परिचय
उच्चरक्तचाप हमारी जीवन शैली में निरंतर हो रहे आकस्मिक बदलावों का प्रतीक है | समाज में उच्चरक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों की बढ़ रही संख्या इस बात को दर्शाती है कि हम प्रकृति से विमुख होकर कृतिम जीवन शैली की ओर आकर्षित हो रहे हैं , जिसका दुष्परिणाम उच्चरक्तचाप,मोटापा,हृदयरोग, अनिद्रा, दमा तथा मधुमेह जैसे रोगों के रूप में सामने आ रहा है | बड़े-बड़े शहरों में रहने वाले अनेक लोग आज उच्चरक्तचाप से पीड़ित हैं क्योंकि उनके जीवन में शांति का स्थान कभी न ख़त्म होने वाली प्रतिस्पर्धा ने ले लिया है |
लक्षण :
उच्चरक्तचाप प्रायः किसी गंभीर रोग का सूचक होता है | इसलिए यह आवश्यक है कि इस बात कि जाँच कर ली जाय, ताकि तदनुसार मूल रोग की चिकित्सा की जा सके | अन्य अनेक रोगों की भांति साधारणतया उच्चरक्तचाप का कारण भी अधिक मानसिक श्रम और तनावपूर्ण दिनचर्या है | खान-पान और रहन-सहन की गलत आदतों के साथ उत्पन्न नकारात्मक विचारधारा और प्रतिस्पर्धात्मक जीवन शैली इस रोग को बढ़ावा देते हैं | कई बार किन्ही औषधियों के दुष्प्रभाव से भी रक्तचाप को बढ़ते हुए देखा गया है | फिर भी इन कारणों को निम्नानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है -
एक स्वस्थ्य व्यक्ति का रक्तचाप सिस्टोलिक ११०-१२० mm of Hg. तथा डायस्टोलिक ७०-८० mm of Hg. तक होता है | इससे कम रक्तचाप होने पर निम्नरक्तचाप तथा अधिक होने पर उसे उच्चरक्तचाप की संज्ञा दी जाती है |
उच्चरक्तचाप के दुष्प्रभाव :
उच्चरक्तचाप को साईलेंट किलर यानि धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाने वाला रोग माना जाता है |इसके दुष्प्रभावों में लकवा, मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं का फट जाना, हृदयावरोध तथा हृद्पात आदि प्रमुख हैं |
यौगिक चिकित्सा :
उच्चरक्तचाप के नियंत्रण और प्रबंधन में योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अत्यंत लाभकारी है |रक्चाप बढे होने की स्थिति में शिथिलीकरण वाले आसनों का अभ्यास करना चाहिए | गहरे श्वास-प्रश्वास एवं कुम्भक न करके सुखासन या वज्रासन में बैठकर केवल रेचक-पूरक का अभ्यास करना चाहिए | थकान महसूस होने पर तत्काल शवासन का अभ्यास करना चाहिए | चंद्रभेदी प्राणायाम रक्चाप को कम करने में सहायक है |
रक्चाप बढ़ा हुआ न होने पर कटिचक्रासन,ताड़ासन, उर्ध्वहस्तोतानासन, भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, पवनमुक्तासन तथा शवासन का अभ्यास करना उपयुक्त है | शरीर शोधन की प्रक्रियाओं तथा जलनेति आदि का प्रयोग लाभप्रद है | योगनिद्रा का विधिपूर्वक एवं नियमित अभ्यास बढे हुए रक्तचाप को कम करने में अत्यंत आश्चर्यजनक प्रभाव दिखता है | ध्यान के नियमित अभ्यास से उच्चरक्तचाप के लक्षणों के उत्पन्न होने की सम्भावना अत्यंत कम हो जाती है |
प्राकृतिक चिकित्सा :
प्राकृतिक उपचारों से उच्चरक्तचाप के रोगियों को अत्यंत लाभ मिलता है | इन उपचारों में पेट एवं माथे पर मिटटी की पट्टी, एनिमा, गरम पाद स्नान तथा रीढ़ स्नान प्रमुख हैं | विशेष रूप से ठन्डे रीढ़स्नान का प्रयोग इसमें लाभकारी है | रीढ़ पर ठंडी पट्टी का प्रयोग भी किया जा सकता है | विशेष उपचारों में सप्ताह में एक बार पूरे शरीर पर मिटटी का लेप भी लाभ पहुँचाता है | हरे रंग की बोतल में तैयार किये गए सूर्यतप्त जल का आधा कप खाली पेट सुबह-शाम सेवन भी उच्चरक्तचाप को कम करने में सहायक सिद्ध होता है |उच्चरक्तचाप के रोगियों को अपनी दिनचर्या प्रातः कल टहलने से प्रारंभ करनी चाहिए | चिंता एवं तनाव आदि को अपने ऊपर हावी न होने देकर यथासंभव प्रकृति के नजदीक रहने का प्रयास करना चाहिए |
आहार चिकित्सा :
उच्चरक्तचाप की चिकित्सा में आहार का महत्वपूर्ण स्थान है | आहार ऐसा होना चाहिए जो कब्जकारक न होकर कब्ज को दूर करने वाला हो | कुछ समय तक फलाहार का प्रयोग करके चिकित्सा प्रारंभ करना उपयुक्त होता है | ऐसे रोगियों को नमक का उपयोग बिलकुल सीमित मात्रा में करना चाहिए | फलाहार में मौसम के ताजे फलों का सेवन दिन में तीन-चार बार किया जा सकता है | भोजन करते समय केवल भोजन पर ही ध्यान देकर खूब चबा -चबा कर भोजन करना चाहिए | तामसिक, बसी, गरिष्ठ, नमकीन तथा बेसन, चीनी आदि से बने पदार्थों तथा मांसाहार, धुम्रपान, मद्यपान का प्रयोग न करना ऐसे रोगियों के लिए श्रेयस्कर है|
उच्चरक्तचाप के एक रोगी की दैनिक आहार तालिका निम्नानुसार निर्धारित की जा सकती है :-
उच्चरक्तचाप को जीवन शैली का रोग माना जाता है | इसलिए ऐसे रोगियों के लिए आवश्यक है कि वे अपने खान-पान, रहन-सहन और विचारधारा में सकारात्मक परिवर्तन लायें | कृतिम जीवन शैली को छोड़कर यथासंभव प्रकृति के निकट रहने का प्रयास करें | प्रातःकाल टहलना तथा रात्रि को समय से सो जाना ऐसे रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध होता है | अधिक भागदौड़ तथा मानसिक तनाव बढ़ाने वाले कार्यों एवं धूम्रपान व् मद्यपान से बचना उच्चरक्तचाप से मुक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है |
उच्चरक्तचाप की चिकित्सा करते समय इसके कारणों की जाँच अवश्य कर लेनी चाहिए ताकि तदनुसार चिकित्सा की जा सके | किसी योग चिकित्सक के मार्गदर्शन में यौगिक क्रियायों का अभ्यास करना चाहिए |
स्रोत :- केन्द्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकिसा अनुसन्धान परिषद् |
उच्चरक्तचाप हमारी जीवन शैली में निरंतर हो रहे आकस्मिक बदलावों का प्रतीक है | समाज में उच्चरक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों की बढ़ रही संख्या इस बात को दर्शाती है कि हम प्रकृति से विमुख होकर कृतिम जीवन शैली की ओर आकर्षित हो रहे हैं , जिसका दुष्परिणाम उच्चरक्तचाप,मोटापा,हृदयरोग, अनिद्रा, दमा तथा मधुमेह जैसे रोगों के रूप में सामने आ रहा है | बड़े-बड़े शहरों में रहने वाले अनेक लोग आज उच्चरक्तचाप से पीड़ित हैं क्योंकि उनके जीवन में शांति का स्थान कभी न ख़त्म होने वाली प्रतिस्पर्धा ने ले लिया है |
लक्षण :
- मोटापा
- सिर में दर्द
- साँस फूलना
- अधिक थकान महसूस होना
- नींद न आना
- दिल की धड़कन बढ़ जाना
- छाती में खिंचावट महसूस होना
- चहरे या कानों का तमतमाना
- घबराहट
- बात-बात में चिडचिडाहट एवं क्रोध
- चक्कर आना
- कभी-कभी नाक से खून आना
उच्चरक्तचाप प्रायः किसी गंभीर रोग का सूचक होता है | इसलिए यह आवश्यक है कि इस बात कि जाँच कर ली जाय, ताकि तदनुसार मूल रोग की चिकित्सा की जा सके | अन्य अनेक रोगों की भांति साधारणतया उच्चरक्तचाप का कारण भी अधिक मानसिक श्रम और तनावपूर्ण दिनचर्या है | खान-पान और रहन-सहन की गलत आदतों के साथ उत्पन्न नकारात्मक विचारधारा और प्रतिस्पर्धात्मक जीवन शैली इस रोग को बढ़ावा देते हैं | कई बार किन्ही औषधियों के दुष्प्रभाव से भी रक्तचाप को बढ़ते हुए देखा गया है | फिर भी इन कारणों को निम्नानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है -
- धूम्रपान व् मद्यपान का लम्बे समय से सेवन
- मांसाहार
- मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध एवं असहिष्णुता की भावना
- व्यायाम का आभाव
- नमक का अधिक प्रयोग
- औषधियों का निरंतर सेवन
- मोटापा
- गुर्दे की खराबी
- अनिद्रा या रात्रि जागरण
- ऊँची महत्वाकांक्षाएं
एक स्वस्थ्य व्यक्ति का रक्तचाप सिस्टोलिक ११०-१२० mm of Hg. तथा डायस्टोलिक ७०-८० mm of Hg. तक होता है | इससे कम रक्तचाप होने पर निम्नरक्तचाप तथा अधिक होने पर उसे उच्चरक्तचाप की संज्ञा दी जाती है |
उच्चरक्तचाप के दुष्प्रभाव :
उच्चरक्तचाप को साईलेंट किलर यानि धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाने वाला रोग माना जाता है |इसके दुष्प्रभावों में लकवा, मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं का फट जाना, हृदयावरोध तथा हृद्पात आदि प्रमुख हैं |
यौगिक चिकित्सा :
उच्चरक्तचाप के नियंत्रण और प्रबंधन में योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अत्यंत लाभकारी है |रक्चाप बढे होने की स्थिति में शिथिलीकरण वाले आसनों का अभ्यास करना चाहिए | गहरे श्वास-प्रश्वास एवं कुम्भक न करके सुखासन या वज्रासन में बैठकर केवल रेचक-पूरक का अभ्यास करना चाहिए | थकान महसूस होने पर तत्काल शवासन का अभ्यास करना चाहिए | चंद्रभेदी प्राणायाम रक्चाप को कम करने में सहायक है |
रक्चाप बढ़ा हुआ न होने पर कटिचक्रासन,ताड़ासन, उर्ध्वहस्तोतानासन, भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, पवनमुक्तासन तथा शवासन का अभ्यास करना उपयुक्त है | शरीर शोधन की प्रक्रियाओं तथा जलनेति आदि का प्रयोग लाभप्रद है | योगनिद्रा का विधिपूर्वक एवं नियमित अभ्यास बढे हुए रक्तचाप को कम करने में अत्यंत आश्चर्यजनक प्रभाव दिखता है | ध्यान के नियमित अभ्यास से उच्चरक्तचाप के लक्षणों के उत्पन्न होने की सम्भावना अत्यंत कम हो जाती है |
प्राकृतिक चिकित्सा :
प्राकृतिक उपचारों से उच्चरक्तचाप के रोगियों को अत्यंत लाभ मिलता है | इन उपचारों में पेट एवं माथे पर मिटटी की पट्टी, एनिमा, गरम पाद स्नान तथा रीढ़ स्नान प्रमुख हैं | विशेष रूप से ठन्डे रीढ़स्नान का प्रयोग इसमें लाभकारी है | रीढ़ पर ठंडी पट्टी का प्रयोग भी किया जा सकता है | विशेष उपचारों में सप्ताह में एक बार पूरे शरीर पर मिटटी का लेप भी लाभ पहुँचाता है | हरे रंग की बोतल में तैयार किये गए सूर्यतप्त जल का आधा कप खाली पेट सुबह-शाम सेवन भी उच्चरक्तचाप को कम करने में सहायक सिद्ध होता है |उच्चरक्तचाप के रोगियों को अपनी दिनचर्या प्रातः कल टहलने से प्रारंभ करनी चाहिए | चिंता एवं तनाव आदि को अपने ऊपर हावी न होने देकर यथासंभव प्रकृति के नजदीक रहने का प्रयास करना चाहिए |
आहार चिकित्सा :
उच्चरक्तचाप की चिकित्सा में आहार का महत्वपूर्ण स्थान है | आहार ऐसा होना चाहिए जो कब्जकारक न होकर कब्ज को दूर करने वाला हो | कुछ समय तक फलाहार का प्रयोग करके चिकित्सा प्रारंभ करना उपयुक्त होता है | ऐसे रोगियों को नमक का उपयोग बिलकुल सीमित मात्रा में करना चाहिए | फलाहार में मौसम के ताजे फलों का सेवन दिन में तीन-चार बार किया जा सकता है | भोजन करते समय केवल भोजन पर ही ध्यान देकर खूब चबा -चबा कर भोजन करना चाहिए | तामसिक, बसी, गरिष्ठ, नमकीन तथा बेसन, चीनी आदि से बने पदार्थों तथा मांसाहार, धुम्रपान, मद्यपान का प्रयोग न करना ऐसे रोगियों के लिए श्रेयस्कर है|
उच्चरक्तचाप के एक रोगी की दैनिक आहार तालिका निम्नानुसार निर्धारित की जा सकती है :-
- प्रातः :- एक गिलास पानी + नींबू + २ चम्मच शहद |
- नाश्ता :- मौसम का कोई एक फल जैसे पपीता, अमरुद या अम्रिताहर (अंकुरित मुंग + मेथी ) या मौसमी फल का रस – एक गिलास |
- दोपहर :- चोकर सहित मोटे आंटे की रोटी -एक या दो + उबली हरी सब्जी + सलाद + दही |
- सायंकाल :- मौसम का कोई एक फल या फल का रस या नींबू + एक गिलास पानी + शहद २ चम्मच |
- रात्रि का भोजन :- गेहूं का दलीय + उबली सब्जी या चोकर सहित मोटे आंटे की रोटी -एक या दो + उबली हरी सब्जी |
उच्चरक्तचाप को जीवन शैली का रोग माना जाता है | इसलिए ऐसे रोगियों के लिए आवश्यक है कि वे अपने खान-पान, रहन-सहन और विचारधारा में सकारात्मक परिवर्तन लायें | कृतिम जीवन शैली को छोड़कर यथासंभव प्रकृति के निकट रहने का प्रयास करें | प्रातःकाल टहलना तथा रात्रि को समय से सो जाना ऐसे रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध होता है | अधिक भागदौड़ तथा मानसिक तनाव बढ़ाने वाले कार्यों एवं धूम्रपान व् मद्यपान से बचना उच्चरक्तचाप से मुक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है |
उच्चरक्तचाप की चिकित्सा करते समय इसके कारणों की जाँच अवश्य कर लेनी चाहिए ताकि तदनुसार चिकित्सा की जा सके | किसी योग चिकित्सक के मार्गदर्शन में यौगिक क्रियायों का अभ्यास करना चाहिए |
स्रोत :- केन्द्रीय योग एवं प्राकृतिक चिकिसा अनुसन्धान परिषद् |
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