Friday, March 6

गिलोय द्वारा त्वचा रोगों का निवारण




विभिन्न भाषाओं में नाम :
                      हिन्दी-       गिलोय
                      अंग्रेजी-      गुलाचा
                      संस्कृत-     गुडूची
                      मराठी-      गुलबेल
                      बंगाली-     गुलंच
                      फारसी-     गलोय
                      गुजराती-    गलो
                      तेलगू-       तियातिज
                      अरबी-      गिलाइ
                      लैटिन-      टिनोस्पोरा कोर्डिफोलिया
रंग: - गिलोय हरे रंग की होती है।
स्वाद: - गिलोय खाने में तीखी होती है।
स्वरूप: - गिलोय एक प्रकार की बेल होती है जो बहुत लम्बी होती है। इसके पत्ते पान के पत्तों के समान होते हैं। इसके फूल छोटे-छोटे गुच्छों में लगते हैं। इसके फल मटर के दाने के जैसे होते हैं।
प्रकृति: - गिलोय की प्रकृति गर्म होती है।
मात्रा: - गिलोय की 20 ग्राम मात्रा में सेवन कर सकते हैं।
गुण: - गिलोय पुरानी पैत्तिक और रक्तविकार वाले बुखारों का ठीक कर सकती है। यह खांसी, पीलिया, उल्टी और बेहोशीपन को दूर करने के लिए लाभकारी है। यह कफ को छांटता है। धातु को पुष्ट करता है। भूख को खोलता है। वीर्य को पैदा करता है तथा उसे गाढा करता है, यह मल का अवरोध करती है तथा दिल को बलवान बनाती है। गिलोय गुण में हल्की, चिकनी, प्रकृति में गर्म, पकने पर मीठी, स्वाद में तीखी, कड़वी, खाने में स्वादिष्ट, भारी, शक्ति तथा भूख को बढ़ाने वाली, वात-पित्त और कफ को नष्ट करने वाली, खून को साफ करने वाली, धातु को बढ़ाने वाली, प्यास, जलन, ज्वर, वमन, पेचिश, खांसी, बवासीर, गठिया, पथरी, प्रमेह, नेत्र, केश और चर्म रोग, अम्लपित्त, पेट के रोग, मूत्रावरोध (पेशाब का रुकना), मधुमेह, कृमि और क्षय (टी.बी.) रोग आदि को ठीक करने में लाभकारी है।
गिलोय का उपयोग:
                      घी के साथ गिलोया का सेवन करने से वात रोग नष्ट होता है।
                      गुड़ के साथ गिलोय का सेवन करने से कब्ज दूर होती है।
                      खाण्ड के साथ गिलोया का सेवन करने से पित्त दूर होती है।
                      शहद के साथ गिलोय का सेवन करने से कफ की शिकायत दूर होती है।
                      रेण्डी के तेल के साथ गिलोय का उपयोग करने से गैस दूर होती है।
                      सोंठ के साथ गिलोय का उपयोग करने से गठिया रोग ठीक होता है।
        
 गिलोय में गिलोइन नामक कड़वा ग्लूकोसाइड, वसा अल्कोहल ग्लिस्टेराल, बर्बेरिन एल्केलाइड, अनेक प्रकार की वसा अम्ल एवं उड़नशील तेल पाये जाते हैं। पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन, फास्फोरस और तने में स्टार्च भी मिलता है। कई प्रकार के परीक्षणों से ज्ञात हुआ की वायरस पर गिलोय का प्राणघातक असर होता है। इसमें सोडियम सेलिसिलेट होने के कारण से अधिक मात्रा में दर्द निवारक गुण पाये जाते हैं। यह क्षय रोग के जीवाणुओं की वृद्धि को रोकती है। यह इन्सुलिन की उत्पत्ति को बढ़ाकर ग्लूकोज का पाचन करना तथा रोग के संक्रमणों को रोकने का कार्य करती है।


रक्तपित्त (खूनी पित्त):
         10-10 ग्राम मुलेठी, गिलोय, और मुनक्का को लेकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं। इस काढ़े को 1 कप रोजाना 2-3 बार पीने से रक्तपित के रोग में लाभ मिलता है।
खुजली :
         हल्दी को गिलोय के पत्तों के रस के साथ पीसकर खुजली वाले अंगों पर लगाने और 3 चम्मच गिलोय का रस और 1 चम्मच शहद को मिलाकर सुबह-शाम पीने से खुजली पूरी तरह से खत्म हो जाती है।

         बवासीर, कुष्ठ और पीलिया:
7 से 14 मिलीलीटर गिलोय के तने का ताजा रस शहद के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से बवासीर, कोढ़ और पीलिया का रोग ठीक हो जाता है।
चेहरे के दाग-धब्बे:
गिलोय की बेल पर लगे फलों को पीसकर चेहरे पर मलने से चेहरे के मुंहासे, फोड़े-फुंसियां और झाइयां दूर हो जाती है।
शीतपित्त (खूनी पित्त):
                      10 से 20 ग्राम गिलोय के रस में बावची को पीसकर लेप बना लें। इस लेप को खूनी पित्त के दानों पर लगाने तथा मालिश करने से शीतपित्त का रोग ठीक हो जाता है।
घाव (व्रण):
                      4 ग्राम से 6 ग्राम गिलोय का काढ़ा प्रतिदिन पीने से घाव ठीक हो जाता है।
उपदंश (फिरंग):
                      गिलोय के काढ़े में 10-20 मिलीलीटर अरण्डी का तेल मिलाकर पीने से उपदंश रोग में लाभ मिलता है। इसको खाने से खून साफ होता है और गठिया-रोग भी ठीक हो जाता है।
कुष्ठ (कोढ़):
                      100 मिलीलीटर बिल्कुल साफ गिलोय का रस और 10 ग्राम अनन्तमूल का चूर्ण 1 लीटर उबलते हुए पानी में मिलाकर किसी बंद बर्तन में 2 घंटे के लिये रखकर छोड़ दें। 2 घंटे के बाद इसे बर्तन में से निकालकर मसलकर छान लें। इसमें से 50 से 100 ग्राम की मात्रा प्रतिदिन दिन में 3 बार सेवन करने से खून साफ होकर कुष्ठ (कोढ़) रोग ठीक हो जाता है।
सफेद दाग:
                      सफेद दाग के रोग में 10 से 20 मिलीलीटर गिलोय के रस को रोजाना 2-3 बार कुछ महीनों तक सफेद दाग के स्थान पर लगाने से लाभ मिलता है।

Saturday, February 22

नेचुरल कॉफी घर पर बनाएँ, हानिकारक चाय-कॉफी से छुटकारा पाएँ !

हम आपको एक ऐसा नुस्खा बताने जा रहे हैं जो शायद आज तक किसी ने ही सुना या प्रयोग किया होगा | एक ऐसा नुस्खा जिसे यदि किसी व्यक्ति को बिना बताए पिलाया जाए तो वह यह जान नहीं पाएगा कि यह कॉफी थी या कुछ और, क्योंकि इस नुस्खे के द्वारा बनाई गयी कॉफी का स्वाद व स्मेल बिलकुल कॉफी की तरह ही होती है | इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर को कोई नुकसान भी नहीं करती, बल्कि इसके फायदे ही फायदे हैं | विश्वास नहीं होता .... तो देर किस बात की है, नीचे दी गयी विधि से कॉफी बनाएँ और इसके स्वास्थ्य लाभ लें -
आवश्यक सामग्री :
  1. गेहूं
  2. मेथी
इन दोनों को बराबर मात्रा मे ले लें और इन्हे अलग-अलग कड़ाही मे अच्छे से भून लें | ठंडा हो जाने पर इन्हे एक मे मिलाकर मिक्सी मे पीसकर पाउडर बना लें | बस तैयार है आपकी नेचुरल कॉफी | एक कप गरम दूध मे एक चम्मच इस पाउडर को मिलाएँ | स्वादानुसार चीनी या शहद मिला सकते हैं | नेचुरल कॉफी का आनंद लें | इससे न सिर्फ कब्ज,गैस, जैसी बीमारियाँ ठीक होंगी, हानिकारक चाय या कॉफी की लत भी छूट जाएगी |


Saturday, January 25

कब्ज व बबासीर को दूर करने की अदभुत योग क्रिया- मूलशोधन


संस्कृत शब्द मूल का अर्थ आधार या जड़ है । यहाँ पर मूल का अर्थ मलद्वार एवं मलाशय है । शोधन का अर्थ शुद्ध करना या धोना है । इस प्रकार मूलशोधन की परिभाषा है - वह क्रिया जिससे मलद्वार और मलाशय की सफाई की जाती है । इस मूलशोधन क्रिया के अन्य कई नाम हैं , जैसे - मूलधौति व गणेश क्रिया । गणेशजी का मूलाधार चक्र से संबंध होता है । इसलिये भी इसका नाम गणेश क्रिया पड़ा है । इस क्रिया को चकरी कर्म भी कहा जाता है , क्योंकि उँगली को अंदर में चकरी की तरह गोल - गोल घुमाया जाता है ।


मूलशोधन एक सरल , किन्तु प्रभावशाली क्रिया है ।  इस विधि में उँगली से मलद्वार एवं मलाशय की सफाई करनी होती है । सभवतः आपको यह सबसे कष्टकारक और घिनौना योगाभ्यास  प्रतीत हो , परन्त यही आपके समग्र जीवन को बदल सकता है , विशेषतः आप यदि कब्ज या बवासीर ( हेमोराइड ) से पीड़ित हैं ।
यह अति सरल अभ्यास है परन्तु इसके अनेक अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं । आप अपनी झिझक को दूर करके स्वयं इस क्रिया को करने का प्रयास करें । परम्परानुसार मूल शोधन के लिए हल्दी की जड का प्रयोग किया जाता है , क्योंकि इसका औषधि के रूप में भी उपयोग होता है । यह रोगानु - रोधक तथा रक्त शुद्धि - कारक है एवं शरीर की गंदगी को बाहर निकालती है ।
हल्दी की जड़ सब जगह उपलब्ध नहीं है , अतः मलशोधन हेतु हल्दी की जड़ के स्थान पर उँगली का प्रयोग किया जा सकता है । पर ध्यान रखें कि, आपके नाखून छोटे हों तथा अभ्यास के बाद हाथों को अच्छी तरह धो लें ।
लाभ
इस क्रिया से प्राप्त होने वाले लाभों को जानने से पहले शरीर के इस भाग की संरचना को संक्षिप्त में समझ लेना उपयक्त होगा । वास्तव में यह दो भागों में विभक्त है - पहला गुदा या मलद्वार और दूसरा मलाशय । गुदा दो अवरोधिनियों में विभक्त है . जिन्हें इच्छानुसार प्रसारित व संकुचित किया जा सकता है । आप इसे करके स्वयं समझ सकते हैं । ये अवरोधिनी - पेशियाँ मलत्याग का समय आने तक गुदा को बंद रखती हैं । वास्तव में मलद्वार लगभग दो सेंटीमीटर लम्बा है तथा उसके बाद वह मलाशय में विलीन हो जाता है । मलाशय थोड़ी दूर तक ऊपर जाकर अवरोही बडी आंत के निचले भाग में मिल जाता है । जब आप मलशोधन हेतु अपनी उँगली भीतर डालते हैं तो कुछ उभरा हुआ भाग मालूम होता है । इन उभरे हए भागों की संख्या सात या आठ है तथा इनकी ऊँचाई लगभग एक सेंटीमीटर होती है । इस भाग में कुछ वाल्व भी होते हैं तथा स्नायु एवं रक्त वाहिकाएँ बहुतायत से होती हैं । ये रक्त वाहिकाएँ ही बवासीर के रूप में प्रसारित हो जाती हैं
लाभ
1 . इस क्रिया से स्नाय और रक्त वाहिकाएँ उत्प्रेरित होती हैं , जिससे उत्सर्जन प्रणाली को यथोचित रूप से कार्य करने हेत प्रोत्साहन । मिलता है ।
2 . इससे नियमित एवं तनाव - रहित मल - त्याग की आदत को । प्रोत्साहन मिलता है ।
3 . यह क्रिया कठोर , जमे हए तथा दुर्गंधयुक्त व्यर्थ पदार्थों को निकाल कर सम्पूर्ण भाग की सफाई करती है ।
4 . यह क्रिया कब्ज और बवासीर आदि रोगों का निराकरण करती है तथा उन्हें पनपने से रोकती है ।

कब्ज आधुनिक जीवन का रोग है । इस रोग के मुख्य कारण हैं - अनियमित शौच जाना व मलत्याग के समय अनावश्यक दबाव डालना , गरिष्ठ भोजन करना , जैसे मैदा से निर्मित ब्रेड आदि का सेवन इत्यादि ।
कब्ज होने पर बड़ी आँत का भाग रोगग्रस्त हो जाता है । । कब्ज का निराकरण करना अत्यन्त आवश्यक है , क्योंकि इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव शरीर के अन्य अंगों पर भी पड़ता है । यदि मलोत्सर्ग ठीक से होने लगे तो पाचन क्षेत्र के शेष भाग भी ठीक से काम करने लगेंगे । जो लोग कब्ज से पीड़ित हैं वे नियमित रूप से मूलशोधन का अभ्यास करें । यह अभ्यास है तो कछ ही मिनटों का , मगर इससे मिलने वाले लाभ बहुत हैं ।

कब्ज के साथ बवासीर भी एक सर्व सामान्य रोग है । यह सीधे कब्ज से अथवा रक्त - प्रवाह में रुकावट एवं जमने से भी हो सकता है । मलाशय के अंतिम भाग के समीप गुच्छों या जालिकाओं के आकार की असंख्य रक्त - वाहिका होती हैं । कब्ज के दौरान मलाशय में कड़ा मल संगृहीत होने लगता है तथा वह इन पतली दीवालों वाली रक्त वाहिकाओं पर दबाव डालता है । । इससे रक्त का प्रवाह धीमा तथा अवरुद्ध हो जाता है तथा वह जमने लगता है । यह जमा हुआ रक्त ( थ्रोम्बी ) रक्त वाहिकाओं को प्रसारित होने को बाध्य करता है ताकि कुछ और रक्त प्रवाहित हो सके । यह फैलाव अंदर ही ऊपर की ओर बढ़ता है | फैली हई रक्त - वाहिकाएँ कड़े व कठोर मल के कारण और प्रसारित होती हैं । इस प्रकार मलोत्सर्ग के समय वाहिकाओं में प्रदाह , उत्तेजना तथा दर्द उत्पन्न होता है । चूँकि इस क्षेत्र में रक्त अधिक मात्रा  में रहता है और वाहिकाएं खिचने के कारण सामान्य से पतली हो गई होती हैं , अत वे थोड़ा भी दबाव सहन नहीं कर पातीं और अति शीघ्र रक्त स्रवित होने लगता है तथा पपड़ी जमने लगती है । यही बवासीर की पीड़ादायक । अवस्था है । इसके निराकरन हेतु आप नियमित रूप से मूलशोधन का अभ्यास करें , परन्तु सावधानी अवश्य रखें । यदि आवश्यक हो तो इस हेतु उँगली पर किसी चिकने पदार्थ का लेप किया जा सकता है । इससे असुविधा नहीं होगी तथा वह स्थल शुष्क प्रतीत नहीं होगा ।

अभ्यास का समय
यह आपकी परिस्थिति पर निर्भर करता है । मलशोधन से जो उत्तेजना उत्पन्न होती है , वह क्रमाकंचन की प्रक्रिया शुरू कर देती है । अतः जो कब्ज से पीड़ित हैं , उन्हें मलत्याग से पूर्व मूलशोधन की क्रिया करनी चाहिये । यदि आपको नियमित शौच होता है तो मूलशोधन का अभ्यास शौच के बाद करें ।
अभ्यास
  • इस अभ्यास हेतु उकड़ू बैठना सर्वोत्तम है । भारतीय लोग शौच हेतु उकड़ू ही बैठते हैं । उकड़ू बैठने से पेट पर दबाव पड़ता है , जिससे मल को नीचे मलद्वार की ओर सरकने में सहायता मिलती है । यदि आप शौच के लिये उकड़ू न बैठते हों तो कोई बात नहीं । कम से कम मूलशोधन की क्रिया करते समय आपको उकड़ू बैठना । चाहिये । आप शौचालय में कमोड पर भी उकड़ू बैठ सकते हैं, परन्तु सावधानी रखें ।
  • उकडूं बैठ जायें ।
  • तर्जनी या माध्यमा उँगली को मलद्वार में डालें । आवश्यकता हो तो घी ,थोड़ा तेल या पानी उँगली में लगाया जा सकता है ।
  • पहले उँगली को करीब दो सेंटीमीटर अंदर डालें । उसके बाद उँगली को अंदर दोनों दिशाओं में धीरे - धीरे गोल घुमायें ।
  •  इस प्रकार करने पर धीरे - धीरे आप अपनी उँगली को मलाशय में और आगे प्रवेश कराने में सक्षम होंगे । बल प्रयोग न करें । इससे अवरोधिनी की मांसपेशियाँ शिथिल हो जायेंगी । उँगली को घुमाना और यथा संभव अंदर डालना लगातार करते जायें । इससे मलाशय के स्नाय उत्तेजित होंगे और उनकी कार्यप्रणाली सुधरेगी ।
  • अब उँगली बाहर निकालकर अच्छी तरह धो लें ।
  • पुनः ऊपर बतलाये अनुसार उँगली को अंदर डालकर कछ देर घुमायें । पुनः उँगली को निकालकर धो डालें । इसी प्रकार कई बार करें ।
  • आपको उँगली के द्वारा मलद्वार और मलाशय की दीवालों पर सौम्य , परन्तु स्थिर दबाव डालना है ।
  • यदि आप इस अभ्यास को अधिक प्रभावशाली बनाना चाहें तो अंदर ऊँगली डालते समय मलद्वार की अवरोधिनी को बारी - बारी से संकुचित एवं मुक्त करें । इससे वहाँ के स्नायओं में उत्तेजना उत्पन्न होगी और मलाशय में रक्त का प्रवाह सुचारू रूप से होने लगेगा । परिणामस्वरूप स्वास्थ्य उन्नत होगा और शरीर के इस महत्वपूर्ण अंग की कार्यप्रणाली में सुधार आयेगा ।


सावधानियाँ
·       उँगली के नाखून अच्छी तरह काट लें , क्योंकि मलद्वार तथा मलाशय अत्यधिक संवेदक अंग हैं और नाखूनों से क्षति पहँच सकती है ।
·       यदि आप नाखून काटना नहीं चाहते तो आपको हल्दी की जड़ का प्रयोग करना चाहिये ।
·       अभ्यास के बाद हाथों को अच्छी तरह साफ करें ।
·       यदि आप बवासीर से पीड़ित हों तो उँगली अंदर डालते समय सावधान रहें । इस क्रिया से आपको रोग मुक्त होने में मदद मिलेगी परन्त इसके लिये उँगली डालते समय और मालिश करते समय आपको सावधानी रखनी होगी । दर्द में जैसे - जैसे कमी होती जाये , वैसे - वैसे आप मालिश थोड़े दबाव के साथ कर सकते हैं । इस समय आपको अपने सामान्य विवेक का उपयोग करना चाहिये ।
·        अभ्यास के दौरान अपने हाथों को धोने के लिए ठंडे पानी का प्रयोग करें । यदि संभव हो तो मलद्वार को भी ठंडे पानी से धोयें । यह बहत महत्वपूर्ण है , क्योंकि ठंडा पानी उस क्षेत्र में रक्त के प्रवाह को उत्तेजित करता है । साथ ही ठंडा पानी रक्त वाहिकाओं का संकुचन करता है , जो बढ़ी शिराओं को यथा स्थान ले जाता है । इस हेतु गर्म पानी का उपयोग करने से उक्त क्रिया विपरीत दिशा में होने लगती है , अतः हमेशा ठंडे पानी का ही प्रयोग करना चाहिये ।



Monday, January 20

टॉयलेट में बैठकर एनिमा लेने की विधि, How to take JET ENIMA?





इंडियन या यूरोपियन स्टाइल के टॉयलेट में कॅमोड पर बैठकर जिसमे जेट हो ।, हैंड जेट स्प्रे को एनस के इतने करीब ले जाएं कि वह उसे छू जाए । ध्यान रहे कि हैंड जेट स्प्रे को एनस के भीतर ले जाने का प्रयास न करें । अब हैंड जेट स्प्रे में पानी की धार चालू करें ।
स्प्रे से निकलनेवाले पानी का प्रेशर इतना अधिक होता है कि पानी बड़ी आँत तक पहुंच ही जाता है । इस प्रक्रिया में बड़ी आँत पर दबाव बनने लगता है और कोलोन तथा रेक्टम के भीतर जमा मल, पुराने कठोर हो चुके मल समेत , बाहर आ जाता है । 



Saturday, October 5

इन नौ औषधियों में वास है नवदुर्गा का



By- Dr.Kailash Dwivedi
मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां,जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया। चिकित्सा प्रणाली का यह रहस्य वास्तव में ब्रह्माजी ने दिया था जिसे बारे में दुर्गाकवच में संदर्भ मिल जाता है। ये औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली हैं।

 शरीर की रक्षा के लिए कवच समान कार्य करती हैं। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जी सकता है। आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है।

प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़
 नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है।

पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान
हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता)- शिवा यानी कल्याण करने वाली।

द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी 
ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वालीऔर स्वर को मधुर करने वाली है।

इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है। यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी कीआराधना करना चाहिए।

तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर
नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है।

यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।

चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा 
नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं।

इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ितव्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए।



पंचम स्कंदमाता यानि अलसी
नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है।

"अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।"
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए।


षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया 
नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है।
इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करनी चाहिए।








सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन
दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है।

 यह नागदौन औषधि केरूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है। इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

अष्टम महागौरी यानि तुलसी 
नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र।
ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।

"तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि:
तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।"
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।

नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी
नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी याशतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है।

 सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
सर्व मंगलम मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्रयम्ब्के गौरी नारायणी नमो स्तुते।।

Wednesday, September 25

PRANAYAMA FOR HIGH BLOOD PRESSURE & HEART DISEASES





हृदय रोग एवं हाई ब्लड प्रैशर के लिए प्राणायाम !





PRANAYAMA FOR HIGH BLOOD PRESSURE & HEART DISEASES


DON'T FORGET TO CHECK OUT THESE VIDEOS ALSO
1.How to take Enema ? एनिमा कैसे ले ?-
https://www.youtube.com/watch?v=8WzYE...
2.इस विधि से पा सकते हैं कान के रोगों से छुटकारा !-
https://www.youtube.com/watch?v=gTncV...
3.एनिमा (enima) की विधि एवं लाभ-
https://www.youtube.com/watch?v=P32Z9...
4.लम्बे समय तक यौवन की रक्षा करती है यह क्रिया !-
https://www.youtube.com/watch?v=ZqKy6...
5.जल चिकित्सा (Hydrotherapy)- जल की गर्म पट्टी लपेट-
https://youtu.be/XqbcI-htBnE
6. बिना किसी दबा के -पेट की चर्बी घटाएँ एवं पुरानी कब्ज को दूर करें !
https://www.youtube.com/watch?v=Xqu1N...
7. हार्ट अटैक से बचाती है यह मुद्रा ! -
https://www.youtube.com/watch?v=fSubv...
8. इस उपचार से पा सकते हैं श्वास रोगों से छुटकारा !-
https://youtu.be/XWkFZDxx5K0
9.पेट के रोगों मे रामबाण - गर्म ठंडा कटि स्नान-
https://youtu.be/_Ugc8iM5-YQ
10. पेट के रोग, दुबलापन,गले की खराश आदि रोगों मे लाभकारी है - पृथ्वी मुद्रा-
https://youtu.be/gxinQlvgmg4
11. वायु मुद्रा - जोड़ों के दर्द निवारक मुद्रा !-
https://youtu.be/3LDwKYPqbfo
12. हृदय रोगों और हाई ब्लड प्रैशर के लिए योग-
https://youtu.be/vsmq5MUxZlc
13. उज्जायी प्राणायाम की सरल विधि-
https://youtu.be/DT2pj4BZSj4


By- Dr.Kailash Dwivedi