गति ही जीवन है | शरीर की संधियाँ, उनकी मांसपेशियां, कंडरा, स्नायु आदि मुख्य रूप से हमें चलने-फिरने में सहायता करते हैं | इन अंगों में किसी भी प्रकार की चोट दर्द का कारण बन सकती है | करोड़ों व्यक्ति संधिशोथ के अत्यधिक दर्द व उससे सम्बंधित रोगों के लक्षणों जिसमें प्रदाह, सूजन, लालिमा, दर्द एवं जकड़न से पीड़ित हैं | यद्यपि संधिशोथ के सौ से भी अधिक प्रकार माने गए हैं पर उनमे से अस्थिसंधिशोथ, आमवात एवं गठिया मुख्य हैं |
संधिशोथ के कारण क्या हैं ?
आर्थराइटिस शब्द ग्रीक भाषा के शब्द 'आर्थोन' जिसका अर्थ है जोड़ तथा 'आइटिस' जिसका अर्थ है प्रदाह, से मिल कर बना है | आर्थराइटिस का अर्थ है जोड़ों का प्रदाह, जो रोगों के एक समूह से सम्बंधित होता है | जिसके कारण दर्द, सूजन, जकड़न बढ़ जाती है तथा जोड़ों की गति कम हो जाती है | जोड़ों के किनारे सूज जाते हैं जिससे स्नायु भी खिंच जाते हैं और जोड़ों की स्थिरता व शक्ति में कमी आ जाती है | 100 से अधिक आमवात रोगों के सन्दर्भ में प्रायः सबसे अधिक प्रयोग में लाया जाने वाला शब्द संधिशोथ है | कुछ प्रकार के संधिशोथ रोग जीवाणु, विषाणु, चोट अथवा सोडियम युरेट कणों के कारण उत्पन्न होते हैं |
1. अस्थिसंधिशोथ :
अस्थिसंधिशोथ साधारणतया 50 वर्ष की उम्र के बाद होता है | अस्थिसंधिशोथ इसलिए होता है क्योंकि जोड़ों को ढके रहने वाली सुरक्षात्मक गद्दी उपास्थि (कुशनी कार्टिलेज) कमजोर होकर घिस जाती है परिणामस्वरूप हड्डियाँ आपस में रगड़ खाने लगती हैं | इस घर्षण के कारण जोड़ों में दर्द व सूजन हो जाती है | यह स्थिति तब और असहनीय हो जाती है जब उपास्थि (कार्टिलेज) और अधिक क्षतिग्रस्त हो जाती है | अस्थिशोथ सामान्यतः हाथों, नितम्ब, घुटनों एवं रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करता है तथा बढती उम्र के साथ स्थिति बिगड़ती चली जाती है |
घुटने के जोड़ की संरचना एवं कार्यप्रणाली :
शरीर के जोड़ों में घुटना ही सबसे ज्यादा वजन को वहन करता है | जंघा की निचली हड्डी (उरुअस्थि) के छोर से जो पिण्डली की हड्डी के ऊपरी छोर पर टिकी होती है व आगे पीछे गति करती है और घुटने की टोपी (जान्वस्थि अर्थात घुटने की चौड़ी हड्डी) जंघा की निचली हड्डी (उरुअस्थि) के छोर पर एक खांचे में सरकती है | बड़े स्नायु जंघा की निचली हड्डी (उरुअस्थि) एवं टिबिया में जुड़े होते हैं जो इन्हें स्थिरता प्रदान करते हैं | जंघा की लम्बी मांसपेशियां घुटने को चलने हेतु शक्ति प्रदान करती हैं | जोड़ों की ऊपरी सतह आर्टिक्युलर उपास्थि (कार्टिलेज) से ढकी होती है, जो एक मुलायम ऊतक से ढकी होती है |घुटने की शेष सतह भी एक मुलायम ऊतक से ढकी होती है, जिसे श्लेष्मा कला कहते हैं | एक स्वस्थ्य घुटने में यह कला (झिल्ली) एक विशेष प्रकार का स्राव करती है जो घुटने को चिकनाई प्रदान कर उसे घर्षण से बचाता है |
घुटने के अत्यधिक प्रयोग, जोड़ों की पुरानी चोट या सूजन से हुयी किसी भी प्रकार की क्षति से घुटने की कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे कार्टिलेज क्षतिग्रस्त हो जाती है, उपास्थि (कार्टिलेज) का निचला भाग मोटा हो जाता है व किनारों की हड्डी के बढ़ जाने से विकृति आ जाती है |
अस्थिसंधिशोथ के कारण :
- जीवन शैली : भाग दौड़ वाली जिन्दगी शीघ्र बुढ़ापे की ओर ले जाती है |
- मोटापा
- आनुवंशिक प्रवृत्ति
- जोड़ों की गुम चोट से हुयी क्षति
जोखिम कारण (रिस्क फैक्टर)
- मोटापा
- आनुवंशिक
- 70 वर्ष से अधिक आयु के 75 प्रतिशत लोग अस्थिसंधिशोथ से पीड़ित हैं |
- व्यायाम का आभाव
- गुम चोट
- रजोनिवृत्ति
चिकित्सकीय तथ्य : अस्थिसंधिशोथ -लक्षण एवं पहचान
- हिलाने-डुलाने से जोड़ों में दर्द
- दिन के समय दर्द का ज्यादा पीड़ादायी होना
- प्रातः कम अकडन
- जोड़ों को हिलाने-डुलाने की क्षमता में कमी
- जोड़ों में अस्थिरता
- हड्डी का बढ़ जाना
- चलना-फिरना सीमित हो जाना
- जोड़ों में कड़कड़ की आवाज होना
- जोड़ों में सूजन कम ज्यादा होना और/ अथवा अस्थिरता
2. संधिशोथ (गठिया):
आमवातज संधिशोथ जोड़ों के दर्द में सबसे सामान्य है जो वयस्कों को प्रभावित करता है | अनुमानतः 0.25 - 0.5 प्रतिशत वयस्क व्यक्ति इस रोग से प्रभावित हैं | मधुमेह और उच्चरक्तचाप की तरह यह एक जीर्ण रोग है | आमवातज संधिशोथ विकलांगता, जोड़ों की निष्क्रियता, काम करने की असमर्थता आदि का एक प्रमुख कारण है | यदि इसका उपचार प्रारंभ से ही उचित ढंग से न किया जाये तो अपंगता जैसी विकृति आ जाती है तथा कुछ रोगी तो बिस्तर ही पकड़ लेते हैं |
3. आमवात संधिशोथ के कारण :
आमवात संधिशोथ के सही कारण अभी तक ज्ञात नही है | यह रोग किसी एक विशेष कारण से उत्पन्न नहीं होता | वतावरणीय एवं अनुवांशिक कारणों आदि का सम्मिश्रण एवं मानसिक तनाव जो रोगों से लड़ने की क्षमता को असामान्य बनाते हैं |
चिकित्सकीय तथ्य : आमवात संधिशोथ -लक्षण एवं पहचान
- जोड़ों की पीड़ा एवं कार्यप्रणाली सीमित होना
- प्रातःकालीन अकड़न
- सूजन, लालिमा एवं गरमाहट
- जोड़ों में कोमलता एवं प्रदाह
- जोड़ों के दर्द में एकरूपता
- गठियारूप गांठें
संधिशोथ की योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा :
संधिशोथ (जोड़ों के दर्द) का प्रबंधन पंचकोश के सभी पांच स्तरों पर किया जाता है |
अन्नमय कोश :
जोड़ों को शिथिल (ढीला) करने वाले व्यायाम जैसे सूक्ष्म व्यायाम, आसन, शिथिलीकरण (विश्राम) तकनीक, तत्काल,तत्क्षण एवं गहन शिथिलीकरण तकनीक तथा जलनेति, सूत्रनेति क्रियाएं |
प्राणमय कोश :
नाड़ीशोधन प्राणायाम, सूर्यभेदी प्राणायाम एवं भ्रामरी प्राणायाम, प्राण चिकित्सा विधि |
मनोमय कोश :
ॐ ध्यान, नादानुसंधान, प्रार्थना |
विज्ञानमय कोश :
वैचारिक सुधार एवं यौगिक परामर्श |
आनंदमय कोश :
तनाव से भरी हुयी कार्यशैली को बदलकर आनंद के साथ नवीन शैली से कार्य करें |
- प्राकृतिक चिकित्सा के उपचार में दीर्घ उपवास और समय-समय पर गुनगुने जल में नींबू, शहद, गाजर का रस, कच्चे आलू के रस पर उपवास करना चाहिए |
- नियमित रूप से सामान्य शाकाहारी आहार लें विशेषकर प्राकृतिक आहार जो कच्चा, फाइबर से भरपूर व कम कैलोरी का हो |
- जब जोड़ों में प्रदाह (सूजन) हो तो बर्फ से सेंक करें और जब प्रदाह न हो तब गर्म पानी की थैली से |
- सभी जोड़ों की मालिश के साथ जोड़ों पर इन्फ्रारेड का प्रयोग करें |
- भाफ स्नान, जोड़ के स्थान पर स्थानीय भाफ की सिंकाई और उसके बाद ठंडी पट्टी रखें |
- ठंडी एवं गर्म पट्टियाँ, ठंडी व गरम गीली पट्टी, इप्सम सॉल्ट डालकर सामान्य पूर्ण टब स्नान आदि करें |
- एक्यूपंचर एवं एक्यूप्रेशर, सरसों का लेप (मस्टर्ड पैक), मिटटी की पट्टी व प्राकृतिक जीवनशैली अपनाने से प्रदाह एवं रोग को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है |
संधिशोथ के रोगी के लिए दैनिक कार्यक्रम :
प्रातः 5.00 से 6.00 बजे
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खाली पेट दो गिलास पानी पियें (उषापान) दैनिक गतिविधियाँ, बताये गए आसन, प्राणायाम, ध्यान एवं जोड़ों के व्यायाम करें |
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प्रातः 7.00 से 8.00 नाश्ता
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मौसमी फल – सेब/ नाशपाती/ चीकू/ केला/ अमरुद | सूखे मेवे – किशमिश/अंजीर/ अंकुरित अन्न – मूंग, गेहूं आदि | सब्जियों के सूप/ रागी का दलिया | जैसे पदार्थ को शामिल करें |
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प्रातः 11.00 से 12.00 दोपहर का भोजन
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कन सहित चावल/ रागी की लोई/ मोटे आटे की रोटी/ बाजरा/ रागी की रोटी, कम मसाले व तेल की सब्जियां/ हरी पत्तेदार सब्जियों का सूप/ आंवला + धनिये की चटनी |
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अपराह्न 3.00 से 4.00
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प्रातःकाल के अनुसार जो भी फल पसंद हों/ गाजर का रस/ प्राकृतिक चाय |
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सायं 6.00 से 7.00
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चोकरयुक्त गेहूं के आटे/ रागी/ बाजरे की रोटी, कम मसाले व तेल की सब्जियां/ गेहूं का दलिया + हरी सब्जियों का सूप |
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वर्जित
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आलू, मैदा, वनस्पति घी/ तेल, ठंडे पेय, आइसक्रीम, चीनी, मिठाइयाँ, दूध, अंडा, मांसाहार आदि |
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कम करें
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नमक, तला हुआ भोजन, वसा, दालें, कार्बोहाइड्रेटस |
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आवश्यक सुझाव :
- ठंड से बचें क्योंकि इससे ऐंठन और दर्द बढ़ सकते हैं |
- सूजन की अवस्था में गर्म सेंक एवं अन्य गर्म उपचारों से बचें |
- वायु उत्पन्न करने वाले खाद्य पदार्थों जैसे मीठा आलू, अरबी (रतालू), दलों का सेवन न करें |
- प्रातः उठते ही गर्म पानी से स्नान, जोड़ों की सिंकाई करें ताकि अकड़न खुल जाये |
अस्वीकरण : प्रस्तुत सामग्री का उद्देश्य योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा में प्रयुक्त की जाने वाली आम विधियों की जानकारी देते हुए संधिशोथ के रोगियों को इन पद्धतियों की ओर उन्मुख करना है | संधिशोथ के रोगियों को परामर्श दिया जाता है कि वे अपने लिए उपयुक्त चिकित्सा क्रम का निर्धारण किसी सुयोग्य प्राकृतिक चिकित्सक के मार्गदर्शन में कराएँ |

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