By - Yogaguru Suneel Singh
उज्जाई प्राणायाम का अर्थ ऊपर उठने से लिया गया है, या फिर इसका अर्थ विजय प्राप्त करने से लिया गया है। जिस प्राणायाम के अभ्यास के द्वारा साधक सुगमता से विजय प्राप्त कर ले उसे उज्जाई प्राणायाम कहते हैं।
विधि :
- पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं। कमर, गर्दन, पीठ बिल्कुल सीधी हो। दोनों हाथ की अंगुलियों को ज्ञान मुद्रा में दोनों घुटने पर रखें।
- साँस की गति को सामान्य रखते हुए मस्तिष्क के विचारों को शांत करें, फिर आँखें बंद कर लें। उसके बाद कंठ को संकुचित करके जीभ को उलटकर इसकी नोंक को तालू से लगाए। यह कहलाती है “खेचरी मुद्रा
- अब दोनों नासिका छिद्र से धीरे-धीरे श्वास लें और गले में घर्षण करते हुए श्वास अंदर ले जाएं, इसको आवाज़ के साथ करें।
- कुछ देर साँस अपनी क्षमतानुसार रोक कर फिर दाहिने नासिका छिद्र को दायें हाथ के अंगूठे से दबाएं और फिर कंठ का संकुचन करते हुए बायें नासिका छिद्र से धीरे-धीरे श्वास बाहर निकालें।
- यह इस प्राणायाम का एक चक्र पूरा हुआ, कम से कम 10 चक्रों का अभ्यास अवश्य करें।
लाभ व प्रभाव :
- उज्जाई प्राणायाम से गलकण्ड, कंठ-माला, टाँसिल जैसे रोग दूर हो जाते हैं।
- थायराईड पैरा-थायराईड पर प्रभाव डालता है।
- कफ़ दोष, तपेदिक और प्लीहा के रोग दूर हो जाते हैं।
- कंठ, फेफड़ा, नाक, कान, गले आदि के लिए राबामाण का काम करता है।
- सर्दी, जुकाम, निम्न-रक्तचाप के लिए भी लाभकारी प्राणायाम है।
सावधानियाँ :
हृदय रोगी और दूषित वातावरण में इसका अभ्यास न करें।
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