Wednesday, February 3

कपालभाति प्राणायाम

By- योगगुरु सुनील सिंह 



 Yoga guru suneel singh is one


of the to 5 yoga gurus in India.






प्राणवायु के बिना जीवन संभव नहीं है। मनुष्य के शरीर में स्थित प्राण ही उसे आरोग्य व स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। “प्राणायाम” प्राणवायु को नियंत्रित करने की प्रक्रिया है। प्रस्तुत पुस्तक में लेखक का उद्देश्य पाठक को योगासन एवम् प्राणायाम के विभिन्न पक्षों पर विस्तृत जानकारी प्रदान करने का है, आसनों की विस्तृत जानकारी के उपरान्त अब हम प्राणायाम का विस्तारपूर्वक वर्णन करेंगे। हाँलाकि योग-शास्त्रों में कई प्रकार के प्राणायाम के संदर्भ में बताया गया है, लेकिन हम केवल उन्हीं प्राणायाम के बारे में जानकारी दे रहे हैं जो कि चलन में है। यह प्राणायाम निम्नवत् हैं; क्योंकि....
1. कपालभाति प्राणायाम
2. नाड़ी शोधन प्राणायाम
3. शीतली प्राणायाम
4. भ्रामरी प्राणायाम
5. सूर्यभेदी प्राणायाम
6. उज्जाई प्राणायाम
7. भस्तिका प्राणायाम
8. चन्द्रभेदी प्राणायाम

कपालभाति प्राणायाम :



कपाल माने माथा और भाति का अर्थ है रोशनी, ज्ञान व प्रकाश। योगियों ने कहा है कि इस प्राणायाम से हमारे मस्तिष्क या फिर सिर के अग्र भाग में रोशनी प्रज्जवलित होती है और हमारे अग्र भाग की शुद्धि होती है। कपालभाति प्राणायाम षटकर्म की क्रिया के अर्न्तगत भी आता है। इसे कपाल शोधन प्राणायाम भी कहा जाता है।

विधि :




  • ज़मीन पर पद्मासन या फिर सुखासन की अवस्था में बैठे फिर पूरे बल से नासिका से साँस को बाहर फेंके, श्वास को लेने का प्रयास न करें, श्वास स्वतः आ जाएगा।

  • जब हमारा श्वास बाहर निकलेगा उसी समय हम अपने पेट का संकुचन करेंगे।

  • पहले धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें, उसके बाद धीरे-धीरे श्वास छोड़ने और पेट के संकुचन की गति बढ़ा दें।

  • शुरू-शुरू में नये अभ्यासी कम से कम 20 चक्रों का अभ्यास करें।

  • एक सप्ताह उपरांत 50 चक्रों तक अभ्यास को बढ़ा दें।

  • ध्यान रहे कमर और गर्दन सीधी हो, आँखें बन्द (या खोलकर भी अभ्यास कर सकते है) हो। दोनों हाथ ज्ञान मुद्रा में हो।



लाभ व प्रभाव :




  1. इस प्राणायाम के अभ्यास से नाक, गले एवम् फेफड़े की सफाई होती है, चेहरे पर कांति, लालिमा और ओजस्व आता है।

  2. इसे करने से चेहरे की झुर्रियाँ, दाग, फुन्सी आदि दूर होते हैं।

  3. कपालभाति प्राणायाम से ईडा नाड़ी और पिंगला नाड़ी की शुद्धि होती है।

  4. दमा, तपेदिक, टाईसिल / टाउंसिल आदि के विकार दूर हो जाते हैं।

  5. महिलाओं में गर्भाशय के विकार, मासिक धर्म सम्बंधी कठिनाई और गर्भाशय जनित दोष दूर होते है।

  6. यह प्राणायाम पाचन संस्थान को मजबूत बनाता है तथा नर्वस सिस्टम में संतुलन लाता है।

  7. इससे कपाल की नस-नाड़ियों की शुद्धि होती है, इसलिए इसके अभ्यास से ध्यान की एकाग्रता बढ़ती है, जिससे व्यक्ति तनावमुक्त होता है।



सावधानियाँ :



हृदय रोगी, उच्च रक्तचाप के रोगी, मिर्गी स्ट्रोक, हार्निया और अल्सर के रोगी तथा गर्भवती महिलाएं इसका अभ्यास ना करें।

विशेष :



चक्कर आने या फिर सरदर्द की स्थिति में कुछ देर आराम करें और पुनः इसका अभ्यास करें। इसे करते हुए हर दिन कम से कम 15 गिलास पानी अवश्य पियें।

No comments:

Post a Comment