Wednesday, January 4

कुण्डलिनी महाशक्ति क्या है ?







योग के अभ्यास से जो अनेक प्रकार की शक्तियां  प्राप्त होती है, उन सभी का सम्बंध कुण्डलिनी शक्ति से है। योगशास्त्रों में इस कुण्डलिनी शक्ति का स्थान मूलाधार चक्र बताया गया है। मूलाधार चक्र में यह शक्ति सोई हुई अवस्था में रहती है तथा योग के द्वारा जब कोई व्यक्ति इस शक्ति को जगाता है, तब उसे विभिन्न प्रकार की दिव्य शक्तियां प्राप्त होती है।

शरीर में कुण्डलिनी शक्ति कहाँ पर है ?

गुह्य देश से 2 अंगुली ऊपर और लिंग मूल से 2 अंगुली नीचे ´मूलाधार चक्र´ में यह कुण्डलिनी शक्ति सुप्तावस्था में स्थित होती है। योग में कुण्डलिनी का वर्णन करते हुए कहा गया है-

पश्चिमोभिमुखी योनिर्गुद मेढ़ान्तरालगा।तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ते कुण्डलिनी सदा।।संवेष्टा सकला नाड़ी: सार्ध-त्रि कुटिल्याकृत:।मुखे निवेश्य सा पुच्छ: सुषुम्ना-विवरे स्थिता।।

गुदा और लिंग के बीच में पीछे की ओर मुंह करके स्थित ´योनि मण्डल´ है। इस योनि मण्डल को ´कन्द´ भी कहते हैं। इसी ´कन्द´ के बीच में कुण्डलिनी शक्ति सभी नाड़ियों को लपेट कर साढ़े 3 बार गोलाकर घूमकर सर्प की तरह अपनी पूंछ को मुंह में डालकर सुषुम्ना मार्ग को रोककर सोई हुई अवस्था में स्थित रहती है। जब यह ´मूलाधार´ चक्र से जागृत होती है, तो यह एक-एक करके स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध तथा आज्ञा चक्र समेत 6 चक्रों को जागृत करती हुई सहस्त्रार में पहुंच जाती है।

ब्रह्माण्ड में जितनी शक्ति मौजूद है, उन सभी शक्तियों को भगवान ने मनुष्य के शरीर रूपी ´पिण्ड´ के मूलाधार में एकत्रित कर दिया है। परंतु सुषुम्ना नाड़ी का मुख त्रिकोण ´योनि मण्डल´ के बीच स्थान पर है, जहां से मेरूदण्ड के भीतर से होती हुई ऊपर की ओर चलती है। साधारण अवस्था में सुषुम्ना बन्द रहती है, जिसमे कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई अवस्था में रहती है। प्राणावायु केवल सुषुम्ना के दाएं और बाएं से ऊपर की ओर जाती हुई ´इड़ा´ और ´पिंगला´ नाड़ी से होते हुए चक्रों को स्पर्श करती हुई ऊपर जाती है। जिससे प्राणवायु पूरे शरीर में हमेशा प्रवाहित होता रहती है।इसी त्रिकोण ´योनिमण्डल´ में एक अति सूक्ष्म विद्युत के समान दिव्य शक्ति वाली नाड़ी लिपटी हुई है जिसे सर्पिण या कुण्डलिनी कहते हैं। यह नाड़ी जब तक सोई हुई अवस्था में रहता है, तब तक कोई भी शक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती। इस जागृत करने के लिए योग साधना करना पड़ती है। इसके जागरण के बिना शरीर के द्वारा होने वाले अनेक कार्य बाहर से दिखाई नहीं देता।


कुण्डलिनी महाशक्ति के विषय में वैज्ञानिक और योग गुरूओं के मत :


अनेकों योग गुरूओं ने अपने अन्दर इस शक्ति को वास्तविक रूप से अनुभव किया है। कुण्डलिनी शक्ति को विज्ञान भी मानता है, परंतु यह शक्ति दिखाई न देने के कारण विज्ञान इस बात को स्पष्ट नहीं कर पाता  कि क्या कुण्डलिनी शक्ति है? आज के शरीर वैज्ञानिक (फिजियोलोजिस्ट) अभी तक इस बात को जान नहीं पाएं हैं कि प्राचीन यूनान, रोम आदि देशों के तत्व ज्ञाता शरीर के अन्दर मौजूद इन शक्तिओं से परिचित थे या नहीं।प्लोटों और पिथागोरस जैसे आत्मदर्शी (आत्मा को जानने वाले) विद्धानों ने शरीर के इन शक्तियों के बारे में इस तरह लिखा है-नाभि के पास एक ऐसी अदभुत शक्ति मौजूद है, जो किसी साधना के द्वारा जागृत होकर मस्तिष्क में पहुंच जाती है और मस्तिष्क में तीव्र बुद्धि का विकास करती है, जिससे मनुष्य के अन्दर दिव्य शक्तियां उत्पन्न होने लगती है। यह शक्ति कोई अन्य वस्तु नहीं बल्कि कुण्डलिनी शक्ति होती है। कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर ही मनुष्य परमात्मा के सूक्ष्म स्वरूप का दर्शन कर पाता हैं तथा वह संसार में अनेक प्रकार के चमत्कारी कार्यो को करने में सफलता प्राप्त करता है।

कुण्डलिनी शक्ति के विषय में कहा गया है कि यह एक महान शक्ति है जो मनुष्य के शरीर की नाभि में स्थित सूर्य चक्र में सुप्तावस्था में रहती है। आज के समय में यह सौभाग्य ही है कि लोग कुण्डलिनी शक्ति के विषय में चेतना विज्ञान के रूप में जानने की इच्छा रखते हैं। योग ऋषियों ने कुण्डलिनी को अदृश्य और चमत्कारिक शक्ति कहा है। परंतु कुण्डलिनी शक्ति का अध्ययन एवं विश्लेषण करें तो पाएंगें कि इसका सम्बंध भौतिक शरीर से भी है, क्योंकि कुण्डलिनी शक्ति को जगाने के लिए स्थूल शरीर में स्थित चक्रों का  सहारा लिया जाता है। कुण्डलिनी शक्ति रूपी चेतना को शिव और आधार को शक्ति कहा गया है। 


गोरक्ष ऋषि के अनुसार :

षट्चक्रं शोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योम पंचकम्।स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्धयन्ति योगिन:।।

गोरक्ष ऋषि के अनुसार शरीर में मौजूद चक्रों (7 चक्र), 16 आधारों, 3 लक्ष्यों और 5 शरीर पंचकोशों के ज्ञान के बिना योगाभ्यास कर पाना सम्भव ही नहीं है। 

योग में जिस कुण्डलिनी शक्ति व चक्रों को बताया गया है, उसे आज के वैज्ञानिक तरीके से शरीर को काटकर उसका अध्ययन करने की कोशिश की जा रही है परंतु इससे वैज्ञानिकों को शास्त्रों में बताए गए स्थान पर चक्र या कुण्डलिनी आदि कुछ भी प्राप्त नहीं होता। परंतु शास्त्रों में इसका वर्णन बहुत गम्भीर और महत्वपूर्ण ढ़ंग से किया गया है। इसलिए शरीर में मौजूद सूक्ष्म शक्ति तथा चक्रों के शरीर पर अधिकार को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। प्राचीन योग विज्ञान के द्वारा बताये गये शरीर की रचना तथा समाधि के द्वारा प्राप्त होने वाले सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों का ज्ञान प्राप्त करने में आज के शरीर-रचना-विज्ञान अभी भी असमर्थ हैं। शरीर में मौजूद दिव्य शक्ति व चक्र अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण इसे बाहर आंखों से या यंत्रों की सहायता से देख पाना सम्भव नहीं है। आज के विज्ञान के आधार पर जिसका ज्ञान शरीर-रचना-विज्ञान शास्त्र को प्राप्त नहीं है, वह नहीं है, ऐसे कहना बिल्कुल गलत है।योग शास्त्रों में चक्र और कुण्डलिनी शक्ति के आधार पर ही योगाभ्यास और योग क्रिया आदि का निर्माण किया गया है। अत: योग शास्त्रों में वर्णित इन शक्ति व चक्रों को काल्पनिक और अस्तित्वहीन कहना अज्ञानता है।

अष्टांग योग की साधना विधि से समाधि अवस्था प्राप्त करने से योगी को समाधि प्रज्ञा प्राप्त होती है। मनुष्य के अन्दर यह शक्ति उत्पन्न होने से उसे दिव्य ज्योति अर्थात दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है। योग के द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त होने के बाद ही व्यक्ति शरीर के आंतरिक सूक्ष्म अंगों को देख पाने में समर्थ होता है। ध्यान के द्वारा ही योगी अन्नमयकोश में स्थित शक्ति केन्द्र को जागृत करके योग के मार्ग में अत्यधिक ऊंचाई तक पहुंच सका है। इस शक्ति को प्राप्त करने के लिए और इसके द्वारा शरीर को अत्यधिक प्रभावित करने के लिए योग शास्त्रों में शोधन क्रिया, आसन, मुद्रा तथा प्राणायाम की क्रिया को बनाया गया है। इन क्रियाओं के अभ्यास से योग मार्ग पर चलते हुए समाधि आदि दिव्य शक्ति को प्राप्त करना आसान हो जाता है।

योग के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति के जागृत करने पर यह ऊर्जा शक्ति सुषुम्ना से होते हुए अपने रास्ते में आने वाले सभी चक्रों का भेद (जागृत) करते हुए अंत में सहस्त्रार में पहुंचकर शिव में लीन होकर स्वयं शिव रूप हो जाती है। 
कुण्डलिनी शक्ति को अग्नि व सूर्य के समान बताया गया है। शरीर में कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होने पर अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होती है। कुण्डलिनी जागरण योग साधना के द्वारा किया जाता है और इस शक्ति को स्थाई रखने के लिए हमेशा अभ्यास और पवित्र भावनाओं की आवश्यकता पड़ती है। हमेशा योगाभ्यास करने से यह शक्ति सुषुम्ना से होकर सभी चक्रों में ऊपर की ओर प्रवाहित होती रहती है। अगर नियमित अभ्यास न किया जाए तो शक्ति ऊपर के चक्रों से उतरकर पुन: निम्न चक्र मूलाधार में स्थित हो जाती है। इसके निरंतर अभ्यास से कुछ शक्तियां अपने आप ही प्राप्त हो जाती है। इन शक्तियों को प्राप्त करने के बाद व्यक्ति को अहंकार, क्रोध, लोभ आदि नहीं करना चाहिए तथा अपनी साधना से प्राप्त शक्ति को गुप्त ही रखना चाहिए।

कुण्डलिनी जागरण होकर आध्यात्मिकता की प्राप्ति होती है। योग में कहा गया है कि कुण्डलिनी शक्ति वशिष्ठ में रसिकता भाव संवेदना आदि अनेक कलाओं के रूप में विकासित होते हुए जीवन को अच्छा बना देती है। कुण्डलिनी शक्ति के जागरण का प्रभाव पूरे शरीर पर दिखाई देने लगता है तथा व्यक्ति को आलौकिक शक्ति का अनुभव होने लगता है। चेहरे पर चमक व तेज दिखाई देने लगता है। 

मनुष्य के अन्दर कुण्डलिनी जागरण होने के बाद उसके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं रहता। अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति ´यद् ब्रह्माडे तत् पिण्डे´ के अनुसार होती है। ध्यान के द्वारा अपने मन को अन्तर आत्मा में लगाना और अपनी अतिन्द्रिय शक्ति को जागृत कर कल्पना करना की विश्व का निर्माण जैसा हुआ है, वैसे ही हमारे शरीर का भी निर्माण हुआ है। इस तरह की इच्छा रखते हुए व्यक्ति अनेक चमत्कारों से परिपूर्ण हो जाता है। इस शक्ति के जागरण से ही समस्त सिद्धियां प्राप्त होती है। इस चमत्कारी विद्या को जानने के बाद पतंजलि ´योग दर्शन´ में वर्णित समस्त विभूति, परिचित ज्ञान, पूर्व जन्म का ज्ञान, दूर स्थित वस्तुओं के बारे में जानने वाला, दूरदर्शी (भविष्य को जानने वाला) ज्ञान, सभी लोकों का ज्ञान, तारा-ग्रहों का ज्ञान, शरीर का ज्ञान, भूख-प्यास को रोकना तथा हवा में उड़ना आदि का ज्ञान, साधना पाद में विर्णत अहिंसा भाव, पृथ्वी के रत्नों का प्रकट होना, मैत्री, इष्ट साक्षात्कार तथा समाधि आदि योग साधना अपने आप प्राप्त हो जाता है।

नाक के बाईं छिद्र से ´इड़ा´ नाड़ी चलती है, जिसे चन्द्र नाड़ी कहते हैं। इसका रंग शुभ होता है। नाक के दाएं छिद्र से ´पिंगल´ नाड़ी चलती है, जिसे सूर्य नाड़ी कहते हैं। इसका रंग खून की तरह होता है। इन दोनों नाड़ियों की वक्रगति से 5 चक्र बनते हैं अर्थात दोनों नाड़िया जहां आपस में मिलती है, वहां चक्र बनते हैं। जब यह दोनों नाड़ियां समान गति से चलती है, तब सुषुम्ना नाड़ी में इन दोनों नाड़ियों का लय होता है। दोनों के मिलने वाले स्थान पर जब वायु का दबाव पड़ता है, तब कुण्डलिनी जागृत होकर सुषुम्ना में प्रवेश करती है। कुण्डलिनी सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करके सहस्त्रार चक्र में पहुंचकर जब शांत हो जाती है तब उस अवस्था को तंत्र योग में समाधि कहते हैं। समाधि तभी प्राप्त होती है, जब व्यक्ति अपने अन्दर की संसारिक वस्तुओं की इच्छा को छोड़ देता है। व्यक्ति का मन शून्य होने पर कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना नाड़ी से होते हुए सहस्त्रार में जाकर समाधि की स्थिति प्राप्त कराती है।कुण्डलिनी जागरण योग की परम सिद्धि है और इन सिद्धियों को प्राप्त करना आसान नहीं है। परंतु योग पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति श्रद्धा, विश्वास, धैर्य तथा गुरू की सहायता से कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने में सफलता प्राप्त कर पाते हैं। ऐसे सभी व्यक्ति जिनमें एक खास प्रकार के चमत्कारी गुणों को देखा जाता है, वे सभी किसी न किसी चक्र से प्रभावित रहते हैं अर्थात उससे सम्बंधित चक्र का उसमें जागरण हुआ होता है। जैसे मूलाधार चक्र से प्रभावित बच्चे अपनी असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहते हैं तथा स्वाधिष्ठ चक्र से प्रभावित व्यक्ति वीर, राजा, काल तथा साहित्य प्रेमी होते हैं। इसी प्रकार मणिपूर चक्र से प्रभावित व्यक्ति धर्म-अधर्म को समझने वाले, दानी, परोपकारी तथा कर्त्तव्य परायण होते हैं। अनाहत चक्र से प्रभावी व्यक्ति राजयोगी एवं स्थिर प्रज्ञा होते हैं। योग शास्त्रों में कुण्डलिनी शक्ति की प्राप्ति करने से पहले गुरू के द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हुए योग के अष्टांग यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि के ज्ञान तथा अभ्यास द्वारा सफलता प्राप्त होने के बाद ही कुण्डलिनी शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है।

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