लाभ :
विधि :
सबसे छोटी उंगली (जल तत्व) एवं अनामिका उंगली (पृथ्वी तत्व) के पोरों को अंगूठें के पोर (अग्नि तत्व) से मिलाकर जो मुद्रा बनती है उसे प्राण मुद्रा कहते हैं। प्राणमुद्रा अत्यंत प्रभावकारी मुद्रा है।
कितने समय तक करें
प्राणमुद्रा का अभ्यास अधिकतम 48 मिनट तक कर सकते हैं | यदि एकसाथ इस मुद्रा को नहीं कर सकते तो इसका अभ्यास 2-3 बार मे 16-16 मिनट में करके पूरा कर सकते है।
- ह्रदय रोग में रामबाण तथा नेत्रज्योति बढाने में यह मुद्रा बहुत सहायक है।
- प्राणमुद्रा के निरंतर अभ्यास से व्यक्ति तेजस्वी बनता है।
- प्राणमुद्रा करने से पूरे शरीर में ताकत पैदा हो जाती है तथा लकवे
के रोग के कारण आई हुई कमजोरी भी दूर होती है। - यह मुद्रा शरीर की कमजोरी, मन की बैचेनी और कठोरता को दूर
करती है। - प्राण शक्ति की कमी को प्राण मुद्रा द्वारा बढ़ाया जा सकता है
- इससे सांस की नली ठीक रहती है।

विधि :
सबसे छोटी उंगली (जल तत्व) एवं अनामिका उंगली (पृथ्वी तत्व) के पोरों को अंगूठें के पोर (अग्नि तत्व) से मिलाकर जो मुद्रा बनती है उसे प्राण मुद्रा कहते हैं। प्राणमुद्रा अत्यंत प्रभावकारी मुद्रा है।
कितने समय तक करें
प्राणमुद्रा का अभ्यास अधिकतम 48 मिनट तक कर सकते हैं | यदि एकसाथ इस मुद्रा को नहीं कर सकते तो इसका अभ्यास 2-3 बार मे 16-16 मिनट में करके पूरा कर सकते है।
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