीसकर 2 खुराक के रूप में सुबह और शाम प्रयोग करने से प्रमेह रोग में आराम मिलता है।

  2. 10 ग्राम खरबूजे के बीजों को पीसकर उसमें चंदन की 10 बूंदे मिलाकर खाने से प्रमेह (वीर्य विकार) रोग में आराम होता है।

  3. पालक के बीजों का चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में दिन में 3 बार खाने से प्रमेह रोग में लाभ होता है।

  4. 1 से 3 ग्राम इमली के बीजों का चूर्ण सुबह-शाम खाने से प्रमेह रोग में लाभ होता है।

  5. 6 ग्राम इमली की छाल की राख को लगभग 55 ग्राम इमली की कच्ची गिरी के साथ 5-6 दिन तक सुबह-शाम सेवन करना प्रमेह रोग में लाभकारी रहता है।

  6. 125 ग्राम इमली के बीजों को 250 मिलीलीटर दूध में भिगो दें। 3 दिन के बाद इन बीजों के छिलके उतारकर, साफ करके पीस लेते हैं। इसे सुबह-शाम 6 ग्राम की मात्रा में गाय के दूध या पानी से लेने से प्रमेह रोग दूर हो जाता है।

  7. हल्दी का चूर्ण 3 से 5 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ खाने से सब तरह के प्रमेह (वीर्य विकार) दूर होते हैं।

  8. हल्दी के पिसे और छने चूर्ण को आंवले के रस और शहद में मिलाकर चाटने से प्रमेह (वीर्य विकार) रोग दूर हो जाता है।

  9. 20 ग्राम हल्दी, 25 ग्राम आंवले का चूर्ण और 25 ग्राम मिश्री को एकसाथ मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में से 10 ग्राम चूर्ण को रोजाना 15 दिन तक पानी के साथ खाने से प्रमेह रोग में लाभ होता है।

  10. हल्दी के चूर्ण में शहद और आंवले के रस को मिलाकर चाटने से प्रमेह रोग में लाभ होता है।

  11. 1 ग्राम हल्दी का चूर्ण, आधा ग्राम शहद तथा 50 ग्राम आंवला का रस मिलाकर खाने से सब तरह के पित्तज प्रमेह दूर हो जाते हैं।

  12. तुलसी के बीजों को कूटकर रख लें। इस चूर्ण को ताजे पानी के साथ खाने से वीर्य का बहना, वीर्य का पतलापन और स्वप्नदोष में लाभ होता है।

  13. तुलसी के बीज और काली मूसली को बराबर मात्रा मे लेकर कूटकर छान लें। इसे 1-2 ग्राम तुरंत निकाले हुए गाय के दूध के साथ खाने से बल और वीर्य की वृद्धि होती होती है। यह चूर्ण कामशक्ति बढ़ाने में भी सहायक होता है।

  14. 20-20 ग्राम तुलसी के बीज तथा काली मूसली के बीज और 10 ग्राम तुलसीदल ले लें। फिर इन बीजों का बारीक चूर्ण बनाकर पानी में घोटकर शहद मिलाकर खाने से वीर्य बढ़ जाता है।

  15. तुलसी और गिलोय को बराबर मात्रा में शहद मिलाकर खाने से प्रमेह रोग में लाभ होता है।

  16. तुलसीदल और गुलाब की पंखुडियों को बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर खाने से वीर्य के सारे दोष दूर हो जाते हैं।

  17. तुलसी के साथ दूध, दही, शहद, घी और शक्कर मिलाकर बनाये गये मिश्रण को खाने से वीर्य और बल बढ़ता है।

  18. तुलसी की जड़ को पानी में घिसकर लिंग पर लेप करने से कामशक्ति यानी सैक्स पावर बढ़ती है।

  19. 10 ग्राम तुलसी, 3 ग्राम असगन्ध का चूर्ण और 3 ग्राम दालचीनी का चूर्ण 3 लेकर लगभग 125 मिलीलीटर पानी में उबालकर उतार लें तथा ठंडा होने पर उसमें मिश्री और दूध मिलाकर रोजाना पीने से प्रमेह से सम्बंधित कोई रोग नहीं होता है।

  20. तुलसी के 5 से 10 पत्तों को रोजाना सुबह-शाम मिश्री के साथ खाने से शरीर में कोई रोग नहीं होते हैं।

  21. 5 ग्राम तुलसी की मंजरी को पानी में भिगोकर पीस लें। फिर उसमें मिश्री मिलाकर 15 दिन तक सेवन करने से प्रमेह रोग में लाभ होता है।

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