हमारे शरीर का निर्माण पंचतत्वों से हुआ है | यह पंचतत्व हैं - पृथ्वी, जल, अग्नि (धूप), वायु और आकाश | हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका में इन तत्वों का प्रतिनिधित्व है | शरीर की समस्त कोशिकाएं स्वयं को स्वस्थ्य रखने में सक्षम होती हैं पर यह तभी संभव है जब हम प्रकृति के नियमों के अनुरूप जीवन व्यतीत करें | स्वास्थ्य एक वरदान है तथा प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ्य जीवन की कला, जिसे अपनाकर हम अपने जीवन को स्वस्थ्य एवं खुशहाल बना सकते हैं |
पृथ्वी :
- स्वस्थ्य रहने के लिए पृथ्वी के संपर्क में रहना आवश्यक है |
- मिटटी पर नंगे पैरों से चलकर या ओस से भीगी हुयी घास पर टहलकर पृथ्वी से संपर्क का लाभ उठाया जा सकता है |
- यदि संभव हो तो कभी-कभी मिटटी या घास पर लेटना चाहिए | यह शरीर की थकान को दूर उसे पुनः स्फूर्तिवान बनाता है |
जल :
- स्वस्थ्य रहने के लिए पृथ्वी की तरह जल भी अत्यंत आवश्यक है |
- प्रातः उठकर कम से कम आधा लीटर पानी पियें |
- नित्य कम से कम तीन लीटर पानी पियें |
- प्रातःकाल स्वच्छ जल से स्नान करने से शरीर के समस्त रोमछिद्र खुल जाते हैं | इससे शरीर में हल्कापन और स्फूर्ति आती है तथा सभी मांसपेशियां और संस्थान सक्रिय एवं रक्त संचार उन्नत हो जाता है |
- स्नान करते समय साबुन के स्थान पर स्वच्छ चिकनी मिटटी या मुल्तानी मिटटी का भी प्रयोग किया जा सकता है | गर्मियों में सप्ताह में एक-दो रोज यह प्रयोग अवश्य करें | दूध बेसन का उबटन भी उपयोगी है |
- स्नान करने से पूर्व मोटे, खुरदुरे तौलिये से शरीर को रगड़ने के बाद स्नान करना अधिक लाभदायक है |
- जब भी प्यास लगे तब प्यास बुझाने के लिए पानी पीना ही सर्वोत्कृष्ट है |
- पानी को एक साथ न पीकर घूंट-घूंट करके पियें |
- यदि पानी की स्वच्छता में संदेह हो तो उसे उबालकर ठंडा होने पर छानकर पियें |
- भोजन के साथ पानी न पीना श्रेयस्कर है | भोजन के आधा घंटा पहले एवं आधा घंटा पश्चात् पानी पियें | बीच में आवश्यकता पड़ने पर एक-दो घूंट पानी पी सकते हैं |
अग्नि (धूप) :
- सूर्य का प्रकाश भी स्वस्थ्य रहने के लिए अति आवश्यक है |
- हमारा घर ऐसा होना चाहिए जिसमे पर्याप्त प्रकाश आता हो |
- सूर्य की किरणे, सात दृश्य तथा अन्य अदृश्य किरणों से बनीं हैं | उनका अपना-अपना प्रभाव होता है | यह हमारे शरीर को विटमिन- डी प्राप्त करने में अत्यंत सहायक हैं |
- प्रतिदिन प्रातःकाल हल्की धूप में खड़े होकर सूर्य की किरणों के सेवन से त्वचा जीवंत एवं मन प्रफुल्लित होता है |
- सूर्य की किरणे शरीर को सक्रिय और संस्थानों को क्रियाशील बनाती हैं |
वायु :
- अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ वायु का सेवन आवश्यक है |
- हमें खुले वातावरण में रहकर शुद्ध वायु के अधिकाधिक सेवन का प्रयास करना चाहिए |
- हमारा घर ऐसा हो जिसमें वायु का निर्बाध प्रवेश हो | विशेषकर सोने का कमरा पर्याप्त हवादार हो | सोते समय खिड़कियाँ खुली रखनी चाहिए |
- जब भी संभव हो बाहर खुली हवा में टहलना और गहरी साँस लेना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक है |
आकाश :
- शरीर में आकाश का प्रतिनिधित्व उपवास द्वारा होता है |
- शरीर के संस्थानों का कार्य सुचारू रूप से चले इसके लिए हमें सप्ताह में एक दिन उपवास/रसाहार या फलाहार अवश्य करना चाहिए |
- उपवास/ रसाहार/ फलाहार में नींबू, पानी और शहद या मौसम के ताज़े रसदार फल दिन में 3-4 बार लिए जाने चाहिए |
- उपवास से मन को शांति मिलती है तथा शरीर के समस्त स्रोतों की शुद्धि हो जाती है | इससे पाचन संस्थान गतिशील हो जाता है |
व्यायाम :
- प्रातःकाल दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर कुछ व्यायाम करें ताकि शरीर में रक्त संचार सुचारू रूप से हो सके |
- प्रातःकाल टहलना, जागिंग, धीरे-धीरे दौड़ना, योगाभ्यास, प्राणायाम अथवा सूर्य नमस्कार में से किसी का भी चुनाव किया जा सकता है |
- टहलते समय ध्यान रखें कि वह स्थान खुला एवं प्रदुषण रहित हो |
- गहरी श्वास लेते हुए तेज गति से टहलना अधिक लाभदायक है, पर अपनी क्षमता के अनुसार ही टहलना या व्यायाम करना चाहिए |
- योगासनों का चुनाव करते समय किसी योग चिकित्सक का मार्गदर्शन लेना अधिक उपयोगी रहेगा |
- टहलना अथवा योगाभ्यास जो भी करें नियमित रूप से करें तभी उसका अच्छा परिणाम मिलेगा |
- योगाभ्यास या टहलने जाने से पूर्व एक गिलास नींबू पानी ले सकते हैं किन्तु इसके तुरंत पहले अथवा तुरंत बाद में कुछ भी खाने से बचना चाहिए |
मालिश :
- शरीर की मालिश भी स्वस्थ्य रहने के लिए आवश्यक है |
- इससे अंग-प्रत्यंग पुष्ट होते हैं और रक्त संचार उन्नत होता है |
- विशेषकर जाड़े के दिनों में पूरे शरीर पर प्रतिदिन तेल की मालिश करनी चाहिए | इसके बाद धूप में बैठने से शरीर सदैव स्वस्थ्य एवं क्रियाशील बना रहता है |
- मालिश के लिए सरसों अथवा तिल का तेल प्रयोग में लाया जा सकता है |
स्वच्छता :
- अपने शरीर घर एवं आस-पास के वातावरण को स्वच्छ रखना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है |
- पहनने के वस्त्र हमेशा सूती होने चाहिए |
- वस्त्र ढीले एवं सुविधाजनक होने चाहिए |
- वस्त्रों को रोज धोना चाहिए |
- ताज़े जल से रोज स्नान करके शरीर को स्वच्छ करना चाहिए |
- नहाते समय पानी सर्वप्रथम सिर पर डालना चाहिए तथा आँखों पर ठंडे पानी के छींटे डालने चाहिए |
भोजन :
- स्वस्थ्य रहने के लिए भोजन सात्विक एवं संतुलित होना चाहिए |
- हमें अपना भोजन प्राकृतिक या अधिक से अधिक प्राकृतिक रूप में ही लेना चाहिए |
- मौसम के ताज़े फलों, ताज़ी हरी पत्तेदार सब्जियों तथा अमृताहर (अंकुरित अन्न) को भोजन में पर्याप्त स्थान देना चाहिए |
- भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए | सामान्यतः इसका समय निश्चित करते हुए दिन में दो बार ही भोजन करना चाहिए |
- शाम का भोजन सूर्यास्त से पूर्व या सोने के तीन घंटे पहले कर लेना अधिक श्रेयस्कर है |
- बार-बार खाने से पाचन संस्थान को अधिक परिश्रम करना पड़ता है | इसलिए इस प्रवृत्ति से बचना चाहिए |
- कहीं बाहर से लौटने पर या काम की थकान होने पर तुरंत भोजन न करके पहले थोडा विश्राम करके ही भोजन करना चाहिए |
- शीतगृह के मंहगे फलों की अपेक्षा मौसम के ताज़े फल तथा स्थानीय फलों व सब्जियों का सेवन अधिक लाभदायक होता है |
- रोग की अवस्था में भोजन को त्याग देना उचित है |
- दो प्रधान भोजनों के बीच भूख लगने पर फल, फलों का रस, छाछ या नींबू पानी लिए जा सकते हैं |
- भोजन शांतिपूर्वक बैठकर खूब चबा-चबाकर मनोयोग से करना चाहिए |
- भोजन करने के पूर्व हाथ, पैर एवं मुंह धो लेना चाहिए |
- भोजन करते समय केवल भोजन ही करना चाहिए | मौन रहकर भोजन करना सर्वश्रेष्ठ है |
- भोजन एकांत स्थान और शुद्ध वातावरण में स्वच्छ पात्रों में करना चाहिए |
- सदैव भूख से थोडा कम भोजन करना चाहिए |
- क्रोध एवं अवसाद में भोजन करना हानिप्रद है | अतः ऐसे में भोजन को त्याग देना उचित होगा |
- भोजन में क्षारीय और अम्लीय आहार का अनुपात 80 एवं 20 प्रतिशत का होना चाहिए |क्षारीय आहार में अधिकांश फल, सब्जियां तथा अपक्वाहार आते हैं | अम्लीय आहार में ब्रेड, रोटी, मसालेदार सब्जियां, तली-भुनी चीजें तथा कॉफ़ी, चाय इत्यादि खाद्य पदार्थ आते हैं | पाचन में अंतिम परिणाम के आधार पर नींबू आदि को भी क्षारीय खाद्य पदार्थों में गिना जाता है |
- फ्रिज से निकाले गये फलों को यदि लेना हो तो तत्काल न खाकर उनका तापमान शरीर के तापमान से कम अंतर होने पर ही लेना चाहिए |
- भोजन के साथ पर्याप्त मात्रा में सलाद अवश्य लेना चाहिए |
- रोटी बनाने के लिए आटा मोटा पिसा हुआ होना चाहिए या अलग से चोकर मिलाया जा सकता है |
- भोजन में नमक का प्रयोग सीमित रखना चाहिए |
- स्वास्थ्य की दृष्टि से शाकाहार सर्वोत्तम है |
- उत्तेजक पेय पदार्थों, गरिष्ठ, तामसिक आहारों, मैदे एवं चीनी से बनी चीजों का प्रयोग करने से बचना चाहिए |
विश्राम :
- अच्छे स्वास्थ्य के लिए शरीर की क्रियाओं और विश्राम में सामंजस्य होना आवश्यक है |
- विश्राम या निद्रा के लिए रुई का पतला गद्दा बिछाकर लकड़ी के तख़्त का उपयोग करना चाहिए |
- विश्राम तन और मन दोनों को शांति मिलती है | शरीर शिथिल और तनाव रहित होकर पुनः कार्य के लिए तैयार हो जाता है |
- सोते समय हल्के वस्त्र पहनकर व ठंडे पानी से हाथ, पैर व मुंह धोकर सोना चाहिए | अनिद्रा के शिकार हों तो गर्म पाद स्नान करके सोयें |
- सोते समय मुंह को ढककर सोने से बचना चाहिए |
- रात्रि में जल्दी सोयें एवं प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठ जाएँ |
- सोते समय सभी चिंताओं को भुला दें | ईश्वर का नाम लेते हुए गहरी नींद लेने से शारीरिक थकान दूर होती है |
- 6 से 8 घंटे की नींद एक व्यक्ति के लिए पर्याप्त है |
सदाचार :
- शरीर और मन को स्वस्थ्य रखने के लिए सदाचार का पालन आवश्यक है |
- आपस में प्रेमभाव रखते हुए सभी जीवों को शारीरिक, वाचिक और मानसिक रूप से कष्ट पहुँचाने से बचना चाहिए |
- सदा सत्य का आश्रय लेते हुए जो वस्तु जैसी हो उसका वैसा ही वर्णन मानना-जानना चाहिए |
- किसी दूसरे की वस्तु पर अपना अधिकार जताने से बचना चाहिए |
- अपने जीवन और आचरण को सयंमपूर्ण बनाना चाहिए जिससे बल और वीर्य की वृद्धि हो तथा ईश्वर के प्रति निष्ठा का भाव जागृत हो |
- जीवन निर्वाह के लिए जो वस्तुएं आवश्यक हैं उनसे अधिक का संग्रह करने से बचना चाहिए |
- शरीर के अंगों को बाहर-भीतर से शुद्ध रखते हुए ईर्ष्या, द्वेष, अभिमान, घृणा आदि बुरे विचारों को मन से दूर रखना चाहिए |
- अपनी क्षमता के अनुसार उचित प्रयत्न से जो फल मिले अथवा जिस अवस्था में रहना पड़े उसमे प्रसन्न रहते हुए सब प्रकार के लोभ और तृष्णा को छोड़ देना चाहिए |
- शरीर, प्राण, इन्द्रियों और मन को उचित रीति और अभ्यास से वश में रखना चाहिए |
- आत्मज्ञान और ईश्वरीय ज्ञान कराने वाले शास्त्रों का नियमित पठन-पाठन और चिंतन-मनन करना चाहिए |
- ईश्वर की सदा समीपता अनुभव करना और कर्मफल का उसी को समर्पण, जीवन को सुखी बनाने का महामंत्र है |
प्रार्थना :
- अपनी आस्था के अनुसार प्रार्थना, ध्यान, भजन या सत्संग अवश्य करना चाहिए |
- प्रार्थना से तनाव दूर होता है, आत्मबल एवं सात्विक प्रवृत्ति बढती है तथा कुण्ठा, निराशा एवं मानसिक विकार दूर होते हैं |

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