By- Dr. Kailash Dwivedi
नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट के अनुसंधानों से सिद्ध होता है कि देश के जिन भागों में देशवासी सूर्य के प्रकाश के अधिक संपर्क में होते हैं, उनमें स्तन, आंत, गर्भाशय, उदर एवं कई अन्य प्रकार के कैंसर होने की संभावना अत्यंत कम होती हैं। सूर्य की किरणों में जो पैराबैंगनी किरणें होती हैं, उनमें कई प्रकार के रोगाणुओं को नष्ट करने की क्षमता होती है। वस्तुत: सूर्य के प्रकाश के संपर्क की कमी से कई प्रकार के त्वचा संबंधी रोग होने की प्रबल संभावना बनी रहती है। विशेषरूप से सूर्योदय के एक घंटा तक और इसी प्रकार सूर्यास्त के एक घंटे पहले का समय, सभी के लिए सूर्य के सामने उपस्थित रहने का आदर्श समय माना जाता है, लेकिन प्रारंभिक अवस्था में सूर्ययोग के अभ्यास से इसके समय को बढ़ाया और निर्धारित किया जाता है।
सूर्ययोग अत्यंत उच्चकोटि और तीव्रतम गति का मार्ग है, जो आत्मसाक्षात्कार एवं मुक्ति के कठिन लक्ष्यप्राप्ति का अत्यंत सरल साधन है, न्यूनतम समयावधि में निश्चित परिणाम देनेवाली अत्यधिक सरल विधि है। मानव का अपनी काया के पोषण हेतु ठोस द्रव तथा गैस के स्वरूप में आहार ग्रहण करना आदि है, किंतु अग्नि या प्रकाश के रूप में आहार ग्रहण करने के विषय में विचार नहीं किया गया है। मानव जाति ने यह ज्ञान प्राप्त नहीं किया है कि प्रकाश ऊर्जा को जीवन पोषण हेतु कैसे प्रयोग किया जाए। जब तक मनुष्य अपनी देह के पोषण हेतु ठोस द्रव व गैस आहार तक सीमित रहेगा, उसकी समझ भौतिक जगत की ही सीमाओं तक सीमित रहेगी। ब्रह्मांड के अनबूझे रहस्यों के ज्ञान प्राप्ति की योग्यता प्राप्ति हेतु मनुष्य को अपने मस्तिष्क का पोषण प्रकाश जैसे उच्चकोटि के वैकल्पिक ऊर्जा भंडार से करना सीखना होगा।
क्या होता है,जब मानव शरीर सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आता है
प्राकृतिक सूर्यप्रकाश के सेवन से रक्त में श्वेत रक्तकणिकाओं की संख्या में वृद्धि होती है। लिम्फोसाईट श्वेतरक्त कणिकाओं का करीब चौथाई प्रतिशत होता है। यह इंटरफेरोन नामक रस का निर्माण करता है, जो रोगाणुओं की वृद्धि रोक देता है। जब मानव शरीर सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आता है तो लिम्फोसाईट की संख्या में पर्याप्त वृद्धि होती है। सूर्य का प्रकाश मधुमेह रोगियों हेतु अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि शरीर से सूर्य के प्रकाश का संपर्क रक्त में शर्करा की मात्रा को चमत्कारिक रूप से कम कर देता है। सूर्य योगियों के शरीर पर किये गए अध्ययन से यह तथ्य प्रकट हुआ है कि उनकी पिट्यूटरी हारमोन ग्रंथि में सामान्य मनुष्यों की तुलना में आकार में दोगुने तक वृद्धि हो जाती है। पिट्यूटरी मुख्य हारमोन ग्रंथि है, जो शरीर की अन्य हारमोनि ग्रंथियों को नियंत्रित करती है और शरीर को सुचारूरूप से कार्यरत रखने हेतु उत्तरदायी होती है।जो हृदयरोगी सूर्ययोग का अभ्यास करते हैं, उनके सीरम, कोलेस्ट्राल एवं ट्रिग्लीसेराईड के स्तर में उल्लेखनीय कमी आने लगती है तथा हृदय की आक्सीजन शोषण की क्षमता में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है। हृदय एवं मुख्य धमनियों की दीवारें शक्ति से पूरित होने लगती हैं। हृदय की क्षमता बढ़ने लगती है।
ओस्टियोपोरेसिस तथा स्वत: हड्डियां टूटने के रोगीजनों को सूर्ययोग का आश्चर्यजनक लाभ होता है और वे इस रोग की भीषणता से सर्वदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।
सूर्य की किरणों में ईथर के कणों की शक्ति विद्यमान होती है, जो हमारे प्राणमय शरीर को पुष्ट बनाती है। प्रात:काल निरंतर सूर्य के प्रकाश के संपर्क में रहने से ऋणात्मक प्रवृत्तियां जैसे क्रोध, अहंकार, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, मानसिक अवसाद इत्यादि अवगुण स्वत: समाप्त होने लगते हैं तथा हमारे स्वभाव में प्रेम, दया सद्भावना, सौहार्द, शांति, आनंद, स्वीकार्यता, सहानुभूति इत्यादि सहज सद्गुणों का समावेश होना आरंभ हो जाता है। पश्चिम के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ नोरमान रोसेंथाल के अनुसार-सूर्य के प्रकाश में मानसिक अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति से मुक्त होने की अद्भुत क्षमता है। तनाव नियंत्रण तथा मनोरोगों से मुक्ति हेतु सूर्य का प्रकाश अत्यंत प्रभावी सहायक है।
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