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Friday, February 17

इन 10 हस्त मुद्राओं में छिपा है सभी रोगों का उपचार !


By- Dr. Kailash Dwivedi

1.ज्ञान मुद्रा..

 1. ज्ञान मुद्रा (चिन्मय मुद्रा) GYANA MUDRA

अंगूठे एवं तर्जनी अंगुली के स्पर्श से जो मुद्रा बनती है उसे ज्ञान मुद्रा कहते हैं |

विधि :

  1. पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ |

  2. अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रख लें तथा अंगूठे के पास वाली अंगुली (तर्जनी) के उपर के पोर को अंगूठे के ऊपर वाले पोर से स्पर्श कराएँ |

  3. हाँथ की बाकि अंगुलिया सीधी व एक साथ मिलाकर रखें |

सावधानियां :

  • ज्ञान मुद्रा से सम्पूर्ण लाभ पाने के लिए साधक को चाहिए कि वह सादा प्राकृतिक भोजन करे |
  • मांस मछली, अंडा,शराब,धुम्रपान,तम्बाकू,चाय,काफ़ी कोल्ड ड्रिंक आदि का सेवन न करें |
  • उर्जा का अपव्यय जैसे- अनर्गल वार्तालाप,बात करते हुए या सामान्य स्थिति में भी अपने पैरों या अन्य अंगों को हिलाना, ईर्ष्या, अहंकार आदि उर्जा के अपव्यय का कारण होते हैं, इनसे बचें |

मुद्रा करने का समय व अवधि :



  • प्रतिदिन प्रातः, दोपहर एवं सांयकाल इस मुद्रा को किया जा सकता है |
  • प्रतिदिन 48 मिनट या अपनी सुविधानुसार इससे अधिक समय तक ज्ञान मुद्रा को किया जा सकता है | यदि एक बार में 48 मिनट करना संभव न हो तो तीनों समय 16-16 मिनट तक कर सकते हैं |
  • पूर्ण लाभ के लिए प्रतिदिन कम से कम 48 मिनट ज्ञान मुद्रा को करना चाहिए |


चिकित्सकीय लाभ :



  • ज्ञान मुद्रा विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी मुद्रा है, इसके अभ्यास से बुद्धि का विकास होता है,स्मृति शक्ति व एकाग्रता बढती है एवं पढ़ाई में मन लगने लगता है |
  • ज्ञान मुद्रा के अभ्यास से अनिद्रा,सिरदर्द, क्रोध, चिड़चिड़ापन, तनाव,बेसब्री, एवं चिंता नष्ट हो जाती है |
  • ज्ञान मुद्रा करने से हिस्टीरिया रोग समाप्त हो जाता है |
  • नियमित रूप से ज्ञान मुद्रा करने से मानसिक विकारों एवं नशा करने की लत से छुटकारा मिल जाता है |
  • इस मुद्रा के अभ्यास से आमाशयिक शक्ति बढ़ती है जिससे पाचन सम्बन्धी रोगों में लाभ मिलता है |
  • ज्ञान मुद्रा के अभ्यास से स्नायु मंडल मजबूत होता है

आध्यात्मिक लाभ :



  • ज्ञान मुद्रा में ध्यान का अभ्यास करने से एकाग्रता बढ़ती है जिससे ध्यान परिपक्व होकर व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति करता है |
  • ज्ञान मुद्रा के अभ्यास से साधक में दया,निडरता,मैत्री,शान्ति जैसे भाव जाग्रत होते हैं |
  • इस मुद्रा को करने से संकल्प शक्ति में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती है |

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2.पृथ्वी मुद्रा

2. पृथ्वी मुद्रा : PRITHAVI MUDRA


विधि :

  1. वज्रासन की स्थिति में दोनों पैरों के घुटनों को मोड़कर बैठ जाएं,रीढ़ की हड्डी सीधी रहे एवं दोनों पैर अंगूठे के आगे से मिले रहने चाहिए। एड़िया सटी रहें। नितम्ब का भाग एड़ियों पर टिकाना लाभकारी होता है। यदि वज्रासन में न बैठ सकें तो पदमासन या सुखासन में बैठ सकते हैं |

  2. दोनों हांथों को घुटनों पर रखें , हथेलियाँ ऊपर की तरफ रहें |

  3. अपने हाथ की अनामिका अंगुली (सबसे छोटी अंगुली के पास वाली अंगुली) के अगले पोर को अंगूठे के ऊपर के पोर से स्पर्श कराएँ |

  4. हाथ की बाकी सारी अंगुलिया बिल्कुल सीधी रहें ।

सावधानियां :



  • वैसे तो पृथ्वी मुद्रा को किसी भी आसन में किया जा सकता है, परन्तु इसे वज्रासन में करना अधिक लाभकारी है, अतः यथासंभव इस मुद्रा को वज्रासन में बैठकर करना चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि :


  • पृथ्वी मुद्रा को प्रातः – सायं 24-24 मिनट करना चाहिए | वैसे किसी भी समय एवं कहीं भी इस मुद्रा को कर सकते हैं।

चिकित्सकीय लाभ :


  • जिन लोगों को भोजन न पचने का या गैस का रोग हो उनको भोजन करने के बाद 5 मिनट तकवज्रासन में बैठकर पृथ्वी मुद्रा करने से अत्यधिक लाभ होता है ।
  • पृथ्वी मुद्रा के अभ्यास से आंख, कान, नाक और गले के समस्त रोग दूर हो जाते हैं।
  • पृथ्वी मुद्रा करने से कंठ सुरीला हो जाता है |
  • इस मुद्रा को करने से गले में बार-बार खराश होना, गले में दर्द रहना जैसे रोगों में बहुत लाभ होता है।
  • पृथ्वी मुद्रा से मन में हल्कापन महसूस होता है एवं शरीर ताकतवर और मजबूत बनता है।
  • पृथ्वी मुद्रा को प्रतिदिन करने से महिलाओं की खूबसूरती बढ़ती है, चेहरा सुंदर हो जाता है एवं पूरे शरीर में चमक पैदा हो जाती है।
  • पृथ्वी मुद्रा के अभ्यास से स्मृति शक्ति बढ़ती है एवं मस्तिष्क में ऊर्जा बढ़ती है।
  • पृथ्वी मुद्रा करने से दुबले-पतले लोगों का वजन बढ़ता है। शरीर में ठोस तत्व और तेल की मात्रा बढ़ाने के लिए पृथ्वी मुद्रा सर्वोत्तम है।


आध्यात्मिक लाभ :



  • हस्त मुद्राओं में पृथ्वी मुद्रा का बहुत महत्व है,यह हमारे भीतर के पृथ्वी तत्व को जागृत करती है।
  • पृथ्वी मुद्रा के अभ्यास से मन में वैराग्य भाव उत्पन्न होता है |
  • जिस प्रकार से पृथ्वी माँ प्रत्येक स्थिति जैसे-सर्दी,गर्मी,वर्षा आदि को सहन करती है एवं प्राणियों द्वारा मल-मूत्र आदि से स्वयं गन्दा होने के वाबजूद उन्हें क्षमा कर देती है | पृथ्वी माँ आकार में ही नही वरन ह्रदय से भी विशाल है | पृथ्वी मुद्रा के अभ्यास से इसी प्रकार के गुण साधक में भी विकसित होने लगते हैं | यह मुद्रा विचार शक्ति को उनन्त बनाने में मदद करती है।


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3.वरुण मुद्रा

3. वरुण मुद्रा VARUN MUDRA


विधि :

  1. पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ | रीढ़ की हड्डी सीधी रहे एवं दोनों हाथ घुटनों पर रखें |

  2. सबसे छोटी अँगुली (कनिष्ठा)के उपर वाले पोर को अँगूठे के उपरी पोर से स्पर्श करते हुए हल्का सा दबाएँ। बाकी की तीनों अँगुलियों को सीधा करके रखें।



सावधानियां :


  • जिन व्यक्तियों की कफ प्रवृत्ति है एवं हमेशा सर्दी,जुकाम बना रहता हो उन्हें वरुण मुद्रा का अभ्यास अधिक समय तक नहीं करना चाहिए।
  • सामान्य व्यक्तियों को भी सर्दी के मौसम में वरुण मुद्रा का अभ्यास अधिक समय तक नही करना चाहिए | गर्मी व अन्य मौसम में इस मुद्रा को प्रातः – सायं 24-24 मिनट तक किया जा सकता है।

मुद्रा करने का समय व अवधि :


  • वरुण मुद्रा का अभ्यास प्रातः-सायं अधिकतम 24-24 मिनट तक करना उत्तम है, वैसे इस मुद्रा को किसी भी समय किया जा सकता हैं।

चिकित्सकीय लाभ :


  • वरुण मुद्रा शरीर के जल तत्व सन्तुलित कर जल की कमी से होने वाले समस्त रोगों को नष्ट करती है।
  • वरुण मुद्रा स्नायुओं के दर्द, आंतों की सूजन में लाभकारी है |
  • इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर से अत्यधिक पसीना आना समाप्त हो जाता है |
  • वरुण मुद्रा के नियमित अभ्यास से रक्त शुद्ध होता है एवं त्वचा रोग व शरीर का रूखापन नष्ट होता है।
  • यह मुद्रा शरीर के यौवन को बनाये रखती है | शरीर को लचीला बनाने में भी यह लाभप्रद है ।
  • वरुण मुद्रा करने से अत्यधिक प्यास शांत होती है।


आध्यात्मिक लाभ :


  • जल तत्व (कनिष्ठा) और अग्नि तत्व (अंगूठे) को एकसाथ मिलाने से शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन होता है । इससे साधक के कार्यों में निरंतरता का संचार होता है |


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4.वायु मुद्रा..4. वायु मुद्रा : (VAYU MUDRA)

विधि :
  1. वज्रासन या सुखासन में बैठ जाएँ,रीढ़ की हड्डी सीधी एवं दोनों हाथ घुटनों पर रखें | हथेलियाँ उपर की ओर रखें |

  2. अंगूठे के बगल वाली (तर्जनी) अंगुली को हथेली की तरफ मोडकर अंगूठे की जड़ में लगा दें |


सावधानियां :

• वायु मुद्रा करने से शरीर का दर्द तुरंत बंद हो जाता है,अतः इसे अधिक लाभ की लालसा में अनावश्यक रूप से अधिक समय तक नही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है |
• वायु मुद्रा करने के बाद कुछ देर तक अनुलोम-विलोम व दूसरे प्राणायाम करने से अधिक लाभ होता है |
• इस मुद्रा को यथासंभव वज्रासन में बैठकर करें, वज्रासन में न बैठ पाने की स्थिति में अन्य आसन या कुर्सी पर बैठकर भी कर सकते हैं |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

• वायु मुद्रा का अभ्यास प्रातः,दोपहर एवं सायंकाल 8-8 मिनट के लिए किया जा सकता है |

चिकित्सकीय लाभ :

• अपच व गैस होने पर भोजन के तुरंत वाद वज्रासन में बैठकर 5 मिनट तक वायु मुद्रा करने से यह रोग नष्ट हो जाता है |
• वायु मुद्रा के नियमित अभ्यास से लकवा,गठिया, साइटिका,गैस का दर्द,जोड़ों का दर्द,कमर व गर्दन तथा रीढ़ के अन्य भागों में होने वाला दर्द में चमत्कारिक लाभ होता है |
• वायु मुद्रा के अभ्यास से शरीर में वायु के असंतुलन से होने वाले समस्त रोग नष्ट हो जाते है।
• इस मुद्रा को करने से कम्पवात,रेंगने वाला दर्द, दस्त ,कब्ज,एसिडिटी एवं पेट सम्बन्धी अन्य विकार समाप्त हो जाते हैं |

आध्यात्मिक लाभ :

• वायु मुद्रा के अभ्यास से ध्यान की अवस्था में मन की चंचलता समाप्त होकर मन एकाग्र होता है एवं सुषुम्ना नाड़ी में प्राण वायु का संचार होने लगता है जिससे चक्रों का जागरण होता है |

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5. शून्य मुद्रा (SHUNYA MUDRA)

5.शून्य मुद्रा
विधि :
1. मध्यमा अँगुली (बीच की अंगुली) को हथेलियों की ओर मोड़ते हुए अँगूठे से उसके प्रथम पोर को दबाते हुए बाकी की अँगुलियों को सीधा रखने से शून्य मुद्रा बनती हैं।

सावधानियां :

• भोजन करने के तुरंत पहले या बाद में शून्य मुद्रा न करें |
• किसी आसन में बैठकर एकाग्रचित्त होकर शून्य मुद्रा करने से अधिक लाभ होता है |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

• शून्य मुद्रा को प्रतिदिन तीन बार प्रातः,दोपहर,सायं 15-15 मिनट के लिए करना चाहिए | एक बार में भी 45 मिनट तक कर सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ :

• शून्य मुद्रा के निरंतर अभ्यास से कान के रोग जैसे कान में दर्द, बहरापन, कान का बहना, कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें आना आदि समाप्त हो जाते हैं। कान दर्द होने पर शून्य मुद्रा को मात्र 5 मिनट तक करने से दर्द में चमत्कारिक प्रभाव होता है।
• शून्य मुद्रा गले के लगभग सभी रोगों में लाभकारी है |
• यह मुद्रा थायराइड ग्रंथि के रोग दूर करती है।
• शून्य मुद्रा शरीर के आलस्य को कम कर स्फूर्ति जगाती है।
• इस मुद्रा को करने से मानसिक तनाव भी समाप्त हो जाता है |

आध्यात्मिक लाभ :

• शून्य मुद्रा के निरंतर अभ्यास से स्वाभाव में उन्मुक्तता आती है |
• इस मुद्रा से एकाग्रचित्तता बढती है |
• शून्य मुद्रा इच्छा शक्ति मजबूत बनाती है |

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6. सूर्य मुद्रा (SURYA MUDRA)

6.सूर्य मुद्रा

विधि :
1. सिद्धासन,पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ |
2. दोनों हाँथ घुटनों पर रख लें हथेलियाँ उपर की तरफ रहें |
3. अनामिका अंगुली (रिंग फिंगर) को मोडकर अंगूठे की जड़ में लगा लें एवं उपर से अंगूठे से दबा लें |
4. बाकि की तीनों अंगुली सीधी रखें |

सावधानियां :

• अधिक कमजोरी की अवस्था में सूर्य मुद्रा नही करनी चाहिए |
• सूर्य मुद्रा करने से शरीर में गर्मी बढ़ती है अतः गर्मियों में मुद्रा करने से पहले एक गिलास पानी पी लेना चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

• प्रातः सूर्योदय के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर इस मुद्रा को करना अधिक लाभदायक होता है | सांयकाल सूर्यास्त से पूर्व कर सकते हैं |
• सूर्य मुद्रा को प्रारंभ में 8 मिनट से प्रारंभ करके 24 मिनट तक किया जा सकता है |

चिकित्सकीय लाभ :

• सूर्य मुद्रा को दिन में दो बार 16-16 मिनट करने से कोलेस्ट्राल घटता है |
• अनामिका अंगुली पृथ्वी एवं अंगूठा अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है , इन तत्वों के मिलन से शरीर में तुरंत उर्जा उत्पन्न हो जाती है |
• सूर्य मुद्रा के अभ्यास से मोटापा दूर होता है | शरीर की सूजन दूर करने में भी यह मुद्रा लाभकारी है |
• सूर्य मुद्रा करने से पेट के रोग नष्ट हो जाते हैं |
• इस मुद्रा के अभ्यास से मानसिक तनाव दूर हो जाता है |
• प्रसव के बाद जिन स्त्रियों का मोटापा बढ़ जाता है उनके लिए सूर्य मुद्रा अत्यंत उपयोगी है | इसके अभ्यास से प्रसव उपरांत का मोटापा नष्ट होकर शरीर पहले जैसा बन जाता है |

आध्यात्मिक लाभ :

• सूर्य मुद्रा के अभ्यास से व्यक्ति में अंतर्ज्ञान जाग्रत होता है |

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7. प्राण मुद्रा (PRANA MUDRA)

7.प्राण मुद्राविधि :


  1. पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ | रीढ़ की हड्डी सीधी रखें |

  2. अपने दोनों हाथों को घुटनों पर रख लें,हथेलियाँ ऊपर की तरफ रहें |

  3. हाथ की सबसे छोटी अंगुली (कनिष्ठा) एवं इसके बगल वाली अंगुली (अनामिका) के पोर को अंगूठे के पोर से लगा दें |




सावधानियां :

• प्राणमुद्रा से प्राणशक्ति बढती है यह शक्ति इन्द्रिय, मन और भावों के उचित उपयोग से धार्मिक बनती है। परन्तु यदि इसका सही उपयोग न किया जाए तो यही शक्ति इन्द्रियों को आसक्ति, मन को अशांति और भावों को बुरी तरफ भी ले जा सकती है। इसलिए प्राणमुद्रा से बढ़ने वाली प्राणशक्ति का संतुलन बनाकर रखना चाहिए।

मुद्रा करने का समय व अवधि :
• प्राणमुद्रा को एक दिन में अधिकतम 48 मिनट तक किया जा सकता है। यदि एक बार में 48 मिनट तक करना संभव न हो तो प्रातः,दोपहर एवं सायं 16-16 मिनट कर सकते है।

चिकित्सकीय लाभ :

• प्राणमुद्रा ह्रदय रोग में रामबाण है एवं नेत्रज्योति बढाने में यह मुद्रा बहुत सहायक है।
• इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से प्राण शक्ति की कमी दूर होकर व्यक्ति तेजस्वी बनता है।
• प्राणमुद्रा से लकवा रोग के कारण आई कमजोरी दूर होकर शरीर शक्तिशाली बनता है |
• इस मुद्रा के निरंतर अभ्यास से मन की बैचेनी और कठोरता को दूर होती है एवं एकाग्रता बढ़ती है।

आध्यात्मिक लाभ :

• प्राणमुद्रा को पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर करने से शक्ति जागृत होकर ऊर्ध्वमुखी हो जाती है, जिससे चक्र जाग्रत होते हैं एवं साधक अलौकिक शक्तियों से युक्त हो जाता है ।
• प्राणमुद्रा में जल,पृथ्वी एवं अग्नि तत्व एक साथ मिलने से शरीर में रासायनिक परिवर्तन होता है जिससे व्यक्तित्व का विकास होता है।



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8. लिंग मुद्रा : (LINGA MUDRA)

लिंग मुद्रा

विधि :

  1. किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएँ |

  2. दोनों हाथों की अँगुलियों को परस्पर एक-दूसरे में फसायें (ग्रिप बनायें)

  3. किसी भी एक अंगूठे को सीधा रखें तथा दूसरे अंगूठे से सीधे अंगूठे के पीछे से लाकर घेरा बना दें |


सावधानियाँ :

• लिंग मुद्रा से शरीर मे गर्मी उत्पन्न होती है,इसलिए इस मुद्रा को करने के पश्चात् यदि गर्मी महसूस हो तो तुरंत पानी पी लेना चाहिए |
• लिंग मुद्रा को नियत समय से अधिक नही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि संभव है |
• गर्मी के मौसम में इस मुद्रा को अधिक समय तक नहीं करना चाहिए |
• पित्त प्रकृति वाले व्यक्तियों को लिंग मुद्रा नही करनी चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

• लिंग मुद्रा को प्रातः-सायं 16-16 मिनट तक करना चाहिए |

चिकित्सकीय लाभ :

• सर्दी से ठिठुरता व्यक्ति यदि कुछ समय तक लिंग मुद्रा कर ले तो आश्चर्यजनक रूप से उसकी ठिठुरन दूर हो जाती है |
• लिंग मुद्रा के अभ्यास से जीर्ण नजला,जुकाम, साइनुसाइटिस,अस्थमा व निमन् रक्तचाप का रोग नष्ट हो जाता है | इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से कफयुक्त खांसी एवं छाती की जलन नष्ट हो जाती है |
• यदि सर्दी लगकर बुखार आ रहा हो तो लिंग मुद्रा तुरंत असरकारक सिद्ध होती है |
• लिंग मुद्रा के नियमित अभ्यास से अतिरिक्त कैलोरी बर्न होती हैं परिणाम स्वरुप मोटापा रोग समाप्त हो जाता है |
• लिंग मुद्रा पुरूषों के समस्त यौन रोगों में अचूक है । इस मुद्रा के प्रयोग से स्त्रियों के मासिक स्त्राव सम्बंधित अनियमितता ठीक होती हैं |
• लिंग मुद्रा के अभ्यास से टली हुई नाभि पुनः अपने स्थान पर आ जाती हैं |

आध्यात्मिक लाभ :

• यह मुद्रा पुरुषत्व का प्रतीक है इसीलिए इसे लिंग मुद्रा कहा जाता है। लिंग मुद्रा के अभ्यास से साधक में स्फूर्ति एवं उत्साह का संचार होता है | यह मुद्रा ब्रह्मचर्य की रक्षा करती है , व्यक्तित्व को शांत व आकर्षक बनाती है जिससे व्यक्ति आन्तरिक स्तर पर प्रसन्न रहता है ।

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9. अपान मुद्रा : (APANA MUDRA)

अपान मुद्रा विधि :


  1. सुखासन या अन्य किसी आसान में बैठ जाएँ, दोनों हाथ घुटनों पर, हथेलियाँ उपर की तरफ एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रखें |

  2. मध्यमा (बीच की अंगुली)एवं अनामिका (RING FINGER) अंगुली के उपरी पोर को अंगूठे के उपरी पोर से स्पर्श कराके हल्का सा दबाएं | तर्जनी अंगुली एवं कनिष्ठा (सबसे छोटी) अंगुली सीधी रहे |

सावधानियाँ :

• अपान मुद्रा के अभ्यास काल में मूत्र अधिक मात्रा में आता है, क्योंकि इस मुद्रा के प्रभाव से शरीर के अधिकाधिक मात्रा में विष बाहर निकालने के प्रयास स्वरुप मूत्र ज्यादा आता है,इससे घबड़ाए नहीं |
• अपान मुद्रा को दोनों हाथों से करना अधिक लाभदायक है,अतः यथासंभव इस मुद्रा को दोनों हाथों से करना चाहिए ।

मुद्रा करने का समय व अवधि :

• अपान मुद्रा को प्रातः,दोपहर,सायं 16-16 मिनट करना सर्वोत्तम है |

चिकित्सकीय लाभ :

• अपान मुद्रा के नियमित अभ्यास से कब्ज,गैस,गुर्दे तथा आंतों से सम्बंधित समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं |
• अपान मुद्रा बबासीर रोग के लिए अत्यंत लाभकारी है | इसके प्रयोग से बबासीर समूल नष्ट हो जाती है |
• यह मुद्रा मधुमेह के लिए लाभकारी है , इसके निरंतर प्रयोग से रक्त में शर्करा का स्तर सन्तुलित होता है |
• अपान मुद्रा शरीर के मल निष्कासक अंगों – त्वचा,गुर्दे एवं आंतों को सक्रिय करती है जिससे शरीर का बहुत सारा विष पसीना,मूत्र व मल के रूप में बाहर निकल जाता है फलस्वरूप शरीर शुद्ध एवं निरोग हो जाता है |

आध्यात्मिक लाभ :

• अपान मुद्रा से प्राण एवं अपान वायु सन्तुलित होती है | इस मुद्रा में इन दोनों वायु के संयोग के फलस्वरूप साधक का मन एकाग्र होता है एवं वह समाधि को प्राप्त हो जाता है |
• अपान मुद्रा के अभ्यास से स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र जाग्रत होते है |

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10. अपान वायु मुद्रा (ह्रदय मुद्रा) : APAN VAYU MUDRA

अपान वायु मुद्रा

विधि :
1. सुखासन या अन्य किसी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएँ | दोनों हाथ घुटनों पर रखें, हथेलियाँ उपर की तरफ रहें एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रहे |
2. हाथ की तर्जनी (प्रथम) अंगुली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगा दें तथा मध्यमा (बीच वाली अंगुली) व अनामिका (तीसरी अंगुली) अंगुली के प्रथम पोर को अंगूठे के प्रथम पोर से स्पर्श कर हल्का दबाएँ |
3. कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) अंगुली सीधी रहे ।

सावधानी :

• अपान वायु मुद्रा एक शक्तिशाली मुद्रा है इसमें एक साथ तीन तत्वों का मिलन अग्नि तत्व से होता है,इसलिए इसे निश्चित समय से अधिक नही करना चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

• अपान वायु मुद्रा करने का सर्वोत्तम समय प्रातः,दोपहर एवं सायंकाल है | इस मुद्रा को दिन में कुल 48 मिनट तक कर सकते हैं | दिन में तीन बार 16-16 मिनट भी कर सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ :

• अपान वायु मुद्रा ह्रदय रोग के लिए रामवाण है इसी लिए इसे ह्रदय मुद्रा भी कहा जाता है |
• दिल का दौरा पड़ने पर यदि रोगी यह मुद्रा करने की स्थिति में हो तो तुरंत अपान वायु मुद्रा कर लेनी चाहिए | इससे तुरंत लाभ होता है एवं हार्ट अटैक का खतरा टल जाता है |
• इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से रक्तचाप एवं अन्य ह्रदय सम्बन्धी रोग नष्ट हो जाते हैं |
• अपान वायु मुद्रा करने से आधे सिर का दर्द तत्काल रूप से कम हो जाता है एवं इसके नियमित अभ्यास से यह रोग समूल नष्ट हो जाता है |
• यह मुद्रा उदर विकार को समाप्त करती है अपच,गैस,एसिडिटी,कब्ज जैसे रोगों में अत्यंत लाभकारी है |
• अपान वायु मुद्रा करने से गठिया एवं आर्थराइटिस रोग में लाभ होता है |

आध्यात्मिक लाभ :

• अपान वायु मुद्रा अग्नि,वायु,आकाश एवं पृथ्वी तत्व के मिलन से बनती है | इस मुद्रा के प्रभाव से साधक में सहनशीलता,स्थिरता,व्यापकता और तेज का संचार होता है |



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खूबसूरती में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि करती है यह मुद्रा !




लाभ :


  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा शरीर और चेहरे को सुंदर बनाती है।

  • इस मुद्रा को करने से चेहरे की लाली बढ़ती है।

  • इस मुद्रा को करने से रक्त शुद्ध होता है एवं शरीर में लाल रक्त के कणों की वृद्धि होती है।

  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा के अभ्यास से दिमागी शक्ति भी तेज होती है।

  • रक्त विकार जैसे - खाज, खुजली, छाजन, फोड़े-फुंसी आदि सारे त्वचा के रोगों को यह मुद्रा समाप्त कर देती है।

विशेष :


  • रक्तशोधिनी हरिमुद्रा स्त्रियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है , इसके नियमित अभ्यास से खूबसूरती में आश्चर्यजनक रूप से  वृद्धि होती है ।

विधि :


  1. जमीन पर आसन बिछाकर बैठ जाएँ

  2. दोनों हाथों की अंगुलियों एवं अंगूठे के अग्रभाग को जमीन पर टिका दें |

इसे रक्तशोधिनी हरिमुद्रा कहते है, इस स्थिति में अंगुलिया एवं अंगूठा सीधा रहना चाहिए एवं इनके अग्रभाग जमीन पर अच्छे से टिके रहने चाहिए |

कितने समय तक और कब करें :


प्रातः सूर्योदय के समय तथा सांयकाल सूर्यास्त से पहले इस मुद्रा को किया जा सकता है |
प्रारंभ में पांच मिनट से शुरू करके 15 मिनट तक कर सकते हैं |

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Friday, February 10

अश्विनी मुद्रा ( ASHWANI MUDRA)




By- Dr.Kailash Dwivedi

अथ अश्वनीमुद्राकथनम्।


आकुञ्चयेद्गुदद्वारं प्रकाशयेत् पुनः पुनः। सा भवेदश्विनी मुद्रा शक्तिप्रबोधकारिणी ॥८२॥

अश्विनीमुद्रायाः फलकथनम्।


अश्विनी परमा मुद्रा गुह्यरोगविनाशिनी। बलपुष्टिकरी चैव अकालमरणं हरेत् ॥८३॥
श्रीघेरण्डसंहितायां घेरण्डचण्डसंवादे घटस्थयोगप्रकरणे मुद्राप्रयोगो नाम तृतीयोपदेशः ॥

जिस प्रकार से अश्व (घोडा) अपने गुदाद्वार को बार-बार सिकोड़ता एवं ढीला करने की क्रिया करता है उसी प्रकार से अपने गुदाद्वार से यह क्रिया करने से अश्वनी मुद्रा बनती है | इस मुद्रा का नाम भी इसी आधार पर पड़ा है | घोड़े में बल एवं फुर्ती का रहस्य  यही मुद्रा है, इस क्रिया के करने के फलस्वरूप घोड़े में इतनी शक्ति आ जाती है कि आज के मशीनी युग में भी इंजन आदि की शक्ति अश्वशक्ति (HORSE POWER) से ही मापी जाती है |


विधि :

  1. कगासन (जैसे शौच के समय टॉयलेट में बैठते हैं) में बैठ जाएँ |
  2. अपने गुदाद्वार को जैसे मूलबन्ध के समय या मल-मूत्र के वेग को रोकते समय अंदर खींचते हैं,उसी तरह से खींचकर रखें |
  3. कुछ देर इसी स्थिति में रहें फिर गुदा को ढीला छोड़ दें |
  4. इस प्रक्रिया को बार-बार यथासंभव दोहराएँ |


सावधानियां : 


अश्वनी मुद्रा करते समय यदि मल-मूत्र का वेग हो तो इस वेग को रोकना नही चाहिए बल्कि इससे निवृत्त हो लेना चाहिए |


मुद्रा करने का समय व अवधि : 


  • सामान्य स्थिति में यह क्रिया लेटकर,बैठकर या चलते-फिरते कभी भी दिन में कई बार कर सकते हैं |
  • अश्वनी मुद्रा  एक बार में कम-से-कम 50 बार करनी चाहिए |


चिकित्सकीय लाभ :

  1. अश्वनी मुद्रा के निंरतर अभ्यास से गुदा से सम्बंधित समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं |
  2. इस मुद्रा को करने से शरीर बलवान हो जाता है |
  3. अश्वनी मुद्रा करने से व्यक्ति की आयु बढती है एवं वह आजीवन निरोग रहता है |
  4. अश्वनी मुद्रा के अभ्यास से नपुंसकता दूर हो जाती है | यह मुद्रा शीघ्रपतन रोकने में अत्यंत प्रभावी है |
  5. शौच के समय यदि इस क्रिया को बार –बार किया जाये तो शौच खुलकर आता है |

आध्यात्मिक लाभ : 


अश्वनी मुद्रा से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है।

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Monday, January 30

वज्रोली मुद्रा : VAJROLI MUDRA





By- Dr. Kailash Dwivedi

अथ वज्रोलीमुद्राकथनम्।
धरामवष्टभ्य करयोस्तलाभ्याम् ऊर्ध्वं क्षिवेत्पादयुगंशिरः खे। शक्तिप्रबोधाय चिरजीवनाय वज्रालिमुद्रां कलयो वदन्ति ॥४५॥
अयं योगो योगश्रेष्ठो योगिनां मुक्तिकारणम्। अयंहितप्रदोयोगो योगिनां सिद्धिदायकः ॥४६॥
एतद्योगप्रसादेन बिन्दुसिद्धिर्भवेद्ध्रवम्। सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिद्ध्यतिभूतले ॥४७॥
भोगेन महता युक्तो यदि मुद्रां समाचरेत्। तथापि सकला सिद्धिस्तस्य भवति निश्चितम् ॥४८॥

प्रथम विधि :

  1. किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएँ |
  2. दोनों हाथ घुटनों पर रखें,आँखे बंद रखें | 
  3. अन्तः कुम्भक (श्वास अन्दर रोककर) की स्थिति में गुदा द्वार एवं अंडकोष के बीच की सिवनी जैसे भाग को उपर की ओर संकुचित करें तत्पश्चात श्वास को बाहर निकालकर पेट को शिथिल करते हुए पेट के नीचे के भाग को इस तरह से खींचे जैसे मल-मूत्र के वेग को रोकते समय खींचते हैं |
  4. आराम से जितनी देर इस स्थिति में रह सकते हैं,रहें तत्पश्चात सामान्य स्थिति में आ जाएँ |

दूसरी विधि : 
वज्रोली मुद्रा की दूसरी विधि हठयोग के अंतर्गत आती है,इस क्रिया में प्रारंभ में रबड़ का कैथेटर मूत्र मार्ग में प्रतिदिन एक-एक इंच बढ़ाते हुए 10-12 इंच तक प्रवेश कराया जाता है,तत्पश्चात चांदी या कांच की नली को मूत्रमार्ग में 10-12 इंच तक प्रवेश कराया जाता है | अभ्यास सिद्ध हो जाने पर इस नली से जल को अंदर खींचने का अभ्यास किया जाता है,जल खींचने का अभ्यास हो जाने पर क्रमशः दूध,शहद और पारा को खींचने का अभ्यास सिद्ध किया जाता है | यह बहुत ही उच्च कोटि की क्रिया है एवं योग्य गुरु के निर्देशन के वगैर करना पूर्णतया  निषिद्ध है,इसलिए साधक इस बात का विशेष ध्यान रखें |

सावधानी : 
वज्रोली मुद्रा की प्रथम विधि को सरलता पूर्वक कोई भी व्यक्ति कर सकता है,परन्तु दूसरी विधि कठिन है इसमें जरा सी असावधानी होने पर भयंकर रोग होने का खतरा रहता है अतः इसे किसी योग्य गुरु के निर्देशन में ही करना उचित है |



मुद्रा करने का समय व अवधि : 
इस मुद्रा को प्रातः-सायं खाली पेट किया जा सकता है | प्रारंभ में 5 बार से शुरू करके प्रतिदिन धीरे-धीरे इसे 21 बार तक ले जाना चाहिए | अभ्यास परिपक्व हो जाने पर अधिक बार भी किया जा सकता है |

चिकित्सकीय लाभ :

  1. वज्रोली मुद्रा करने से स्वप्नदोष एवं शीघ्रपतन रोग नष्ट हो जाते हैं |
  2. इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर की शक्ति,सुन्दरता एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है |

आध्यात्मिक लाभ : 

  1. वज्रोली मुद्रा की दूसरी विधि सिद्ध हो जाने पर साधक अलौकिक शक्तियों का स्वामी बन जाता है |
  2. वज्रोली मुद्रा के नियमित अभ्यास से वीर्य उर्ध्वगामी होकर ब्रहमचर्य की रक्षा होती है | 
  3. इस मुद्रा के अभ्यास से मन तथा इन्द्रिय निग्रह होता है |
  4. कुण्डलिनी जागरण में इस मुद्रा का विशेष महत्त्व है |   


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Wednesday, January 18

इस मुद्रा से बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल और मोटापा हो जायेगा ख़त्म !



By- Dr. Kailash Dwivedi

लाभ :

  • सूर्य मुद्रा शरीर की सूजन मिटाकर उसे हलका बनाती है।
  • सूर्य मुद्रा का रोज दो बार 5 से 15 मिनट के लिए अभ्यास करने से रक्त से कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है। 
  • इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर का बढ़ा हुआ वजन तेजी कम होने लगता है।
  • पेट संबंधी रोगों में भी सूर्य मुद्रा लाभदायक है। 
  • इस मुद्रा को करने से बेचैनी और चिंता कम होकर मस्तिष्क शांत बना रहता है। 

मुद्रा करने की विधि :


सूर्य की अँगुली (रिंग फिंगर) को हथेली की ओर मोड़कर उसे अँगूठे के अग्रभाग से स्पर्श कराएँ । बाकी बची तीनों अँगुलियों को सीधा रखें।

कितने समय तक और कब करें :

  • प्रातः सूर्योदय के समय स्नान आदि से निवृत्त होकर इस मुद्रा को करने से अधिक लाभ होता है |
  • सांयकाल सूर्यास्त से पहले इस मुद्रा को किया जा सकता है |
  • प्रारंभ में पांच मिनट से शुरू करके 15 मिनट तक किया जा सकता है |
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Monday, January 16

जुकाम एवं छींक की योगिक चिकित्सा



By- Dr.Kailash Dwivedi

जुकाम में लाभकारी-अग्नि मुद्रा
लाभ :

  1. अग्निमुद्रा को करने से बलगम, खांसी, पुराना जुकाम, नजला, सांस का रोग, ज्यादा ठंड लगना तथा निमोनिया आदि रोग दूर हो जाते हैं l
  2. इससे शरीर में अग्नि की मात्रा तेज हो जाती है।

विधि :

अग्नि मुद्रा बहुत ही आसान मुद्रा है। इसे बनाने के लिए अंगूठों के आगे के भाग (अग्रभाग) को मिलाएं और
बाकी की सभी अंगुलियाँ सीधी रखें। हथेलियां नीचे की ओर रहें।
कितने समय तक करें
अग्नि मुद्रा को दिन में 3-4 बार 15-15 मिनटों के लिए कर सकते हैं।


ज्यादा छींक आना जैसे रोग को दूर करे ; अदिती मुद्रा
लाभ
इस मुद्रा को करने से हर समय उबासी आना, ज्यादा छींक आना जैसे रोगों को दूर किया जा सकता है।

विधि -
अंगूठे के आगे के भाग को अनामिका (छोटी उंगली के साथ वाली उंगली) उंगली की जड़ में टेढ़ा लगाने से अदिती मुद्रा बन जाती है।

कितने समय तक करें
अदिती मुद्रा को दिन में 3-4 बार 15-15 मिनटों के लिए कर सकते हैं।

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Saturday, December 10

गंजापन दूर करना है तो इसे करें


माण्डुकी मुद्रा

मुखं संमुद्रितं कृत्वा जिह्वामूलं प्रचालयेत्। शनैर्ग्रसेदमृतं तां माण्डूकीं मुद्रिकां विदुः ॥६२॥
वलितं पलितं वैव जायते नित्ययौवनम्। न केशे जायते पाको यः कुर्यान्नित्यमाण्डुकीम् ॥६३॥ श्रीघेरण्डसंहिता |

माण्डूकी मुद्रा की विधि :

  1. सुखपूर्वक किसी आसन में बैठकर अपने मुंह को बंद कर लें । आँखें बंद रहें एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रहे
  2. जीभ को पूरे तालू के ऊपर दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं।
  3. जीभ को इस तरह से घुमाने के फलस्वरूप उत्पन्न लार का पान करें (निगलते रहें) योग शास्त्र में इस लार को सुधा या अमृत की संज्ञा दी गयी है।

सावधानियां :

  • माण्डूकी मुद्रा करते समय आपका पूरा ध्यान जीभ के संचालन पर रहना चाहिए |
  • आँखें बंद रखें एवं मन की आँखों से (अन्तःचक्षु) से जीभ के क्रियाकलाप को देखते रहें |
  • भोजन के तुरंत बाद या पहले माण्डूकी मुद्रा न करें | कम-से-कम 30 मिनट के अंतर पर कर सकते हैं |

मुद्रा करने का समय व अवधि :माण्डूकी मुद्रा करने का सबसे उपयुक्त समय प्रातः एवं सायंकाल का है |

यह मुद्रा 5 मिनट से प्रारंभ करके धीरे-धीरे 15 मिनट तक बढ़ा सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ :

  1. बाल झड़ना, गंजापन एवं असमय सफेद हो रहे बालों को रोकने के लिए योगशास्त्र में माण्डुकी मुद्रा को सबसे श्रेष्ठ उपाय बताया गया है।
  2. माण्डुकी मुद्रा करने से शरीर में झुर्रियां पड़ना रुक जाता है तथा यौवन की प्राप्ति होती है।
  3. माण्डुकी मुद्रा के निरंतर अभ्यास से जीभ, गले और आंखों के रोग समाप्त हो जाते हैं |
  4. इस मुद्रा के प्रभाव से चेहरे एवं शरीर में चमक पैदा हो जाती है।
  5. माण्डुकी मुद्रा से पाचन सम्बन्धी रोग समाप्त हो जाते हैं |

आध्यात्मिक लाभ :

माण्डुकी मुद्रा से इच्छाओं पर सयंम होता है एवं मन को नियंत्रित करने की शक्ति उत्पन्न होती है |
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Thursday, April 23

काकी मुद्रा : KAKI MUDRA

अथ काकीमुद्राकथनम्।
काकचञ्चुवदास्येन पिबेद्वायुं शनैः शनैः। काकीमुद्रा भवेदेषा सर्वरोगविनाशिनी ॥८६॥

अथ काकीमुद्रायाः फलकथनम्।
काकीमुद्र परा मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता। अस्याः प्रसादमात्रेण न रोगी काकवद् भवेत् ॥८७॥

होठों को कौए की चोंच के समान आकृति बनाकर धीरे-धीरे वायु अंदर खींचकर पान करने की क्रिया सभी रोगों को नष्ट करने वाली काकी मुद्रा हैं |
महर्षि घेरंड कहते हैं कि इस मुद्रा को गुप्त रूप से करना चाहिए एवं इसे किसी पर प्रकट नही करना चाहिए | ऐसी मान्यता है कि कौवा को कभी कोई रोग नही होता एवं वह लम्बा जीवन जीता है उसी प्रकार योगी इस मुद्रा के अभ्यास से सदैव रोगमुक्त रहकर सिद्धियों को प्राप्त करता है,इसीलिए इसे काकी मुद्रा नाम दिया गया है | इस मुद्रा का अभ्यास शरीर के समस्त रोगों को नष्ट करने वाला एवं सदैव निरोग रखने वाला है |

विधि : 

  1. किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएँ | रीढ़ की हड्डी सीधी रहें |
  2. दोनों हाथों को घुटनों पर रखकर ज्ञान मुद्रा बना लें (अंगूठे की बगल वाली अंगुली के पोर को अंगूठे के पोर से स्पर्श करें)
  3. आँखें बंद करके अपने शरीर को शिथिल करें |
  4. अब धीरे से आँखें खोलें एवं दृष्टि को नासिका के अग्र भाग पर केन्द्रित करें |
  5. अपने होठों की आकृति कौवे की चोंच की तरह से बना लें एवं जिह्वा से स्पर्श कराते हुए मुख से धीरे-धीरे श्वास को अन्दर खींचें |
  6. पूरी श्वास अंदर खीचने के बाद मुख बंद कर लें एवं नासिका से श्वास को बाहर छोड़ दें |
  7. पुनः मुखाकृति कौवे के समान बनाकर इस क्रिया को दोहराएँ | इसी क्रिया को बार-बार करें |

सावधानियां :

  • अभ्यास के दौरान दृष्टि नासाग्र पर ही केन्द्रित रहनी चाहिए एवं पलक नही झपकानी चाहिए |
  • ध्यान रहे जहाँ पर यह क्रिया कर रहे हों वहां शुद्ध वायु का आवागमन हो |
  • अत्यधिक सर्दी के मौसम में काकी मुद्रा नही करनी चाहिए |
  • जो व्यक्ति जीर्ण कब्ज से पीड़ित हों उन्हें पहले कब्ज को दूर करने का उपाय करना चाहिए तत्पश्चात काकी मुद्रा करनी चाहिए |
  • लो ब्लड प्रेशर की स्थिति में काकी मुद्रा नही करनी चाहिए |
  • ध्यान रखें प्रत्येक बार श्वास को मुंह से खींचे एवं नासिका से छोड़ें | नासिका से श्वास अंदर न खीचें |

मुद्रा करने का समय व अवधि : 
प्रातः काल एवं मध्य रात्रि  का समय काकी मुद्रा के लिए सर्वोत्तम है | इस मुद्रा को जब तक चाहें तब तक कर सकते हैं परन्तु ध्यान रहे कि नासाग्र पर अपलक दृष्टि केन्द्रित करते हुए आँखों में अत्यधिक तनाव न आये | आँखों में तनाव महसूस होने पर आँखों को बंद कर विश्राम दें तत्पश्चात पुनः इस मुद्रा को कर सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. उच्च रक्तचाप को कम करने के लिए यह रामवाण मुद्रा है |
  2. इस मुद्रा के अभ्यास से रक्त का शोधन होता है एवं खाज ,खुजली,फोड़े-फुंसी आदि त्वचा विकार भी दूर होते हैं |
  3. इस क्रिया के अभ्यास से शरीर में पाचक रसों का स्राव बढ़ जाता है जोकि पाचन संस्थान को शक्तिशाली बनाते हैं |
  4. योग के अनुसार काकी मुद्रा में समस्त रोगों को नष्ट करने की शक्ति है |
  5. काकी मुद्रा  गुदा, उदर, कंठ एवं हृदय विकार को दूर करने के लिए बहुत उपयोगी है|
  6. इस मुद्रा के अभ्यास से एसिडिटी रोग नष्ट हो जाता है |

आध्यात्मिक लाभ : 
काकी मुद्रा के अभ्यास से साधक का मन एकाग्र होकर ध्यान में प्रवेश होता है | यह एक गुप्त साधना है | अर्ध रात्रि के समय इसके अभ्यास से साधक को अपरिमित शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं |

पाशिनी मुद्रा :(PASHINI MUDRA)

 अथ पाशिनीमुद्राकथनम्।
कण्ठपृष्ठे क्षिपेत्पादौ पाशवद्दृढबन्धनम्। सा एव पाशिनी मुद्रा शक्ति प्रबोधकारिणी ॥८४॥

अथ पाशिनीमुद्रायाः फलकथनम्।
पाशिनी महती मुद्रा बलपुष्टिविधायिनी। साधनीया प्रयत्नेन साधकैः सिद्धिकाङक्षिभिः ॥८५॥

विधि : 

  1. पृथ्वी पर आसन लगाकर पीठ के बल लेट जाएँ | दोनों हाथ नीचे जांघों के पास जमीन पर रखें |
  2. अपने हांथों पर जोर डालते हुए दोनों पैर,नितम्ब एवं धड़ ऊपर उठायें एवं पैरों को सिर के पीछे लाकर जमीन से स्पर्श कराएँ (हलासन की स्थिति में) |
  3. जमीन पर स्पर्श किये हुए ही दोनों पैरों के बीच में लगभग आधा मीटर का गैप करें एवं घुटनों को मोडकर जांघों को छाती से स्पर्श कराएँ | इस स्थिति में घुटने कान और कन्धों को स्पर्श करने चाहिए |
  4. अपने हाथों को मजबूती से पैरों के पीछे लपेट लें । फिर धीरे-धीरे दीर्घ शवासन करें ।  
  5. अपनी चेतना को मूलाधार चक्र पर रखें । 
  6. पाशिनी मुद्रा लगाकर जितने समय आराम से इस मुद्रा में रुक सकते हैं उतने समय मुद्रा लगाकर रखें,तत्पश्चात पैरों को खोलकर धीरे-धीरे जमीन पर लायें | 2 मिनट विश्राम के बाद पुनः इस मुद्रा को लगायें |

सावधानियां : 

  • जिन व्यक्तियों को रीढ़ से सम्बंधित कोई रोग जैसे – स्लिप डिस्क आदि हो उन्हें इस मुद्रा का अभ्यास नही करना चाहिए |
  • उच्च रक्तचाप के रोगियों को यह मुद्रा नही करनी चाहिए |
  • हर्निया से ग्रस्त लोगों को भी यह मुद्रा नहीं करनी चाहिए |

मुद्रा करने का समय व अवधि :

  • प्रातः नित्यकर्म के बाद खाली पेट इस मुद्रा को करना चाहिए |
  • पाशिनी मुद्रा लगाकर जितने समय आराम से इस मुद्रा में रुक सकते हैं उतने समय मुद्रा लगाकर रखें,तत्पश्चात पैरों को खोलकर धीरे-धीरे जमीन पर लायें | 2 मिनट विश्राम के बाद पुनः इस मुद्रा को लगायें |
  • प्रारंभ में 3 बार से शुरू करके शारीरिक शक्ति के अनुसार धीरे-धीरे क्रम बढ़ाते जाएँ |

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. पाशिनी मुद्रा के अभ्यास से नाड़ी संस्थान (नर्वस सिस्टम) में संतुलन और स्थिरता आती है। 
  2. इससे मेरूदंड (रीढ़ की हड्डी) और उसके चारो ओर की नाड़ियां क्रियाशील बनती है।
  3. प्रजनन अंगों से सम्बंधित समस्त रोग दूर हो जाते हैं ।
  4. शरीर में बल बढ़ता है एवं मानसिक शक्ति भी बढती है | 
  5. इस मुद्रा के अभ्यास से थायरायड ग्रंथि से सम्बंधित रोग दूर हो जाते है 

आध्यात्मिक लाभ :

  1. आध्यात्मिक प्रगति हेतु इस मुद्रा में ध्यान मूलाधार या विशुद्धि चक्र पर लगाना चाहिए | 
  2. यह मुद्रा कुण्डलिनी जागरण में अत्यंत लाभदायक है। 
  3. यह मुद्रा सिद्ध होने के बाद साधक के लिए कुछ भी असंभव नही रह जाता है |


शाम्भवी मुद्रा : SHAMBHAVI MUDRA

अथ शाम्भवीमुद्राकथनम्।
नेत्राञ्जनं समालोक्य आत्मारामं निरीक्षयेत्। साभवेच्छाम्भवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषुगोपिता ॥६४॥
अथ शाम्भवीमुद्रायाः फलकथनम्। वेदशास्त्र पुराणानि सामान्य गणिका इव। इयन्तु शाम्भवीमुद्रा गुप्ताकुलवधूरिव ॥६५॥
स एव आदिनाथश्च न च नारायणः स्वयम्। स च ब्रह्मा सृष्टिकारी यो मुद्रां वेत्ति शाम्भवीम् ॥६६॥
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्यमुक्तं महेश्वरः। शाम्भवीं यो विजानाति स च ब्रह्म न चान्यथा ॥६७॥॥श्रीघेरण्डसंहिता ॥
विधि :
  1. पदमासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ |
  2. दोनों हाथ घुटनों पर रखें, रीढ़ की हड्डी सीधी रहे |
  3. पूरी श्वास बाहर निकालने के साथ मूलबन्ध एवं उड्डियान बन्ध लगा लें |
  4. अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग या दोनों भौहों के बीच (भ्रूमध्य ) में स्थिर कर दें एवं एकाग्र मन से ईश्वर का ध्यान करें |
मुद्रा करने का समय व अवधि : 
इस मुद्रा को शुरुआत में जितनी देर हो सके करें और बाद में धीरे-धीरे इसका अभ्यास बढ़ाते जाएं।




सावधानियां : 

गर्दन को बिल्कुल सीधी अवस्था में रखकर पलकों को बिना झपकाएं देखते रहें। आपकी पलकें और आंखें खुली हों पर दिमाग बिल्कुल ध्यान में लगा हुआ हो। जो व्यक्ति त्राटक आसन करते हैं वे इस मुद्रा को बहुत ही अच्छी तरह से कर सकते हैं। शाम्भवी मुद्रा पूरी तरह से तभी सिद्ध हो सकती है जब इस मुद्रा को करने वाले की आंखें खुली हों लेकिन वे किसी भी चीज को न देख रही हों।

 चिकित्सकीय लाभ : 
शाम्भवी मुद्रा को करने से दिल और दिमाग को शांति मिलती है। इस मुद्रा को करने से योगी का ध्यान दिल में स्थिर होने लगता है।

आध्यात्मिक लाभ : 
इस मुद्रा में ध्यान परिपक्व हो जाने पर ज्योति दर्शन होता है,जो साधक को आत्म साक्षात्कार की ओर ले जाती है |

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माण्डुकी मुद्रा : बाल झड़ना, गंजापन एवं असमय सफेद होना का योगिक उपचार

मुखं संमुद्रितं कृत्वा जिह्वामूलं प्रचालयेत्। शनैर्ग्रसेदमृतं तां माण्डूकीं मुद्रिकां विदुः ॥६२॥
वलितं पलितं वैव जायते नित्ययौवनम्। न केशे जायते पाको यः कुर्यान्नित्यमाण्डुकीम् ॥६३॥ श्रीघेरण्डसंहिता |

माण्डूकी मुद्रा की विधि :

  1. सुखपूर्वक किसी आसन में बैठकर अपने  मुंह को बंद कर लें । आँखें बंद रहें एवं रीढ़ की हड्डी सीधी रहे 
  2. जीभ को पूरे तालू के ऊपर दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं।
  3. जीभ को इस तरह से घुमाने के फलस्वरूप उत्पन्न  लार का पान करें (निगलते रहें) योग शास्त्र में इस लार को सुधा या अमृत की संज्ञा दी गयी है। 

सावधानियां :

  • माण्डूकी मुद्रा करते समय आपका पूरा ध्यान जीभ के संचालन पर रहना चाहिए |
  • आँखें बंद रखें एवं मन की आँखों से (अन्तःचक्षु ) से जीभ के क्रियाकलाप को देखते रहें |
  • भोजन के तुरंत बाद या पहले माण्डूकी मुद्रा न करें | कम-से-कम 30 मिनट के अंतर पर कर सकते हैं |

मुद्रा करने का समय व अवधि : 
माण्डूकी  मुद्रा करने का सबसे उपयुक्त समय प्रातः एवं सायंकाल का है  यह मुद्रा   5  मिनट से प्रारंभ करके धीरे-धीरे  15 मिनट तक बढ़ा सकते हैं |

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. बाल झड़ना, गंजापन एवं असमय सफेद हो रहे बालों को रोकने के लिए योगशास्त्र में माण्डुकी मुद्रा को सबसे श्रेष्ठ उपाय बताया गया है। 
  2. माण्डुकी मुद्रा करने से शरीर में  झुर्रियां पड़ना रुक जाता है तथा यौवन की प्राप्ति होती है। 
  3. माण्डुकी मुद्रा के निरंतर अभ्यास से जीभ, गले और आंखों के रोग समाप्त हो जाते हैं |
  4. इस मुद्रा के प्रभाव से चेहरे एवं शरीर में चमक पैदा हो जाती है।
  5. माण्डुकी मुद्रा से पाचन सम्बन्धी रोग समाप्त हो जाते हैं |


आध्यात्मिक लाभ :
माण्डुकी मुद्रा से इच्छाओं पर सयंम होता है एवं मन को नियंत्रित करने की शक्ति उत्पन्न होती है |

तड़ागी मुद्रा : TADAGI MUDRA

तड़ाग का अर्थ होता है –तालाब, अर्थात जैसे तालाब में पानी होता है उसी प्रकार से पेट को वायु से भरने की क्रिया को तड़ागी मुद्रा कहा जाता है |

अथ तडागीमुद्राकथनम्।
उदरं पश्चिमोत्तानं कृत्वा च तडागाकृतिम्। ताडागी सा परामुद्रा जरामृत्यु विनाशिनी ॥६१॥श्रीघेरण्डसंहिता ||

प्रथम विधि :

  1. शवासन में लेट जाएँ, जिस नासिका से श्वर चल रहा हो उससे श्वास को अन्दर खींचते हुए पूरक करें (श्वास अंदर भरें)|पूरक करते समय पेट को वायु से इस प्रकार फुलाएं जैसे तालाब में पानी भरा हो |
  2. श्वास को अंदर ही रोकें (अन्तः कुम्भक करें) एवं वायु को पेट में इस प्रकार हिलाएं जैसे तालाब का जल हिलता है |
  3. आराम से जितनी देर यह क्रिया कर सकते हों उतनी देर करें तत्पश्चात धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकाल दें |
  4. एक मिनट सामान्य श्वास-प्रश्वास के साथ विश्राम करें,तत्पश्चात इस क्रिया को पुनः दोहराएँ |

दूसरी विधि : 

  1. जैसे पश्चिमोत्तान आसन में बैठते हैं उसी तरह से जमीन पर बैठकर अपने दोनों पैरों को सामने की ओर अलग-अलग दिशा में सीधा फैला लें एवं आगे की ओर झुककर अपने दोनों हाथों से दोनों पैरों के अंगूठों को पकड़ लें। 
  2. श्वास अन्दर भरते हुए पेट स्नायुओं को बाहर की ओर फैलाएं । आराम से जितनी देर श्वास अन्दर रोक सकते हों उतनी देर तक रोककर रखें  तत्पश्चात धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकालकर दोनों अंगूठों को पकड़े-पकड़े ही शरीर को ढीला छोड़ दें। कुछ देर रुककर पुनः इस क्रिया को करें

सावधानियां : 

  • तड़ागी मुद्रा को सदैव खाली पेट ही करना चाहिए |
  • शक्ति के अनुसार ही अन्तः कुम्भक करना चाहिए,जबरदस्ती करने से हानि हो सकती है |
  • जिन व्यक्तियों के गर्दन,कमर अथवा रीढ़ के अन्य किसी हिस्से में दर्द हो उन्हें यह मुद्रा लेटकर करनी  चाहिए  |

मुद्रा करने का समय व अवधि :   
तड़ागी मुद्रा को प्रातः-सायं खाली पेट करना चाहिए | इस मुद्रा को प्रारंभ में  10 बार करना चाहिए तत्पश्चात यथाशक्ति धीरे-धीरे 21 बार तक संख्या बढ़ाना चाहिए ।

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. तड़ागी मुद्रा पेट की सर्व रोगहारी मुद्रा है |इसके नियमित अभ्यास से पेट के समस्त रोग समूल नष्ट हो जाते हैं |
  2. इस मुद्रा को करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है |

आध्यात्मिक लाभ : 
तड़ागी मुद्रा के अभ्यास से मणिपुरक चक्र पर एकाग्रता बढ़ती है।

शक्ति चालिनी मुद्रा : SHAKTI CHALINI MUDRA

अथ शक्तिचालनीमुद्राकथनम्।
मूलाधारे आत्मशक्तिः कुण्डली परदेवता। शयिता भुजगाकारा सार्द्धत्रिवलयान्विता ॥४९॥
यावत् सा निद्रिता देहे तावज्जीवः पशुर्यथा। ज्ञानं न जायते तावत् कोटियोगं समभ्यसेत् ॥५०॥
उद्याट्येत् कवाटञ्च यथा कुञ्चिकया हठात्। कुण्डलिन्याः प्रबोधेन ब्रह्मद्वारं प्रभेदयेत् ॥५१॥
नाभिं संवेष्ट्य वस्त्रेण न च नग्नो बहिस्थितः। गोपनीयगृहे स्थित्वा शक्ति चालनमभ्यसेत् ॥५२॥
वितस्तिप्रमितं दीर्घं विस्तारे चतुरंगुलम्। मृदुलं धवलं सूक्ष्मं वेष्टनाम्बर लक्षणम् ॥५३॥
एवम्बरयुक्तं च कटिसूत्रेणयोजयेत्। भस्मनागात्र संलिप्तं सिद्धासनं समाचरेत् ॥५४॥
नासाभ्यां प्राणमाकृष्य अपानेयोजयेतवलात्। तावदाकुञ्चयेत् गुह्यं शनैरश्वनिमुद्रया ॥५५॥
यावद्गच्छेत् सुषुम्नायां वायुः प्रकाशयेत् हठात्। तदा वायुप्रबन्धेन कुम्भिका च भुजङ्गिनी ॥५६॥
बद्धश्वासस्ततोभूत्वा ऊर्ध्वमार्गं प्रपद्यते। शक्तोर्विनाचालनेन योनिमुद्रा न सिध्यति ॥५७॥
आदौ चालनमभ्यस्य योनिमुद्रं समभ्यसेत्। इति ते कथितं चण्डकापाले शक्तिचालनम्।५८॥
गोपनीयं प्रयत्नेन दिने दिने समभ्यसेत्। मुद्रेयं परमागोप्याजरामरणनाशिनी ॥५९॥
तस्मादभ्यासनं कार्यं योगिभिः सिद्धिकांक्षिभिः।  नित्यं योऽभ्यसेतेयोगी सिद्धिस्तस्य करेस्थिता।
तस्यविग्रहसिद्धिः स्याद् रोगाणां संक्षयो भवेत् ॥६०॥ श्रीघेरण्डसंहिता ||

महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित विधि :

  1. पदमासन अथवा सिद्धासन में बैठ जाएँ |
  2. हथेलियों को पृथ्वी पर टिका कर धीरे-धीरे दोनों नितम्बों को पृथ्वी से उठा – उठा कर ताड़न करें |
  3. 20-25 बार ताड़न करने के बाद मूलबन्ध लगा लें एवं दोनों नासिकाओं से या वायीं नासिका या फिर जो स्वर चल रहा हो उससे श्वास अंदर भरकर जालंधर बन्ध लगा लें तथा प्राणवायु को अपानवायु के साथ मिलाने की धारणा करते हुए अश्वनी मुद्रा करें (गुदाद्वार को बार-बार संकुचित कर ढीला छोड़ने की क्रिया को अश्वनी मुद्रा कहते हैं )|
  4. आराम से जितनी देर रोक सकते हैं उतनी देर श्वास अन्दर ही रोककर रखें,तत्पश्चात जालंधर बन्ध खोलकर यदि  दोनों नासिका से श्वास अन्दर भरी थी तो दोनों नासिका से और यदि एक नासिका से श्वास अंदर भरी थी तब उसके विपरीत नासिका से श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें एवं कुछ देर एकाग्र होकर शांत बैठ  जाएँ |

महर्षि घेरंड ने इस मुद्रा की विधि इस तरह से बताई है 
  1. आठ अंगुल लंबा और चार अंगुल चौड़ा मुलायम वस्त्र लेकर नाभि पर लगाएं और कटिसूत्र में बांध लें| फिर शरीर में भस्म रमाकर सिद्धासन में बैठें और प्राणवायु को अपानवायु से मिलाएं | 
  2. जब तक गुदा द्वार से चलती हुई वायु(अपान) प्रकाशित न हो, तब तक गुदा द्वार को संकुचित रखें (मूलबन्ध लगायें)| इससे वायु का जो निरोध होता है, उसमें कुम्भक के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती हुई सुषुम्ना मार्ग से सहस्रार में अवस्थित हो जाती है| 
  3. प्राण-अपान को संयुक्त करने की क्रिया प्राणवायु को पूरक द्वारा भीतर खींचने और उड्डीयान बंध से अपान वायु को ऊपर की ओर आकर्षित करने से पूर्ण होती है| इसमें गुह्य प्रदेश के संकोच और विस्तार का अभ्यास (अश्वनी मुद्रा) होने से अधिक सरलता दोनों वायु का मिलन हो जाता है |

सावधानियां : 

  • शक्ति चालिनी मुद्रा के अभ्यास काल में हल्का सुपाच्य आहार लेना चाहिए |
  • कोई भी क्रिया क्षमता से अधिक करने पर हानिकारक सिद्ध हो सकती है अतः सावधानी पूर्वक शक्ति के अनुसार ही अभ्यास करें |

मुद्रा करने का समय व अवधि : 

  • शक्ति चालिनी मुद्रा का अभ्यास खाली पेट प्रातः एवं सायं के समय करना सर्वोत्तम है |
  • प्रारंभ में इस मुद्रा को 20 बार कर सकते हैं,अभ्यास हो जाने पर धीरे-धीरे संख्या बढ़ाई जा सकती है |

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं |
  2. यह मुद्रा गुदा रोगों में अत्यंत लाभकारी है |
  3. इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से यौन संबंधी रोग समाप्त होते हैं और वीर्य उर्ध्वगामी होता है।
  4. शक्ति चालिनी मुद्रा करने से नपुसंकता जैसा रोग भी समूल नष्ट हो जाता हैं।
  5. यह मुद्रा वृद्धावस्था को रोकती है एवं शरीर की खूबसूरती बढ़ाती है |
  6. शक्ति चालिनी मुद्रा के अभ्यास से स्त्रियों के भी समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं एवं उनकी सुन्दरता में भी वृद्धि होती है |

आध्यात्मिक लाभ : 
पूरक करने के बाद उड्डियान बन्ध में अश्वनी मुद्रा करने से सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है जिससे यह मुद्रा कुण्डलिनी जागरण में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है |

योनि मुद्रा

            

अथ योनिमुद्राकथनम्।

सिद्धासनं समासाद्य कर्णचक्षुर्न सोमुखम्। अंगुष्ठ तर्जनी मध्यानामाभिश्चैव साधयेत् ॥
काकीभिः प्राणं संकृष्य अपाने योजयेत् ततः। षट्चक्राणि क्रमाद्ध्यात्वा हूं हंसमनुना सुधीः ॥३८॥
चैतन्यमानयेद् देवीं निद्रितां यां भुजङ्गिनीम्। जीवेन सहितांशक्तिं समुत्थाप्यकराम्बुजे ॥३९॥
शक्तिमयः स्वयंभूत्वा परशिवेन संगमम्। नाना सुखं विहारं च चिन्तयेत् परमं सुखम् ॥४०॥
शिव शक्ति समायोगादेकान्तेभुविभावयेत्। आनन्दं च स्वयं भूत्वा अहं ब्रह्मेति सम्भवेत् ॥४१॥
ब्रह्महाभ्रणहाचैव सुरापीगुरुतल्पगः। एतैपापैर्निलिप्येत योनिमुद्रानिबन्धात् ॥४२॥
यानि पापानि घोराणि उपपापानि यानि च। तानिसर्वाणि नश्यन्ति योगनिमुद्रानिबन्धात् ॥
तस्मादभ्यासनं कुर्याद्यदि मुक्तिं समिच्छति ॥४३॥ श्रीघेरण्डसंहिता ||

विधि :
  1. सिद्धासन में बैठ जाएँ , रीढ़ की हड्डी सीधी रहे |
  2. अपने हाथ के दोनों अंगूठों से दोनों कानों को बंद करें तत्पश्चात क्रमशः दोनों तर्जनी अंगुलियों से दोनों नेत्र एवं दोनों मध्यमा अँगुलियों से नाक के दोनों छिद्र बंद कर लें, अंत में दोनों अनामिका व कनिष्ठका अंगुलियों को दोनों होठों के पास रखकर होठों को गोल बनाते हुए जिह्वा को कौए की चोंच की तरह नाली जैसा बना लें |जीभ की इस स्थिति को योग में काकी मुद्रा कहा जाता है |
  3. काकी मुद्रा में ही पूरी श्वास अंदर भरें एवं मूलबन्ध लगाते हुए अपान वायु से प्राण वायु को मिलाने की भावना करें | तत्पश्चात श्वास बाहर निकालने के साथ  ॐ का उच्चारण करते हुए यह भावना करें कि ॐ ध्वनि के साथ परस्पर मिली हुयी वायु कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर चक्रों का भेद कर सहस्रार चक्र में स्थित हो रही है | 
  4. 5 सेकेण्ड तक बाह्य कुम्भक करने के बाद पुनः पहले की तरह काकी मुद्रा में श्वास को अंदर भरकर योनि मुद्रा करें |


सावधानियां : 
उच्चरक्तचाप के रोगी बलपूर्वक श्वास को लम्बा न करें | आराम से जितना कर सकते हैं उतना ही करें |

मुद्रा करने का समय व अवधि : 
इस मुद्रा को प्रारंभ में प्रातः सायं 5-5 बार करना चाहिए तत्पश्चात क्रम बढ़ाते हुए 21 बार तक ले जाना चाहिए |

चिकित्सकीय लाभ : 

  1. योनि मुद्रा के अभ्यास से मानसिक तनाव समाप्त हो जाता है |
  2. इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से आँख,नाक एवं कान के रोग नष्ट हो जाते हैं |

आध्यात्मिक लाभ : 

  1. इससे अंतर्ज्योति का साक्षात्कार होता है |
  2. यह मुद्रा कुण्डलिनी जागरण के लिए अत्यंत लाभकारी है |


विपरीतकरणी मुद्रा : VIPRITKARANI MUDRA

विपरीतकरणी मुद्रा में पैर उपर एवं सिर नीचे अर्थात शरीर की विपरीत स्थिति होने से इसे विपरीतकरणी मुद्रा कहते हैं |इस मुद्रा को सर्वांगासन की पूर्व स्थिति भी कहा जाता है |

अथ विपरीतकरणीमुद्राकथनम्।
नाभिमूलेवसेत्सूर्यस्तालुमूले च चन्द्रमाः। अमृतं ग्रसते मृत्युस्ततो मृत्युवशो नरः ॥३३॥
ऊर्ध्वं च जायते सूर्यश्चन्द्रं च अध आनयेत्। विपरीतकरीमुद्रा सर्वतन्त्रेषुगोपिता ॥३४॥
भूमौ शिरश्च संस्थाप्य करयुग्मा समाहितः। ऊर्ध्वपादः स्थिरोभूत्वा विपरीतकरीमता ॥३५॥

अथ विपरीतकरणीमुद्राकथनम्।
मुद्रेयं साधिता नित्यं जरा मृत्युं च नाशयेत्। स सिद्धः सर्वलोकेषु प्रलयेऽपि न सीदति ॥३६॥




विधि : 

  1. जमीन पर चटाई या कम्बल बिछाकर सीधे लेट जाएँ, दोनों हाथ शरीर से सटे हुए एवं पैर के पंजे आपस में मिले रहें |
  2. सर्वांगासन की तरह पैरों को धीरे से क्रमशः 30 डिग्री,60-90 डिग्री तक उठा लें |
  3. हाथों को जमीन पर दबाते हुए पैरों को पीछे 120 डिग्री तक ले जाएँ |दोनों हाथों से कमर व नितम्ब को सहारा दें एवं पैरों को सीधा करें |
  4. अपना ध्यान गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय के बीच वाले स्थान (Perineum)पर केन्द्रित करें एवं नितम्बों को सिकोड़ते हुए गुदा द्वार को संकुचित (मूलबन्ध)करें तथा अपनी जिह्वा को अंदर की तरफ मोड़कर तालू में लगा दें | श्वास सामान्य रूप से चलती रहे |
  5. आराम से जितनी देर इस मुद्रा में रह सकते हैं,उतनी देर रहें तत्पश्चात मूलबन्ध को खोलकर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएँ |

सावधानियां :

  • उच्चरक्तचाप एवं कमर दर्द  की अवस्था में विपरीतकरणी मुद्रा नही करनी चाहिए |
  • विपरीतकरणी मुद्रा करते समय यदि गले में कड़वा सा रस महसूस हो तो तत्काल इस मुद्रा को बंद कर सामान्य अवस्था में आ जाएँ एवं कुछ देर शवासन की अवस्था में लेटे रहें | 
  • जो व्यक्ति शरीर का वजन अधिक होने के कारण इस मुद्रा को नही कर सकते वे प्रारंभ में पैरों की तरफ कोई ऊँची चीज जैसे स्टूल आदि रखकर दोनों पैर उस पर टिका सकते हैं |

मुद्रा करने का समय व अवधि : 

  1. विपरीतकरणी मुद्रा का अभ्यास प्रातः खाली पेट या सायं जब भोजन करे कम से कम 4 घंटे हो चुके हो तब करना चाहिए |
  2. इस मुद्रा को प्रारंभ में 30 सेकंड से करके धीरे-धीरे लगभग 1 घंटे तक किया जा सकता है।


चिकित्सकीय लाभ : 

  1. विपरीतकरणी मुद्रा बबासीर एवं यौन रोगों को नष्ट करती है |
  2. हठयोग के अनुसार विपरीतकरणी मुद्रा शरीर के ताप को सन्तुलित कर समस्त आधि-व्याधि का नाश करती है |
  3. यह जठराग्नि को प्रदीप्त कर पाचन संस्थान को सबल बनाती है तथा शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है |
  4. विपरीतकरणी मुद्रा के अभ्यास से चेहरे पर कान्ति बढ़ती है एवं बुढ़ापा व अकाल मृत्यु नही सताती है |
  5. इस मुद्रा के अभ्यास से स्त्रियों के मासिकधर्म संबंधी रोग समाप्त हो जाते हैं | यह मुद्रा बांझपन दूर करने में भी सहायक है। 
  6. विपरीतकरणी मुद्रा के नियमित अभ्यास से गले के समस्त रोगों से छुटकारा मिल जाता है, एवं पैरों की थकान भी दूर होती है |
  7. इस मुद्रा से मष्तिस्क में रक्त की आपूर्ति होती है जिससे सिरदर्द,असमय बाल सफेद होना जैसे रोग नष्ट हो जाते हैं | यह स्मरण शक्ति को भी बढ़ाती है |

आध्यात्मिक लाभ : 

  1. हठयोग के अनुसार मनुष्य के तालुमूल में चन्द्रनाड़ी एवं नाभिमूल सूर्य नाड़ी स्थित है | सामान्य रूप से जब सहस्रार चक्र से चन्द्रामृत का प्रवाह होता है तो वह नाभि मूल में पहुंचकर सूर्य नाड़ी के ताप से नष्ट हो जाता है | विपरीतकरणी मुद्रा में यह अमृत तालुमूल में सुरक्षित रहता है,यदि यह स्थिति लम्बे समय तक बनी रहे तो शरीर अमरता तक भी प्राप्त कर सकता है |
  2. विपरीतकरणी मुद्रा का कुण्डलिनी जागरण करने में महत्वपूर्ण स्थान है |


खेचरी मुद्रा : KHECHARI MUDRA

अथ खेचरीमुद्राकथनम्।
जिह्वाधोनाडीं संछिन्नां रसनां चालयेत् सदा। दोहयेन्नवनीतेन लोहयन्त्रेण कर्षयेत् ॥२५॥
एवं नित्यं समाभ्यासाल्लम्बिकादीर्घतां ब्रजेत्। यावद्गच्छेद्भ्रुवोर्मध्ये तथा गच्छति खेचरी ॥२६॥
रसनां तालुमध्ये तु शनैः शनैः प्रवेशयेत्। कपालकुहरेजिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा। भ्रुवोर्मध्ये गता दृष्टिमुर्द्रा भवति खेचरी ॥२७॥
अथ खेचरीमुद्राफलकथनम्।
न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैवालस्यं प्रजायते। न च रोगो जरामृत्युर्देवदेहं प्रपद्यते ॥२८॥
नाग्निनादह्येतेगात्रं न शोषयति मारुतः। न देहं क्लेदयन्त्यापो दंशयेन्न भुजङ्गमः ॥२९॥
लावण्यं च भवेद्गात्रे समाधिर्जायते ध्रुवम्। कपाल वक्त्रसंयोगे रसना रसमाप्नुयात् ॥३०॥
नाना रससमुद्भूतमानन्दं च दिने दिने। आदौ लवणक्षारं च ततस्तिक्त कषायकम् ॥३१॥
नवनीतं धृतं क्षीरं दधितक्रमधूनि च। द्राक्षा रसं च पीयूषं जायते रसनोदकम् ॥३२॥
श्रीघेरण्डसंहितायां घेरण्डचण्डसंवादे घटस्थयोगप्रकरणे मुद्राप्रयोगो नाम तृतीयोपदेशः ॥

खेचरी मुद्रा करने की पूर्व तयारी :
इस मुद्रा में सफलता प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम  जिह्वा को बढाने के उपाय किये जाते हैं जिससे जिह्वा  लंबी होकर नाक, भौंह और सिर को स्पर्श करने लगे।  जिह्वा को बढ़ाने की क्रिया प्रमुख तीन विधियों से की जाती है  – छेदन,चालन और दोहन | इनमे से छेदन और चालन कठिन है अतः इन्हें किसी योग्य गुरु की देखरेख में ही करना उचित है | सामान्य गृहस्थजनों को प्रतिदिन प्रातःकाल जीभ को दोनों हाथों के अंगूठे और तर्जनी उंगली से पकड़कर दोहन करना चाहिए जैसे गाय का दूध निकालते समय दोहन करते हैं। इसके बाद जीभ पर त्रिफला का चूर्ण लगा लेंना चाहिए । इस कार्य मे जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। इसके अभ्यास में कम से कम 6 महीने से अधिक समय लग सकता है, अतः धैर्यपूर्वक करें ।

विधि : 

  1. सुखपूर्वक किसी ध्यानात्मक आसन में बैठकर मुंह के अन्दर जीभ को उपर की ओर उलटी ले जाकर तालू-कुहर (जीभ के उपर तालू के बीच का गड्ढा) में लगाने से खेचरी मुद्रा हो जाती है |
  2. इस तरह से जिह्वा को तालू से लगाने पर इड़ा-पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी के खुले हुए द्वार बंद हो जाते हैं एवं ब्रह्मरंध्र से टपकने वाला रस जिह्वा पर टपकने लगता है । योग में इसे अमृतपान कहा जाता है।

सावधानियां :  

  • शारीरिक श्रम करने के तुरंत बाद इस मुद्रा को नहीं करना चाहिए। 
  • यदि जिह्वा पर नाक के ऊपर के भाग से कड़वा सा रस टपकने लगे तो यह मुद्रा तत्काल रूप से बंद कर देनी चाहिए। 
  • खेचरी मुद्रा का अभ्यास अत्यधिक कठिन होता है इसलिए इसे सावधानी के साथ अथवा किसी योग्य गुरू के निर्देशन में करना उचित है ।

मुद्रा करने का समय व अवधि :  
खेचरी मुद्रा का अभ्यास करने का उपयुक्त समय प्रातः एवं संध्याकाल है | प्रारंभ में इस मुद्रा को 20 बार एवं 2 माह के बादप्रतिदिन  8 बार करना उचित है।

चिकित्सकीय लाभ :

  1. खेचरी मुद्रा के अभ्यास से मुंह के अंदर लार का स्राव बढ़ता है जिससे पाचन तंत्र सबल होता है एवं  भूख बढती है  एवं बवासीर रोग नष्ट हो जाता है |
  2. इस मुद्रा से प्यास पर नियंत्रण होता है। 
  3. इसके अभ्यास से हकलाहट एवं तुतलाहट जैसे रोगों में लाभ मिलता है |
  4. जीर्ण बेहोशी के रोग में यह मुद्रा अत्यधिक लाभकारी है।

आध्यात्मिक लाभ : 

  1. इस मुद्रा के अभ्यास से साधक का तीसरा नेत्र खुल जाता है जिससे साधक के लिए कुछ भी असंभव नही रहता |
  2. योग में खेचरी मुद्रा को अनेक सिद्धियां प्राप्त करने का प्रभावी साधन माना गया है | 
  3. खेचरी मुद्रा से वाणी एवं मन पर सयंम होता है |
  4. खेचरी मुद्रा के अभ्यास से प्राणों का संचय होता है एवं  कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है। 
  5. खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाने पर साधक अपनी इच्छानुसार श्वास को जब तक चाहे रोक सकते हैं।


महावेध मुद्रा : भगन्दर का योगिक उपचार

अथ महावेधकथनम्।
रूपयौवनलावण्यं नारीणां पुरुषं विना।
मूलबन्धमहाबन्धौ महावेधं विना तथा ॥२१॥
महाबन्धं समासाद्य उड्डीनकुम्भकं चरेत्।
महावेधः समाख्यातो योगिनां सिद्धिदायकः ॥२२॥
अथ महावेधस्य फलकथनम्।
महाबन्धमूलबन्धौ महावेधसमन्वितौ ।
प्रत्यहं कुरुतेयस्तु स योगीयोगवित्तमः ॥२३॥
न च मृत्यु भयं तस्य न जरा तस्य विद्यते।
गोपनीयः प्रयत्नेन वेधोऽयं योगिपुंगवैः ॥२४॥

विधि :

  1. पद्मासन की स्थिति में बैठ जाएँ | 
  2. मूल बन्ध लगाकर श्वास अन्दर भर लें एवं दोनों हथेली दृढ़तापूर्वक जमीन में स्थिर करके हाथों के बल शरीर को जमीन से उपर उठा लें |
  3. इसी स्थिति में ऐसी भावना करें कि प्राण इड़ा पिंगला नाड़ी को छोड़कर कुण्डलिनी शक्ति को जगाता हुआ सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कर रहा है |
  4. मूल बन्ध खोलकर श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए सामान्य स्थिति में आ जाएँ |

सावधानियां :
आराम से जितनी देर कुम्भक कर सकें उतनी देर ही मुद्रा लगायें , जबरदस्ती न करें |
मुद्रा करने का समय व अवधि :
प्रातः – सायं खाली पेट इस आसन मुद्रा को करें |प्रारंभ  5 बार से करके धीरे-धीरे  21 बार तक बढ़ाएं |
चिकित्सकीय लाभ :

  • महावेध मुद्रा से कब्ज,बबासीर,भगन्दर जैसे रोग नष्ट हो जाते हैं |
  • यह आसन मुद्रा पुरुषों के धातुरोग और स्त्रियों के मासिकधर्म सम्बंधी रोगों में बहुत ही लाभकारी है।
  • महावेध मुद्रा करने से वीर्य शुद्ध होकर स्तम्भन शक्ति बढती है |

आध्यात्मिक लाभ :

  • महावेध मुद्रा से साधक की कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होने लगती है |
  • प्राणों का सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करने से समस्त चक्रों का जागरण होता है जिससे साधक अनेक सिद्धियों से युक्त हो जाता है |


महाबन्ध मुद्रा

अथ महाबन्धकथनम्।
वामपादस्य गुल्फेन पायुमूलं निरोधयेत्।
दक्षापादेन तद्गुल्फं संपीड्य यत्नतः सुधीः ॥१८॥
शनैः शनैश्चालयेत् पार्ष्णिं योनिमाकुञ्चयेच्छनैः।
जालन्धरे धारयेत्प्राणं महाबन्धोनिगद्यते ॥१९॥
अथ महाबन्धस्य फलकथनम्।
महाबन्ध परोबन्धो जरामरणनाशनः।
प्रसादादस्य बन्धस्य साधयेत् सर्ववाञ्छितम् ॥२०॥
(महाबन्ध  तीन बन्धों - मूलबन्ध, जालन्धर बन्ध और उड्डीयान बन्ध के मिलाने से बनता है)।

विधि :

  1. पदमासन या सिद्धासन की स्थिति में बाएं पैर की एड़ी को गुदा एवं लिंग के मध्य भाग में जमाकर बायीं जंघा के ऊपर दाहिने पैर को रखें | रीढ़ की हड्डी सीधी रखें |
  2. जिस नासा छिद्र से श्वास चल रही हो उससे ही श्वास अंदर भरकर जालन्धर बन्ध लगा लें | फिर गुदाद्वार से वायु को उपर की ओर आकर्षित करके मूलबन्ध लगायें एवं पेट को अंदर सिकोड़कर उड्डियान बन्ध लगा लें |
  3. मन को मध्य नाडी में एकाग्र करते  हुए यथाशक्ति अन्तः कुम्भक करें (श्वास को अंदर ही रोककर रखें) |
  4. जिस नासा छिद्र से श्वास अंदर भरी थी उसके विपरीत नासा छिद्र से धीरे-धीरे श्वास बाहर निकाल दें | इस प्रकार दोनों नासा छिद्रों से अनुलोम-विलोम विधि से समान प्राणायाम करें |

मुद्रा करने का समय व अवधि :
प्रारंभ में इस आसन मुद्रा को प्रातः – सायं खाली पेट 5 बार करना चाहिए ।
सावधानियां :

  • प्रत्येक अभ्यास को करने के बाद कुछ देर तक सामान्य श्वास लेकर पुनः बन्ध लगाना चाहिए |
  • किसी भी क्रिया में जोर-जबरजस्ती नही करना चाहिए | आराम से जितना कर सकते हैं उतना ही करें |
  • महाबन्ध में जालन्धर बन्ध को अवश्य लगायें अन्यथा मूलबन्ध एवं उड्डियान बन्ध लगा होने से पेट की वायु मष्तिस्क पर अटैक करके सिरदर्द,भारीपन एवं अवसाद जैसे रोग को भी जन्म दे सकती है | 

चिकित्सकीय लाभ :

  • महाबन्ध के अभ्यास से प्रजनन अंगों के समस्त रोग जैसे- गर्भाशय की सूजन,प्रदर रोग,धातुरोग आदि दूर हो जाते हैं। 
  • महाबन्ध युवावस्था बनाये रखने के लिए बहुत ही ज्यादा लाभकारी है।
  • यह आसन मुद्रा मन को शांत एवं एकाग्र करती  है जिससे शरीर के स्नायु सबल होते हैं |
  • महाबन्ध के नियमित अभ्यास से ह्रदय को बल मिलता है जिससे ह्रदय रोगों की संभावना समाप्त हो जाती है |
  • यह प्रजनन अंगों एवं उनसे सम्बंधित स्नायुओं की अनावश्यक उत्तेजना और शिथिलता को दूर करके वीर्य की शुद्धि एवं स्तम्भन शक्ति को बढ़ाता है | 
  • महाबन्ध आँतों की निष्क्रियता को दूर कर जठराग्नि प्रदीप्त करता है जिससे कब्ज और अपच दूर होती है | एवं बवासीर,लिवर व तिल्ली के रोग नष्ट हो जाते हैं | 
आध्यात्मिक लाभ : 
महाबन्ध के अभ्यास से इड़ा,पिंगला एवं सुषुम्ना नाड़ी का संगम होता है एवं प्राण उर्ध्यगामी होकर कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है |

मूलबन्ध

हठयोग-प्रदीपिका में जरा मरण नाशक दस मुद्राओं का वर्णन किया गया है , मूलबन्ध उनमें से एक है |
अथ मूलबन्धकथनम्।
पार्ष्णिना वामपादस्य योनिमाकुञ्चयेत्ततः।
नाभिग्रंथिमेरुदण्जे संपीड्य यत्नतः सुधीः।१४॥
मेढ्रं दक्षिणगुल्फे तु दृढबन्धं समाचरेत्।
जराविनाशिनी मुद्रा मूलबन्धो निगद्यते ॥१५॥



अथ मूलबन्धस्य फलकथनम्।
संसार समुद्रं तर्तुमभिलषति यः पुमान्। विजनेषु गुप्तो भूत्वा मुद्रामेनां समभ्यसेत् ॥१६॥
अभ्यासाद् बन्धनस्यास्य मरुत्सिद्धिर्भवेद्ध्रुवम्। साधयेद्यत्नतो तर्हि मौनी तु विजितालसः ॥१७ ||श्रीघेरण्डसंहिता |

मूलबन्ध की  विधि :

  1. सिद्धासन या पद्मासन  की स्थिति में बैठ जाएँ(चित्र देखें),दोनों हाथ घुटनों पर रहें तथा रीढ़ की हड्डी सीधी रहे | 
  2. धीरे-धीरे पूरी श्वास अन्दर भरें एवं रोककर रखें |
  3. गर्दन को नीचे झुकाकर ठुड्डी को कंठकूप में लगायें (जलंधर बंध) तथा गुदा प्रदेश को सिकोड़ लें |
  4. आराम से जितनी देर रुक सकते हैं श्वास रोककर इसी मुद्रा में रहें |
  5. बंध खोलते समय पहले गुदा प्रदेश के संकुचन को ढीला छोड़ें तत्पश्चात सिर को धीरे से उपर उठायें (जलंधर बंध खोलें ) एवं श्वास को बाहर निकाल दें |

सावधानियां : 
इस मुद्रा को जब तक आप सांस को अंदर की ओर रोककर रख सकते हैं उसी के अनुसार शुरुआत में 5 से 10 बार करें और धीरे-धीरे इसको करने का समय बढ़ाते जाएं। मूलबन्ध करने के4-5 घंटे पहले एवं 30 मिनट बाद तक कुछ नही खाना चाहिए |

मूलबन्ध करने का समय व अवधि : 
मूलबन्ध प्रातः खाली पेट करना सबसे उचित है सायं जब भोजन करे कम से कम 4-5 घंटा हो जाये तब कर सकते हैं | प्रारंभ में इस अभ्यास को 4-5 बार करें फिर धीरे-धीरे इस क्रम को बढ़ाते हुए 21 बार तक करें |

                                                                                     विशेष :
मूलबन्ध को वैसे तो किसी भी अवस्था में जैसे खड़े होकर, बैठकर या लेटकर । लेकिन इसको करने के लिए सबसे अच्छा आसन सिद्धासन होता है क्योंकि ऐसी अवस्था में एड़ी मूलाधार से लगी होने के कारण अभ्यास करने में मददगार होती है। मूलबन्ध करते समय सांस की गति स्वाभाविक रूप से रुक जाती है और शरीर में कम्पन-सा होने लगता है| योग के अनुसार शौच की अवस्था में जब हम मल को रोकते हैं, तब शंखिनी नाड़ी को ऊपर की ओर खींचना पड़ता है, जबकि मूत्र को रोकने के लिए कुहू नाड़ी को खींचा जाता है| गुदाद्वार और मूत्राशय के बीच वाली जगह को योनिमंडल कहते है। इसी के ऊपर रीढ़ का वो स्थान होता है जिसे कन्द कहते है। यहीं से इड़ा और पिंगला नाड़ी शुरू होती हैं। इड़ा नाड़ी बाईं ओर तथा पिंगला नाड़ी दाईं ओर चढ़ती हुई एक ही जगह पर जाकर समाप्त होती है। फिर ये 2 हिस्सों में बंटकर एक माथे और दूसरी ब्रह्मरंध्र तक जाती है।  ये नाड़ियां सांस लेने की क्रिया को पूरी तरह से काबू में करती है। मूल स्थान से कुछ दूर ओर 2 शंखिनी नाड़ी पैदा होती है।

चिकित्सकीय लाभ : 

  • जठराग्नि प्रदीप्त होने से पाचन शक्ति बढ़ जाती है |
  • मूलबन्ध को करने से कब्ज समाप्त होती है और भूख तेज हो जाती है। 
  • इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर का आलस्य एवं भारीपन समाप्त होता है । 
  • मूलबन्ध पुरुषों के धातुरोग और स्त्रियों के मासिकधर्म सम्बंधी रोगों में बहुत ही लाभकारी है। 
  • मूलबन्ध से बवासीर एवं भगंदर रोग समाप्त हो जाते है । 
  • मूलबन्ध के नियमित अभ्यास से गुदा प्रदेश के स्नायु और काम ग्रंथियां सबल एवं स्वस्थ होती हैं| इससे स्तम्भन शक्ति बढ़ती है|   


आध्यात्मिक लाभ : 

  • मूलबन्ध लगाने से मूलाधार चक्र जाग्रत होता है | यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9 लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है। 
  • इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना आवश्यक है।


जालन्धर बन्ध : JALANDHARA BANDHA

अथ जालन्धर बन्धकथनम्।
कण्ठ संकोचनं कृत्वा चिबुकं हृदयेन्यसेत्।
जालन्धरे कृते बन्धे षोडशाधारबन्धनम्।
जालन्धरं महामुद्रामृत्योश्चक्षय कारिणीं ॥१२॥
सिद्धं जालन्धरं बन्धं योगिनां सिद्धिदायकम्।
षण्मासमभ्यसेद्यो हि स सिद्धो नात्र संशयः ॥१३॥
श्रीघेरण्डसंहितायां घेरण्डचण्डसंवादे घटस्थयोगप्रकरणे
मुद्राप्रयोगो नाम तृतीयोपदेशः ॥

कंठ का संकुचन करके ठोड़ी को ह्रदय के समीप दृढ़तापूर्वक लगाने की क्रिया को  जरामृत्यु का नाश करने वाला जालन्धर बन्ध कहते हैं |


विधि :

  1. भूमि पर आसन बिछाकर पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं । 
  2. दोनों हाथों को घुटनों पर रखें एवं ऑंखें बंद व रीढ़ की हड्डी सीधी रखें | 
  3. गहरी श्वास लेकर अन्तः कुम्भक करें (श्वास को अंदर रोककर रखें )और कंठ की आन्तरिक मांसपेशियों को संकुचित कर ठोड़ी को झुकाकर हृदय के पास कण्ठकूप में लगा दें एवं दोनों कन्धों को थोड़ा सा उचकाकर उपर उठायें |
  4. आराम से जब तक अन्तः कुम्भक की स्थिति में रह सकें रहें तत्पश्चात हाथों तथा कन्धों को शिथिल कर सिर को उपर  उठाकर सामान्य स्थिति में आ जाएँ |
  5. धीरे-धीरे श्वास बाहर निकालें |
  6. श्वास क्रिया सामान्य हो जाने पर पुनः इस प्रक्रिया को करें ।

सावधानियां :

  • जिन लोगों की कमर या गर्दन में दर्द रहता हो उन्हें जालंधर बंध का अभ्यास नहीं करना चाहिए। 
  • जब तक आसानी से कुम्भक की स्थिति में रह सकें रहें, हठपूर्वक न करें |

जालन्धर बन्ध करने का समय व अवधि :
प्रातः एवं सायं भोजन के पूर्व इस बन्ध को करना चाहिए | प्रारंभ में तीन बार करें तत्पश्चात धीरे-धीरे क्रम को बढाकर 21 बार तक ले जाना चाहिए |

चिकित्सकीय लाभ : 

  • जालन्धर बन्ध गले के समस्त रोगों जैसे- टॉन्सिल, आवाज खराब होना आदि का नाश करता है |
  • यह बन्ध थायरायड एवं पैराथायरायड ग्रन्थियों की क्रियाशीलता बढ़ाकर हार्मोन्स के स्राव को सन्तुलित करता है | जिससे शरीर का मेटाबालिज्म ठीक रहता है |
  • जालन्धर बन्ध से चेहरे पर भी चमक आ जाती है। स्फूर्ति,उत्साह,एवं यौवन को बनाये रखता है |
  • इस बन्ध के अभ्यास से हाई ब्लडप्रेशर और लो ब्लडप्रेशर दोनों ही सामान्य हो जाते हैं। 
  • जालन्धर बन्ध से क्रोध का नाश होता है एवं मष्तिस्क तरोताजा रहता है |

 आध्यात्मिक लाभ : 

  • जालन्धर बन्ध से  विशुद्ध चक्र  जाग्रत होता है |
  • यह मुद्रा कुण्डलिनी शक्ति को जगाने में बहुत ही सहायक है। 
  • जालन्धर बन्ध सिद्ध हो जाने पर योगियों के लिए कोई भी सिद्धि पाना कठिन नही रह जाता है |