आसन अष्टांग योग की तीसरी सीढी है। बहुत से आसनों की परिकल्पना विभिन्न जीव जन्तुओं की शारीरिक बनाबट के आधार पर की गई है, उन्ही में एक आसन है भुजंगासन। इस आसन में शारीरिक स्थिति फन उठाये सर्प के समान हो जाती है इसलिए इसे सर्पासन या भुजंगासन नाम दिया गया है।
यह अभ्यास 3-4 बार करें।
लाभ:-
- भुजंगासन में रीढ़ की हडडी पीछे की ओर आकुन्चित होती है एवं उदर की
- मांसपेशिया विस्तृत होती हैं जिससे रीढ व पेट में सक्रियता बढ़ती है।
- भुजंगासन से एड्रिनल ग्रन्थि सक्रिय होती है जिससे शरीर में एड्रिनलीन हार्मोन का संतुलन होता है। यह हार्मोन शरीर की स्फूर्ति को बढाता है।
- पेट में धनात्मक दबाब बढ़कर गुर्दो को दबाता है, भुजंगासन की अन्तिम स्थिति में गुर्दो में रक्त का प्रवाह अधिक मात्रा में पहुचकर गुर्दो को स्वास्थ्य प्रदान करता है।
- स्त्रियों के गर्भाशय संबन्धी रोगों को दूर करता हैं।
- रीढ़ के लगभग सभी रोगों में लाभकारी है।
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