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Friday, March 6

पेट को रोगमुक्त रखेंगे घर में बने ये 4 चूर्ण


पेट की समस्या से हर घर में अधिकतर व्यक्ति परेशान होते हैं। पेट की मुख्‍य समस्‍याओं में कमजोर पाचन तंत्र, कब्‍ज, गैस बनना हो सकता है। इनके लिए डॉक्‍टरी इलाज करने के साथ ही आप इन घरेलू नुस्‍खों को भी अपना सकते हैं। आज हम आपको पेट की आम समस्‍याओं के लिए इलाज के लिए घरेलू चीजों से बनने वाले 4 चूर्ण के बारे में बता रहे हैं। इनके प्रयोग से कई रोगों से मुक्त हो सकते है।
गैस हर चूर्ण :
सामग्री
·       10 ग्राम सेंधा नमक
·       10 ग्राम हींग
·       10 ग्राम सज्जीखार ( शुद्ध )
·       10 ग्राम हरड़ छोटी
·       10 ग्राम अजवायन
·       10 ग्राम काली मिर्च
चूर्ण बनाने की विधि
इस चूर्ण को बनाने के लिए उपर्युक्त  सामग्री को इक्कठा करें और अच्छी तरह से बारीक पीस लें। जब पाउडर बन जाए तो उसे किसी बारीक कपड़े या छन्‍नी से छान कर किसी कांच की शीशी में भरकर रख लें।
गैस और अपच के लिए :
सामग्री
·       जीरा 120 ग्राम 
·       सेंधानमक 100 ग्राम 
·       धनिया 80 ग्राम
·       कालीमिर्च 40 ग्राम 
·       सोंठ 40 ग्राम
·       छोटी इलायची 20 ग्राम
·       पीपर छोटी 20 ग्राम 
·       नींबू सत्व 15 ग्राम 
·       खाण्ड देशी 160 ग्राम
चूर्ण बनाने की विधि
नींबू और खाण्‍ड को छोड़ कर बाकी की सभी सामग्रियों को पीस कर चूर्ण तैयार करें।  फिर उसमें नींबू निचोड़े और खाण्‍ड मिलाएं। इस मिश्रण को 3 घंटे के लिये एक कांच के बरतन में रख दें।  फिर इसका सेवन खाना खाने के बाद 2 से 5 ग्राम करें।
कब्‍ज निवारक चूर्ण
सामाग्री
·       जीरा
·       अजवाइन
·       काला नमक
·       मेथी
·       सौंफ
·       हींग
चूर्ण बनाने की विधि
सबसे पहले जीरा, अजवाइन, मेथी और सौंफ को अलग-अलग धीमी आंच पर भून लें। भूनने के बाद इन्‍हें अलग-अलग बारीक पीस लें। इसके बाद एक बर्तन में काला नमक और आधा चम्‍मच हींग लें। अब इसमें जीरा, सौंफ, अजवाइन का पाउडर डाल लें। इन तीनों से कम मात्रा में मेथी पाउडर डालें। इस मिश्रण को अच्‍छी तरह मिला लें। ध्‍यान ये रखना है कि जीरा, अजवाइन और सौंफा की मात्रा समान होनी चाहिए। इसको अच्‍छी तरह से मिक्‍स करने के बाद किसी डिब्‍बे में रख लें।

पेट के लिए रामबाण है यह चूर्ण
खाना खाने के बाद कई लोगों को बदहजमी हो जाती है। कभी-कभी तो पेट दर्द बर्दाशत से बाहर हो जाता है।इस चूर्ण से पाचन क्रिया ठीक रहती है।
सामग्री
·       अनारदाना 10 ग्राम
·       छोटी इलायची 10 ग्राम
·       दालचीनी 10 ग्राम
·       सौंठ 20 ग्राम
·       पीपल 20 ग्राम
·       कालीमिर्च 20 ग्राम
·       तेजपत्ता 20 ग्राम
·       पीपलामूल 20 ग्राम
·       नींबू का सत्व 20 ग्राम
·       धनिया 40 ग्राम
·       सेंधा नमक 50 ग्राम
·       काला नमक 50 ग्राम
·       सफेद नमक 50 ग्राम
·       मिश्री की डली 350 ग्राम
चूर्ण बनाने की विधि
सेंधा नमक, काला नमक, सफेद नमक, मिश्री और नींबू का सत्व को छोड़कर सभी सामान को कड़ी धूप में 2-3 घण्टे सुखा लें। फिर इसे मिक्सी में डालकर बारीक पीस लें।
इसके बाद बाकी सामान को अलग से बारीक पीस लें और फिर सभी सामानों के इस पाउडर को अच्छे से मिला लें। अब इसे किसी कांच की शीशी भरकर रख लें।

रखें पेट की सेहत का ध्यान


हमारा स्वास्थ्य सर्वाधिक पेट के स्वास्थ्य पर निर्भर है | पेट खराब होने से विभिन्न रोगों की आशंका काफी बढ़ जाती है। आजकल की व्यस्त जीवनशैली में हमे यह ध्यान ही नहीं रहता कि हम अपने खानपान में जो ले रहे हैं वह स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है भी या नहीं। हम कई बार स्वाद के चक्कर में तो कई बार मजबूरी में ऐसे खाद्यों को खा लेते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक नही होते हैंइन कारणों से पाचन तंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है | इसलिए ध्यान रखें, यदि पेट स्वस्थ रहेगा, तभी शरीर स्वस्थ रहेगा। पेट खराब होने से निम्न परेशानियाँ उत्पन्न हो जाती हैं |
·       यदि पाचन तंत्र सही तरह से काम न करे और खाना ठीक से न पचे तो कई बार गैस की समस्या पैदा हो जाती है, जो कई तरह की परेशानियों को जन्म देती है। सही तरह से खाना न पचने से आपका पाचन तंत्र बिगड़ जाता है, जिससे शरीर को जरूरी पोषण भी नहीं मिल पाता है।
·       कब्ज एक बड़ी समस्या है, जिसका हमारी पाचन क्रिया पर सीधा असर पड़ता है।
·       पेट खराब होने का असर सबसे ज्यादा हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। कमजोर प्रतिरोधक क्षमता अनेक बीमारियों का कारण बनती चली जाती है।
·       पेट खराब होने पर छोटी आंत में मौजूद बैक्टीरिया शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को बढ़ावा देते हैं। इससे दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।
·       आंतों में खराब बैक्टीरिया जमा होने के कारण शरीर में पोषक तत्व ठीक से अवशोषित नहीं हो पाते। ऐसे में वजन घटने लगता है।
·       यदि पेट में समस्या बनी रहती है तो इसका असर हमारी त्वचा पर दिखने लगता है। खुजली और मुहांसे जैसी समस्या ऐसे में आम हो जाती हैं।

पेट को स्वस्थ्य रखने के लिए इन्हे अपनाएं –

तरल पदार्थों की मात्रा बढ़ाएँ
शरीर में पानी की कमी से अक्सर पेट खराब हो जाता है । ऐसे में भरपूर पानी पीएं अथवा आप फलों का जूस और सब्जियों का रस भी ले सकते हैं। आप चाहें तो नीबू पानी, नमक-चीनी का घोल या फिर नारियल पानी ले सकते हैं। 
साबुत अनाज खाएं 
साबुत अनाज में फाइबर, विटामिन, मिनरल्स और पानी की अधिकता होती है। इसलिए इनके सेवन से पेट का स्वास्थ्य ठीक रहता है। अंकुरित अन्न के माध्यम से यह हमे आसानी से प्राप्त हो सकते हैं |
पेट रोगों मे दही का सेवन है लाभकारी
पेट दर्द में दही का इस्तेमाल काफी फायदेमंद रहता है। दही में मौजूद बैक्टीरिया संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे पेट जल्दी ठीक होता है। ये पेट को ठंडा भी रखता है।
जीरा
जीरा दस्त में काफी फायदेमंद है । यदि लगातार दस्त हो रहे हों तो एक चम्मच जीरा चबा लें। जीरा चबाकर पानी पी लेने से दस्त बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं।
पुदीना
पुदीना पेट से जुड़ी समस्याओं मे एक बेहद असरदार हर्ब है। इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सिडेंट्स पाचन क्रिया को सुधारने में भी सहायक होते हैं।
बेल का शरबत
बेल फाइबर से युक्त होता है। इससे बना शरबत भी काफी गाढ़ा और फाइबर युक्त होता है। फाइबर पेट को बांधने का काम करता है, जिससे दस्त जल्दी ठीक हो जाते हैं।
सेब का सिरका
सेब के सिरके में पेक्टिन की पर्याप्त मात्रा होती है, जिससे पेट दर्द और मरोड़ में राहत मिलती है। एक चम्मच सिरके को एक गिलास पानी में मिलाकर पीने से जल्दी आराम होता है।
अदरक
अदरक में एंटीफंगल और एंटी-बैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं, जो पेट दर्द में राहत देते हैं। एक चम्मच अदरक का रस काफी फायदेमंद साबित होता है।

Saturday, March 4

रतनजोत के इस प्रयोग से बाल हो जायेंगे काले !




By- Dr. Kailash Dwivedi
जेट्रोफा की जड़ से एक महीन लाल रंगने वाला पदार्थ मिलता है जिसका प्रयोग खाने,पीने की चीज़ों को लाल रंगने के लिए होता है, भारत के रोग़न जोश व्यंजन की तरी का लाल रंग अक्सर इसी से बनाया जाता है। इसके अलावा दवाईयों, तेलों, शराब, इत्याद में भी इसके लाल रंग का इस्तेमाल होता है। इसे रतनजोत भी कहते हैं परन्तु वास्तव में 'रतनजोत' नाम इस पौधे की जड़ से निकलने वाले रंग का है | जेट्रोफा से बायो डीजल बनता है | चिकित्सकीय दृष्टि से यह कई रोगों की रामबाण औषधि है। इस लेख में पढ़िए सफ़ेद बालों को प्राकृतिक रूप से काला करने का एक बेहद असरकारी प्रयोग |

आवश्यक सामग्री :

रतनजोत की ताज़ी जड़  : 100 ग्राम
मेंहदी के पत्ते :                 100 ग्राम
जलभांगर के पत्ते :           100 ग्राम
आम की गुठलियां :          100 ग्राम
सरसों का तेल :                1 किलोग्राम

बनाने की विधि :

उपर्युक्त सभी सामग्री (सरसों के तेल को छोडकर) आपस में मिलाकर कूट लें | जब यह अच्छे से कुट जाये तो इसे निचोड़ लें | तत्पश्चात इस रस को 1 किलो सरसों के तेल में इतना उबाल ले कि इसका पानी खत्म हो जाये और केवल तेल बचे | ठंडा होने पर इसे छानकर कांच की शीशी में भरकर रख लें | इस तेल को प्रतिदिन सिर पर लगाने से बाल काले हो जाते है | 
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Monday, February 13

अनगिनत रोगों की औषधि है पीपल का वृक्ष - जानिए उपयोग




  • स्कन्द पुराण के अनुसार - अश्वत्थ (पीपल) के मूल में भगवान विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं। पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप है।
  • भगवान कृष्ण कहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ। स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है।
  • शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।
  • प्रसिद्ध ग्रन्थ व्रतराज के अनुसार -  अश्वत्थोपासना में पीपल वृक्ष की महिमा का उल्लेख है। अश्वत्थोपनयनव्रत में महर्षि शौनक द्वारा इसके महत्त्व का वर्णन किया गया है।
  • अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेद के अनुसार -  पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र, जप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया है।
  • श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए।
पीपल के बीज राई के दाने के आधे आकार में होते हैं। परन्तु इनसे उत्पन्न वृक्ष विशालतम रूप धारण करके सैकड़ों वर्षो तक खड़ा रहता है। पीपल के वृक्ष के पत्ते मार्च के महीने में झड़ जाते हैं और गर्मी के मौसम में इसमें फल की बहार आती है, जो बारिश के मौसम में पकते हैं। पुराने पीपल के पेड़ से लाक्षा (लाख, चपड़ा) भी प्राप्त होती है।
पीपल के पेड़ के अनेक अलौकिक स्वास्थ्यकर गुणों के कारण इसे हिन्दू धर्म में इसे बहुत ही पवित्र माना गया है |पीपल पाचनशक्तिवर्द्धक, वीर्यवर्द्धक (धातु को बढ़ाने वाला), मधुर-रसायन, वातकफनाशक, हल्की, दस्तावर, श्वास (दमा), खांसी, बुखार, कोढ़, प्रमेह (वीर्य विकार), बवासीर, प्लीहा शूल तथा आमवात आदि रोगों में लाभकारी है। यह पेशाब और मासिक-धर्म के बहने को जारी करती है, गर्भ को गिरने नहीं देती है। हृदय (दिल) की बीमारियों को हटाती है। कृमि (कीड़े) रोगों का नाश करती है। पीपल की छाल का लेप सूजन को मिटाता है, नासूर के लिए लाभकारी है तथा घावों को भरता है।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

हिंदी       :  पीपरि, पीपल।
संस्कृत    :  अश्वत्थ, पिप्पल, चलपत्र, गजाशन, बौधिद्रु।
बंगाली     :  पिपुल, अश्वत्थ।
मराठी      :  पिम्पली, पीपल।
कर्नाटकी   :  अरलीमारा।
तैलगू       :  रावीचेट्टु।
तमिल     :  आराकमरं, अष्वत्थम।
कन्नड़     :  अश्वत्थ।
गुजराती   :  लिंडी पीपर, पीपलों।
मलयलम :  अरायल।
फारसी    :  फिल-फिल दराज, दरख्तलरजा।
अंग्रेजी    :  डारफिल, सेक्रेड फिग, पोपलरलिब्ड फिग ट्री।
लैटिन    :  पाइपर लांगम, फाइकरिलिजियोजा।
  • रंग : इसका रंग भूरा और हरा होता है।
  • स्वाद : पीपल खाने में चरपरा होता है। कच्चा पीपल बाखट और पका पीपल फीका और मीठा होता है।
  • स्वरूप : यह एक प्रकार की गुल्म जातीय लता है। इसमें ही फल लगा करते हैं। पीपल के पत्ते पान की तरह छोटे, गोल तथा बड़ी नोक वाले नुकीले होते हैं। पीपल के फल पत्तों की जड़ में छोटे-छोटे गोल-गोल झड़बेरी के समान लगते हैं, पीपल के फल आधा व्यास के पकने पर बैंगनी या काले हो जाते हैं। इसकी डाली में लाख भी पैदा होती है।
  • स्वभाव : पीपल की तासीर गर्म होती है। पीपल का पत्ता और छाल ठंडी और रूखी होती है। बाकी भाग गर्म होता है।

रोगों में सेवन योग्य मात्रा :

  • पीपल की छाल और फलों का चूर्ण :  1 से 3 ग्राम।
  • लाक्षा (गोंद का) चूर्ण :  1 से 2 ग्राम।
  • छाल, पत्तों का काढ़ा :  50 से 100 मिलीलीटर।
  • पत्तों का रस :  10 से 20 मिलीलीटर |

विभिन्न रोंगों का पीपल से उपचार :

 मुंह के छाले :

पीपल की छाल के काढ़े से सुबह-शाम गरारे करने और छाल के चूर्ण को शहद में मिलाकर छालों पर लगाने से छालों में आराम मिलता है।

अफीम का नशा उतारने हेतु :

पीपल की छाल का काढ़ा रोगी को पिलाने से अफीम का जहर उतर जाता है |

हिचकी का रोग:

  • 1 ग्राम की मात्रा में पीपल का चूर्ण शहद या शर्करा के साथ चाटने से हिचकी आना बंद हो जाती है।
    पीपल के पेड़ की छाल पानी में घोलकर कुछ देर छोड़ दें। फिर इसके पानी को निथारकर पीने से हिचकी ठीक हो जाती है।
  • 1 ग्राम पीपल की लाख का चूर्ण शहद में मिलाकर रोगी को चटाने से हिचकी का रोग दूर हो जाता है।

खूनी दस्त :

पीपल की कोमल टहनियां, धनिये के बीज तथा मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर 3-4 ग्राम रोजाना सुबह-शाम सेवन कराने से खूनी दस्त के रोग में लाभ होता है।

उपदंश (सिफलिस):

पीपल के तने की 50 ग्राम सूखी छाल की राख, उपदंश पर छिड़कने से उपदंश के घाव ठीक हो जाते हैं।

पेट में दर्द:

पीपल के मुलायम 3 पत्तों को बारीक पीसकर गुड़ को मिलाकर छोटी-छोटी गोली बना लें। इन गोलियों को सुबह-शाम 1-1 गोली खुराक के रूप में खाने से पेट के दर्द में लाभ हो जाता है।

रक्त शुद्धि हेतु :

1-2 ग्राम पीपल के बीजों के चूर्ण को शहद के साथ सुबह-शाम चाटने से खून साफ हो जाता है।

प्रदर:

40 ग्राम पीपल के गोंद को कूट-पीसकर इसे 5 ग्राम गाय के कच्चे दूध के साथ प्रातः सेवन करने से प्रदर रोग मिट जाता है।
• पीपल के सूखे गोंद को आटे में मिलाकर गाय के दूध में हलवा बनाकर खाने से प्रदर में लाभ मिलता है।

श्वास (दमा) :

पीपल की लाख का चूर्ण घी और शक्कर के साथ मिलाकर खाने से दमा के रोग में आराम आता है।

कब्ज:

  • पीपल के 5-10 फल को प्रतिदिन खाने से कब्ज समाप्त हो जाती है ।
  • पीपल के पत्ते और कोमल कोपलों का 40 मिलीलीटर काढ़ा पीने से पेट साफ होता है।
घाव :
• पिसी हुई पीपल की छाल का काढ़ा बनाकर उससे घाव को धोने से घाव जल्दी भर जाता है।
• पीपल की छाल का बारीक चूर्ण घाव पर लगाने से रक्तस्राव (खून का बहना) बंद होकर घाव जल्दी भर जाता है।
• पीपल की छाल का बारीक चूर्ण लगाने से सड़े हुए तथा न भरने वाले घाव जल्दी ठीक होकर भर जाते हैं। भगंदर और कंठमाला के रोग में भी इससे लाभ होता है।
• पीपल की सूखी छाल को पीसकर जले हुए स्थान पर बुरकने से आग से जला हुआ घाव ठीक हो जाता है।

पुरानी खांसी में कफ के साथ खून आना :

  • लगभग आधा ग्राम पीपल की लाख, 1 चम्मच शहद, 2 चम्मच घी और थोड़ी सी मिश्री को मिलाकर दिन में 5-6 बार रोगी को देने से खून की खांसी बंद हो जाती है।
  • पीपल की लाख का चूर्ण घी और शक्कर के साथ खाने से सूखी खांसी में आराम आता है।

बुखार:

  • पीपल के पेड़ की टहनी तोड़कर उसे चबाकर रस को चूसे और लकड़ी थूक दें। इससे मलेरिया व हर प्रकार का बुखार उतर जायेगा।
  • हल्का बुखार, सूखी खांसी और कमजोरी के रोग में घी, शहद और चीनी के साथ पीपल की लाख देनी चाहिए।

बच्चों का शारीरिक दर्द एवं अनिद्रा :

एक चुटकी पीपल की लाख को थोड़े से दूध में मिलाकर बच्चों को पिलाने से बच्चों के दर्द और नींद न आना दूर होता है।

दांतों के रोग :

पीपल की ताजी टहनी को दांतों से चबाकर दातुन करने से और इसकी छाल के काढ़े से गरारे करने से मुंह की दुर्गंध मिटती है, दांतों का दर्द, पायरिया एवं मसूढ़ों की सूजन में भी लाभ होता है ।

चर्म रोग:

  • पीपल के पत्तों को पानी में उबालकर उसके काढ़े से नहाने से त्वचा के अनेक रोग दूर हो जाते हैं।
  • पीपल की कोमल कोपलें खाने से खुजली और त्वचा पर फैलने वाले चर्मरोग दूर हो जाते हैं। इसका 40 मिलीलीटर काढ़ा बनाकर पीने से भी यही लाभ होता है।
  • 6 ग्राम पीपल के पेड़ की जड़ के चूर्ण को 5 कालीमिर्च के साथ बारीक पीसकर और छानकर पीने से और इसी लेप बनाकर श्वेत कुष्ठ (कोढ़) में लगाने से श्वेत कुष्ठ दूर होता है।

गर्भ का न ठहरना :

  • 250 ग्राम पीपल के पेड़ की सूखी पिसी हुई जड़ों में 250 ग्राम बूरा मिलाकर रख लें। जिस दिन से पत्नी का मासिक-धर्म आरम्भ हो, उस दिन से इसे पति व पत्नी दोनों 4-4 चम्मच गर्म दूध के साथ 11 दिनों तक फंकी लें। जिस दिन यह मिश्रण समाप्त हो, उसी रात से 12 बजे के बाद प्रतिदिन संभोग (स्त्री प्रंसग) करने से बांझपन की स्थिति में भी गर्भधारण की संम्भावना बढ़ जाती है।
  • पीपल के सूखे फलों के 1-2 ग्राम चूर्ण कच्चे दूध के साथ मासिक-धर्म के शुद्ध होने के बाद 14 दिनों तक देने से बांझपन में लाभ होता है।

हकलाहट :

आधा चम्मच पीपल के पके फलों का चूर्ण शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से हकलाहट में लाभ होता है।

नपुंसकता :

आधा चम्मच पीपल के फल का चूर्ण दिन में 3 बार दूध के साथ सेवन करते रहने से नपुंसकता (नामर्दी) दूर होकर, बल, वीर्य तथा पौरुष बढ़ता है।

वीर्यवर्धक :

  • पीपल की जड़ की छाल का प्रयोग करने से वीर्य अधिक गाढ़ा होता है |
  • छाया में सुखाये गए पीपल के फल को पीसकर छान लें। इस चौथाई चम्मच चूर्ण को 250 मिलीलीटर गर्म दूध में मिलाकर प्रतिदिन पीने से वीर्य बढ़ जाता है। नपुंसकता दूर होती है। इससे मासिक-धर्म के रोग, श्वेतप्रदर एवं कब्ज में भी अत्यंत लाभ होता है।

पीलिया :

पीपल के 3-4 पत्तों को मिश्री के साथ खरल में खूब घोंटकर बारीक पीस लें इसमें 250 मिलीलीटर पानी मिलाकर छान लें। 3- 5 दिनों तक प्रतिदिन यह पेय पीने से लाभ होता है |

अपच :

  • पीपल का 1 पत्ता + 4 कलियां शीशम की + थोड़ा-सा हरा धनिया आपस में मिलाकर 1 कप पानी में तब तक उबालें जब तक पानी आधा कप न बच जाए, फिर इसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर पीने से आराम होगा।
  • पीपल के पेड़ की कोपलों को मिट्टी के बर्तन में बंद करके जलाकर उसकी राख बना लें। इस राख को खाने से मंदाग्नि एवं  अजीर्ण में लाभ होता है।
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Thursday, February 9

टखने में मोच आ जाये तो करें यह उपचार


. By- Dr. Kailash Dwivedi

टखने की मोच एक पीड़ादायक स्थिति है यह चलते-फिरते, खेलों अथवा शारीरिक चुस्ती की गतिविधियां करते हुए, ऊँची-नीची सतह पर एकाएक पैर पड़ जाने से हो जाती है | मोच टखनों को सहारा देने वाले स्नायुओं (लिगामेंट्स) में खिंचाव से आने वाली चोट है। टखने के बाहरी तरफ के स्नायु, टखने के मुड़ने के कारण, सबसे आसानी से चोटग्रस्त होते हैं। यदि एक ही टखने में बार-बार मोच आती है या 4 सप्ताह से अधिक समय तक दर्द का रहता हो तो यह जीर्ण मोच (क्रोनिक स्प्रेन) हो सकती है। इस लेख में जानिये टखने में मोच आ जाने पर क्या करना चाहिए |

टखने की मोच के लक्षण :


  • टखने में दर्द
  • सूजन 
  • चोटग्रस्त क्षेत्र के आस-पास सूजन एवं नीला निशान

रोकथाम (बचाव) :


  • व्यायाम एवं परिश्रम के कार्य करने के पूर्व शरीर को वार्म-अप करें।
  • ऊँची एड़ी के जूते या सैंडल न पहनें।
  • चलते समय, दौड़ते समय या असमतल धरातल पर कार्य करते समय सावधानी रखें ।

इन स्थितियों में चिकित्सक से संपर्क करें :

सामान्यतः टखने की मोच पर आई सूजन एवं दर्द 48 घंटों में सामान्य हो जाता हैं। गंभीर मोच में, कई सप्ताह लग सकते हैं। यदि निम्न लक्षण हों तो तुरंत अपने चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए |

  • चल नहीं पा रहे हों।
  • बर्फ से सिंकाई, विश्राम एवं  दर्द निवारक दवाएं लेने के बाद भी दर्द में कमी ना हो।
  • 5-7 दिनों बाद भी मोच में कोई सुधार न हो।
  • यदि  टखना लाल, काला, या नीला पड़ रहा हो या सुन्न हो रहा हो।

जाँच और परीक्षण :

  • एक्स-रे
  • बोन स्केन
  • सीटी स्केन (कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी)।
  • एमआरआई (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग)।


घरेलू  उपचार :


  • चोट लगने पर तुरन्त तुलसी की कुछ पत्तियों को पीसकर पेस्ट बना लें | इस पेस्ट को चोट वाले स्थान पर लगायें।
  • बेड रेस्ट करें |
  • पैरों के नीचे तकिया आदि लगाकर टखने को ह्रदय की ऊँचाई से ऊपर उठाएँ।
  • उँगलियों से लेकर टखने के थोड़ा ऊपर तक एक समान दबाव देते हुए इलास्टिक बैंडेज लगाएँ। सूजन समाप्त होने तक इसे लगाये रखें।
  • सूजन एवं दर्द हो तो दिन में तीन से चार बार 10 से 15 मिनट के लिए आइस पैक या बर्फ से सिंकाई करें। बर्फ मिले पानी में पैर रखने से भी आराम मिलता है। 
  • दो चम्मच हल्दी एवं एक चम्मच चूना अच्छी तरह से एक में मिलाकर धीमी आंच में एक-दो मिनट रखने के बाद उतार लें | इसे  सहने लायक गर्म अवस्था में ही मोच वाले जगह पर लगायें। यह जब तक न सूखे लगा रहने दें, सूखने के बाद गुनगुने गर्म पानी से धो लें। इस लेप को दिन में दो बार लगा सकते हैं। 



क्या खाएं :


प्रोटीन युक्त खाद्य जैसे - डेरी उत्पाद, सोया और फलियों का सेवन करें |
ताजे फल और हरी सब्जियों का अधिक प्रयोग करें ।

क्या न खाएं :

शीतल पेय, आइसक्रीम आदि का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए | यह खाद्य रक्तसंचरण को धीमा कर देते हैं, जिसके कारण चोट के सुधरने की गति भी धीमी हो जाती है।
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